"गीत"
(2122 2122 2122 2122)
हौसला तेरा गिरा दे भीड़ ऐसी जोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर राह अपनी छोड़ना मत।।
पाँव में कंकर चुभें जो
दर्द सहना ही सिखाते।
चमचमाती धूप में कुछ
फूल देखो खिलखिलाते।
छोड़ कस्तूरी गुणों को
तू वनों में दौड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर
राह अपनी छोड़ना मत।।१।।
हो प्रवाहित पर्वतों से
फिर नदी रुकती कहाँ है!
श्वास लेती है वहीं प्रियतम
मिले सागर जहाँ है।
बाँध अपने धैर्य का तू
भूलकर भी तोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर
राह अपनी छोड़ना मत।।२।।
जो निरंतर तू चले तो
मिल सकेंगी मंज़िलें भी।
रोक लेगा चाल अपनी
बीत जाएगा समय ही।
ठान कर आगे बढ़ा तो
पैर पीछे मोड़ना मत।
तू अकेला ही सही पर
राह अपनी छोड़ना मत।।३।।
शर्मिला चौहान
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