मौसमी अचार बनाम मौसमी चुनाव
फलों, सब्जियों की आम उपलब्धि को देखकर, मौसमी अचार बनते हैं। पहले तो सिर्फ़ घरों में ही बनते थे अब तो फैक्ट्रियों, कंपनियों में खास बनाए जाते हैं। अचार की तरह देश में विविध मौसमों में, विविध क्षेत्रों में, विविध स्तर के चुनाव मुँह बाए खड़े मिलते हैं। जैसे अचार आम के, मूली के, गाजर मटर के, नींबू के, आंवले के, मिर्च के, कटहल के होते हैं वैसे ही चुनाव लोकसभा, विधानसभा, विधान मंडल, विधान परिषद, स्थानीय निकायों, नगर निगम, नगर पालिका, ग्राम पंचायत और कभी-कभी मध्यावधि होते हैं।
बांकेलाल ने घर से बाहर कदम रखा ही था कि पत्नी की आवाज़ आई, " बढ़िया आम ले आना, अचार बनाना है।"
बांके ने सब्ज़ी वाले से "बढ़िया आम" मांग लिए।
हँसते हुए उसने कहा, "साहब, आम बढ़िया कब से हो गए, बढ़िया तो बस खास होते हैं।"
चौक पर चुनावी बैनरों में घमासान मचा था, किसका नेता कितना बढ़िया। उस ओर नज़र घुमाकर बांके ने सब्ज़ी वाले से कहा, "चुनावी बारिश में भीगकर, मेंढ़क की तरह टर्रा रहे हो। आम हो, आम जैसे काम करो।"
अचार के लिए कटे, रंग-बिरंगे मसालों में इठलाते फलों सब्जियों के टुकड़ों को देखकर, रंग-बिरंगी, उत्साही चुनावी रैलियांँ स्मृति पटल पर चटखारे लेने लगती हैं।
फलों और सब्जियों को एक-दूसरे के साथ मिलाकर, मिश्र अचार बनता है। आम में कटहल, नींबू में मिर्च, गोभी में गाजर मटर और जब महागठबंधन की सरकार बनानी हो तो गोभी, नींबू, मिर्च, आम, गाजर, अदरक सब एक साथ एक बरनी में समा जाते हैं। बाद में अपनी तासीर, अपने टिकाऊपन से वो गठबंधन को बिगाड़ने पर आमादा हो जाते हैं।
खैर, एक आम आदमी को इन खास बातों से क्या लेना-देना, उसकी तो ज़िंदगी अचार बनते बनाते बीत जाती है।
बांकेलाल सोच में पड़ गए कि जब तक कोई फल, सब्ज़ी खास रहती है वो आम घरों में अचार बनाने के लिए अवैध करार दी जाती है। जैसे-जैसे वह आम की श्रेणी में आने लगती है, घरों की बरनियों में सजने लगती हैं। एक आम आदमी, चुनाव जीतने के बाद खास हो जाता है और फिर आम लोगों के लिए उसके सिर्फ़ दूरदर्शन होते हैं।
अचार तो सिर्फ़ आम फलों और सब्जियों का बनता है। खास गाजर, मटर, गोभी की जब रईसी उतरने लगती है तब वो अचार रूप में आम घरों की शोभा बढ़ाती हैं। विभिन्न स्तरों के विजयी नेता सांसद, विधायक, वार्ड मेंबर, सरपंच अपनी समयावधि खत्म होने के समय ही आम लोगों की ओर दौड़ते हैं।
अचार बनाने का निठल्ला काम, अब तो बड़ी बड़ी कंपनियाँ कर रही हैं। ताम-झाम वाले विज्ञापनों से प्रभावित होकर एक आम आदमी दुकानों, मॉल और ऑनलाइन, इन अचारों को खरीदकर अपने को खास समझने लगता है।
बड़े-बड़े पोस्टरों, बैनरों में कई छोटे छोटे चेहरों के बीच, एक भव्य बड़ा चेहरा आम लोगों के सामने परोसा जाता है। कभी दूसरों के द्वारा तो कभी उस भव्य व्यक्ति के स्वयं के द्वारा विरदावली गाई जाती है। आम आदमी अपने को सिंहासन पर विराजमान राजा समझने लगता है और ईनाम में अपना मत दे देता है।
सादे भोजन में स्वाद का तड़का अचार से लगता है तो देश की गति में चुनाव उत्प्रेरक का काम करते हैं। खास आदमी, इन चुनावों को ऐसा परोसते हैं कि आम जनता की थाली में ये खास नहीं बल्कि "आम चुनाव" का चटखारा देने लगते हैं। गौर करने की बात यह है कि तमाम खास फलों, सब्जियों के अचार भी "आम" के अचार की जगह नहीं ले सकते। आखिर कार, अचारों और लोकतंत्र का राजा तो आम ही है।
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शर्मिला चौहान (अट्टहास व्यंग्य पत्रिका के लिए भेजी)
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