सोमवार, 26 दिसंबर 2022

आप सभी विज्ञजनों के समीक्षार्थ मेरा एक प्रयास प्रस्तुत है।🙏

22 22 22 22 22 22 22 2

दिल के हसीन तारों को हौले से झिंझोड़ गया
प्यार भरे अपने गीतों को मेरे लबों पे छोड़ गया।।1।।

कड़ियांँ टूट रहीं रिश्तों की बंधन कच्चे से बिखरे
टाँका प्रेम लगाकर निश्छल कोई उनको जोड़ गया।।2।।

संग लिपट सूरज के डाले बदली चितवन कजरारी
मोह भरा सूरज देखो किरणों से नाता तोड़ गया।।3।।

रिश्तों की चादर फैलाए मांगा जब तब अपनों से
खुद देने का वक्त जो आया चादर अपनी मोड़ गया।।4।।

पल पल जीवन सिक्का सोना गुल्लक में भर रखता था
आंँधी का बस एक ही झटका गुल्लक सारी फोड़ गया।।5।।

मृगतृष्णा की चाह में भटका बंजारा जीवन दर दर
पीछे देखा उसका बचपन ही सबसे बेजोड़ गया।।6।।

धन दौलत माया दरवाजा भटके महलों अंदर मन
कछुआ जाने तत्व अनोखा अपनी देह सिकोड़ गया।।7।‌।


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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

2212 2212 2212 2212 पर ग़ज़ल

2212  2212  2212  2212

आकाश की छाती से जब, टूटा कोई तारा दिखा
दुनिया की भारी भीड़ में,  किस्मत का इक मारा दिखा।।1।।

बाजी लगाकर जान की, रक्षा करे दिन रात जो
माँ भारती का पूत वो, सबसे अधिक प्यारा दिखा‌‌।‌2।।

रख ताक पर सारे नियम, खेला करे जो बन कुटिल
वो जीत कर बाजी सभी, सबसे बड़ा हारा दिखा।।3।। 

भीतर कहीं जब कोख में, मसली गईं थीं बेटियांँ
मेला बगीचा बाग बन, सूना सा चौबारा दिखा।।4।।

अख़्तर शुमारी रात भर, इक दौर ऐसा भी रहा
तारों में चमका चाँद जब, उसमें मुझे यारा दिखा‌।5।।

इस चिलचिलाती धूप में, निष्प्राण नदियाँ शुष्क वन
नंगे बदन पर्वत खड़े, सूरज का ही पारा दिखा।।6।।

काँधे पे बस्ता लादकर, अब चल पड़ीं हैं बेटियांँ
कदमों को उनके चूमता, जग आज ये सारा दिखा।।7।।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

221 1222 221 1222

221 1222  221 1222


जग जीत ही लेंगे हम जब साथ तुम्हारा है
दिल प्रेम भरा अपना फिर कल तो हमारा है।।1।।

था जुर्म निगाहों का तस्वीर बसी उनकी
दिल आह भरे हरदम नादान बेचारा है।।2।।

यौवन से भरी लहरें हैं चाँद  दिवानी जो
है चाँद तो बादल का, लहरों को किनारा है।।3।।

बारिश थमी है जब से गुंजार भ्रमर करते
कलियों ने ली अंगड़ाई प्रियतम का इशारा है।।4।।

ये धूप सलोनी सी लुकछिप के बिखरती यूँ
अब आँख मिचौली का‌ अलमस्त नज़ारा है।।5।।

संध्या सजी चूनर में हाथों में रची लाली
सूरज पिया ले भाँवर सहबाल सितारा है।।6।।

फूलों से भरी वादी लथपथ पड़ी थी बरसों
घावों पे लगी मरहम खिलना जो दुबारा है।।7।।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

1212 1212 1212 1212 पर ग़ज़ल

दी हुई बहर पर जितेंदर पाल सिंह जी की ग़ज़ल साझा कर रहीं हूँ। साथ ही मेरा प्रयास आप सभी के समीक्षार्थ प्रस्तुत है।🙏(आदरणीय सर के सुझावों से संशोधित)


1212 1212 1212 1212

छपे सवाल दर सवाल ज़ीस्त वो किताब है
समय तलाश दे जो हल वो सबसे लाज़वाब है।।1।।


ज़रूरतों को मापने को हर सफ़े में है सबक
बिना पढ़े ही कह गए किताब ही खराब है।।2।।

बिना सबब ही भागते जवान बूढ़े आजकल
नशा लगा दे दौड़ का ये ज़िंदगी शराब है।।3।।

सुने जो दिल की बात को चले सफ़र में मस्त हो
मिले जिसे दिली खुशी वही तो बस नवाब है।।4।।

है लेन देन कर्म का मिले असल पे ब्याज भी 
निरख परख ले बुद्धि से बड़ा सही हिसाब है।।5।।

हज़ार दुख सहा करे जो दूसरों के वास्ते
महक रहा जो शूल में खुशी भरा गुलाब है।।6।।

निहारते वो चाँद को जवान रात ढल गई
पलक पलक जो पल रहा हसीं सुबह का ख़्वाब है।।7।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे ( महाराष्ट्र)

सोमवार, 12 सितंबर 2022

212 1222 212 1222(आइने के सौ टुकड़े करके हमने देखें हैं)

आदरणीय सर के मार्गदर्शन से ग़ज़ल का संशोधित रुप सादर है।🙏


212  1222  212  1222


द्रौपदी को खुद अपनी  लाज अब बचानी है
कृष्ण जी के आने की बात तो पुरानी है।।1।।


मूक बैठ कर देखें चीर के हरण वाला
अब दिखे न वो मंज़र याद फिर दिलानी है।।2।।


औरतें रहीं दुश्मन औरतों की सदियों से
लोक लाज के बंधन दर्द की कहानी है।।3।।


धुंँध थी दिशाओं में भेद की प्रथाओं में
गाँठ जो पड़ी अंतस अब वही छुड़ानी है।।4।।


सोच तंग दुनिया की वंशबेल बेटों से
बेटियांँ नहीं कमतर बात यह बतानी है।।5।।


बाग की सभी कलियांँ हृष्ट पुष्ट हों उन्नत
ज्ञान पुष्प विकसित हों वो फसल उगानी है।।6।।


