मंगलवार, 15 जुलाई 2025

कहानी - दिल दीवाना

कहानी - "दिल दीवाना"

टेलीविजन पर गाना चल रहा था, "आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे.."

गाने के साथ सुर मिलाती हुई शिखा, हॉल में घूम-घूमकर नाच भी रही थी। सचमुच जब से उसका रिश्ता पक्का हुआ है, अरमानों के पँख लगाए वो उड़ती ही रहती है।
बैंगलोर की एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर है उसका वैभव। ऊँचा, हैंडसम और मिलनसार लड़का।
"अब अरेंज मैरिज में इतनी अच्छी जोड़ी बने तो कोई लव के चक्कर में क्यों पड़े?" उसके साथ की शिक्षिकाएं उसे चिढ़ाती रहतीं।
शिखा दिल्ली के एक प्रायवेट स्कूल में अँग्रेजी पढ़ाती है, उसने इस विषय में एम.ए. किया है।
"नौकरी छोड़नी होगी बेटा, बाद में बैंगलोर में कोई नौकरी देख लेना।" एक बार में शिखा ने स्वीकार कर लिया क्योंकि वैभव उसे अच्छा लगने लगा था।

धूमधाम से विवाह हुआ और दुल्हन बनी शिखा चेन्नई, अपने ससुराल आ गई।‌ वैभव के माँ-बाबा और छोटा भाई विनय ने जी भरकर उसका स्वागत किया।
उसी के परिवार की तरह छोटा सा परिवार मिला उसे। 
दो दिनों बाद पापा आ गए और वो पगफेरे के लिए मायके चली गई। उन दो दिनों में वैभव के कितने कॉल‌ आ गए कि कब आओगी वापस। 
"तुम जब लेने आ जाओ तब आ जाऊंगी।" शिखा ने कहा दिया।

अगली शाम वैभव ससुराल पहुँच गया और दूसरे दिन विदा कराकर वो चेन्नई की फ्लाइट में बैठ गए।
"तुम तो तुरंत लेने आ गए।" उसके कंधों पर सिर टिकाती शिखा ने उलाहना भरे स्वर में कहा।
"यह तो दिल्ली है मेरी जान, तुम्हारे लिए तो मैं स्वर्ग से भी आ जाऊंगा।" वैभव अपनी रौ में बोल गया और शिखा ने अपनी हथेली से उसका मुँह बंद कर दिया।
"कुछ भी बोल रहे हो अब तुम!" उसकी ओर देखते हुए शिखा बोल‌ पड़ी।
"दो-तीन दिनों माँ-बाबा के साथ रहकर, बैंगलोर भी तो जाना है मैडम जी। आगे हनीमून के लिए भी छुट्टियांँ ली हैं तो एक सप्ताह काम करना पड़ेगा ना।" वैभव ने शिखा की आँखों में झाँकते हुए कहा।

चेन्नई एयरपोर्ट से अपने निवास स्थान तक, दोनों ने टैक्सी कर ली। सुंदर सड़कें, साथ-साथ चलती समुद्र तट पट्टी, खुला साफ आसमान, हरियाली की शॉल ओढ़ी प्रकृति, मनभावन लग रही थी।
"अब तक उत्तरी भारत की सुंदरता ही देखी थी मैंने, दक्षिण भारत कितना खूबसूरत है।" लगातार खिड़की से बाहर देखती शिखा बोल‌ रही थी।
"ओहहह...! मैंने तो हनीमून के लिए शिमला की टिकट बुक करा ली, मुझे लगा तुम्हें उत्तर की जगहें पसंद करोगी।" वैभव ने मुँह उतार लिया।
"कोई बात नहीं, तुम्हारे साथ शिमला बहुत आनंद देगा।" शिखा ने उसके हाथों को अपने हाथ में ले लिया। 
"हम तो हमारी शिखा के पसंद की दक्षिण भारतीय जगहें ऊटी, कुर्ग जा रहे हैं। तुम्हें कोडई बहुत पसंद आने वाला है।" कहते हुए वैभव मुस्कुराने लगा।
"अच्छा, तो जनाब मुझे उल्लू बना रहे थे।" आँखें तरेरती शिखा को देखकर वैभव ने अपने कान पकड़ लिए।

