आप सभी के समीक्षार्थ मेरा प्रयास सादर है।🙏 सुझाव एवं मार्गदर्शन का हृदय से स्वागत है।(संशोधित)
212 212 212 212
जब जली थी जमीं दर्या बादल हुआ
आसमाँ रो पड़ा नीर निर्मल हुआ।।1।।
नेह भीगी धरा खूब प्यारी लगे
अंक में वृंद भर धानी आँचल हुआ।।2।।
देखकर सामने अजनबी सा उसे
नैन भर क्यों गए, मन भी घायल हुआ।।3।।
वाहवाही करें बात सब ऊपरी
बैन मिसरी डली दिल तो काजल हुआ।।4।।
होड़ में इस तरह से लगा आदमी
नोट की दौड़ में बस वो पागल हुआ।।5।।
गाँठ ऐसी पड़ी रस बचा ही नहीं
भावना कैद है गर्व सांकल हुआ।।6।।
चैन मिलता नहीं इक घड़ी भी कहीं
सोम जीवन नहीं बस हलाहल हुआ।।7।।
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शर्मिला चौहान
ठाणे
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