मुश्किलों से वो लड़ती  विघ्न हर बड़े सहती
छू रही गगन सारा जीत की निशानी है।।7।।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

शनिवार, 10 सितंबर 2022

गंगा दर्शन

"गंगा दर्शन"


तेजस्विता भाव, शुचिता परिपूर्ण, भव निर्मल करती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे,अंतर मम  बसती हो।।

भगीरथ अथक प्रयास सफल,
हुआ धरा पर अवतरण।
शिव जटा बीच सिमटी,
था प्रबल वेग मात्र कारण।
शुभ्र उफनती गौमुख उद्गम,
चपला सी वेग गति।
संतृप्त हृदय, आत्म अनहद ,
स्थिर करती चंचल मति।

आवेग, उत्साह, हर्ष , परिपूर्णता, जन-जन में भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

वेद, पुराण, इतिहास, वंदित,
जप-तप ध्यान योग स्थान।
निर्मल नीर प्रवाह निरंतर,
आदिकाल से धरा की शान।
हरिद्वार की पुण्य भूमि को,
करती जब स्पर्श।
तपोभूमि ऋषियों-मुनियों की ,
रम्य मनोहर तीर्थ।

श्रृद्धा भाव, मन शुचिता, आस्था विश्वास भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

सुरसरि, देवनदी, माँ गंगा,
जाह्नवी, अलकनंदा, मंदाकिनी।
पुण्यदायिनी,मोक्षप्रदायिनी,
पापनाशिनी, कर्म प्रकाशिनी।
सिंचन करती निज नीर से, 
समस्त धरा का पोषण करे।
आलिंगन कर वसुधा का फिर,
जन -जन का कल्याण करे।

बूंद बूंद निर्मल गंगाजल,
आध्यात्म भाव भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

घंटा, ढोल, नगाड़े बाजें, 
शंखनाद की गूंँज रहें।
बहते दीपक जलधारा में
जीवन सातत्य की सीख धरें।
आकाश दीप सा जीवन हो
ध्येय उच्चतम सदा रहे।
आत्मज्ञान की ज्योति से 
हृदय आलोकित रहे।

जीवन दर्शन की सुंदरता, लहर लहर भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

राम, कृष्ण ने वंदन किया,
तुलसीदास गुणगान करे।
तट पर स्थित पवित्र भूमि पर,
शिव साक्षात निवास करे।
आदि शंकराचार्य, विवेकानंद के
दर्शन का आधार हो तुम।
सनातन वैदिक संस्कृति का 
एक प्रबल विश्वास हो तुम।

आदिकाल से अनंत तक, जनमानस में भाव भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे , अंतर मम बहती हो।
अंतर मम बहती हो।।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9968674585
sharmilachouhan.27@gmail.com

बुधवार, 24 अगस्त 2022

122 122 122 122 पर ग़ज़ल

122 122 122 122

रहे साथ हरदम सहारा वो सच्चा
निभा प्रीत ले जो है यारा वो सच्चा।।1।।

गगन में चमकते हजारों हैं तारे
तके चाँद इकटक सितारा वो सच्चा।।2।।

थे ईमान कायम उसूलों के चलते
रहीं तंग जेबें गुज़ारा वो सच्चा।।3।।


धनक सात रंगी धरा मेघ सूरज
दे खुशियांँ दिलों को नज़ारा वो सच्चा।।4।।

कमी प्रेम की से दरारें बढ़ीं अब
जो रिश्तों को जोड़े है गारा वो सच्चा।।5।।

हुई शाम बिछड़े जमीं और सूरज
मिलेंगे सुबह फिर इशारा वो सच्चा।।6।।

करूँ पार कैसे अनोखा ये सागर
मिले चंद को ही किनारा वो सच्चा।।7।।


शर्मिला चौहान

शनिवार, 20 अगस्त 2022

221 1221 1221 122

मार्गदर्शन के बाद संशोधित ग़ज़ल 🙏 धन्यवाद आदरणीय अनिल सर।



ये देश हमारा बड़ा बलवान सिपाही
सरहद पे वतन की लुटा दे जान सिपाही।।1।।

शूरों के जो किस्से सुने दादा की ज़ुबाँ से
 हित देश का बचपन में लिया ठान सिपाही।।2।।

जब प्रेम युगल गीत जुबानों पे चढ़े थे
तब गीत वतन का करे मुखगान सिपाही।।3।।

होली पे उड़े रंग गुलालों के फुहारे
निज रक्त से सीमा को रहा सान सिपाही।।4।।

जागे जो लखन सा रखे निद्रा पे कडा़ वश
सीता है धरा रूप रखे भान सिपाही।।5।‌

मौसम हो कोई भी रहे मुस्तैद सदा वो
घुटने हो जमी बर्फ़ खड़ा शान सिपाही।।6।।

जय घोष करे हिंद का दुश्मन की जमीं पे 
लिपटा जो तिरंगे में बढ़ा मान सिपाही।।7।।

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शर्मिला चौहान

1222 1222 1222 1222

1222 1222 1222 1222

हुई ग़लती कभी खुद से तो झुठलाया नहीं करते
दुबारा भूल से वो काम दुहराया नहीं करते।।1।।

मिले सम्मान ना कोई न आँखें नेह भीगीं हों
करीबी लाख हो रिश्ता वहाँ जाया नहीं करते।।2।।

चली जब ज़ोर की आँधी बुझे दीपक हजारों तब
अमावस मौन बैठी दीप बतियाया नहीं करते।।3।।

करें सेवा जो औरों की लुटाते प्रेम जीवन भर
बड़ाई में स्वयं के गीत वो गाया नहीं करते।।4।।

समय के साथ जो चलते लगाकर होड़ खुद से ही
मिले मंज़िल वो परचम आप फहराया नहीं करते।।5।।

सभी को साथ ले चलते रखें ना भेद कोई भी
किसी को स्वार्थ की खातिर वो बहकाया नहीं करते।।6।।

चलो आगे बढ़ें रस्ता करें तैयार मिलकर सब
नई पीढ़ी को लेने साथ शरमाया नहीं करते।।7।।


