मंगलवार, 4 जनवरी 2022

रुबाईयाँ

रुबाई पर प्रथम प्रयास सादर 🙏

222 222 222 2

मौन झुकी पलकें थिरकें साज अलग
आँखें खोल रहीं हैं कुछ राज अलग
मिल न सके जो हाथ ज़माने से डर
आँखें जोड़ चुकीं रिश्ते आज अलग।

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222  222  222  21

ओस मचलकर पत्तों पर झूली है आज
सरसों संग चने के फूली है आज
मेघों में सिमटी है श्यामल सी भोर
मंद पवन भी रस्ता भूली है आज

शर्मिला चौहान 
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221 1222 221 12

हासिल हो गई खुशियाँ  माना करिए
गैरों के दुखों को भी जाना करिए
रोना बेवजह का यूँ  ही ठीक नहीं
हँसने की कभी मन में ठाना करिए

शर्मिला चौहान

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