शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

221 1222 221 1222 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 ( संशोधित)


फ़िलबदीह क्रमांक 25
प्रथम चरण 
वज़्न...
221 1222  221  1222

इस उजले से चंदा में, इक दाग सलोना है 
काजल से लगाया वो, मैयाँ का डिठौना है।।1।।

पागल हुआ मन‌ देखो, तृष्णा ही घुली हरदम
वो तृष्णा निकल जाए, मन इतना बिलोना है।।2।।

आदम की बुरी फितरत, पशुओं से हुआ नीचा
जब सामने हो नारी तब भाव घिनौना है।।3।।

माता-पिता या बीबी, हर मर्द गणित करता
होता न कभी हल ये, अनसुलझा तिकोना है।।4।।

कुछ कर्म तो हों सच्चे, जिनकी हो चमक असली
मोती से उन्हें अब तो, जीवन में पिरोना है।।5।।


तरही मिसरा-

चाहत के पिटारे को, खाली न कभी करना
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।।

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आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 

फ़िलबदीह क्रमांक 25 
दूसरा चरण 

221 1222  221  1222


जब भ्रूण का निज तन में, निर्धार करे नारी
तब सृष्टि सकल का फिर, विस्तार करे नारी।।1।।

मन चाँदनी सा उजला, तन लौह सदृश पक्का
भर भाव हृदय गागर, बौछार करे नारी।।2।।

नव पंँख से शिक्षा के, छूने लगी नभ सारा।
सपनों को प्रयासों से, साकार करे नारी।।3।।

व्रत कोई हो या उत्सव, सब रंग भरे लगते
परिवार सहित हरदम, त्यौहार करे नारी।।4।।

है शक्ति उपासक वो, अन्याय नहीं सहती
जब बढ़ते असुर जग में, संहार करे नारी।।5।।


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शर्मिला चौहान

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