शर्मिला चौहान

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

२१२२ २१२२ २१२२ २१२



2122  2122  2122  212
दूसरा प्रयास समाक्षार्थ 🙏

आस की बूँदें बरस कर लोक पर छाने लगीं
शाख पत्तों से फिसलती गीत नव गाने लगीं।।1।।

दीप्त सूरज यूँ अचानक लुप्त सा कुछ हो गया
आज ये काली घटाएँ फिर उसे भाने लगीं।।2।।

ताल पोखर हैं लबालब चाल नदियों की जुदा
तोड़ कर अपने किनारे गाँव तक आने लगीं।।3।।

जब समुंदर ने उलीचा प्रेम की अंजुरी भरी
प्रेम दीवानी वो लहरें खूब इठलाने लगीं।।4।।

रात भर खपरैल से रोता रहा था आसमां
आस की कथरी भिगोकर बूँदें सुस्तानें लगीं।।5।।


था उनींदा सूर्य भी कंबल लपेटे सुब्ह से
शाम को किरणें उसे बाँहों में लिपटानें लगीं।।6।।


भीग कर बारिश में तेरा साथ छतरी में मेरे
तेज साँसें घुल हवा में दिल को बहकाने लगीं।।7।।


शर्मिला चौहान
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इस बहर पर प्रस्तुत है मेरी प्रिय ग़ज़ल, जिसे निदा फ़ाज़ली जी ने अपने खूबसूरत अशआरों से पिरोया है। सरल शब्दों में, दिल तक उतर जाती है।


होश‌ वालों को ख़बर क्या बेखुदी क्या चीज़ है 
इश्क कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है।।१।।

उनसे नज़रें क्या मिलीं रौशन फ़जा़एँ हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है।।२।।

बिखरी जुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शाइ'री
झुकती आँखों ने बताया मय-कशी क्या चीज़ है।।३।।

हम लबों से कह ना पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये खा़मोशी क्या चीज़ है।।४।।


निदा फ़ाज़ली


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इसी बहर पर मेरी एक और ग़ज़ल आप सभी के समीक्षार्थ 🙏

2122  2122  2122  212

रोक दे जो नाव को उस धार को तू मोड़ दे
हौसला गर है ज़रा तूफान को भी होड़ दे।।1।।

हैं मिली जीने की घड़ियांँ चार पल खुल कर तो जी
जो बने पाँवों की बेड़ी पैंजनी वो तोड़ दे।।2।।

तन मिला ये कीमती तो प्यार से कर ले जतन
हो बुरी आदत जो कोई आज से तू छोड़ दे।।3।।

काम करते नेक वो बंदे जहां में कम मिलें
जग बनाने वाले अब कुछ आदमी बेजोड़ दे।।4।।

दिल हुआ जाता है पत्थर आँखें भी अब शून्य हैं
कोई भी मंज़र नहीं है दिल को जो झिंझोड़ दे।।5।।

टूट जाए दर्प से टकरा के रिश्ता जो कभी
बोलकर मीठे वचन दो प्यार से फिर जोड़ दे।।6।।

झूठ लालच दंभ के सिक्कों से जो गुल्लक भरी
अब समय पहचान कर इंसान गुल्लक फोड़ दे।।7।।


शर्मिला चौहान

212 212 212 212

आप सभी के समीक्षार्थ मेरा प्रयास सादर है।🙏 सुझाव एवं मार्गदर्शन का हृदय से स्वागत है।(संशोधित)


212  212  212  212

जब जली थी जमीं दर्या बादल हुआ
आसमाँ रो पड़ा नीर निर्मल हुआ।।1।।


नेह भीगी धरा खूब प्यारी लगे
अंक में वृंद भर धानी आँचल हुआ।।2।।


देखकर सामने अजनबी सा उसे
नैन भर क्यों गए, मन भी घायल हुआ।।3।।


वाहवाही करें बात सब ऊपरी
बैन मिसरी डली दिल तो काजल हुआ।।4।।


होड़ में इस तरह से लगा आदमी
नोट की दौड़ में बस वो पागल हुआ।।5।।


गाँठ ऐसी पड़ी रस बचा ही नहीं
भावना कैद है गर्व सांकल हुआ।।6।।


चैन मिलता नहीं इक घड़ी भी कहीं
सोम जीवन नहीं बस हलाहल हुआ।।7।।

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शर्मिला चौहान
ठाणे

शनिवार, 9 जुलाई 2022

ग़ज़लें मेरी

 तीसरे तरही मिसरा पर प्रथम प्रयास 🙏
2122  2122  2122  212

बंद महलों में हुआ जो वो हसीं मंज़र नहीं
पद्मिनी ने जो किया था सिर्फ वो जौहर नहीं।।१।।

मीत बन कर पास आते राज दिल के भेदते
देख मौका घात करते बैर सा खंजर नहीं।।२।।

घूम कर सारा ज़माना लौट घर को आ गया
और कोई भी ठिकाना है कहीं सुंदर नहीं।।३।।

हाथ में कंगन चमकते ‌पैर में पायल सजे
मौन लब पलकें झुकीं थीं शर्म सा जेवर नहीं ।।४।।

गर्व का जो बोझ कम हो पार भव से हो सकें
दर्प की जो नाव थामे है कोई सागर नहीं ‌‌।।५।।

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शर्मिला चौहान


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 तीसरे तरही मिसरे पर द्वितीय प्रयास 🙏
2122  2122  2122  212


हैं पिता जब तक जहाँ में मुश्किलों से डर नहीं
हाथ सिर पर रख दिया तो बाप सा अंबर नहीं।।1।।

टूट जातीं जब उमींदें टूट जाता आदमी
जोड़ दे जो चीज़ वो मिलती यहाँ अक्सर नहीं।।2।।

बात का था मान रखना छोड़ सब सुख चल दिए
जो पिता की बात पाले आज वो रघुबर नहीं।।3।।

पंख हैं मज़बूत पंछी खूब नापे आसमाँ
हो शिथिल बैठा पुकारे आज वो तेवर नहीं।।4।।

दाँव नारी का लगाकर खेल मर्दों ने रचा
द्रौपदी का चीर हर ले अब कोई चौसर नहीं।।5।।


शर्मिला चौहान 
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 सप्ताह के गृहकार्य पर प्रथम प्रयास सादर समीक्षार्थ 🙏(संशोधित)

1222 1222 1222 1222

खुशी से हो भरा दिल तो लगे त्यौहार फूलों से
उदासी से गुज़रते को मिले आधार फूलों से।।1।।

