अगले जनम मोहे....ही कीजो (व्यंग्य)
हल्की बारिश में सुबह देर तक बिस्तर का आनंद लेते बांकेलाल को, पड़ोसी के कुत्ते के लगातार भौंकने से क्रोध आ गया।
"कुत्ता वो पालें परेशानी हम सहें, कैसा जमाना है?" करवट बदलते हुए वे बड़बड़ाए।
"वो कुत्ता नहीं, शेरू नाम है उसका।" पत्नी ने बांके की चादर खींचते हुए कहा।
"जाओ भी, रोज कहते हो सुबह चलना शुरू करना है, आज नहीं गए तो खाना-पीना बंद।" आँखें तरेरती हुई वो बोली।
मरता क्या न करता, तैयार होकर बांके गली में निकल गए।
उनको देखकर नियमित चलने वालों की आँखें फैल रही थीं। सबने एक से बढ़कर एक बढ़िया ब्रांड के जूते पहने थे। अपने थोड़े मटमैले, पुराने जूतों को देख बांके ने गहरी सांस भरी।
जूते आपको चलाते हैं। जिसके जूते जितने मार्डन, ब्रांडेड उसकी चाल उतनी ही ठसन भरी। बांके ने गौर किया कि नब्बे प्रतिशत के साथ उनके कुत्ते भी थे।
"आंटी अपने कुत्ते को संभालो ना, कैसे झपट रहा है।" एक अधेड़ महिला को एक जवान लड़के ने टोका।
"ऑस्कर, डोंट डू बेटा, नॉटी बॉय।" कुत्ते को कहकर वो लड़के की ओर पलटी, "हमारे बेटे को कुत्ता कहने की हिम्मत कैसी हुई तुम्हारी। पढ़े-लिखे दिखते हो पर दिमाग बिल्कुल नहीं है।" खुद के लिए आंटी के संबोधन का ज्वालामुखी सा फट पड़ा। उन्होंने अपने उस बेटे को ऊनी मोजे, रंगीन शर्ट पहना रखा था।
उनके महाभारत में धृतराष्ट्र बनकर बांके ने आगे कदम बढ़ा लिए।
आगे चलने का कौतूहल बढ़ता जा रहा था। छोटे-बड़े, मंझोले कद के, सफेद, लाल, काले, भयानक, क्यूट, आलसी फुर्तीले कई प्रकार के कुत्तों से नजरें दो-चार करते बांके चल रहे थे।
एक कुत्ता अपने मालिक के कंधों पर चढ़कर दुनिया का मेला देख रहा था।
बांकेलाल अपने बचपन में घूम आएं जब वो अपने बाबूजी के कांधों पर बैठकर मेला देखा रहते थे। बचपन में गाँव-घर, खेत-खलिहान में घूमते कुत्ते भी बरबस स्मृति में भौंकने लगे। बासी रोटी खाते और गला फाड़कर भौंकते, ईमानदार रखवाले थे वो।
विकास की तरह तेजी से बढ़ते बांकेलाल के कदम, अचानक रुक गए। दो लड़कियांँ अपने आधे फुट के क्यूट से कुत्ते को बीच सड़क शौच करते देख, रूक गईं। बड़े प्रेम से एक ने पर्स से कागज़ निकाला, मल उठाकर आगे कूड़ेदान में डाल दिया और कुत्ते को फिर गोद में चढ़ा लिया।
"नमस्कार बांकेलाल जी! आज सूरज आपको देखकर उगा है क्या?" अगले मोड़ पर मोहल्ले के दो निवासियों ने बांकेलाल को रोका। बांके रूककर कुछ बातें करते कि उनके कुत्ते उन्हें आगे खींचकर ले गए।
आज तो बांकेलाल ने कुत्तों के नाम, नस्लों का इतना सामान्य ज्ञान अर्जित कर लिया था कि उनकी मार्निंग वॉक, डॉग वॉक में बदल गई। पामेरियन, अल्सेशियन, बीगल, जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर और न जाने क्या-क्या! मालिकों के द्वारा उनकी स्तुति से, बांकेलाल के मस्तिष्क पटल पर वो घर के बजट की तरह अंकित हो गए।
इन सब कुत्तों से अलग, दुबले-पतले सड़क छाप कुत्ते को देखकर, बांकेलाल ओरिजिनल ब्रांड को पुचकारने लगे और वो कुकीयाने लगा।
बस, आसपास के तुनकमिजाज, नकचढ़े, रईस बेटों को बुरा लग गया और वे रोने लगे।
"आप इस गंदे कुत्ते को प्यार कर रहे हैं, मेरे बेबी को यह पसंद नहीं आ रहा।" एक मैडम जी ने कहा।
"ये भी कोई डॉग है, हमारे बच्चों को नुक़सान पहुँचाएगा।" एक आदमी ने अपने कुत्ते को झट गोद में बिठा लिया।
बेचारे, देसी कुत्ते ने अपनी दुम दबाई और नौ दो ग्यारह हो गया। बांके को भागे हुए उस कुत्ते का प्रेमी जानकर, लोगों के मुँह विकृत हो गए।
घर वापस लौटते हुए बांकेलाल ने मन ही मन, एक देसी कुत्ते को अपने घर में स्थान देने का मन बना लिया।
घर पहुँचे तो देखा पत्नी अपने गोद में एक श्वेत, झब्बे बालों वाले कुत्ते को उठाए बाहर खड़ी थीं।
"हमने इसे अपने घर में रखने का निश्चय किया है। कितना प्यारा है ना...आज इसके खाने-पीने, इंजेक्शन और देखरेख की जानकारी के लिए डॉक्टर से मिलने जाना है।" कुत्ते के बालों पर स्नेह से अंगुलियाँ फेरती हुई वो बोली, "प्यारा शीबू बेटा, तुम्हारे लिए पापा कपड़े, जूते सब लाएंगे।"
"कब ले आईं तुम कुत्ता? एक बार बताया भी नहीं।" तवे पर फैलते आमलेट की तरह, बांके की पुतलियां फैल गईं।
"खबरदार जो हमारे बेटे को कुत्ता कहा। हमने तुम्हें इसके पापा का ओहदा दिया और तुम..!" हिकारत से वो बेटे को सीने से लगाए अंदर चली गई।
इस आज पैदा हुए बेटे के लिए साज साम्रगी की सूची देख, अपने पुराने जूतों को देख बांके गुनगुनाने लगे, "अगले जनम मोहे...ही कीजो।"
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585
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