मंगलवार, 4 जनवरी 2022
*रुबाई - एक परिचय*रुबाई की शुरूआत फ़ारसी से हुई और उसके बाद उर्दू में आई. इसमें चार मिसरे होते हैं जिनमें से पहला, दूसरा और चौथा मिसरा हमक़ाफ़िया होता है. दूसरे शब्दों मे कहें तो रुबाई में दो शेर होते हैं.मुख्य बात यह है ग़ज़ल की तरह रुबाई को किसी भी बहर में नहीं कहा जा सकता बल्कि इसके लिए कुल 24 बहरें निर्धारित हैं. सिर्फ़ इन 24 बहरों में ही रुबाई कही जा सकती है. रुबाई की निर्धारित बहरों के अलावा अगर किसी अन्य बहर में चार मिसरे कहे जाते हैं तो उसे क़ित्आ यानी मुक्तक कहा जा सकता है पर रुबाई नहीं. 2. एक मज़ेदार बात यह है कि रुबाई के चारों मिसरे अलग अलग बहर में कहे जा सकते हैं पर वो बहरें उन्ही 24 बहरों में से होनी चाहिये जो रुबाई के लिये निर्धारित हैं.यह भी कहा जाता है कि रुबाई का हर मिसरा पिछले मिसरे से बेहतर होना चाहिये और चौथा मिसरा सबसे शानदार हो. रुबाई के लिये निर्धारित बहरें: 1. 221 1212 1222 21 2. 221 1221 1222 21 3. 221 1221 1221 12 4. 221 1222 222 21 5. 221 1212 1222 2 6. 221 1221 1222 2 7. 221 1222 222 121 8. 221 1222 221 12 9. 221 1222 222 2 10. 221 1221 1221 121 11. 221 1212 1221 121 12. 221 1212 1221 12 13. 222 1212 1222 21 14. 222 221 1222 21 15. 222 212 1221 12 16. 222 222 222 21 17. 222 222 222 2 18. 222 212 1222 2 19. 222 221 1221 121 20. 222 221 1222 2 21. 222 222 221 12 22. 222 221 1221 12 23. 222 212 1221 121 24. 222 222 221 121
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