"गीत"
(22 22 22 22 )
ईश्वर की लीला न्यारी है
यह दुनिया कितनी प्यारी है!
नीली छतरी सिर पर डोले
बगियों में कोयलिया बोले।
योगी बन मौन खड़े पर्वत
धरती पर खूब सजे मरकत।
हिममय गिरि के चरणों में
केसर की सुंदर क्यारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।१।
सागर जब धरता रूप विकट
लहरें बन जातीं तब संकट।
नदियों की गाथा प्रेममयी
सदियों से बहतीं कालजयी।।
लहरों की चंचलता पल भर
पर त्याग नदी का भारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।२।
अग्नि सम मरुथल तप्त रहें
लिपियाँ गढ़ अपनी बात कहें।
काँटों में फूल खिलाते जो
मौसम से ही बन जाते वो।
सर्द गरम बरसें बन जीवन
अद्भुत प्रभु रचना सारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।३।
हैं रंग बिरंगे फूल खिले
पक्षी बोलों की तान मिले।
तितली के रूप अनूठे से
धरती पर सजते बूटों से।
देख धरा की यह सुंदरता
खुद ईश्वर भी बलिहारी है।
यह दुनिया कितनी प्यारी है!।४।
शर्मिला चौहान
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें