कहानी- "फैसला"
"रोज ही देर हो जाती है, चाहे सुबह से कितनी भी जल्दी करो।" ड्राइविंग सीट पर बैठकर, सामने रखे गणपति बप्पा को हाथ जोड़ती सुगंधा ने झटके से ऑटो को सड़क पर निकाल लिया। नई, चिकनी, काली सड़क पर ऑटोरिक्शा फिसलता जा रहा था।
स्टैंड पर लगाने के पहले ही, एक वृद्ध दंपत्ति ने उसे रोक लिया और कभी वे उसकी ओर देखते कभी ऑटो की ओर।
"काका, अच्छा चलाती मैं ऑटो, टेंशन नई लेने का। किधर जाना है, बैठो।" औरत के ऑटो चलाने पर संशय से देखने वाली नज़रों को रोज ही देखती थी वो।
दोनों बैठ गए और कोर्ट नाका छोड़ने की बात करके, अपने दस्तावेज जमाने लगे।
उसके आई-बाबा के उम्र के थे, पता नहीं किस केस मुकदमे में फंस गए थे बेचारे। उसके आई-बाबा तो अब घर संभालते हैं और वो ऑटोरिक्शा चलाकर सबके लिए दो समय की रोटी जुटाती है।
कपड़ा मिल में काम करते थे बाबा, उसी की चॉल में सब मजदूरों के घरों में से एक उनका भी था। आई, उस क्षेत्र के सबसे धनी, बहुत बड़े भूखंड के मालिक के बंगले पर खाना बनाती थी। मिल की जिस दिन छुट्टी होती, बाबा भी बंगले पर जाकर उनके बगीचे, लॉन की साफ-सफाई कर आते। सुगंधा और उसका छोटा भाई मयूर, मराठी पाठशाला में पढ़ते थे।
"ताई, बड़ी होकर तू क्या बनेगी?" मयूर उससे पूछता।
"मैं हवाई जहाज उड़ाऊंगी, कार रेसिंग वाली बनूंगी। तू क्या बनेगा?" अपने भाई से वह भी पूछती।
"मैं बड़ा डॉक्टर बनूंगा, जो मेरे जैसे बच्चों को अच्छा कर दें।" घुटने से नीचे, बेजान पड़े अपने पैरों को देखकर मायूसी से बोलता वो और सुगंधा उसे गले से लगा लेती।
दस बजे ऑफिस का समय सड़क पर ट्रैफिक भी बहुत होता है। कोर्ट नाका पर दोनों को उतारकर फिर ऑटो को यू-टर्न कर लिया।
ऑटो को लाइन में खड़ा करके, वो आते-जाते हुए लोगों, परिवारों को देखने लगी और अपने बचपन में खो गई।
मयूर को रिक्शे से स्कूल भेजते थे, वहाँ भी दो आया बाई उसे कक्षा तक ले जातीं। गरीब परिवार में पोलियो ग्रस्त बच्चा दे दिया भगवान ने, किस्मत के सहारे ही छोड़ दी थी जीवन नैया।
सुगंधा आठवी में आई, किशोरावस्था की सुगंध सब तरफ बिखरने लगी। चिकनी होती काया, बालों को घंटों संवारना, स्कूल जाते समय चेहरे पर पावडर फेर लेना, बार-बार आइने में खुद को देखते रहना, सुगंधा को भाने लगा था। पँख लग गए थे उसको और कल्पना के खुले आसमान में, दिन रात उड़ने की आजादी भी।
बढ़ते उम्र के साथ मयूर में चिड़चिड़ापन, असुरक्षा और हीनता बढ़ने लगी थी। स्कूल से भी शिकायतें आने लगी थीं कि वो चीजें फेंक कर बच्चों को मारता है।
स्कूल से आते-जाते एक लड़का रोज़ साइकिल से, सुगंधा के आगे-पीछे होता। एक दिन पेपर खत्म हुआ और वो अकेली घर लौट रही थी तब उसने एक लाल कागज़ उसकी ओर उछाल दिया।
"क्यों पीछा करता है, कौन है?" सुगंधा ने पूछा।
"तू अच्छी लगती है मेरे को। अवि मेरा नाम है।" कहते हुए वह चला गया।
पहला प्रेमपत्र, इतनी बार पढ़ा सुगंधा ने कि हर शब्द याद हो गया। अब तो स्कूल के बाद, आगे पीछे उनका मिलना चालू हो गया। बात एक-दूसरे का हाथ पकड़ने से लेकर अब बाँहों में भर लेने तक आ गई।
एक दिन उसने फिल्मी हीरो के अंदाज में, लाल गुलाब देते हुए कहा, "तू मेरे को अच्छी लगती है। शादी करेगी मेरे से?"