बड़ी सौगात मिलतीं थीं नहीं था पर वो अपनापन
हुई हासिल कई खुशियांँ मिले उन चार फूलों से।।2।।

बिखेरें रंग दुनिया में हवाओं में महक भर दें
जहां में है कोई ऐसा रहे बेजा़र फूलों से।।3।।

खुली जुल्फ़ों पे इठलाते किताबों में वो शरमाते
बहुत किस्से सुना जाते मिलो जब यार फूलों से।।4।।

लुभाएँ मन सभी का वो भले ही क़ीमती ज़ेवर 
मगर नारी दिखे सुंदर करे शृंगार फूलों से।।5।।

चले आते कहीं से गुनगुनाते सिरफिरे भौंरे
जताते इस तरह जैसे हो सचमुच प्यार फूलों से।।6।।

कभी शाखों पे मुस्काते कभी मंदिर में सज जाते
निभाते साथ अर्थी तक है जीवन सार फूलों से।।7।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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 दूसरा प्रयास सादर समीक्षार्थ 🙏(संशोधित)
1222 1222 1222 1222


खिलीं कलियाँ हवा बहकी बदलता हर नज़ारा है
किसी के पास आने का लगे जैसे इशारा है।।1।।

समुंदर बीच में कश्ती लड़े तूफान से हरदम
निगाहों में समाया दूर बैठा बस किनारा है।।2।।

मिलन की चाह में काँटे  घड़ी में घूम थक जाते
बजे बारह लिपट जाते समय भी दिल का मारा है।।3।।

ग़ज़ल हो गीत हो या नज़्म या कोई कहानी हो
छुए दिल को तभी जब भाव भरता दिल हमारा है।।4।।

बजाते ढ़ोल आए मेघ बिन बरसे मगर लौटे
किसानों ने लिखी अर्जी हमें तेरा सहारा है।।5।।

मिले जो साथ छोटा या बड़ा संबल बढ़ा देता
अमावस रात में जुगनू लगे चंदा से  प्यारा है।।6।।

जु़बां मीठी रहे प्यारे तो हो हासिल सभी खुशियांँ
इसी हथियार ने अक्सर जहां जीता ये सारा है।।7।।


शर्मिला चौहान

गुरुवार, 9 जून 2022

212 212 212 212 पर ग़ज़ल

इस बहर पर मेरा  संशोधित प्रयास 🙏

212  212  212  212
ई- क़ाफिया


अलहदा होड़ है साठ के पार की
मन डरे हर घड़ी साँस थोड़ी बची।।1।।

फ़िक्र में जेब की बीतती उम्र है
हाथ डालो कभी ना मिले ये भरी।।2।।

हाथ थामे चले प्रेम की राह जो
बावरी सी उसे ढूँढती मैं रही।।3।।

ज़िंदगी छोड़कर तू चली है कहाँ
इस जहाँ में मिली तू ही इक मनचली।।4।।

दूसरों की गिनाकर कई खामियाँ
खुद की भूलें छिपाता फिरे आदमी।‌5।।

 प्यार माता पिता से हमेशा जिसे
सात फेरे पिया लाड़ली वो बनी।।6।।

बात जो दूसरों की करें वो करें
ये ग़ज़ल जो कही आज खुद पर कही।।7।।


शर्मिला चौहान

बुधवार, 1 जून 2022

ग़ज़लें मेरी (विभिन्न बहरें)

ग़ज़ल कहने का प्रयास 
क़ाफिया _आ 
रदीफ़ _ हूँ
                              

2122  1212  22

साँस की डोर मैं वो वादा हूँ
जो अधूरा रहा इरादा हूँ।1।

बांध सपनों के पंख उड़ते सब
मैं तो इक परकटा परिंदा हूँ।2।

रौशनी गैर से सभी रौशन
खुद जलूँ रात भर वो दीया हूँ।3।

दौर जामों का रात भर चलता
रात छलका नहीं वो प्याला हूँ।4।

 देखकर मैल खुद के चेहरे पर
पोंछते मुझको मैं वो शीशा हूँ।5।

साथ पानी के ही खड़ा रहकर
बाद प्यासा रहा किनारा हूँ।6।

बेवफ़ा जिंदगी दगा देती
मौत को दोस्त मैं बनाता हूँ।7।


शर्मिला चौहान

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 1222 1222 1222 1222
(प्रथम प्रयास सादर )
क़ाफिया ई
रदीफ़ है 

फलक ने रोशनी देखो ज़मीं पर यूँ उतारी है।
सितारों ने बिना मौसम दिवाली फिर मनाई है।।1।।

दिए जो घाव अपनों ने हुआ छलनी हमारा दिल
कहीं कोई मिले कोना बिना घावों जो खाली है।।2।।

सितम के मायने बदले सितमगर तू नहीं बदला
मिली जो चोट तुझसे वो लगे बिल्कुल करारी है।।3।।


गगन ने गीत जब गाया शरद का चाँद मुस्काया
विहँस कर चाँदनी उज्ज्वल ज़मीं पर तब छिटकती है।।4।।


खुले बालों महक जाती घटाओं सी बहक जाती
सफेदी ओढ़ शरमाती वही तो रातरानी है।।5।।


शर्मिला चौहान

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 1222 1222 1222 1222
 (दूसरा प्रयास समीक्षार्थ )🙏

ई क़ाफिया

हवाओं संग बह आती दुआ भी खूब जिद्दी है
जहाँ रहता कोई अपना पहुँच जाती हठीली है।।1।।

तपा सूरज बना दूल्हा उड़ी सेमल लिए न्यौता
खिले टेसू सजा मंडप उमस की आज शादी है।।2।।

झुकी नज़रें सितम ढाती दिलों की बात कह जाती
उठीं जब भी यही नज़रें खड़ी हो बन सवाली है।।3।।

किनारों पर मिटा करतीं हजारों रोज ही लहरें
किनारा खुद सिमट आए लहर लगती सुहानी है।।4।।

गिना कर ऐब औरौं के बटोरे वाहवाही जो
कभी झाँकें जरा दर्पण उसी का ऐब भारी है।।5।।


शर्मिला चौहान

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पाँचवां संशोधित प्रयास आप सभी के समीक्षार्थ 🙏

