गुरुवार, 9 जून 2022

212 212 212 212 पर ग़ज़ल

इस बहर पर मेरा  संशोधित प्रयास 🙏

212  212  212  212
ई- क़ाफिया


अलहदा होड़ है साठ के पार की
मन डरे हर घड़ी साँस थोड़ी बची।।1।।

फ़िक्र में जेब की बीतती उम्र है
हाथ डालो कभी ना मिले ये भरी।।2।।

हाथ थामे चले प्रेम की राह जो
बावरी सी उसे ढूँढती मैं रही।।3।।

ज़िंदगी छोड़कर तू चली है कहाँ
इस जहाँ में मिली तू ही इक मनचली।।4।।

दूसरों की गिनाकर कई खामियाँ
खुद की भूलें छिपाता फिरे आदमी।‌5।।

 प्यार माता पिता से हमेशा जिसे
सात फेरे पिया लाड़ली वो बनी।।6।।

बात जो दूसरों की करें वो करें
ये ग़ज़ल जो कही आज खुद पर कही।।7।।


शर्मिला चौहान

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