कहानी - "कॉफी हाउस"
काॅफी हाउस, शहर की वह प्रसिद्ध जगह जहाँ हर मौसम, हर समय भीड़ रहती है। सर्दियों में तो बाहर खड़े होकर काॅफी पीने वाले भी होते हैं, जिनके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। शाम का माहौल काफी खुशगवार होता है मानो जिंदगी अपनी रंगीनियाँ बिखेर दिया करती है। काम से वापस आने वाले, काॅलेज के युवा, घूमने आए परिवारों, महिलाओं के झुंड और जीवन के अंतिम पड़ाव से गुजर रहे बुजुर्गों की यह पसंदीदा जगह है। कितने लोग और कितने चेहरे। मुस्कुराते चेहरे, व्यग्र और आतुर चेहरे, चिंतामग्न, दुःखी चेहरे, उत्साहित और प्रफुल्लित चेहरे, ठहाके लगाते तो कुछ अनमने से। यह एक जगह अनेक प्रकार के लोगों से भरी रहती है।
आज उसे सिन्हा ने बुलाया है पर वह खुद कभी समय पर आता नहीं। वेटर चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कान लिए कॉफी का प्याला मेज़ पर रख कर कहता है, "सिन्हा साहब भी आएँगे क्या?" मीरा ने सिर्फ सहमति में सिर हिलाया। पहले भी वह सिन्हा से यहाँ तीन-चार बार मिल चुकी है।
कॉफी से उठता धुआंँ नथुनों में समा रहा था। इस खुशबू को वह अंदर तक पी लेना चाहती है। ना जाने क्या जादू है कि वह काॅलेज के जमाने से कॉफी हाउस के कॉफी की प्रशंसक है और जब आने का मौका मिलता है जरूर आती है।
आँखें बंद करके इस खुशबू में डूब जाना चाहती थी, उसी समय सिन्हा की खरखराती आवाज ने ध्यानभंग कर दिया।
"ज्यादा इंतजार तो नहीं करना पड़ा आपको। अरे... मैं निकला तो ठीक समय पर ही था मगर.!"
"अब बस भी कीजिए सिन्हा जी, आज कोई नई बात नहीं है। हर बार और कितने बहाने ढूँढेंगे। एक महिला को आपने बुलाया और आप ही देर से आ रहे हैं।" मीरा ने शिकायत भरे लहजे में कहा।
"साहब, आपकी कॉफी तैयार है। कुछ और लेंगे साथ में?" वेटर ने मुस्कुराते हुए कहा।
"भई, बिना समोसे के कॉफी का क्या मजा? "अरे...तुम्हारा बेटा कैसा है अब? बुखार तो नहीं आता ना उसको?" सिन्हा ने कुछ ऊंँची आवाज में वेटर से पूछा।
"नहीं साहब, बिल्कुल भला-चंगा है अब। आपकी मेहरबानी से बहुत मदद हुई। बड़ी सुविधा मिली अस्पताल में उसे। अब तो स्कूल भी जा रहा है।" अदब और कृतज्ञता से वेटर ने बताया।
"अरे भाई .. कुछ मदद-वदद नहीं की। तुम तो गरमागरम समोसे ले आओ।" सिन्हा ने हँसते हुए कहा।
"कैसे याद किया आज आपने?" मीरा ने छोटा-सा प्रश्न किया।
"वकील और लेखक दोस्त नहीं हो सकते क्या? " प्रश्न का उत्तर प्रश्र से ही देते हुए सिन्हा ने कहा।
"एक बहुत रोचक केस आया है। मुझे लगा कि आपके लेखों के लिए अच्छा हो सकता है। कुछ लिखने पर मजबूर कर देगा।"
"कहिए, कौन सा किस्सा आया है आपके दरबार में?" मीरा ने उत्सुकता जताई।
"एक औरत का केस है। सैंतीस-अड़तीस की होगी। कम पढ़ी-लिखी लगती है, पर दिखने में एकदम हीरोइन है। उस पर उसके पति की हत्या का आरोप है। वकील के लिए पैसे नहीं हैं और सरकारी वकीलों पर लगता विश्वास नहीं है उसको। मुँह से कुछ बोलती नहीं।" एक ही सांस में कह गए सिन्हा जी।
"साहब, आपका गरमागरम समोसा हाजिर है। कुछ और लगे तो आवाज देना।" विनम्रता से वेटर ने कहा।