आठवीं पढ़ने वाली लड़की, शरमाकर भागते घर आ गई थी।
अचानक पीछे वाली ऑटो का हार्न बजने लगा।
"गाड़ी तो आगे करो मैडम, पीछे लाइन बढ़ गई है।" आगे के एक ऑटो को सवारी मिल गई और जगह ख़ाली हो गई थी।
"हो भाऊ, आत्ताच पुढे घेते।" कहकर उसने अपनी ऑटो आगे सरका ली।
सुगंधा सोचने लगी कि कैसी उम्र थी, कैसा नशा था वो। मयूर अपने बढ़ते शरीर, परनिर्भरता से दिनों दिन चिड़चिड़ा, गुस्सैल और कभी-कभी तो हिंसक हो जाता। स्कूल वालों ने बड़ी विनम्रता से उसे घर पर रखकर पढ़ाने या विशेष स्कूल में भेजने की सलाह देकर अपना काम पूरा कर दिया।
बेचारे आई-बाबा, हमेशा उसी के बारे में सोचते कि क्या होगा आगे? बंगले वालों को, आई के हाथ के बने महाराष्ट्र के सभी व्यंजन, शाकाहारी-मांसाहारी भोजन बहुत पसंद थे। छोटी पार्टियों में तो एक काउंटर पूरणपोली का रखते ही थे। कभी कभी सुगंधा खुद भी जाती थी आई के साथ मदद करने।
आगे से एक ऑटो और निकल गई, अब अगला नंबर उसी का था।
सुगंधा उस दिन की याद करके सिहर गई जब आइने में स्वयं को निहारती, बाल बनाती, गाना गुनगुनाती सुगंधा को मयूर के चीखने चिल्लाने की आवाज़ आई।
"क्यूँ इतना चिल्ला रहा है? आराम से बता ना क्या चाहिए, बेमतलब दिनभर बोमा-बोम करता है।" सुगंधा ने उसे डाँटते हुए कहा।
"मैं हल्ला करता हूँ, तू क्या करती है मेरे को सब कुछ मालूम है। दिन भर सजती है, चिट्ठी लाकर छुप छुपकर पढ़ती है, स्कूल में ये नाटक करने जाती है ना?" पैर के नीचे की जमीन खिसक गई थी उसकी। काटो तो खून नहीं, दिव्यांग छोटे भाई का मुँह नोचने का मन हुआ।
"खुद घर में बैठा है तो फालतू बात करेगा ना। ऐसा गुणवान था तो आगे पढ़ा क्यों नहीं, क्यों शाला बंद करवाए तेरी?" भुनभुनाती हुई वो घर से निकल गई।
शाम को परिणाम सामने था, बाबा ने जीवन में पहली बार उसे मारा। बाबा और आदमियों के जैसे नहीं थे, वो कभी-कभार ही शराब पीते थे उस रात उन्होंने खूब शराब पी। देर रात तक गालियांँ देते, रोते हुए सो गए। आई अपनी बेटी को दुनिया की ऊँच-नीच समझा रही थी और मयूर निर्विकार भाव लिए अपनी कुर्सी पर चिपका था।
अब सुगंधा पर निगरानी कड़ी कर दी गई थी। उम्र का पंछी ऐसा चंचल कि जितना पिंजरा मजबूत, उतने ही तीक्ष्ण चोंच से उसको तोड़ने की कोशिश करता। स्कूल में एक लड़की ने उसे अवि का पत्र दिया। शौचालय में उसने पत्र का एक-एक अक्षर पढ़ा और फिर फाड़कर फेंक दिया।
"पोस्ट ऑफिस जाना है, चलोगी?" एक लड़की ने ऑटो के बाजू से झाँकते हुए पूछा।
सुगंधा ने ऑटो स्टार्ट करते हुए उसे बैठने का इशारा किया। सुंदर, सांवली, नए जमाने की जींस-टॉप पहनी लड़की बैठ गई।
अब वाहनों और लोगों को पार करता ऑटो आगे भाग रहा था और सुगंधा का मन अतीत में। आज भी सोच रही है तो रोएं खड़े हो जाते हैं। छोटी उम्र में इतनी हिम्मत कैसे कर ली थी उसने?