चेन्नई में रहते हुए शिखा को लगा कि वो अपने मायके में ही है। सब कुछ अपनापन से भरा हुआ। दोनों जब बैंगलोर के लिए निकलने लगे तो माँ ने मसाले, अचार, कुछ ज़रुरत की चीजें पैक कर दिया। 
"बस बस माँ, अब बाकी जब आप लोग आओगे तब ले आना।" डिक्की और कार की पिछली सीट को भरी देख वैभव कहने लगा।
"हाँ-हाँ माँ, मेरे फाइनल पेपर्स हो जाएंगे तब आएंगे हम।" विनय ने कहा।

लवबर्ड्स अपने घोंसले में आ गए। नया शहर, नए लोग, नई भाषा बोली और नया घर-संसार। पाँचवीं मंजिल पर दो बेडरूम का, सुंदर हवादार फ्लैट लिया था वैभव ने। 
"बहुत साफ-सुथरा, व्यवस्थित घर रखा है तुमने।" सुंदर और व्यवस्थित घर देखकर शिखा कहने लगी।
"ये साफ-सफाई, खाना और रसोई सब गायत्री आंटी का काम है।" गायत्री आंटी का ज़िक्र पहले भी वैभव ने किया था।

लड़कियांँ वो फसलें हैं जिन्हें उगाया, बढ़ाया जाता है और जब जड़ें मजबूत होने लगती हैं उन्हें उखाड़कर किसी दूसरे आँगन में रोप दिया जाता है। जिन आँगनों की मिट्टी प्रेम अपनापन लिए उन्हें स्वीकार करती है उनमें वो पल्लवित पुष्पित होती हैं।‌ जहाँ उन्हें जमीन नहीं मिलती वो अमरबेल सी जी लेती हैं।‌ शिखा अपने भाग्य पर इठला रही थी।
गायत्री आंटी ने शिखा के स्वागत में खीर बनाई थी।‌ 
 सोमवार से शुक्रवार वैभव को ऑफिस जाना था।‌ शनिवार से अगले पूरे सप्ताह उनका हनीमून प्लान था।
सोमवार को शाम सात बजे घर आकर वैभव‌ ने बताया, "शुक्रवार को एक मीटिंग और ट्रेनिंग सेशन रखा है कंपनी ने। बैंगलोर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर, हमारा ही ब्रांच है वहांँ जाना है।" 
"अरे..! तुमने तो शनिवार ऊटी चलने को कहा था ना, ऑफिस में नहीं बताया था?" ऊटी देखने की प्रबल इच्छा के कारण शिखा बोलती चली गई।
"छुट्टी ली है जान‌ परंतु शुक्रवार को तो करना पड़ेगा ना काम।" वैभव ने कहा, "तीन लोग जा रहें हैं नए लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए। जल्दी आ जाएंगे, अरे बाबा शनिवार को सुबह ही चलेंगे तुम्हारे उस पसंदीदा ऊटी झील को देखने।" फिर कुछ याद करते बोला,"कौन सा गाना बताया था तुमने...हहहह।" वैभव सोचने लगा और शिखा ने गाना शुरू कर दिया, "दिल‌ दीवाना बिन सजना के माने ना..!" दोनों का कोरस गूँजने लगा।

शुक्रवार की सुबह तैयार होकर, अपनी एक एक्स्ट्रा टी-शर्ट बैग पैक में डालकर, वैभव टैक्सी से ऑफिस के लिए निकल रहा था।
"आज टैक्सी से जा रहे हो?" शिखा ने पूछा।
"हाँ, कार और ड्राइवर कंपनी का है। तुम अपनी तैयारी ठीक से कर लेना, मेरा सूटकेस तो करीब-करीब तैयार हो गया है।" टैक्सी के आँखों से ओझल होते तक शिखा देखती और हाथ हिलाती रही। 