221  1221  1221  122

ये मुफ़लिसी है इसकी कोई जात नहीं है
रोटी से बड़ी कोई भी सौगात नहीं है।।1।।

कूड़े में पड़ा अन्न किसानों को रुलाता
खाली किसी थाली में अभी भात नहीं है ।।2।‌।

अब याद बहुत आता है गुज़रा वो ज़माना
क्यूँ आज के इस दौर में वो बात नहीं है।।3।।

मन दीप जले प्रेम के फैला है उजाला
नफ़रत से भरी कोई कहीं रात नहीं है।।4।।

बस होड़ में बढ़ने के लगा आज है इंसांँ
औरों को गिराना ये सही मात नहीं है।।5।‌

बातों की कमी से बड़े सूखे पड़े रिश्ते 
रिश्तों में नमी ला सके बरसात नहीं है।।6‌।।

नाजों से पला दिल ये मेरा सौंप कैसे दूँ
अब आपसे इतनी भी मुलाकात नहीं है।।7।।


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प्रयास -छटवाँ संशोधित 🙏
2122  1212  112/22

क़ाफिया - अर

इश्क का हो गया असर गायब
प्यार की वो भरी नज़र गायब।।1।।

ढूँढती मैं फिरूँ जहाँ में जिसे
हो गया आज वो बशर गायब।।2।।

गाँव की ओर जो चला करती
लो अचानक हुई डगर गायब।।3।।

आदमी डस रहा है आदम को
साँप का हो रहा ज़हर गायब।।4।।

रात लंबी लगे निराशा की
हो गई आस की सहर गायब।।5।।

खूब पैसै भरे तिजोरी में
चैन के हो गए पहर गायब।।6।।

तार पर बैठ कर हँसा पंछी
हो गए आज कल शज़र गायब।।7।।



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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

बुधवार, 27 अप्रैल 2022

गीत (22 22 22 22)

"गीत" 

(22  22  22  22 )




ईश्वर की लीला न्यारी है
यह दुनिया कितनी प्यारी है!

नीली छतरी सिर पर डोले
       बगियों में कोयलिया बोले।
योगी बन मौन खड़े पर्वत
     धरती पर खूब  सजे मरकत।
हिममय गिरि के चरणों में
      केसर की सुंदर क्यारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।१।

सागर जब धरता रूप विकट
     लहरें बन जातीं तब संकट।
नदियों की गाथा प्रेममयी
    सदियों से बहतीं कालजयी।।
लहरों की चंचलता पल भर
   ‌‌ पर त्याग नदी का भारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।२।

अग्नि सम मरुथल तप्त रहें
     लिपियाँ गढ़ अपनी बात कहें।
काँटों में फूल खिलाते जो
     मौसम से ही बन जाते वो।
सर्द गरम बरसें बन जीवन
   अद्भुत प्रभु रचना सारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।३।

हैं रंग बिरंगे फूल खिले
    पक्षी बोलों की तान मिले।
तितली के रूप अनूठे से
      धरती पर सजते बूटों से।
देख धरा की यह सुंदरता
  खुद ईश्वर भी बलिहारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।४।

शर्मिला चौहान

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

गीत (२१२२×४)

"गीत"

(2122  2122  2122  2122)



हौसला तेरा गिरा दे भीड़ ऐसी जोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर राह अपनी छोड़ना मत।।

पाँव में कंकर चुभें जो
       दर्द सहना ही सिखाते।
चमचमाती धूप में कुछ
         फूल देखो खिलखिलाते।
छोड़ कस्तूरी गुणों को
             तू वनों में दौड़ना मत।
 तू अकेला ही सही पर
         राह अपनी छोड़ना मत।।१।।

हो प्रवाहित पर्वतों से
      फिर नदी रुकती कहाँ है!
श्वास लेती है वहीं प्रियतम
            मिले सागर जहाँ है।
बाँध अपने धैर्य का तू
           भूलकर भी तोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर
           राह अपनी छोड़ना मत।।२।।


जो निरंतर तू चले तो
         मिल सकेंगी मंज़िलें भी।
रोक लेगा चाल अपनी
         बीत जाएगा समय ही।
ठान कर आगे बढ़ा तो
           पैर पीछे मोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर
       राह अपनी छोड़ना मत।।३।।


शर्मिला चौहान

गीत (१२२२×४)

"गीत" समीक्षार्थ

(-1222 1222 1222 1222)



जगत में गूँजता नित, द्वेष का ही शोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम की इक डोर तब है।

रही बढ़ती दनुजता विश्व में
                   हर बार जब जब।
विजय पाती मनुजता मात दे,
                    हर बार तब तब।
हृदय को बींधकर भीगी मिले,
               ‌     इक कोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम की
                इक डोर तब है।।१।।


पनपती शाख पर कोंपल,
         सहमती खूब हर पल।
किलकती मौन हों कलियाँ
           बुरा है सोच के कल।
बिखरती आस जीवन की,
             निराशा जोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस,
          प्रेम की इक डोर तब है।।२।। 


महाभारत कथा से सीख 
         ‌ ‌‌       भी  लेते नहीं जो
भटकते मोह में फिर ठौर
                  पाते ना कहीं वो।
हृदय की वेदना का रूप
                  होता घोर जब है
मनुज को जोड़ती बस प्रेम
       की इक डोर तब है।।३।।

तमस अवसाद का जितना 
         सघन छाया हुआ हो।
भरम का जाल नैनों से
          हृदय आया हुआ हो।
निशा को मात देती रश्मियों
                   का भोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम
          की इक डोर तब है।।४।।


शर्मिला चौहान

रविवार, 13 मार्च 2022

गज़लें

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
क़ाफ़िया _ अला



मुसाफ़िर साथ में कोई, हमारे जो चला होता।
मज़ा आता सफ़र का तब, बढ़ा ये हौसला होता।।१।।


शिकायत अब करें भी क्या, सुनेगा कौन इस दिल की।
कभी कहते कभी सुनते, अगर साथी भला होता।।२।।


उनींदी सी रहीं आँखें, कई रातें कटीं जगकर।
झपक लेते कभी पलकें, कोई सपना पला होता।।३।।


रहा होता सदा रौशन, हमारा दिल मुहब्बत से।
किसी के प्यार का दीपक, कभी दिल में जला होता।।४।।


दवा भी खूब मिल जाती, दुआ भी काम आ जाती।
किसी ने गर मुहब्बत में, कभी हमको छला होता।।५।।