अवि के बताए पते पर पहुँचने के लिए स्कूल बैग में दो कपड़े, बाबा की आलमारी में जमा रखे पैसे, आई का बड़ा मंगलसूत्र, अपनी चैन सब भरकर तैयार कर लिया था उसने। रोज के समय से पहले ही चोटी करके, शाला पोशाक पहनकर तैयार हो गई थी।
"कहाँ चली इतना सज धज कर, पढ़ने तो जाएगी नहीं।" मयूर ने उससे प्रश्न किया।
"हाथ-पैर से अपंग, मुँह बहुत चलता है तेरा। तेरे कारण सब खराब हो गया घर का। मर भी नहीं जाता कि पीछा छूटे।" कहते हुए उसे बाहर से सांकल चढ़ाकर वह निकल गई। उसे बाहर से बंद करने का पिछले कुछ महीनों से शुरू किया था वरना वह घर के सामान भी बाहर फेंक कर लोगों को मारने लगता।
सिग्नल लाल हो गया और अचानक ब्रेक लगाना पड़ा।
उस दिन स्कूल के रास्ते थोड़ी आगे तक चलकर, योजना के अनुसार विपरीत गली में चलती गई थी। चुनरी से सिर ढंककर, पीठ पर बैग लिए, तेज़ कदम से चलती रही। गली के अंतिम मोड़ पर अवि मोटरसाइकिल लेकर खड़ा था।
"आजा जल्दी, ये पहनकर पीछे बैठ जा।" उसने अपने पास से एक बुर्का दिया।
"ये क्यों पहनूँ मैं?" आश्चर्य से सुगंधा ने पूछा था।
"सुरक्षित रहेगी, कोई पहचान नहीं पाएगा इसीलिए।" उसने कारण बताया।
"मैंने चुन्नी से सिर मुँह ढंक लिया है ना।" वह कहती रही परंतु उसने वह लबादा उसे ओढ़ा ही दिया।
उसके पीछे मोटरसाइकिल पर बैठकर, सपनों के आसमान में उड़ने लगी वह। फिल्मी स्टाइल में भागना, मंदिर में सात फेरे, दूर पहाड़ियों में छोटा सा घर, गाना नाचना और बस, सुख और खुशियों की बरसात।
कुछ किलोमीटर दूर अवि ने मोटरसाइकिल खड़ी कर दी।
"सब लाई है ना घर से तू। सुन, यहीं रूक पेड़ के नीचे। मेरा दोस्त आएगा, उसके साथ जाकर ये मोटरसाइकिल छोड़कर, एक कार ले आता हूँ। दोस्त भी साथ चलेगा, हम दोनों को दूसरे शहर छोड़कर, वापस आ जाएगा।" सुगंधा का हाथ अपने हाथ में ले लिया।
तभी सड़क पर एक मोटरसाइकिल आकर रुकी और उस लड़के ने आवाज़ दी।
"इरफ़ान, चल आ जल्दी।"
अवि दौड़ता हुआ उसकी ओर चला गया और सुगंधा का दिमाग घूम गया।
"इरफ़ान, इरफ़ान...अवि है या इरफ़ान।" अब उसके मन में कई प्रश्न उठने लगे। दो मिनट की सोच और फिर एक फैसला।
काले रंग का वह लबादा उतार फेंका, सूर्य की किरणें उसे भविष्य का रास्ता साफ दिखा रही थीं। भागती चली गई, विपरीत दिशा में। कितनी दूर, कितने देर भागती रही पता नहीं। जब एक बड़ी सड़क आ गई तो सामने जाते एक रिक्शे को रोक लिया।
