शनिवार, 10 सितंबर 2022

गंगा दर्शन

"गंगा दर्शन"


तेजस्विता भाव, शुचिता परिपूर्ण, भव निर्मल करती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे,अंतर मम  बसती हो।।

भगीरथ अथक प्रयास सफल,
हुआ धरा पर अवतरण।
शिव जटा बीच सिमटी,
था प्रबल वेग मात्र कारण।
शुभ्र उफनती गौमुख उद्गम,
चपला सी वेग गति।
संतृप्त हृदय, आत्म अनहद ,
स्थिर करती चंचल मति।

आवेग, उत्साह, हर्ष , परिपूर्णता, जन-जन में भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

वेद, पुराण, इतिहास, वंदित,
जप-तप ध्यान योग स्थान।
निर्मल नीर प्रवाह निरंतर,
आदिकाल से धरा की शान।
हरिद्वार की पुण्य भूमि को,
करती जब स्पर्श।
तपोभूमि ऋषियों-मुनियों की ,
रम्य मनोहर तीर्थ।

श्रृद्धा भाव, मन शुचिता, आस्था विश्वास भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

सुरसरि, देवनदी, माँ गंगा,
जाह्नवी, अलकनंदा, मंदाकिनी।
पुण्यदायिनी,मोक्षप्रदायिनी,
पापनाशिनी, कर्म प्रकाशिनी।
सिंचन करती निज नीर से, 
समस्त धरा का पोषण करे।
आलिंगन कर वसुधा का फिर,
जन -जन का कल्याण करे।

बूंद बूंद निर्मल गंगाजल,
आध्यात्म भाव भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

घंटा, ढोल, नगाड़े बाजें, 
शंखनाद की गूंँज रहें।
बहते दीपक जलधारा में
जीवन सातत्य की सीख धरें।
आकाश दीप सा जीवन हो
ध्येय उच्चतम सदा रहे।
आत्मज्ञान की ज्योति से 
हृदय आलोकित रहे।

जीवन दर्शन की सुंदरता, लहर लहर भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे, अंतर मम बहती हो।।

राम, कृष्ण ने वंदन किया,
तुलसीदास गुणगान करे।
तट पर स्थित पवित्र भूमि पर,
शिव साक्षात निवास करे।
आदि शंकराचार्य, विवेकानंद के
दर्शन का आधार हो तुम।
सनातन वैदिक संस्कृति का 
एक प्रबल विश्वास हो तुम।

आदिकाल से अनंत तक, जनमानस में भाव भरती हो।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंँजे , अंतर मम बहती हो।
अंतर मम बहती हो।।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9968674585
sharmilachouhan.27@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें