शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

मुँह खोले पर न बोले (व्यंग्य)

मुँह खोले पर न बोले" (व्यंग्य)

इच्छाएं सुरसा की तरह मुँह फाड़े, आदमी को अपने में समेट लेना चाहती हैं। बांकेलाल भी परिभाषित आदमी हैं तो आजकल एक ही इच्छा पाले हुए हैं, एक पत्नीव्रत की तरह इकलौती इच्छा। खूब बोलने की, लगातार बोलने की, बोलते रहने की... बड़े मंच से। गृहस्थ आश्रम में आने के बाद जो वाणी घुटते घुटते घुट गई, वो अब जीवन चाहती है।

टेलीविजन पर लगातार चलने वाले वाक् युद्ध और भाषणों ने, बांकेलाल की प्रसुप्त इच्छा को जाग्रत कर दिया।

"हम बोलने की ऑनलाइन क्लास लगा रहें हैं। बंद कमरे में आराम से सीखेंगे और प्रेक्टिस करेंगे।" रसोई में हलुआ बनाती पत्नी से बांके ने कहा।
"पचास की उम्र तक क्या मौनी बाबा बने थे जो अब नर्सरी स्कूल में भर्ती होना है। बैठे बिठाए नए चोचले कहाँ से ले आते हो?" टेढ़ी नजर से देखती पत्नी ने, हलुए में दोगुना शक्कर डाल‌ दिया।
यह देखकर ही डायबिटीज के मरीज बांकेलाल को हिचकी चालू हो गई।

"हमें धुआंधार भाषण देना है, मंच से बड़ी सभा में बोलना है जहाँ खूब भीड़ हो।" टेलीविजन पर देश के प्रधानसेवक की वाक् पटुता, सधी आवाज से प्रभावित बांके ने कहा।

"अच्छा-अच्छा, तो यह बात है। आजमा लीजिए, हमें क्या?" स्वाद के लिए एक चम्मच हलुआ बांके के हिस्से डाल, अपना कटोरा भर कर पत्नी झूले पर बैठ गई।
"मंच पर वही लोग बोलते हैं जिनके घरों में पत्नी प्रजाति का जीव न हो या उसका स्वरयंत्र कम विकसित हो।" मन ही मन बुदबुदाते बांकेलाल ने अपने को कमरे में कैद कर लिया।

पलंग पर बैठ कर, सामने तकिए पर अपनी ही तरह के मॉडल वाले फोन को विराजमान किया। फोन में दिए लिंक से जुड़े तो देखा, दुनिया में उनकी तरह बोलने को उतावले कई लोग हैं।
अलग-अलग कई आवाजें सुन रहे थे बांके।

"बांकेलाल जी, कृपया अपना कैमरा चालू कीजिए। फोन पर कैमरे का निशान बना है उस पर क्लिक कीजिए, आप हम सबको दिखाई नहीं दे रहे हैं।" बहुत ही सधी, प्यारी आवाज़ की मालकिन ने उन्हें बताया।

बांके को फोन धूमिल दिख रहा था। 
"अब क्या हमें आज ही मोतियाबिंद का अटैक हो गया है।" सोचते हुए उनका चेहरा सफेद पड़ने लगा। 
"बांकेलाल जी, कृपया कैमरा ऑन कीजिए।" बार-बार बोलती हुई वो आवाज़, अब बांके को उतनी अच्छी नहीं लग रही थी।
तब बुद्धि में तड़ित चमकी और चश्मे की नामौजूदगी का आभास हुआ। आसपास, कमरे के बाहर, कुर्सी-मेज, रसोई में सब तरफ़ घूमने के बाद, पत्नी की आँखों में अपने चश्मे को चढ़ा देखकर, बांके ने झपटकर चश्मा खींच लिया।

