ग़ज़ल कहने का प्रयास
क़ाफिया _आ
रदीफ़ _ हूँ
2122 1212 22
साँस की डोर मैं वो वादा हूँ
जो अधूरा रहा इरादा हूँ।1।
बांध सपनों के पंख उड़ते सब
मैं तो इक परकटा परिंदा हूँ।2।
रौशनी गैर से सभी रौशन
खुद जलूँ रात भर वो दीया हूँ।3।
दौर जामों का रात भर चलता
रात छलका नहीं वो प्याला हूँ।4।
देखकर मैल खुद के चेहरे पर
पोंछते मुझको मैं वो शीशा हूँ।5।
साथ पानी के ही खड़ा रहकर
बाद प्यासा रहा किनारा हूँ।6।
बेवफ़ा जिंदगी दगा देती
मौत को दोस्त मैं बनाता हूँ।7।
शर्मिला चौहान
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1222 1222 1222 1222
(प्रथम प्रयास सादर )
क़ाफिया ई
रदीफ़ है
फलक ने रोशनी देखो ज़मीं पर यूँ उतारी है।
सितारों ने बिना मौसम दिवाली फिर मनाई है।।1।।
दिए जो घाव अपनों ने हुआ छलनी हमारा दिल
कहीं कोई मिले कोना बिना घावों जो खाली है।।2।।
सितम के मायने बदले सितमगर तू नहीं बदला
मिली जो चोट तुझसे वो लगे बिल्कुल करारी है।।3।।
गगन ने गीत जब गाया शरद का चाँद मुस्काया
विहँस कर चाँदनी उज्ज्वल ज़मीं पर तब छिटकती है।।4।।
खुले बालों महक जाती घटाओं सी बहक जाती
सफेदी ओढ़ शरमाती वही तो रातरानी है।।5।।
शर्मिला चौहान
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1222 1222 1222 1222
(दूसरा प्रयास समीक्षार्थ )🙏
ई क़ाफिया
हवाओं संग बह आती दुआ भी खूब जिद्दी है
जहाँ रहता कोई अपना पहुँच जाती हठीली है।।1।।
तपा सूरज बना दूल्हा उड़ी सेमल लिए न्यौता
खिले टेसू सजा मंडप उमस की आज शादी है।।2।।
झुकी नज़रें सितम ढाती दिलों की बात कह जाती
उठीं जब भी यही नज़रें खड़ी हो बन सवाली है।।3।।
किनारों पर मिटा करतीं हजारों रोज ही लहरें
किनारा खुद सिमट आए लहर लगती सुहानी है।।4।।
गिना कर ऐब औरौं के बटोरे वाहवाही जो
कभी झाँकें जरा दर्पण उसी का ऐब भारी है।।5।।
शर्मिला चौहान
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पाँचवां संशोधित प्रयास आप सभी के समीक्षार्थ 🙏
221 1221 1221 122
ये मुफ़लिसी है इसकी कोई जात नहीं है
रोटी से बड़ी कोई भी सौगात नहीं है।।1।।
कूड़े में पड़ा अन्न किसानों को रुलाता
खाली किसी थाली में अभी भात नहीं है ।।2।।
अब याद बहुत आता है गुज़रा वो ज़माना
क्यूँ आज के इस दौर में वो बात नहीं है।।3।।
मन दीप जले प्रेम के फैला है उजाला
नफ़रत से भरी कोई कहीं रात नहीं है।।4।।
बस होड़ में बढ़ने के लगा आज है इंसांँ
औरों को गिराना ये सही मात नहीं है।।5।
बातों की कमी से बड़े सूखे पड़े रिश्ते
रिश्तों में नमी ला सके बरसात नहीं है।।6।।
नाजों से पला दिल ये मेरा सौंप कैसे दूँ
अब आपसे इतनी भी मुलाकात नहीं है।।7।।
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प्रयास -छटवाँ संशोधित 🙏
2122 1212 112/22
क़ाफिया - अर
इश्क का हो गया असर गायब
प्यार की वो भरी नज़र गायब।।1।।
ढूँढती मैं फिरूँ जहाँ में जिसे
हो गया आज वो बशर गायब।।2।।
गाँव की ओर जो चला करती
लो अचानक हुई डगर गायब।।3।।
आदमी डस रहा है आदम को
साँप का हो रहा ज़हर गायब।।4।।
रात लंबी लगे निराशा की
हो गई आस की सहर गायब।।5।।
खूब पैसै भरे तिजोरी में
चैन के हो गए पहर गायब।।6।।
तार पर बैठ कर हँसा पंछी
हो गए आज कल शज़र गायब।।7।।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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