घर का पता बताकर बैठ गई।
"बहुत दूर है तुम्हारा पता।" रिक्शेवाले ने पैडल मारते हुए कहा।
चुन्नी लपेटे, आते-जाते लोगों, मोटरसाइकिल, कारों से मुँह छिपाते अपने घर से कुछ पहले उतर गई।
"आज जल्दी आ गई स्कूल से या छुट्टी हो गई सुगंधा?" उसे असमय घर आते देखकर बाजू वाली काकू पूछी।
"स्कूल पहुँची तो पेट दर्द होने लगा काकू, वापस आ गई।" कहती हुई घर के अंदर जाने लगी।
"तू आराम कर मैं नींबू पानी बनाकर लाती हूँ।" उसे दरवाजे की सांकल खोलते देखकर काकू भी आंँगन में आ गई।
दरवाजा खुला और दोनों की चीख निकल गई। कुर्सी पर मयूर निढ़ाल पड़ा था, टेबल कुर्सी के चारों ओर उसके खून का ताल बना हुआ था। उसकी कलाई की नस खून बहाकर शांत हो गई थी।
डॉक्टर को बुलाया, आई-बाबा रोते-बिलखते आए, सब कुछ शांत हो गया था। अतृप्त, कुंठित, जीवन का अधूरापन झेलती किशोर की आत्मा की मुक्ति के लिए पूजा-पाठ, पिंडदान, दान क्रियाकर्म किए गए। घर में तीन प्राणी रह गए और एक उदासी। पता नहीं, आई ने उस दिन पैसे जेवर लेकर, सुगंधा के भाग जाने की बात का कुछ अंदाजा लगा लिया था। बार-बार अपने मंगलसूत्र के साथ लिपटे उसकी चैन को देखती और उसे मौन घूरती रहती। एक दिन सुगंधा ने अपना वो अपराध कबूल लिया, दो औरतों के बीच यह राज, सीख और फैसला बनकर रह गया।
सामने पोस्ट ऑफिस देखकर सुगंधा ने ऑटो किनारे लगा दिया। युवती उतर गई, पैसे दिए और सुगंधा के कंधे पर थपकी देकर चली गई।
मुस्कुराती हुई सुगंधा ने अपने पुराने मोहल्ले की ओर जाने वाली सड़क पर ऑटो बढ़ा ली। मिल बंद हो जाने के बाद, उसके सामने की सड़कों का पक्कीकरण, छोटी दुकानें, रेस्टोरेंट खुल गए। अपनी धुन में सुगंधा आगे बढ़ती जा रही थी।
"भाभी... श्वेता भाभी।" बस स्टॉप के आगे खड़ी एक स्त्री को देख, सुगंधा ने ब्रेक लगा दिया।
'आई' इन्हीं के बंगले पर काम करती थी। भाभी की शादी बड़े धूमधाम से, मालिक ने उनके रिसोर्ट से की थी। चार दिनों खूब खाना पीना, बढ़िया नाच-गाना, लेन-देन किया था।
"श्वेता भाभी, पहचाना नहीं, मैं सुगंधा। आपके बंगले में आई खाना बनाती थी, बाबा मिल में काम करते थे।" सुगंधा उत्साह से बोल रही थी।
"हाँ-हाँ याद आया, तुम्हारा एक छोटा भाई था ना जिसने...।" कहते हुए भाभी चुप हो गई।
सुगंधा अचकचा गई फिर पूछी, "भाभी, गाड़ी ड्राइवर कहाँ हैं, आप ऐसे अकेली क्यों खड़ी हो?"
