मंगलवार, 5 नवंबर 2024

221 2122 221 2122 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 (संशोधित रूप)


फ़िलबदीह क्रमांक -29
दिनांक - 01.11.24
क़ाफ़िया: ईर
रदीफ़: धीरे धीरे 
मिसरा-ए-तरह- आई मेरे सुखन में तासीर धीरे धीरे 
शाइर/शाइरा का नाम - राजेश रेड्डी 


221 2122 221 2122

 मेहनत से बन रही है तक़दीर धीरे धीरे
 हांडी की खीर सोंधी,  पकती है धीरे धीरे।।1।।

ऊष्मा से प्रेम की अब, पिघले न बर्फ़ मन की
इंसान की बदलती तासीर धीरे धीरे।।2।।

कब तक रखें छुपाकर, कुछ घाव हैं जो गहरे
नैनों से फिर रिसे दुख बन नीर धीरे धीरे।।3।।

 कोहरा अगर घना हो हिम्मत से पग बढ़ाना 
निकलेगा सूर्य फिर से तम चीर धीरे धीरे।।4।।

हो मौन सिर झुकाती पत्थर की नींव जब भी 
इठलाता है वहीं तब प्राचीर धीरे धीरे।।5।।

तरही मिसरा-

दोहे हों गीत ग़ज़लें, गागर में भरते सागर
आई मेरे सुखन में, तासीर धीरे धीरे।।

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शर्मिला चौहान

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