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क़ाफ़िया _ अला
मुसाफ़िर साथ में कोई, हमारे जो चला होता।
मज़ा आता सफ़र का तब, बढ़ा ये हौसला होता।।१।।
शिकायत अब करें भी क्या, सुनेगा कौन इस दिल की।
कभी कहते कभी सुनते, अगर साथी भला होता।।२।।
उनींदी सी रहीं आँखें, कई रातें कटीं जगकर।
झपक लेते कभी पलकें, कोई सपना पला होता।।३।।
रहा होता सदा रौशन, हमारा दिल मुहब्बत से।
किसी के प्यार का दीपक, कभी दिल में जला होता।।४।।
दवा भी खूब मिल जाती, दुआ भी काम आ जाती।
किसी ने गर मुहब्बत में, कभी हमको छला होता।।५।।
चमकता नूर चेहरे पर, दिलों पर रंग चढ़ जाता।
कभी वो रंग उल्फत का, किसी ने जो मला होता।।६।।
गज़ल नज़्में कभी कहते, सुनाते गीत चाहत के।
हमारी भावनाओं में, कभी कोई ढला होता।।७।।
शर्मिला चौहान
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बहर- १२२ १२२ १२२ १२२
क़ाफ़िया- आने
खयालों में अक्सर वो आने लगे हैं।
दबे पाँव दिल में समाने लगे हैं।।१।।
हज़ारों जतन कर छिपाए रखा दिल।
वो बातों से अपनी चुराने लगे हैं।।२।।
कभी रूठ कर मुँह भी मोड़ लूँ गर।
कसम दे के अपनी मनाने लगे हैं।।३।।
जो ग़ैरों से दिल को लगाया थे करते।
वही हम पे दिल अब लुटाने लगे हैं।।४।।
जो चलते नहीं थे कभी साथ मेरे।
क़दम से क़दम अब मिलाने लगे हैं।।५।।
घड़ी भर की फुर्सत नहीं थी मिलन की।
वो दिन रात चक्कर लगाने लगे हैं।।६।।
नज़र एक में अब कहाँ प्यार होता।
बनाने में रिश्ते ज़माने लगे हैं।।७।।
शर्मिला चौहान
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