उत्तर के उत्तर में भाभी, ऑटो की पिछली सीट पर बैठते हुए बोली, "कौशल्य हॉस्पिटल ले चलो ना।"
ऑटो शुरू करती सुगंधा के मन में कई प्रश्न थे।
"तुम्हारे घर में सब कैसे हैं सुगंधा?" भाभी ने मौन तोड़ा।
"सब अच्छे हैं भाभी। आप लोगों ने जो जमीन आई को दी थी उसे बेचकर ये ऑटो लिया और म्हाडा का एक घर मिला उसे भी बनवाए। चारों बहुत अच्छे से रहते हैं।" सुगंधा ने बताया।
"अच्छा अच्छा, तुम्हारी शादी हो गई होगी। मैं तो पूछना भूल गई।" भाभी ने कहा।
"नहीं भाभी, शादी नहीं हुई पर मेरी दो साल की एक बेटी है। अनाथ आश्रम से लिया है, घर पर आई-बाबा उसकी देखभाल करते हैं और मैं इस ऑटो से, सबकी।"
मिरर से देखा सुगंधा ने, भाभी के चेहरे पर आश्चर्य था।
"अरे वाह, बहुत हिम्मती हो तुम।" सचमुच उनकी आँखों में चमक आ गई।
"आप सब कैसे हो भाभी? आप अकेले अस्पताल क्यों जा रही हो?" सुगंधा ने प्रश्न किया।
"मम्मी पापा अच्छे हैं। उनके दोनों बेटे भी ठीक हैं। मेरी देवरानी भी है, सब अच्छा है।" कहती हुई भाभी ने आगे बताया, "मैं तीसरी बार माँ बनने वाली हूँ इसीलिए अस्पताल जा रही हूँ।"
"अरे वाह, मैंने तो आपके बच्चों के बारे में पूछा ही नहीं। बधाई हो आपको। पहले दोनों कितने बड़े हैं?" खुशी से भरी सुगंधा ने पूछा।
"दो बार गर्भवती हुई पर माँ नहीं बनी सुगंधा। दोनों बार गर्भपात करवा दिया।" भाभी के स्वर की वेदना कोई माप नहीं सकता था।
"क्यों भाभी, आपको तकलीफ़ थी कुछ?" बिन ब्याही माँ, एक अधूरी माँ से पूछ रही थी।
"मुझे नहीं, मेरे परिवार को, उस घर की पीढ़ियों से चलने वाली उस परंपरा को जिसमें पहला बेटा पैदा करना, अनिवार्य है।" भाभी बोलती जा रही थी, "स्वस्थ बेटियांँ थीं गर्भ में, चार महीने मैं जिनको महसूस करती, उनकी मांँग पर खाना खाती, गुलाबी सपनों में उन्हें साथ सैर कराती, सब ख़त्म कर दिया।" आँसू रोकने के प्रयास में, खारापन गले में उतर गया, आवाज़ भरभरा गई।
"हे भगवान! हमारी तो बहुत मदद की आपके परिवार ने, आपके दुःख को क्यों नहीं समझा। आपने कितनी तकलीफ़ सही भाभी।" दुःख की आँच से औरत का हृदय मोम की तरह पिघलने लगा।
"आई-बाबा को आज बताऊंगी, हम सब रोज प्रार्थना करेंगे कि इस बार बच्चा आपकी गोद में खेले।" गणपति बप्पा के आगे सिर झुकाती सुगंधा बोली।
अचानक भाभी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी। सुगंधा मुँह बाए देखती रही कि क्या ग़लत बोल गई वो।
"इस बार तो लड़का है लड़का सुगंधा। डॉक्टर ने बताया कि कच्चे गर्भाशय में पनप गया है, पूरा नहीं है। अधूरा है वो शारीरिक और मानसिक रूप से, शायद मेरी तरह अधूरा।" सुगंधा के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
"इस बार घर वालों को दिव्यांग, अक्षम बच्चा भी चाहिए क्योंकि वह लड़का है। कहते हैं कुर्सी पर बैठे-बैठे सारा जीवन चल जाएगा, बहुत पैसा है उनके पास।" सामने कौशल्य हॉस्पिटल की बड़ी बिल्डिंग दिखने लगी।
भाभी उतर गई और पर्स खोलने लगी। सुगंधा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"सुगंधा, तुमने कितने बड़े फैसले लिए हैं, तुम ज़रूर मेरे फैसले को समझोगी। तुमने एक दिव्यांग बच्चे के जीवन की अनुभूत किया है, तुमसे ज्यादा कौन समझेगा?" भाभी का चेहरा मातृत्व से दमक रहा था।
"मैंने इस बच्चे को, दुनिया में नहीं लाने का फैसला किया है। कानून मुझे अधिकार देता है तो आज मैं एक बार अपनी मर्ज़ी से उस प्रार्थना पत्र पर दस्तखत करने आई हूँ, जिस पर पहले दूसरों के कहने पर किया था। विश्वास है मेरा अजन्मा मुझे क्षमा कर देगा।" संतुलित कदमों से भाभी अस्पताल के अंदर चली गई। उनकी बातों ने कई प्रश्न, कई आरोप फिर एक बार इस समाज पर साबित कर दिया था।
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प्रमाणपत्र - मैं प्रमाणित करती हूँ कि "फैसला" मेरी मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित कहानी है।
शर्मिला चौहान
निवास - ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585
शब्दकार कहानी, लघुकथा, कविता पुरस्कार प्रतियोगिता में भेजा है।
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