सूटकेस को एक बार फिर फैला लिया। कौन सा सूट किस दिन पहनना है, कब गाउन और कब जींस टॉप पहनना है। पीले रंग की एक साड़ी उसने बड़े ही सावधानी से रख लिया।
ऊटी की झील देखने के समय तो उसे यही साड़ी पहननी है और वैभव के लिए भी पीली शर्ट या एक जैकेट ढूंढने लगी।
आलमारी के कपड़ों को उलटते-पलटते वह अपना पसंदीदा गाना गुनगुना रही थी।

"ओहो..इतने सारे मैडल, ट्रॉफी मिले हैं जनाब को कभी बताया भी नहीं कि बाइक रेसिंग, कार रेसिंग का इतना शौक है।" हाथ ही कैमरा रखा था और कई खूबसूरत फोटो एक बॉक्स में मिलीं।
सुंदर प्रकृति की सुंदरतम तस्वीरें, छलछलाती नदियांँ, सड़क पार करते जानवरों के झुंड, नहाते हुए हाथी और पर्वतीय क्षेत्रों के झरनों के सौंदर्य को कैमरे में कैद किया था वैभव ने।

"सोअ.. ब्यूटीफुल कैप्चर!" शिखा वैभव के गुणों की कायल होते जा रही थी।

गायत्री आंटी ने आज बिसीबेले भात बनाया था उसके लिए, खाकर उसने मम्मी-पापा, माँ-बाबा से बात की। उन्हें बताया कि कल सुबह जल्दी ही वो ऊटी के लिए निकल जाएंगे। 

शाम को पैकिंग फायनल की तभी वैभव‌ का फोन आया।
"डिनर करके यहाँ से निकलेंगे। रात को ट्रैफिक भी हो सकती है। तुम खाना खाकर सो जाना, सुबह फिर जल्दी भी निकलना है। बाय..!" कहते हुए वैभव ने फोन बंद कर दिया।
ऊटी की कल्पनाओं में डूबती-उतरती शिखा, नींद की बाँहों में समा गई।

डोरबेल बजी और शिखा ने उठकर दरवाजा खोला।
"बाप रे! दो बजने वाले हैं वैभव। इतनी देर अब सुबह जल्दी कैसे निकलेंगे?" उसका बैग पैक रखती हुई शिखा बोली।
"बस, दस मिनट में फायनल पैक करके सो जाता हूँ। तुम सो जाओ।" हाथ-मुँह धोते हुए वैभव‌ ने कहा।
"अब चलो, साथ में मिलकर करते हैं तैयारी।" कहती हुई शिखा उसके साथ सूटकेस जमाने लगी।
"ऊटी जाने की एक शर्त है मेरी।" वैभव शिखा की उनींदी आँखों में झाँकने लगा।
"शर्त...कैसी शर्त!" शिखा की आँखों से नींद उड़ गई।
"हनीमून में हम दोनों ही जाएंगे और कोई नहीं।" कपड़े रखते हुए वैभव ने कहा।
"तो हम दोनों ही तो जा रहें हैं तीसरा कौन है?" शिखा को आश्चर्य हुआ।

"अरे तीसरा है मोबाइल फोन। जब देखो लोग कॉल करते रहते हैं। तुम तो पूरे समय फोन पर ही रहोगी।" वैभव ने अपना फोन उठाया और बंद करते हुए कहने लगा।

"देखो, मैंने तो अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया है।" 
"ओके, मैं भी बंद कर देती हूँ अपना फोन। अब कोई तीसरा नहीं होगा।" शिखा ने भी फोन स्विच ऑफ कर दिया और दोनों सो गए।