कैमरा ऑन किया तो सजे-संवरे लोगों को देखकर झट कैमरा बंद कर लिए। कमरे में टंगी लाल टी-शर्ट पहन, बालों में कंघी फेरकर फिर कैमरा चालू किया।
"बांकेलाल जी, आज कक्षा का पहला दिन है और आपने कैमरा बंद चालू करके समय व्यर्थ किया है। मैं मधुरा, आपकी सहायता करूंगी।‌ अब सब लोग एक दो मिनट, लगातार बोलकर दिखाइए, मुझे पता चलेगा कि समस्या कहाँ हैं?" कहती हुई उस महिला ने नाम लेना शुरू किया।
जिसका नाम बुलाया जाता वो बड़ी शिद्दत से बचपन की कविता, कोई संस्मरण, कोई अन्य जानकारी देता।‌ दो मिनट में जी-जान लगाकर वे मधुरा जी के, मधुर होंठों से झरती मधुर वाणी से, मधु रूप शाबाशी पाने को लालायित थे।

ज्यों ही बांके का नाम पुकारा त्यों ही दरवाजा खुला और तूफान आया।

"आधे घंटे से मुँह छिपाए बैठे हो, हमें लगा हमेशा की तरह बाथरूम में घुसे हो। किराना वाला सरजू आया है। कह रहा तीन हजार की उधारी कर रखे हो। न जाने पैसा कहाँ उड़ा रहे हो आजकल..! अच्छा..तो ये चल रहा कमरा बंद करके फोन पर। ये चक्कर में पैसा फूँककर, उधारी चढ़ा लिए हो।" कमर पर हाथ धरी वह कैमरे के ठीक सामने आ गई।

एक मिनट बांके को घूरती रही। अधपके खिचड़ी से बाल, सालों पुरानी टी-शर्ट से बाहर झांकती तोंद, बाबा आदम के ज़माने को मोटी फ्रेम वाले चश्मे को देखकर, अपने भविष्य के प्रति वह आश्वस्त हो गई।

"सिखाइए मैडम सिखाइए, आप जितनी भी मेहनत कर लो इनका बोलना नामुमकिन है।" बांके की ओर पलटकर बोली, "पहले तीन हजार रूपए दो फिर ये नौटंकी करना।" मुँह बिचकाती वो बांके को लगभग खींचती हुई बाहर ले गई।‌

अपमान का घूँट चाय की तरह गटक कर, जब बांके ने कैमरे की वापस मुँहदिखाई की तो, देखा वो समूह से बाहर फेंक दिए गए थे।

अन्यमनस्क बैठे बांके की अंगुलियाँ आदतन फेसबुक को ऊपर-नीचे खंगालने लगीं। अंतर्यामी फेसबुक ने बांके के हाल पर दया की और भाषण के नुस्खे, अच्छा बोलने के उपाय बताने लगा।
गले की भाप सिकाई, नमक पानी के गरारे, अदरक के रस में शहद घोलकर पीना, जीभ को बाहर-भीतर करके स्वरयंत्र को व्यायाम कराने जैसे नुस्खों ने, बांके के दिल के बुझते दीपक में जैसे दो-चार बूँदें उम्मीदों के भर दिए।

रसोई में जाकर अदरक कुचलने लगे।
"आज से हमारा खाना सादा रहेगा। ज़्यादा तेल, नमक-मिर्च, मसाले वाला मत बनाना।" कहते हुए बांके ने पत्नी को टेढ़ी नज़रों से देखा।
"कहो तो खाना ही न दें, वैसे भी एक-दो महीने न खाने का, सेहत पर कोई फर्क पड़ने से रहा।" पत्नी ने बांके को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा।

"वैद्य विद्या में भी हाथ आजमाने की सोच रहे हो क्या?" बांके द्वारा छोटे खल-बत्ते का उपयोग किए जाने पर उनकी  पत्नी ने प्रश्न किया।
"अदरक के रस में, शहद, काली मिर्च मिलाकर चाटने से आवाज़ खुलती है, गला साफ होता है।" बांके ने बताया।
पत्नी ने अधकुचली अदरक उनके हाथों से, बाउंड्री से बाहर जाती क्रिकेट की गेंद की तरह लपक लिया।

"यह इकलौता टुकड़ा है जो सब्जी के मसाले में डलेगा। अपनी आवाज़ के लिए चाहिए तो जरा बाजार तक चहलकदमी कर आइए, और हाँ..करेले भी लाइएगा। जब शहद की मिठास बढ़ेगी तो उसके ऊपर करेले का रस भी पीना पड़ेगा।" 

