कहानी - "ट्यूबलाइट"
"हजारों बार बताया था कि सुभाष को अकेले बाहर मत जाने दिया कर, परंतु तू तो उसे सामान्य बच्चा ही समझती है आज तक। अब जा, ढूँढ कर ला उसे।" दिन भर काम करके आए भूषण ने, गुस्से से अपनी पत्नी सुनंदा से कहा।
"अब ग्यारह-बारह साल के लड़के को घर में कितना बंद रखूँ, जानती हूंँ मेरा ही जिम्मा है वो।" साड़ी ठीक करती सुनंदा बाहर निकल गई और भूषण भी पानी पीकर उसके पीछे निकल गया।
महानगर से सटा, भीड़ वाले शहर के कुछ बाहरी मोहल्लों में से एक है यह बस्ती।
सुनंदा याद करने लगी कि शादी के कुछ महीनों बाद ही, वो और भूषण इस मोहल्ले में रहने आए थे। पहले छोटा सा किराए का घर लिया था, बाद में म्हाडा का घर मिला। भूषण एक कंपनी की शिफ्ट में काम करता था और मैट्रिक पास सुनंदा ने भी गृहोपयोगी वस्तुएं केंद्र से लेकर घर-घर बेचने का काम सीख लिया था। शहर में चार पैसे कमाना उसे जरूरी लगा। गाँव में भूषण के सेना से सेवानिवृत्त ड्राइवर पिता अब अकेले रहते थे। वो खुद अपना काम करते और खुश रहते थे।
तीन साल बाद जब सुनंदा गर्भवती हुई तब उन्होंने, उन दोनों को गाँव बुलाया, खूब उत्सव किया।
"हमारी कई पीढ़ियों ने देश की सेवा की है बेटा। स्वतंत्रता संग्राम में, सेना में रहे। सिर्फ भूषण ने अपना रास्ता बदल लिया। अब अपने पोते को देशसेवा में भेजूंगा मैं।" उनकी खुशी की सीमा नहीं थी।
"अब तू काम में मत जाया कर सुनंदा। बस, लोकल ट्रेन में जाना पड़ता है, इतना भारी बैग लेकर चढ़ना उतरना ठीक नहीं है।" पाँचवे महीने में भूषण ने कहा और सुनंदा ने अगले महीने छोड़ने का निर्णय लिया।
बाबा भी आ गए। उन्होंने सुनंदा के कमरे में वीर महापुरुषों की, देशभक्तों की तस्वीरें लगा दीं।
"मैं अपने पोते को देशसेवा करने की शिक्षा दूँगा।" उनकी बातें गर्भस्थ शिशु तक पहुँचतीं।
सुनंदा भी पेट में हलचल होने पर, बचपन की बाल भारती में पढ़ी कविताएं गाने लगती और लगता जैसे शिशु शांत होकर सुन रहा है।
"मुझे तोड़ लेना वनमाली, देना उस पथ पर तुम फेंक।"
फिर लगता लड़की हुई तो.."खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।"
अचानक उसके पैर पत्थर से टकरा गए और विचारों की श्रृंखला टूट गई। बस्ती के छोर तक आ गई थी। मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे थे।
"सुभाष को देखा क्या बच्चों?" उसने उनसे पूछा।
"कौन सुभाष आंटी, हम नहीं पहचानते। यहाँ खेलने आता है क्या?" एक लड़के ने पूछा।
"अबे, वो पागल.. थोड़ा कम दिमाग लड़का है ना, वही।" दूसरे लड़के ने एक माँ के सामने उसके बेटे की पहचान बताई।
सत्य कभी सुंदर नहीं होता और उसे किसी भी आवरण से ढांकना कठिन है। किसी माँ के लिए यह सत्य हृदय फाड़ने वाला था।
"पागल नहीं है वो, अलग है बस। तुमसे ज्यादा समझदार है किसी को ठेस तो नहीं पहुँचाता।" डबडबाई आँखों से निकल गई सुनंदा पीछे बच्चों की आवाजें उसका पीछा कर रहीं थीं जो उस लड़के को डाँट रहे थे।
आगे गली के बाईं ओर मुड़ गई जहाँ चाय की टपरी और पान ठेला था।
"क्यों जाने दिया मैंने उसे और अब तो बहुत समय हो गया।" खुद को कोसती हुई सुनंदा चारों तरफ देखती जा रही थी।
इस बच्चे ने हमेशा ही उसकी परीक्षा ली है।गर्भावस्था में एक दिन उसके पेट के निचले हिस्से में दर्द हुआ, उसने हल्के हाथों से मालिश करके, उस दिन आराम किया।
दूसरे दिन दर्द बहुत तेज हो गया। बाबा और एक पड़ोसन के साथ वह अस्पताल आ गई, भूषण को खबर भेज दिया था।
सरकारी अस्पताल में बिस्तरों की कमी या मरीजों की बहुलता से, फर्श पर बिछे गद्दों पर रोगी थे।