निशा का आँचल अभी भी फैला हुआ था और ऊषा ने अपने एक-एक पग बढ़ाने शुरू कर दिए। वैभव पूरे मूड से सीटी बजाते हुए ड्राइविंग कर रहा था। 
कार आगे फिसलती जा रही थी और शिखा का मन तो उड़कर ही ऊटी पहँचने को आतुर था। 
"दिल दीवाना बिन सजना के माने ना...!" वो गुनगुनाने लगी। 
दो घंटे तक राष्ट्रीय अभ्यारण्य की सड़कों का आनंद लेते, सुबह पशु-पक्षियों का भोर राग सुनते वो करीब छह घंटे में ऊटी के प्रवेश द्वार पर थे।

"सचमुच, कितनी बढ़िया कार चलाई तुमने, मुझे तो हिल स्टेशन में कभी इतने अच्छे से जाने का अनुभव नहीं है।" घुमावदार रास्तों में शिखा को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।
"अब कार रेसिंग हर जगह नहीं करता हूँ शिखा जी। तेज़, नियंत्रित, व्यवस्थित सभी प्रकार से चलाना आना चाहिए ना।" कहते हुए वैभव ने आँखों से बाहर इशारा किया।
चाय बागान में कुछ औरतें अभी-अभी अपनी टोकरियांँ लिए, दिनभर की दिहाड़ी की शुरुआत कर रहीं थीं। बागानों के बगल से उतरते, टेढ़े-मेढ़े रास्तों के दोनों ओर कॉटेजेस बने थे।

"कितने सुंदर कॉटेज हैं, वाहहह..क्या हम यहीं रूकेंगे?" शिखा ने चमकती आँखों से वैभव की बाँह पकड़ ली।
"जहांँ हमारी जान बोलेगी, वहीं रुक जाएंगे। हम तो गुलाम हैं आपके।" वैभव ने इस अंदाज से कहा कि शिखा को हँसी आ गई।
संकरे रास्ते से कूदती-उछलती कार, सबसे किनारे के कॉटेज के सामने रुक गई।

"अब तुम रिसेप्शन में पूछो कि जगह है क्या? बाद में मैं कार पार्किंग में लगा लूंगा।" वैभव की बात सुनकर शिखा, अपना पर्स लेकर फुर्ती से उतर गई।
एक ही कमरा खाली था जिसके लिए शिखा ने रजिस्टर की औपचारिकता पूरी की और सामने कार में बैठे वैभव को इशारे से बुला लिया।
कमरे की चाबी और सूटकेस उठाए एक आदमी आगे आगे चल रहा था। झुकी कमर, कंधे से नीचे तक जटा बने बाल, लंबी और अधपकी दाढ़ी। उसने ढीला बड़ा सा कुर्ता ही पहना था शायद झुकी कमर से परेशान था।

"यह कमरा कितने दूर है रिसेप्शन से, तभी खाली है।" शिखा ने कहा और वह पलटकर उसे घूरने लगा। आँखें बिल्कुल शून्य, भेदकर पार निकल जाए ऐसी दृष्टि।
"नए जोड़े ही रुकते हैं इस कमरे में, जिनको दुनिया से कुछ लेना-देना नहीं रहता।" उसने शुद्ध हिन्दी में, खरखराती आवाज़ से उत्तर दिया और पलटकर आगे चलने लगा।

शिखा उसे बोलना चाहती थी कि उसकी हिन्दी बहुत अच्छी है परंतु उसके तेवर, चाल-ढाल देखकर चुप हो गई। कार लगाकर वैभव भी आता दिखाई दिया।

हरियाली के बीच में छोटा-सा सुंदर कॉटेज। दोनों ने चाय आर्डर किया तो चाय लेकर वही आया, झुकी कमर और लाल आँखों से घूरते हुए चाय टेबल पर रख दिया।‌ दो मिनट देखता रहा फिर चला गया।
"बहुत अजीब सा है। यहाँ रहता है परंतु हिन्दी एकदम शुद्ध बोलता है।" शिखा ने वैभव को बताया।

"ओह, लगता है तुमसे बात हो गई। देखना, कहीं  तुम्हारा दीवाना न बन जाए फिर वो गाता फिरेगा..दिल दीवाना बिन शिखा के माने..!" और वह जोर-जोर से हँसने लगा।