"अब यार, तुम्हारे हाॅटल में आएँ हैं तो तुमसे ही कहेंगे, खुद जाकर तो नहीं बना लेंगे ना।" ठहाका मारकर सिन्हा ने कहा। साथ ही सारे वेटर भी मुस्करा रहे थे। वह वेटर झेंपते हुए अंदर चला गया।
"आपने क्या नतीजा निकाला? क्या वह औरत कसूरवार है?" मीरा सीधे परिणाम पर आ गई।
"अभी तक तो सारे सबूत उसके खिलाफ हैं। सारे गवाहों के बयान भी उसी की तरफ इशारा कर रहे हैं।" आराम से बैठते हुए सिन्हा कह रहा था।
"क्या आप उस औरत से मिले हैं कभी?" जिज्ञासा से मीरा ने पूछा।
"हाँ , मिला हूँ। पहली बार जब वह कटघरे में खड़ी थी और बाद में पुलिस कस्टडी में भी। बला की खूबसूरत है वो। गोरा रंग, बड़ी आँखें, लंबे बाल और तीखे नैन-नक्श। बदन तो बस पच्चीस-तीस का लगता है।" जिक्र करते हुए मानो सिन्हा उस औरत की सुंदरता में डूब गए उनकी आँखों की चमक और चेहरे के भाव से मीरा को ऐतराज़ हो रहा था।
क्यों आदमी औरत में सिर्फ शारीरिक सुंदरता देखते हैं। जवान-बूढे़, पढ़े-लिखे, अनपढ़, आदमी सिर्फ आदमी होता है। औरत को देखने का नजरिया बदल पाना, उसके लिए कठिन है।
"क्या आप उसकी खूबसूरती से प्रभावित होकर गए थे या उसकी मदद करने का इरादा था?" अनजाने ही मीरा ने एक तेज-तर्रार प्रश्न दाग दिया।
"हा..ऽ..हा ऽहाऽ.. आपकी कॉफी ठंडी हो रही है। आप भी पीजिए और मैं समोसा खा लेता हूँ।" एक चालाक वकील ने झट पैंतरा बदल दिया।
कॉफी पीते हुए मीरा ने महसूस किया कि आसपास बैठे आदमी उसे घूर रहे हैं। नवयुवकों के जोड़े अपने आप में मग्न थे। बूढ़ों का समूह भी सड़क से आती-जाती लड़कियों और औरतों के कपड़ों पर अपने विचार व्यक्त किए जा रहे थे। कभी-कभी दबी जुबान से कुछ कहकर ठहाके लगा लेते।
पचास साल की प्रौढ़, अनुभवी लेखिका है मीरा। लोगों की आँखों से मन तक झाँकना आता है उसको। उसके लेख, विचार और कहानियाँ, समाज का प्रतिबिंब होती हैं। कुछ जान-पहचान के लोग उसे प्रतिष्ठित लेखिका जानकर, ज्वलंत मुद्दों और कचहरी में आए मामलों की जानकारी देते रहते थे, ये सिन्हा साहब भी उनमें से एक हैं।
"मुझे इस केस के बारे में पता है सिन्हा जी। मैं भी मधु से मिल चुकी हूँ। बड़ी शांत और सभ्य महिला है।" कॉफी के प्याले को सहलाते हुए मीरा ने कहा।
"अच्छा ऽऽ!" मानो सिन्हा जी चीख पड़े। मेज़ साफ करते वेटर, लड़के-लडकियाँ, सारे बूढ़े समूह की आँखें सिन्हा पर टिक गई।
एक क्षण के लिए ही सही सिन्हा ने थोड़ी शर्म महसूस किया।
"हां, मैंने अपने स्तर पर कुछ जानकारियांँ भी हासिल की हैं। मैं खुद को कहीं ना कहीं इससे जुड़ी हुई पातीं हूँ।" आराम से मीरा ने अपनी बात पूरी की।
सिन्हा की प्रश्नवाचक निगाहों को देखते हुए मीरा ने बताया, "एक तो मैं औरत हूंँ, दूसरे आप मर्दों के इस समाज में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हूँ और एक बेटी की माँ भी हूँ।" मीरा ने गहरी सांँस ली।
"अरे.. मुझे मालूम नहीं था कि आप इस केस के बारे में जानकारी रखतीं हैं। मैंने आपका समय खराब किया और इंतजार भी करवाया।" घूरते हुए सिन्हा ने औपचारिकता पूरी की।
