गुरुवार, 10 जुलाई 2025

योग करे दुःख होय - व्यंग्य (इंदौर समाचार 11/7/25)

योग करे दुःख होय-  (व्यंग्य) 

वैसे तो बांकेलाल को और  उनके शरीर को व्यायाम, भागदौड़ ने कभी प्रभावित नहीं किया परंतु आजकल योग उनके दिलो-दिमाग में छाया रहता है।
पंद्रह दिनों से फोन, अखबार और टेलीविजन पर योग दिवस की तैयारियाँ देखकर ही उनकी आँखों का मोतियाबिंद, कुछ कम होने लगा था। रही-सही कसर चौराहे पर लगे बड़े पोस्टर ने पूरी कर दी। सफेद कुर्ते नुमा शर्ट पहने लोग, हष्ट-पुष्ट योगगुरु की तस्वीर, योगदिवस पर आम लोगों को आमंत्रित कर रही थी।

बांकेलाल ने अपने व्यक्तित्व का जायज़ा लिया। काले किए बाल, खाती-पीती तोंद, बरसाती चप्पल और हाथ में चार साल पुराना बढ़िया छाता, कुछ खास तो था नहीं अर्थात आमंत्रण अपने लिए जानकर उन्होंने आने का समय जाँच लिया। आम आदमी थे सो मुफ्त के प्रमाणपत्र और नाश्ते के लोभ का संवरण नहीं कर पाए।

वैसे भी सालों पहले स्कूल का प्रमाणपत्र मिला था, बड़के दद्दा ने अपने प्राचार्य दोस्त से कहकर, सभी खेलों, वाद-विवाद प्रतियोगिता, भाषण का बढ़िया सा प्रमाण पत्र दिलवा दिया था। कॉलेज में तीन साल की डिग्री छह में लिए और प्रमाणपत्र आठवें में हाथ आया था। योग दिवस पर मुफ्त प्रमाणपत्र का योग बन रहा है, यह संयोग ही था बांके के लिए।

योग दिवस पर सुबह साढ़े छह बजे, बांकेलाल जी सपत्नीक चौराहे पर पहुंँच गए। मंच पर विराजमान फिट काया वाले व्यक्ति को योगासन करते देख पत्नी ने बांके पर आँख तरेरी।
"रोज योग करते तो पेट मटका न बनता।" अवसर न छोड़ने वाले विपक्ष की तरह पत्नी ने तीर छोड़ा।

भीड़भाड़ में बांकेलाल ने उनको इग्नोर कर दिया, घर में तो संभव नहीं होता।‌ 
खैर, डेढ़-दो घंटे आड़े-खड़े, लेटे-बैठे, गीत दोहराते बाँकेलाल की सांसें बुलेट ट्रेन की स्पीड पकड़ रही थीं। मांसपेशियों में समोसे, कचौड़ी, गुलाबजामुनों की जकड़न चढ़ी थी, उसने ढीली होने की शुरुआत कर दी थी।

"प्रमाणपत्र शाम को ले जाना, अभी नाम लिखवा दो और नाश्ते की लाइन में लग जाओ।" एक कार्यकर्ता भीड़ संभाल रहा था। 
ऐसे नाश्ते से तो कुछ न खाना अच्छा होता, अंकुरित मूंग, एक केला और हरा कोई पेय। सपनों का हकीकत में बदलना कितना दुखदाई हो सकता है, यह बांकेलाल से ज्यादा कौन समझेगा।

घर आकर सोफे पर शरीर को फैलाते कि बेटे ने आवाज़ दी।
"पापा-मम्मी, आप दोनों आओ।‌ आज परिवार के साथ योग करते हुए वीडियो भेजना है ऑफिस, योग दिवस है ना।" बेटे की मनुहार से बांकेलाल जी ने सोफ़ा त्याग दिया।
परफेक्शनिस्ट बेटे ने, योगासनों की मुद्राओं को सुधरवाने हुए, कई बार आसन करवाए। वीडियो बनकर तैयार हुआ और बांकेलाल ने वापस सोफ़ा संभाल लिया।

दरवाजे की घंटी सुनकर बेटे ने दरवाजा खोला।
"पापा, आपको अंकल लोग बुला रहे हैं।" कहते हुए वह अंदर चला आया।
अपनी अस्त-व्यस्त पड़ी काया को समेटते, माथे पर पड़ी रेखाओं को हटाने का प्रयास करते बांकेलाल दरवाजे पर पहुंचे।

"भाई सोसायटी की नोटिस नहीं देखे क्या? चलो जल्दी, कार्यक्रम शुरू हो गया है। योगशाला के‌ विद्यार्थियों को बुलाया है आज दिन विशेष पर।" सफेद शर्ट, नीली फिट पैंट और चटाई साथ लेकर बांकेलाल मैदान में जा डटे।

दस सूर्य नमस्कार का एक पहला राउंड, पाँचवें में ही बांकेलाल ने, बादलों में छुपे सूर्य को नमस्कार कर कुर्सी पकड़ ली। अपनी सोसायटी के लोगों को बिजली की गति से आसन करते देख, बांकेलाल को योग पर अटूट श्रद्धा हो गई।
"अरे अंकल, पहला राउंड तो पूरा कर लीजिए।" सोसायटी की एक बच्ची ने बांकेलाल को कुर्सी से उठाते हुए कहा। बांकेलाल ने देखा, फोटोग्राफर उसी एंगल से फोटो ले रहा था, वो अचकचा कर उठ गए।

घर जाकर, दो रोटी खाई और सोफे पर पसर गए। हड्डियों का हर जोड़ कराह रहा था।
"पाँच बज गए, चलो अपना प्रमाणपत्र ले आएं।" सजी-धजी पत्नी सामने खड़ी थी।
"कोई प्रमाणपत्र नहीं लाना, कोई पुरस्कार मिला है क्या?" अब अपने शरीर को किसी भी प्रकार की आज्ञा नहीं देना था बांकेलाल को।

"जाएंगे कैसे नहीं, मुझे उस पोस्टर के साथ सैल्फी लेना है, प्रमाणपत्र को फेसबुक, व्हाट्स एप स्टेट्स पर लगाना है।" गृह लक्ष्मी के बदले तेवर को भांपकर, बांकेलाल जी अपने भारी बदन, हड्डियों की टूटने को समेटते हुए, उनके पीछे हो लिए।


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लेखिका - शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)




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