"अब मुँह मत फुलाओ चलो, आज सबसे पहला हनीमून स्पॉट मेरी शिखा की प्रिय ऊटी झील।" वैभव ने उसे बाँहों में भरते हुए कहा।

"आज ही चल रहें हैं। चलो, मैं पीली साड़ी पहन लेती हूँ और देखो मैंने तुम्हारी आलमारी से, यह पीली टी-शर्ट भी ढूँढ लिया।" अपने सूटकेस में से साड़ी और वैभव की टी-शर्ट निकाल कर बेड पर रख दिया शिखा ने।
"इतनी पुरानी टी-शर्ट! जब नौकरी नई-नई थी तब‌ कंपनी के स्पोर्ट्स दिन की है।" वैभव ने खींचतान कर पहन ही लिया।

सामने पीली साड़ी में खड़ी शिखा को एकटक देखने लगा।
"अब कहीं मोगरे का गजरा मिलेगा तो लगा लूंगी। मालूम है..।" शिखा को बीच में रोककर वैभव ने कहा, "मालूम है कि पिक्चर में उस हीरोइन ने लगाया था।" सुनकर शिखा शरमा गई।

क्या ही यादगार शाम! 
झील किनारे बैठी एक महिला से शिखा के खरीदे गजरों को पिन की सहायता से, बड़ी ही कुशलता से वैभव ने उसके बालों में सजा दिया। झील में मचलती लहरें और नवयुगल का आपसी प्रेमालाप, बोटिंग करते हुए, स्नेह से भरी जलबूँदों को एक-दूसरे पर उड़ेलते, वो गाने लगे।

"दिल दीवाना बिन सजना के माने ना...!"
कैमरा अपना काम कर रहा था। वैभव ने हर कोने से शिखा की खूब फोटो खींची।
"अरे, हम दोनों की भी तो लो फोटो।" शिखा ने वैभव के हाथ पकड़ लिया।

एक बड़े पत्थर पर कैमरे को सैट किया और फिर अलग-अलग प्रकार से फोटो खींच लीं। किनारे पर चलने वाले रेस्टोरेंट से पसंद का खाना खाकर, उन्होंने ऑटो रिक्शा कर लिया।

"बड़ी ही संकरी सड़क है और पथरीली भी, ऑटो लेना ही ठीक रहा। कार का आना-जाना कठिन है।" कॉटेज के कुछ पहले उतरकर वो एक-दूसरे से चिपटे हुए पैदल जाने लगे।
"बहुत अँधेरा है, एक बड़ी लाइट भी नहीं।" शिखा ने कहा और किसी ने उसके मुँह पर टॉर्च की रोशनी फेंकी। 
अचानक मुँह पर लाइट आने से दोनों कुछ घबरा गए, शिखा की तो चीख निकल गई।
झुका हुआ वह आदमी बिल्कुल सामने आ गया था। वैसी ही शून्य सी घूरती आँखें‌
"क्या कर रहे हो? मुँह पर ऐसे रोशनी डालते हैं क्या?" घबराहट में शिखा बड़बड़ाने लगी।

"अपने कॉटेज के लोगों को पहचान कर फिर रास्ता दिखाता हूँ।" शुष्क आवाज़ में कहकर वो पलटकर टॉर्च दिखाते हुए आगे चलने लगा।

रात को ही शिखा ने वैभव से किसी दूसरी जगह रुकने के लिए कहा और सुबह तैयार होकर, कार और सामान लेकर वे निकल गए। शिखा की नजरें उस आदमी को ढूँढ रहीं थीं परन्तु वह कहीं दिखाई नहीं दिया।
"बेचारा, कुछ टिप ही मिल जाता उसको, तुम्हारे चीखने से डर गया होगा।" वैभव ने उसे चिढ़ाया।