"डॉक्टर साहब, मेरी बहू को देख लीजिए, बहुत तकलीफ़ में है।" महिला डॉक्टर से बाबा ने प्रार्थना की।
"सब तकलीफ़ में ही अस्पताल आते हैं दादा, नंबर निकालो और बैठो।" अकेली डॉक्टर परेशान हो चुकी थी।
एक इमरजेंसी प्रसव करवाने के बाद जब बाहर आई तो अर्द्धमूर्छित पड़ी सुनंदा को देखकर, उसकी कलाई पकड़ लिया।
"नर्स, इसको पहले लो अंदर, स्ट्रेचर लाओ।" कहती हुई डॉक्टर वापस उसी कमरे में चली गई।
"दादा, अभी आपरेशन करके बच्चे को निकालना होगा। इनके पति को बुलाओ।" डॉक्टर ने कहा।
"अभी तो सातवाँ महीना है ना मैडम, दो माह बचे हैं।" अचानक ऐसे समाचार से बाबा भी घबरा गए।
तभी भूषण सामने से आते दिखा।
"क्या हुआ मैडम जी?" भूषण ने सारी बातें सुनकर, उस फ़ार्म पर हस्ताक्षर कर दिए।
बच्चे की मंद पड़ती गति, अविकसित अंगों के कारण उसे जन्मते ही केयर यूनिट में रखना था, उसे रूलाने में ही काफी प्रयास करने पड़े डॉक्टर को।
लड़का पैदा हुआ था परंतु कोई खुशी नहीं, उसके जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी को मापती आँखों में सर्वत्र भय का साम्राज्य फैला था।
चौथे दिन डॉक्टर ने बताया कि बच्चा अब सामान्य गति से श्वास ले रहा है, सभी अंग अपना काम ठीक कर रहें हैं। उसके बाद उन्होंने सुभाष के जीवन के उस सत्य को उजागर किया जिसका हर पक्ष अँधेरे में लुप्त था।
"बच्चे के मस्तिष्क के एक हिस्से का पूर्ण विकास नहीं हो पाया है। उसकी सीखने, समझने, सोचने और काम करने की क्षमता, सामान्य बच्चों से कम रहेगी। ऐसे बच्चों को विशेष प्रकार के बच्चों की श्रेणी में रखते हैं।" डॉक्टर बोल रही थी और बच्चे के भविष्य में छाए अंधेरे के अहसास मात्र से, सुनंदा पर बेहोशी छा गई थी।
आज की बेतहाशा दौड़ती ज़िंदगी में, उसका अपना बेटा ज़िंदगी के साथ चलने में भी असमर्थ होगा इसकी कल्पना से वह खुद को धिक्कारने लगती।
स्त्रियांँ अपने आपको खुद ही दोषी के कटघरे में ला खड़ा करती हैं।
इस बात का झटका, बाबा के हृदय को लगा। अब सुनंदा अपने सपनों को छोड़, बाबा और छोटे बच्चे के बीच समर्पित हो गई। जीवन के इस निर्णय को स्वीकार करते हुए भूषण ने अपने आपको काम में झोंक दिया। कंपनी के काम में जाने से पहले, अखबार बाँटना, रविवार को किसी समूह के साथ काम करके वो अतिरिक्त पैसे जुटाने लगा।
बाबा की हालत सुधर गई और बच्चे के नामकरण का समय तय किया। बाबा की इच्छा के अनुसार, उनके प्रिय सेनानी के नाम पर बच्चे का नाम "सुभाष" रखा गया। समय के साथ साथ, वृद्ध व्यक्ति के हृदय के तार अबोध शिशु के साथ जुड़ते चले गए। उन्होंने उसके स्नेह से बंधकर, उसकी कमियों को अपनी ओर से कम करने का प्रयास चालू कर दिया।
बाबा झूला हिलाते तो राष्ट्रप्रेम गीत गाते, दो साल की उम्र में उसे सेना की बहादुरी के किस्से सुनाते। सुभाष भी चुपचाप सुनता, तालियाँ बजाने की कोशिश करता। सामान्य बच्चों से अलग था वो, एक साथ हाथ, आँख, मुँह के बीच तालमेल बिठाने में ही कई महीने लग गए तब पहली बार रोटी मुँह में सही रख पाया था। सुनना, समझना और करना इनमें सामंजस्य उसके जीवन का लक्ष्य बन गया था। दो साल के बच्चे का काम, वह छह की उम्र में कर रहा था।
जब से चॉक पकड़ना सीख गया था, फर्श पर आकार, आकृतियां बनाता। स्लेट पर फिर रंगीन पेंसिलों से सुंदर चित्र बनाने लगा।
पाठशाला में दाखिला मिला तो बाबा उसका बैग लिए साथ आते-जाते। रास्ते में उसे किसी भी चीज की जानकारी देते चलते, वह सुनता रहता समझता कितना था भगवान ही जाने।