"नहीं-नहीं सिन्हा जी, ऐसी बात नहीं है। मुझे आपके विचार पता चले। किसी भी विषय पर लिखने से पहले, संबंधित लोगों के विचार, नजरिया, दृष्टिकोण जानना एक लेखक का काम है। आप एक वकील हैं और मैंने आपके विचार जानने का प्रयास किया।" मीरा ने कहा।
बाजू की टेबल पर एक युवा जोड़ा बैठा आपस में इतना व्यस्त हैं कि उन्हें आसपास की दुनिया से कोई सरोकार नहीं। इस उम्र का आकर्षण ही ऐसा है कि इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
कुछ आँखें उनको ही घूरने में लगीं हैं।
उन बूढ़ों का समूह भी अपनी सभा खत्म कर रहा है और अपने हिस्से के पैसों का हिसाब कर रहा है। जाते हुए उन्होंने सौंफ खा भी लिए और थोड़ी जेब में रख लिए।
मीरा ने अपना ध्यान सिन्हा पर केन्द्रित किया जो बैचैन नजर आ रहा था।
"और क्या-क्या जानतीं हैं आप इस औरत के बारे में?" अजीब सी दृष्टि डालते हुए सिन्हा पूछ रहा था।
"उतना ही जितना एक औरत दूसरी के बारे में जानती है वो भी तब जब वह उसके साथ कुछ समय बीता चुकी है।" मीरा ने सिन्हा के चेहरे पर निगाह गडा़ते हुए कहा।
"सिन्हा जी, मधु आज से दस-बारह साल पहले मेरे घर काम करती थी। तीन साल काम किया उसने। मेरे पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद मैंने वो घर छोड़ दिया और उसका काम छूट गया।" मीरा कहती गई।
"ओह!" सिन्हा की आँखें फैलती चली जा रही थी जैसे थाली में पानी फैल जाता है। इस बार उसने ध्यान रखा कि आवाज ज्यादा ऊँची ना होने पाए।
बुजुर्गो की खाली हुई जगह में अब चार-पाँच औरतों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। पैंतीस से चालीस के उम्र की, अपने रोजमर्रा की जिंदगी से थोड़ा सा वक्त निकालकर आईं हैं, आते ही उन्होंने एक-दो फोटो ले लीं। फिर क्या खाना है और कितना, इस पर बहस करने लगीं। ना जाने क्यों मीरा को बहुत अच्छा लग रहा था कि एक बार फिर वो अपनी दोस्ती का रिश्ता निभाना शुरू कर रहीं हैं।
एक उड़ती हुई नजर से सिन्हा ने सबको ताड़ लिया। मीरा की तरह खुल कर देखने की जुर्रत ना कर पाए। मीरा की नजर में यह उनका शरीफ़ बनने का असफल प्रयास था।
"सिन्हा जी, मधु का केस मैं लड़ रही हूंँ शायद आपको पता नहीं कि मैंने आपसे तीन साल पहले वकालत पास की थी। कभी कोई केस लड़ी नहीं, क्योंकि शादी के बाद पति का स्थानांतरण होता रहता था। अपनी क्षमता लेखन में डाल दी और फिर पूरी तरह उसमें ही डूब गई। अब मुझे मधु ने आवाज दी है, मुझे उसके लिए लड़ना होगा। उसको मैंने तीन सालों में जितना समझा, दुनिया नहीं समझ सकती।"
आत्मविश्वास से भरी हुई औरत बोल रही थी।
"अरे.. आप तो छुपी-रूस्तम निकलीं। बहुत कुछ जानती हैं आप मधु के बारे में परंतु सारे सबूत और गवाह उसके खिलाफ हैं। क्या कर लेंगी आप?" एक वकील अपने पेशे पर आ गया।
"सच्चाई को सामने लाना ही एक वकील और लेखक, दोनों की जिम्मेदारी है। रोज़ दम तोड़ने वाले गवाह और सबूत बहुत बिकते हैं पर सच बिकाऊ नहीं होता और .. मुझे सच्चाई का पता है, वह मैं साबित कर लूँगी।" मीरा ने आत्मविश्वास से भरे शब्द कहे।
उनके बीच सन्नाटा छा गया जिसको तोड़ते हुए वेटर ने कहा, "साहब जी कुछ और मंगाना है आपको या बिल लाऊँ?"