कुछ देर तो वो सुंदर चाय बागानों को देखते, कभी किनारे कार खड़ी करके उतर जाते, आजू-बाजू से गुजरते बादलों को मुट्ठी में हमेशा के लिए कैद करती शिखा की फोटो लेते वैभव अपनी फोटोग्राफी का लुत्फ़ ले रहा था। अब दोपहर होने वाली थी, प्यास से शिखा का गला सूखने लगा था।
"उस साइड छोटी सी दूकान और पीछे रेस्टोरेंट है। पानी लेते हैं ना बहुत प्यास लगी है।" शिखा ने कहा और मोड़ पर किनारे वैभव ने कार रोक लिया।
"तुम ले आओ पानी, आगे कुछ दूरी पर एक बढ़िया सड़क छाप ढाबा है, वहीं खाएंगे लंच‌।" वैभव ने कहा और पर्स लिए शिखा नीचे उतर गई।
सड़क पार करके उसने पानी के लिए पूछा तो उसके पास छोटी बोतल थी। उसने बताया कि एक लीटर वाली बोतल रेस्टोरेंट में है।

शिखा ने पलटकर कार की ओर देखा, बादल नीचे उतर रहे थे। ड्रायविंग सीट पर बैठा वैभव उसे ही देख रहा था। शिखा ने उसे रेस्टोरेंट का इशारा करते हुए हाथ हिलाया और रेस्टोरेंट में घुस गई। 

काउंटर पर पानी की बोतल मांगकर, वह इधर-उधर देखने लगी। सामने टेलीविजन लगा था, खाते पीते लोग समाचार भी देख रहे थे। शिखा को लगा कितने दिनों बाद वह  टीवी देख रही है। निगाहें सामने चलते समाचार पर चिपक गईं।
शुक्रवार को बैंगलोर के हाइवे पर  रात डेढ़ बजे हुए रोड़ हादसे को बार-बार दिखा रहा था। खाई में गिरी उस कार को, शनिवार खोजकर निकाला गया।

"तीन आईटी इंजीनियर और कार चालक की दुर्घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई है। कुछ परिजन पहुँच गए और कुछ से संपर्क किया जा रहा है। इंजीनियर वैभव जिनकी अभी-अभी शादी हुई थी, उनकी पत्नी से अब तक संपर्क नहीं हो पाया है। वह अपने घर में नहीं हैं।" समाचार वाचक बोल रहा था और स्क्रीन पर चारों की तस्वीरें, आई डी कार्ड दिखाया जा रहा था। 
"मैडम पानी।" वेटर ने बोतल सामने किया।

शिखा शून्य में, मूर्तिवत टीवी में गुम थी जहाँ वैभव की तस्वीर, उसका नाम पता दिखा रहा था।
वैभव सक्सेना 
तीस वर्ष 
सीनियर इंजीनियर 
माता-पिता का नाम 

बाद में उसके पार्थिव शरीर के साथ मम्मी-पापा, माँ-बाबा, शिखा और वैभव दोनों के छोटे भाइयों को देखकर, वह पसीने से लथपथ हो गई। सारी दुनिया घूमने लगी, गिरने ही वाली थी कि टेबल को पकड़ लिया। 
सब कुछ धुआँ-धुआंँ सा, आँखें और दिल पथरा गए।‌ गिरते संभलते बाहर आने लगी, बोतल का पानी लिए वेटर पूछने लगा, "मैडम, क्या हुआ? तबीयत ठीक तो है ना।" 

शिखा अपनी धुन में बाहर आ रही थी। सड़क के उस पार बादलों ने कार को अब पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया था। आँखें गडाए, लड़खड़ाती हुई वो कार की ओर बढ़ने लगी। उसने कार की ओर ध्यान से देखा, ड्रायविंग सीट खाली थी। अर्धचेतन सी शिखा ने पर्स से अपना बंद पड़ा फोन निकाला, तभी तेज़ी से एक ट्रक, बादलों के उस धुएं से अचानक बाहर आया और शिखा को कुचलता हुआ निकल गया। कुचली हुई जवान लड़की के चारों ओर भीड़ लग गई। 

कार चालू थी, लोगों ने सुना उस खाली कार से गाने की आवाज़ आ रही थी..
"दिल दीवाना बिन सजना के माने ना....!" 


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शर्मिला चौहान

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