चमकता नूर चेहरे पर, दिलों पर रंग चढ़ जाता।
कभी वो रंग उल्फत का, किसी ने जो मला होता।।६।। 


गज़ल नज़्में कभी कहते, सुनाते गीत चाहत के।
हमारी भावनाओं में, कभी कोई ढला होता।।७।।


शर्मिला चौहान

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बहर- १२२ १२२ १२२ १२२
क़ाफ़िया- आने


खयालों में अक्सर वो आने लगे हैं।
दबे पाँव दिल में समाने लगे हैं।।१।।


 हज़ारों जतन कर छिपाए रखा दिल।
वो बातों से अपनी चुराने लगे हैं।।२।।


कभी रूठ कर मुँह भी मोड़ लूँ गर।
कसम दे के अपनी मनाने लगे हैं।।३।।


जो ग़ैरों से दिल को लगाया थे करते।
वही हम पे दिल अब  लुटाने लगे हैं।।४।।


जो चलते नहीं थे कभी साथ मेरे।
 क़दम से क़दम अब मिलाने लगे हैं।।५।।


घड़ी भर की फुर्सत नहीं थी मिलन की।
वो दिन रात चक्कर लगाने लगे हैं।।६।।


नज़र एक में अब कहाँ प्यार होता।
बनाने में रिश्ते ज़माने लगे हैं।।७।।


शर्मिला चौहान


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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ गज़ल

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

मुसाफ़िर साथ में कोई, हमारे जो चला होता।
मज़ा आता सफ़र का तब, बढ़ा ये हौसला होता।।१।।

शिकायत अब करें भी क्या, सुनेगा कौन इस दिल की।
कभी कहते कभी सुनते, अगर साथी भला होता।।२।।

उनींदी सी रहीं आँखें, कई रातें कटीं जगकर।
झपक लेते कभी पलकें, कोई सपना पला होता।।३।।

रहा होता सदा रौशन, हमारा दिल मुहब्बत से।
किसी के प्यार का दीपक, कभी दिल में जला होता।।४।।

दवा भी खूब मिल जाती, दुआ भी काम आ जाती।
किसी ने गर मुहब्बत में, कभी हमको छला होता।।५।।

चमकता नूर चेहरे पर, दिलों पर रंग चढ़ जाता।
कभी वो रंग उल्फत का, किसी ने जो मला होता।।६।। 

गज़ल नज़्में कभी कहते, सुनाते गीत चाहत के।
हमारी भावनाओं में, कभी कोई ढला होता।।७।।

शर्मिला चौहान

सोमवार, 24 जनवरी 2022

कहानी- गुलाब जामुन

‌ "गुलाब जामुन"


फागुन की हवा अपने साथ मस्ती भर लाती है. प्रकृति में भी विभिन्न रंग सज जाते हैं.
बालकनी में खड़ी नीमा ने सामने बौरों से लदे आम को देखा, यौवन के बोझ से मानो डालियाँ झुकी जा रहीं हैं. कोयल की मोहक आवाज़ ने, खिलते हुए टेसूओं को विचलित किया हुआ है.
अचानक पीछे से आकर शशांक ने उसे बांहों में भर लिया.
"अरे! बालकनी में खड़ें हैं हम, कुछ तो ध्यान रखो." प्यार से झिड़कते हुए नीमा ने खुद को छुड़ा लिया.
"पहली होली है परसों, शुरुआत आज से ही करतें हैं." शशांक ने मस्ती से कहा.
"चलो, पहले सामान पैक कर लेते हैं. सुबह जल्दी निकलना है." कहते हुए नीमा सूटकेस में सामान रखना शुरू किया.
"अरे बाप रे! इतना सारा सामान. होली है दीपावली नहीं जो सबके लिए कपड़े ले जा रही हो." शशांक ने आश्चर्य से पूछा.
"हम सब दीपावली के बाद अब मिलेंगे तो मम्मी-पापा और दीदी के दोनों बच्चों के लिए तो कुछ ले जाना ही था. चिंता मत करो, अपने कार्ड से मंगवाया है." जोर से हंँसती नीमा ने कहा.
दूसरे दिन सुबह चाय पीकर उन दोनों ने यात्रा शुरू कर दी. अपनी कार से करीब आठ-नौ घंटे का सफर कुछ बड़ा नहीं था.  
शहर की सीमा खत्म होते ही बगीचे, खेत और छोटे छोटे गांँवों का सिलसिला शुरू हो गया साथ ही साल भर शादी हुए इस जोड़े ने अपनी पहली होली की प्रेम भरी शुरुआत कर दी.
"मैं जब छोटा था ना तब किसी के रंग लगा देने पर खूब रोता था." शशांक ने अपना बचपन याद किया.
"और मैं..किसी ने रंग नहीं लगाया तो उसके सामने जाकर लगवाती थी, नहीं तो खुद का रंग खुद पर पोतकर खुश." ठहाका मारकर नीमा ने कहा.
"अब जाकर किसी से लगवाना रंग, देखता हूँ." तिरछी नज़रों से  घूरकर शशांक ने कहा.
"हा.हा..हा! जल गए, एकदम शादीशुदा पुरुष.. नहीं पति का डायलॉग." नीमा ने उसे गुदगुदी करते हुए कहा 
"ड्राइविंग कर रहा हूं यार." शशांक ने सड़क पर नज़र जमाते हुए कहा.
"लंच के बाद मुझे दे देना कार, दोनों मिलकर चलाएंगे तो थकेंगे नहीं." प्रेम से नीमा ने कहा.
"हम तो अपनी गृहस्थी भी मिलकर चला रहें हैं नीमू! बहुत खुशकिस्मत हूँ मैं जो तुम्हारा साथ मिला." शशांक की बातों से नीमा की आंखें झिलमिला गईं.