एक सेवानिवृत्त सेना कर्मचारी ने अपनी अतृप्त इच्छाओं के बीजों का रोपण, छोटे सुभाष के आर्द्र मस्तिष्क और हृदय में करना शुरू कर दिया था।
सुनंदा को याद है कि सुभाष का स्कूली जीवन बहुत कठिन रहा। दूसरों के साथ तालमेल नहीं बैठा पाना, उनसे बातें न कर पाना, चीज़ों को समझने-करने में ज्यादा समय लगाने से, बच्चे उसकी हँसी उड़ाते। उसे.."ढीला" और "ट्यूबलाइट" जैसे नामों से पुकारते।
"मम्...मी, सब..हँ..स ते हैं।" वह दुखी रहने लगा।
"अरे, अच्छे लोगों पर तो सब हँसते हैं।" कहते हुए बाबा उसको कोई नीति वाली कहानी सुना देते।
उसे लिखने में भी कठिनाई होती थी, शब्दों का आकार बड़ा हो जाता, लाइनों में लिखने का प्रयास, प्रयास ही रह जाता।
दो साल के बाद स्कूल ने उसे विशेष बच्चों के स्कूल में भेजने की सलाह देकर निकाल दिया।
बाबा को दिल का दूसरा दौरा पड़ा और सुभाष का हाथ पकड़े उन्होंने दुनिया छोड़ दी।
सामने से आते भूषण को देखकर सुनंदा ने आवाज़ लगाई।
"कहीं नहीं दिखा वो। सब तरफ देख लिया, पता नहीं कहाँ चला गया बच्चा?" भूषण के स्वर से डर झलक रहा था।
"हे भगवान! मेरे बच्चे की रक्षा करना।" सुनंदा ने ऊपर आसमान की ओर देखते हुए, अपने हाथ जोड़ लिए।
सामने की दीवार पर वृक्षारोपण से संबंधित चित्र बने थे।
"सुभाष इससे सुंदर बना लेता है। फोटो फ्रेम में लगी हम दोनों की फोटो को हु-ब-हू कॉपी में बनाया था। जो देखता है उसे याद रखकर बना लेता है।" सुनंदा बेटे के हुनर को पति के सामने बताकर, मन शांत कर रही थी।
"चल, अब पुलिस चौकी में जाकर रिपोर्ट करते हैं।" भूषण के कहने पर सुनंदा उसके पीछे-पीछे चलने लगी।
पुलिस चौकी के चारदीवारी के आगे, जीपें, कांस्टेबलों को खड़े देखकर दोनों थोड़े सहम गए।
हिम्मत करके अहाते में प्रवेश किया तो सामने कुर्सी पर चिप्स खाते सुभाष को देखकर दोनों दौड़ते हुए उसके पास आ गए।
"कब से ढूंढ रहे थे बेटा, यहाँ कैसे आ गया?" सुनंदा ने उसे गले से लगा लिया।
"हम भी पता लगवा ही रहे थे कि किसका बच्चा है? कुछ देर पहले इसने सुनंदा कहा था।" पुलिस ऑफिसर ने बताया।
भूषण और सुनंदा ने देखा, फर्श पर चॉक से बड़ा चित्र उकेरा गया था। एक टूटा-फूटा खंडहर, तालाब, हथियार, गोला-बारूद के ढेर के साथ तीन नकाबपोश।
सुनंदा और भूषण इस तस्वीर को समझने की कोशिश करने लगे।
"हैलो... हैलो। इंस्पेक्टर यादव बोल रहा हूँ। सर, बच्चे की जानकारी सही थी, एरिया के अंत में तालाब के पास जो तीन-चार खंडहर हैं, उनमें दो लोगों को हथियारों, गोला-बारूद की बड़ी मात्रा के साथ टीम ने पकड़ा है।" वायरलैस पर गूँजती, घरघराती आवाज़ से, पुलिस चौकी में खुशी की लहर दौड़ गई।
बड़े पुलिस अधिकारी ने सुभाष की पीठ थपथपाई। सब उससे हाथ मिलाने लगे।
थोड़े ही समय बाद पुलिस चौकी परिसर में, पुलिस विभाग के बड़े बड़े अधिकारी, नेताओं, कार्यकताओं की भीड़ लग गई।
फोटोग्राफरों ने सुभाष और उसके माता-पिता, पुलिस दल के सभी अधिकारियों के साथ सुभाष की कई फोटो खीचीं।
पुलिस चौकी का सारा अहाता लोगों और लाइटों से चमक रहा था।
सुभाष को ईनाम की राशि के साथ ही, सरकारी खर्चे पर विशेष बच्चों के स्कूल में पढ़ाने की घोषणा की गई।
सुभाष तेजी से चलता हुआ चौकी के अंदर चला गया। महात्मा गांधी और सुभाष चन्द्र बोस जी की तस्वीरें लगी थीं। उसने सामने खड़े होकर उन्हें सैल्यूट किया।
तस्वीरों के ऊपर लगी ट्यूबलाइट जो बहुत दिनों से खराब पड़ी, जलती-बुझती रहती थी आज अचानक पूरी रौशनी बिखेरने लगी।
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शर्मिला चौहान
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