शनिवार, 9 जुलाई 2022

ग़ज़लें मेरी

 तीसरे तरही मिसरा पर प्रथम प्रयास 🙏
2122  2122  2122  212

बंद महलों में हुआ जो वो हसीं मंज़र नहीं
पद्मिनी ने जो किया था सिर्फ वो जौहर नहीं।।१।।

मीत बन कर पास आते राज दिल के भेदते
देख मौका घात करते बैर सा खंजर नहीं।।२।।

घूम कर सारा ज़माना लौट घर को आ गया
और कोई भी ठिकाना है कहीं सुंदर नहीं।।३।।

हाथ में कंगन चमकते ‌पैर में पायल सजे
मौन लब पलकें झुकीं थीं शर्म सा जेवर नहीं ।।४।।

गर्व का जो बोझ कम हो पार भव से हो सकें
दर्प की जो नाव थामे है कोई सागर नहीं ‌‌।।५।।

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शर्मिला चौहान


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 तीसरे तरही मिसरे पर द्वितीय प्रयास 🙏
2122  2122  2122  212


हैं पिता जब तक जहाँ में मुश्किलों से डर नहीं
हाथ सिर पर रख दिया तो बाप सा अंबर नहीं।।1।।

टूट जातीं जब उमींदें टूट जाता आदमी
जोड़ दे जो चीज़ वो मिलती यहाँ अक्सर नहीं।।2।।

बात का था मान रखना छोड़ सब सुख चल दिए
जो पिता की बात पाले आज वो रघुबर नहीं।।3।।

पंख हैं मज़बूत पंछी खूब नापे आसमाँ
हो शिथिल बैठा पुकारे आज वो तेवर नहीं।।4।।

दाँव नारी का लगाकर खेल मर्दों ने रचा
द्रौपदी का चीर हर ले अब कोई चौसर नहीं।।5।।


शर्मिला चौहान 
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 सप्ताह के गृहकार्य पर प्रथम प्रयास सादर समीक्षार्थ 🙏(संशोधित)

1222 1222 1222 1222

खुशी से हो भरा दिल तो लगे त्यौहार फूलों से
उदासी से गुज़रते को मिले आधार फूलों से।।1।।

बड़ी सौगात मिलतीं थीं नहीं था पर वो अपनापन
हुई हासिल कई खुशियांँ मिले उन चार फूलों से।।2।।

बिखेरें रंग दुनिया में हवाओं में महक भर दें
जहां में है कोई ऐसा रहे बेजा़र फूलों से।।3।।

खुली जुल्फ़ों पे इठलाते किताबों में वो शरमाते
बहुत किस्से सुना जाते मिलो जब यार फूलों से।।4।।

लुभाएँ मन सभी का वो भले ही क़ीमती ज़ेवर 
मगर नारी दिखे सुंदर करे शृंगार फूलों से।।5।।

चले आते कहीं से गुनगुनाते सिरफिरे भौंरे
जताते इस तरह जैसे हो सचमुच प्यार फूलों से।।6।।

कभी शाखों पे मुस्काते कभी मंदिर में सज जाते
निभाते साथ अर्थी तक है जीवन सार फूलों से।।7।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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 दूसरा प्रयास सादर समीक्षार्थ 🙏(संशोधित)
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खिलीं कलियाँ हवा बहकी बदलता हर नज़ारा है
किसी के पास आने का लगे जैसे इशारा है।।1।।

समुंदर बीच में कश्ती लड़े तूफान से हरदम
निगाहों में समाया दूर बैठा बस किनारा है।।2।।

मिलन की चाह में काँटे  घड़ी में घूम थक जाते
बजे बारह लिपट जाते समय भी दिल का मारा है।।3।।

ग़ज़ल हो गीत हो या नज़्म या कोई कहानी हो
छुए दिल को तभी जब भाव भरता दिल हमारा है।।4।।

बजाते ढ़ोल आए मेघ बिन बरसे मगर लौटे
किसानों ने लिखी अर्जी हमें तेरा सहारा है।।5।।

मिले जो साथ छोटा या बड़ा संबल बढ़ा देता
अमावस रात में जुगनू लगे चंदा से  प्यारा है।।6।।

जु़बां मीठी रहे प्यारे तो हो हासिल सभी खुशियांँ
इसी हथियार ने अक्सर जहां जीता ये सारा है।।7।।


शर्मिला चौहान

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