कार अपनी रफ़्तार से बढ़ रही थी और नीमा शादी के बाद की पहली दीपावली की स्मृतियों में खोने लगी. बहुत खुशी और उत्साह से भरे नीमा और शशांक घर आए थे. नीमा की ससुराल में सास-ससुर के अलावा बड़ी ननद शीनू दीदी भी हैं जिनकी ससुराल दूर के गांव में है. ननदोई जी, जिन्हें नीमा "भाई साहब" कहती है, वे इसी शहर में नौकरी करते हैं. उन्होंने अपने परिवार के लिए फ्लैट किराए पर ले रखा परंतु शीनू दीदी अपने दोनों बच्चों को लिए हर दूसरे दिन मायके पहुँच जातीं हैं. 
"मम्मी, ये तो दिन भर आफिस चले जाते हैं और बच्चे स्कूल. मैं अकेली बोर होती रहतीं हूँ इसलिए आ गई." शशांक ने बताया कि ऐसा कहते दीदी, दोनों बच्चों के कपड़े भी बांध लातीं और फिर आठ-दस दिनों की फुर्सत. 
"बेचारे जीजाजी! उन्हें भी बुला कर रख लेतीं दीदी. अब बच्चे इसी घर से स्कूल जाते और जीजाजी आफिस." कहते हुए थोड़ा दुखी हो गया था शशांक. जीजाजी की किसी भी बात को काटकर, उन्हें ससुराल में रहने के लिए मजबूर करना शायद शशांक को भी बुरा लगता था.

अचानक कार को ब्रेक लगा और  नीमा की स्मृतियों को भी.
"अरे ! क्या हुआ?" कहते हुए हड़बड़ा कर नीमा जैसे जाग गई.
"सामने की सीट पर बैठकर सो रही हो! ऐसा कैसे चलेगा नीमा मेमसाब." घबराई नीमा को देखकर शशांक मुस्कुराया.
"सोई नहीं थी, बस दीपावली की बातें याद आ गई थीं." कहती नीमा ने अपने चेहरे पर झूमती लटों को समेट लिया.

शशांक ने गाड़ी एक ढाबे पर रोक दी और दोनों खाना खाने लगे. सामने खड़ा वेटर मुस्कुरा रहा था क्योंकि दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे की पसंद की चीजें आर्डर कर रहे थे.

जब शशांक ने दो गुलाब जामुन मंगवाए तब नीमा को फिर दीपावली की बातें याद आ गईं.
"बहू, तुम्हारी पहली दीपावली है इस बार पकवान तुम्हारी पसंद के बनेंगे." सास की आवाज से नीमा ने फौरन कहा था, "मम्मी, मुझे गुलाब जामुन बहुत पसंद हैं. हम खूब सारे बनाएंगे." बच्चों की सी खुशी थी नीमा की आवाज़ में.
"नीमा भाभी, मुझे भी बहुत पसंद हैं गुलाब जामुन. बड़े दिनों से खाए भी नहीं." अखबार पढ़ते हुए "भाई साहब" ने कहा.
बस..! शीनू दीदी का पारा गरम हो गया। आव देखा ना ताव.. अपने पति के सामने खड़ी हो गईं.
"अब मेरी चुगली इस कल की आई से करोगे. कब से इतने पसंद हो गए ग़ुलाब जामुन आपको?  जामुन नहीं खाए.. मना किया है किसी ने, खा लेते आते-जाते हजार होटल तो हैं रास्ते में." त्यौहार के समय दीदी की आक्रामक मुद्रा से नीमा सहम गई. माता-पिता की असामयिक मृत्यु से, नीमा बुआ-फूफाजी के पास पली बढ़ी थी. उनके बच्चों के साथ हर बात में समझौता कर लेना, आदत बन गई थी उसकी. आफिस में साथ काम करने वाले शशांक ने शादी का प्रस्ताव रखकर, नीमा को जैसे एक नई जिंदगी दी थी.
"नहीं दीदी, भाई साहब ने मेरा मन रखने के लिए कह दिया होगा." नीमा ने अपने ननदोई का बचाव करने की कोशिश की.
"अच्छा! बढ़िया है, वो तुम्हारा मन रखें और तुम उनका. बाकी तो घर में कोई है नहीं. इस परिवार में बाहर से जुड़े लोगों की मर्ज़ी ही चलेगी अब तो." दीदी के कठोर शब्द सभी के कानों में गरम शीशे की तरह घुसने लगे.
"शीनू! कैसी बातें कर रही हो. साल भर का बड़ा त्यौहार और तुम दामाद जी से कैसे बोल रही हो? नीमा और दामाद जी, क्या इस घर के नहीं हैं?" शशांक के पापा ने गुस्से से कहा.
भाई साहब तो चुपचाप उठकर बाहर चले गए और फिर शाम को शशांक ही उन्हें घर वापस लेकर आया था.
दीपावली पर पूजा हुई, सबने नए कपड़े पहने, पकवान भी परोसे परंतु एक चुप्पी, अनमनापन वातावरण में पसरा रहा.
"अपने लाए कपड़े वापस ले जाना, मुझे और बच्चों को जरुरत नहीं है इनकी. तुम्हारी कमाई तुम्हें ही मुबारक हो." वापसी में शीनू दीदी ने नीमा के लाए कपड़े वापस करते हुए कहा था.
कपड़े वापस लेते हुए छलछला आईं थीं नीमा की आंखें.
"बहू, इतनी सुंदर साड़ी है ला दे मुझे. अभी रिश्तेदारों में बहुत शादियां हैं, मुझे जरूरत है इसकी." मम्मी ने साड़ी और सब कपड़े वापस ले लिए और गले लगाकर बहू बेटे को विदा किया.

"ओ..नीमा मैडम, कहां खो जाती हो यार. गुलाब जामुन तो खत्म हो गए. अब चलें." शशांक की आवाज से चौंककर नीमा ने हांँ में सिर हिलाया और उठ खड़ी हुई.

"इस बार मैंने कपड़े सिर्फ बच्चों के लिए खरीदें हैं. शीनू दीदी और भाई साहब के लिए हिम्मत नहीं हुई."  ड्राइविंग सीट पर बैठती नीमा ने कुछ बुझे स्वर में कहा.
बचपन से विपरीत परिस्थितियों में पलने-बढ़ने के बावजूद नीमा, बहुत खुशमिजाज और मिलनसार लड़की है, शशांक को  पता था. शीनू दीदी के व्यवहार से वह विचलित हो गई थी और फोन पर भी दीदी से सिर्फ़ प्रणाम और औपचारिक बातें ही होती थी.

