फ़िलबदीह क्रमांक- 30
रदीफ़ - के लिए
क़ाफ़िया - आने
मिसरा-ए-तरह
मैं झुकूँगा गोद में बच्चा उठाने के लिए
वज़्न -
2122 2122 2122 212
यादों की गहराइयों में डूब जाने के लिए
भूले बिसरे गीत बजते गुनगुनाने के लिए।।1।।
ले के धरती से विदा किरणें गईं जो शाम को
भोर होते आ गईं रिश्ते निभाने के लिए।।2।।
टकटकी बाँधे था चंदा रात हरसिंगार को
वो तो आतुर थे ज़मीं पर लोट जाने के लिए।।3।।
देख कमरे में तिमिर को झाँकती ठिठकी किरण
छन्न से बिखरी उजाला घर में लाने के लिए।।4।।
वेदना सहता है प्रस्तर कटता छंटता रात दिन
मुस्कुराती तब है मूरत दिल लुभाने के लिए।।5।।
जो मिले तैयार घर पंछी नहीं रुकते वहाँ
खुद करें दिन रात मेहनत घर बनाने के लिए।।6।।
डूबकर भक्ति में भव तो पार करते हैं सभी
तैरते पत्थर कभी प्रभु काम आने के लिए।।7।।
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शर्मिला चौहान
तरही मिसरा-
शान शौकत और दौलत मैं कहीं झुकता नहीं
मैं झुकूंँगा गोद में बच्चा उठाने के लिए।।
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शर्मिला चौहान
आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 (संशोधित रूप)
फ़िलबदीह 30
दूसरा चरण
रदीफ़ - है
क़ाफ़िया - आर
2122 2122 2122 212
चल रहा दुनिया में अब हर चीज़ का व्यापार है
रोज़ गढ़ता आदमी अपना नया किरदार है।।1।।
तेज़ भागी ज़िंदगी, भौचक सी मैं देखा करी
जीतने की चाह में मिलती रही बस हार है।।2।।
गठरी खोले आ गया सूरज सबेरे आज भी,
धूप के सिक्कों से चमके पूरा ये संसार है।।3।।
शुष्क होती ये धरा पानी कृषक की आँखों में
ताकता दम थामकर बादल का कब आसार है।।4।।
कौन सच्चा कौन झूठा जाँच भी कैसे करें
इश्तिहारों से भरा देखो हरिक अखबार है।।5।।
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शर्मिला चौहान
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