आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏
फ़िलबदीह - 46
पहला चरण
2212 1212
डूबे जो तेरे प्यार में
जाना नहीं था पार में।।1।।
हैं मुझमें ऐब इतने तो
दाने नहीं अनार में।।2।।
अपना ही मोल पूछता
अब आदमी बज़ार में ।।3।।
झांका करें हैं लोग अब
औरों की ही दरार में।।4।।
खुद को बनाने खास वो
अब खुद लगे प्रचार में।।5।।
होता कहाँ गुज़ारा अब
बस कोरे इक पगार में।।6।।
बोली की धार इतनी है
जितनी नहीं कटार में।।7।।
तरही मिसरा-
जीवन का सुख लिए नहीं
थे खुद ही के हिसार में।।
***********
शर्मिला चौहान
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें