आदरणीय सर के मार्गदर्शन से ग़ज़ल का संशोधित रुप सादर है।🙏
212 1222 212 1222
द्रौपदी को खुद अपनी लाज अब बचानी है
कृष्ण जी के आने की बात तो पुरानी है।।1।।
मूक बैठ कर देखें चीर के हरण वाला
अब दिखे न वो मंज़र याद फिर दिलानी है।।2।।
औरतें रहीं दुश्मन औरतों की सदियों से
लोक लाज के बंधन दर्द की कहानी है।।3।।
धुंँध थी दिशाओं में भेद की प्रथाओं में
गाँठ जो पड़ी अंतस अब वही छुड़ानी है।।4।।
सोच तंग दुनिया की वंशबेल बेटों से
बेटियांँ नहीं कमतर बात यह बतानी है।।5।।
बाग की सभी कलियांँ हृष्ट पुष्ट हों उन्नत
ज्ञान पुष्प विकसित हों वो फसल उगानी है।।6।।
मुश्किलों से वो लड़ती विघ्न हर बड़े सहती
छू रही गगन सारा जीत की निशानी है।।7।।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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