बिना कुछ बोले सिन्हा ने मीरा की ओर देखा।
"सुदर्शन, तुम्हारा बेटा बीमार था। उस बड़े अस्पताल में उसका इलाज हुआ। मेरी सहेली वहाँ बच्चों के विभाग की मुख्य है, उसने मेरे कहने पर मदद की। उस दिन जब सिन्हा से तुमने बताया था तभी मैंने सुनीता से बात करके, सिन्हा को अस्पताल के बारे में बताकर, तुम्हारे लिए खबर दी थी। हम कॉलेज में थे तब भी यहाँ आते थे तब तुम छोटे बच्चे थे। हमें बहुत बुरा लगता था कि तुम काम करते हो।"
सहसा, किसी के मुँह से अपना नाम सुनकर सुदर्शन खुश हो गया क्योंकि यहांँ तो लोग उसको "वेटर" ही बुलाया करते हैं।
उसने अपने दिमाग पर जोर दिया तो तीन-चार लड़कियों की धुँधली तस्वीर घूम गई। "ओह! तो वह बड़ी डॉक्टर वही लड़की थी जिसने एक बार उसके हाथ में काँच लग जाने पर अपने पास रखी पट्टी बाँधी थी।" सोचते हुए उसकी आँखें झिलमिलाने लगीं।
भरी आँखों से सुदर्शन ने हाथ जोड़ लिए, प्रत्युत्तर में मीरा ने भी।
"सिन्हा जी, आपने सुदर्शन से बताया नहीं कि एक महिला दोस्त की दोस्त ने मदद की।" हँसते हुए मीरा ने कहा ।
वेटर सिर झुकाकर, बिल लाने चला गया। सोच रहा था कि इस महिला के बारे में वो कितना गलत सोच रहा था। सिर झटककर वह मीरा की तेज तर्रार, बिंदास और पुरुषों के साथ घूमने वाली औरत की छवि को हटा देना चाहता था।
सहसा, मीरा ने बैग में से फोन निकाला और अगले ही क्षण एक चिरपरिचित, खरखराती आवाज की रिकॉर्डिंग गूँज रही थी, "मिनी, मैं आज ही सुबह आया हूँ। काम था कुछ यहांँ। मैं और तुम्हारी मम्मी अच्छे दोस्त हैं। उन्होंने तुम्हारे लिए कुछ भेजा है। यदि कोई काम ना हो तो चलो घूम आते हैं और बाहर खाना भी खा लेंगे।" फोन पर से आई खुद की आवाज से सिन्हा के दिल की धड़कन चौगुनी हो गई। माथे पर पसीना आ गया।
"नहीं अंकल, मेरे छात्रावास में ऐसा नहीं होता। मैं सिर्फ मम्मी के साथ ही जाती हूंँ। और हाँ .. मम्मी ने मुझे कभी आपके बारे में ना ही बताया ना आपके आने के बारे में फोन किया।" यह मीरा की बीस वर्षीय बेटी मिनी की आवाज थी।
"मम्मी की भेजी हुई चीज मैं रख लेती हूँ। अगले बार आप मम्मी के साथ ही आना जिससे हम बाहर जा सकें।" मीरा ने फोन बंद कर दिया।
घूरती हुई आँखें सिन्हा पर टिकाते हुए, एक छोटी सी, पतले कपड़े की फ्राॅक निकाल कर मेज़ पर पटक दिया।
अपनी कॉफी के पैसे निकाले और सुदर्शन के हाथों में रख दिए।
बैग उठाते हुए बोली, "अभी चलती हूँ कोर्ट में ही मुलाकात होगी। अपना हश्र तो समझ ही गए होगे, जिसकी बेटी ने तुम जैसे शातिर की आवाज कैद कर ली, उसकी मांँ क्या कर सकती है।"
कुर्सी सरकाकर एक हिकारत भरी निगाह सिन्हा पर डालते हुए वह उठ गई। कॉफ़ी हाउस का मुख्य द्वार खोल कर, सुदर्शन झुक कर मानो मीरा के सफलता की कामना कर रहा था।
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यह मेरी मौलिक, स्वरचित कहानी है।(नरेंद्र परिहार को दी आज दिल्ली के लिए)
लेखिका - शर्मिला चौहान
१४ मई २०१८
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