"काश! ईश्वर ने इस प्राणी के स्वरयंत्र की एक चौथाई ऊर्जा भी हमारे को दे दी होती, तो आज ये दिन न देखना पड़ता।" हताश, निराश बांके बालकनी में खड़े हो गए।

सामने बगीचे में लोग व्यायाम, प्राणायाम कर रहे थे। आशा की एक किरण फिर चमकी और उन्होंने जीभ को बाहर-भीतर करना शुरू कर दिया। एक यही उपाय अब उन्हें, उनके लक्ष्य तक ले जा सकता था। अभी हल्की सी आवाज के साथ कुछ ही बार जिव्हा को अंदर-बाहर किया था कि पड़ोसी शीतला कुमार जी ने आवाज़ लगाई।
"क्या हुआ बांकेलाल जी, बारिश का मौसम है फूड पॉइजनिंग का भी। लगता है कल रात सुदर्शन जी के घर की पार्टी में छककर खाएं होगे।" तनिक ठहरकर बोले, "पार्टी दूसरों की परंतु पेट तो अपना है ये कैसे भूल गए।" उन्होंने अपनी बत्तीसी निपोर दी।

"हम तो पार्टी में गए ही नहीं थे, न किसी का बुलावा आया था।" बांके बस इतना ही कह पाए।
"अरे! बुरा मान गए आप तो, हम तो सिर्फ़ पता कर रहे थे कि हमें तो नहीं बुलाया और किस-किस को बुलाया सुदर्शन ने।" कहते हुए वो अपने घर में घुस गए।

इधर-उधर होने के बाद टेलीविजन चालू किया तो वहाँ हाथ-पैर, जुबान सब एक साथ चलाकर, वाक् क्षेत्र में जीत का शंखनाद करने हेतु तैयार लोगों को भिड़ते देखकर, बांके के पसीने छूट गए।

स्वतंत्रता दिवस के दिन मोहल्ले के चौक पर, तिरंगा फहराया जाता है। उस दिन सभी उपस्थित लोगों से दो शब्द कहने का आग्रह करने की परंपरा है। बांके ने कभी अपना देशप्रेम जाहिर नहीं किया क्योंकि ये जुबान लोगों को देखकर ही झूमने लड़खड़ाने लगती है। इस बार तय कर लिया कि बस, बोलना है तो बोलना है।

आइने के सामने खड़े रहते, कुछ वाक्य याद आ जाते और कुछ हिरण की तरह कुलांचे भरते दूर निकल जाते। 

करत करत अभ्यास के... आखिरकार पंद्रह अगस्त की सुबह श्वेत वस्त्र धारण किए बांकेलाल, चौक पर होने वाले ध्वजारोहण में शामिल हुए।

आज उन्होंने परंपरा तोड़ दी। कुछ बोलने के लिए कहा तो बहुत कुछ बोल गए। बोलते हुए स्वतंत्रता दिवस कब गणतंत्र दिवस में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला। मुख्यमंत्री को प्रमोट करके प्रधानमंत्री ही बना दिए। एक साथ सब कुछ बोलकर, माथा पोंछते वे भीड़ में घुस गए।

घर आए तो पत्नी को अपनी भाषण कला की कुछ बातें बताते कि उनकी निगाह अपनी सास पर पड़ी।
"प्रणाम अम्माँ।" कहते हुए उनके चरणों में झुक गए।

"आते-आते चौक पर तुम्हारा भाषण सुना दामाद जी, हम भी कन्फ्यूजिया गए कि सारे देश में तो स्वतंत्रता दिन है पर आपके चौक में गणतंत्र दिन मना रहे थे आप।" प्रणाम का उत्तर इस प्रकार देती हुई वो आगे बोलीं, "हमारी बिटिया ही थी जो निभा गई दामाद जी, पचास में सत्तर सी याददाश्त है तुम्हारी।"

बांकेलाल ने अपनी जिव्हा को खूब उकसाया, हिलाया, पूरी शक्ति लगा दी परंतु वह टस से मस नहीं हुई। आज तक बेटी के सामने न चली तो आज तो साक्षात उनकी जननी खड़ी थी, सिर पर हाथ रखे बांके ने अपने कमरे की शरण ले ली।


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शुभ तारिका के लिए भेजी

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