फ़िलबदीह क्रमांक -28
अर- क़ाफ़िया
रदीफ़- बोलते हैं।
1222 1222 122
बिना सोचे वो अक्सर बोलते हैं
पता कुछ हो नहीं पर बोलते हैं ।।1।।
समा लेता ज़माने की कही सब
हृदय को ही समंदर बोलते हैं।।2।।
किसी से गर गिला हो मुँह पे कहना
सुना पीछे तो कायर बोलते हैं।।3।।
खुशी से झेल लेते हैं ग़रीबी
अदा उनकी को तेवर बोलते हैं।।4।
लगाते व्यंग्य से पैने निशाने
उन्हीं को तो धुरंधर बोलते हैं।।5।।
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तरही मिसरा-
कभी थे बाग कोयल कूकती थी
अब इस बस्ती में खंजर बोलते हैं।।
शर्मिला चौहान
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आदरणीय अनिल सर एवं सभी साथियों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास (सात शेर पहली बार पटल पर 🙏क्षमा प्रार्थी)
फ़िलबदीह क्रमांक 28
दूसरा चरण
क़ाफ़िया - ई की मात्रा
रदीफ़ - है
1222 1222 122
पराली जब से खेतों में जली है
हवा मेरे शहर की विष भरी है।।1।।
हुआ दिन स्याह सूरज लापता सा
धुआँ उड़ता फिरे अब हर गली है।।2।।
जले हैं खेत, जंगल और घर भी
बुझाए कौन किसको क्या पड़ी है।।3।।
कहीं गोदाम तो जलती कहीं बस
जहाँ देखो वहाँ प्राणी दुखी हैं।।4।।
धुआँ तो फट रहा बारूद बनकर
धमाकों से सकल धरती हिली है।।5।।
बचा क्या शेष जलती सृष्टि सारी
ये दुनिया आज अंगारों भरी है।।6।।
हुआ सब राख बस अवशेष बाकी
धरा आँचल भिगोती रो रही है।।7।।
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शर्मिला चौहान
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