"ठीक है भाई! दीदी को वैसे भी किसी की पसंद रास नहीं आती, उन्हें तो तुम इसलिए पसंद नहीं क्योंकि तुम मेरी पसंद हो. जीजाजी, मम्मी पापा की पसंद हैं इसलिए पसंद नहीं." जोर से हँसकर शशांक ने वातावरण को हलका किया और दोनों फिर हँसते मुस्कुराते अपने घर की ओर बढ़ चले.
दरवाजे पर पहुँचकर, शशांक के कहने पर नीमा ने कार का हार्न बजाया. वे दोनों उतरे ही थे कि मम्मी पापा स्वागत के लिए दौड़े आए. नीमा ने मम्मी के चरण स्पर्श किए और उन्होंने आशीर्वाद देते हुए उसे गले से लगा लिया. घर के अंदर आती नीमा को बच्चों की आवाज नहीं आई ना ही वे दिखाई दिए. पानी पीते हुए उसकी नज़रें, शीनू दीदी के परिवार को खोज रहीं थीं.
"मम्मी, दीदी और बच्चे कहाँ हैं? दिखाई नहीं दे रहें हैं." थोड़ी दबी हुई आवाज़ में नीमा ने पूछा.

मम्मी ने शशांक की ओर देखा और कहा, "तुम्हारे जीजाजी की कंपनी से कुछ लोगों को निकाला गया, उसमें दामाद जी भी थे. पिछले महीने ही एक नई जॉब ऑफर मिली जो यहाँ से तीन-चार घंटे की दूरी पर है. कंपनी के लोगों की कालोनी है वही पंद्रह दिनों पहले शिफ्ट हो गए हैं." मम्मी के बताने पर शशांक और नीमा मौन‌ हो गए.

"आपसे हमेशा ही बात होती है, हमें बताया क्यों नहीं?" दोनों एक साथ पूछ बैठे.
"दामाद जी ने मना किया था. बोले होली पर तो‌ आ ही रहें हैं तभी बता देना वरना दोनों परेशान हो जाएंगे." पापा ने उत्तर दिया.

दीदी गुस्सैल स्वभाव की थीं परंतु उनके रहने से घर भरा भरा लगता था. शशांक और नीमा समझ गए कि दीपावली की घटना के बाद मम्मी पापा भी ऐसा ही सोचने लगे थे कि दामाद जी का आगे भी अपमान ठीक नहीं होगा.

"शशांक हम एक-दो दिन छुट्टी ले लेते हैं, होली के दूसरे दिन शीनू दीदी और बच्चों से मिल आएंगे. मम्मी पापा को भी दीदी का घर देखने जाने का मन होगा." नीमा ने कहा.

"बिल्कुल नीमा मैडम, हम सब जाकर दीदी जीजाजी को सरप्राइज देंगे, ठीक है ना पापा मम्मी!" शशांक ने खुशी से कहा.

नीमा और शशांक ने मम्मी पापा की ओर देखा. ‌
"मैं तो अपने दामाद जी की पसंद के गुलाब जामुन बनाकर ले जाऊंगी, मेरी मदद करेगी ना नीमा?" मम्मी की बात पर सब मुस्कुराने लगे. होली पर एक खूबसूरत पहल परिवार खुशियाँ मना रहा था. 


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मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)400610

Add- Sharmila chouhan
C-1401, Niharika kankia Spaces
Opposite Lokpuram Temple
Thane(west)400610
Maharashtra
M.no. 9967674585
Email sharmilachouhan.27@gmail.com

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

रुबाईयाँ

रुबाई पर प्रथम प्रयास सादर 🙏

222 222 222 2

मौन झुकी पलकें थिरकें साज अलग
आँखें खोल रहीं हैं कुछ राज अलग
मिल न सके जो हाथ ज़माने से डर
आँखें जोड़ चुकीं रिश्ते आज अलग।

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222  222  222  21

ओस मचलकर पत्तों पर झूली है आज
सरसों संग चने के फूली है आज
मेघों में सिमटी है श्यामल सी भोर
मंद पवन भी रस्ता भूली है आज

शर्मिला चौहान 
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221 1222 221 12

हासिल हो गई खुशियाँ  माना करिए
गैरों के दुखों को भी जाना करिए
रोना बेवजह का यूँ  ही ठीक नहीं
हँसने की कभी मन में ठाना करिए

शर्मिला चौहान

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*रुबाई - एक परिचय*रुबाई की शुरूआत फ़ारसी से हुई और उसके बाद उर्दू में आई. इसमें चार मिसरे होते हैं जिनमें से पहला, दूसरा और चौथा मिसरा हमक़ाफ़िया होता है. दूसरे शब्दों मे कहें तो रुबाई में दो शेर होते हैं.मुख्य बात यह है ग़ज़ल की तरह रुबाई को किसी भी बहर में नहीं कहा जा सकता बल्कि इसके लिए कुल 24 बहरें निर्धारित हैं. सिर्फ़ इन 24 बहरों में ही रुबाई कही जा सकती है. रुबाई की निर्धारित बहरों के अलावा अगर किसी अन्य बहर में चार मिसरे कहे जाते हैं तो उसे क़ित्‌आ यानी मुक्तक कहा जा सकता है पर रुबाई नहीं. 2. एक मज़ेदार बात यह है कि रुबाई के चारों मिसरे अलग अलग बहर में कहे जा सकते हैं पर वो बहरें उन्ही 24 बहरों में से होनी चाहिये जो रुबाई के लिये निर्धारित हैं.यह भी कहा जाता है कि रुबाई का हर मिसरा पिछले मिसरे से बेहतर होना चाहिये और चौथा मिसरा सबसे शानदार हो. रुबाई के लिये निर्धारित बहरें: 1. 221 1212 1222 21 2. 221 1221 1222 21 3. 221 1221 1221 12 4. 221 1222 222 21 5. 221 1212 1222 2 6. 221 1221 1222 2 7. 221 1222 222 121 8. 221 1222 221 12 9. 221 1222 222 2 10. 221 1221 1221 121 11. 221 1212 1221 121 12. 221 1212 1221 12 13. 222 1212 1222 21 14. 222 221 1222 21 15. 222 212 1221 12 16. 222 222 222 21 17. 222 222 222 2 18. 222 212 1222 2 19. 222 221 1221 121 20. 222 221 1222 2 21. 222 222 221 12 22. 222 221 1221 12 23. 222 212 1221 121 24. 222 222 221 121