गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

नववर्ष पर ग़ज़ल 221 2121 1221 212



221 2121 1221 212



गठरी को बांधे जाने को तैयार साल है 
इसको जो रोक ले कहो किसकी मजाल है।।1।।

अब बीत जाना उसको है ये जानता है वो
जाते हुए भी पर वो मचाता धमाल है।।2।।

अल्हड़ सी चाल चलते नया साल आ गया 
हैरान वो कि सामने तो भूतकाल है।।3।।

इक पल को हाथ थामे खड़े साथ साथ वो
इस पल में दोनों बीच नहीं अंतराल है।।4।।

जाता जो साल देता नसीहत नवीन को
अपने पे दंभ मत करो सब मोहजाल है।।5।।

जो आज है वो सामने  बीता तो कल हुआ
ये सत्य जान ले वही दर्शी त्रिकाल है।।6।।

यादों की मुट्ठी बांध नए साल में जिएं
हर साल अपने आप में बस बेमिसाल है।।7।।


***********

शर्मिला चौहान

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

कहानी - ठहरी हुई हवा

कहानी - ठहरी हुई हवा 

आज जो हो रहा है वैसा नार्मली होता नहीं है धीरज के साथ। हर सिग्नल पर गाड़ी रोकना पड़ रहा है मानो हरे रंग ने आज उसकी राशि से बिदा लेकर, लाल को स्थान दे दिया हो। कार गति पकड़ती कि बस्स्..अगला चौक लाल बत्ती जलाए उसे रोक देता।

मोबाइल की घंटी बजी पर चौक के पहले लाइन में खड़े होकर फोन उठाने की हिम्मत नहीं हुई उसकी। लालबत्ती बुझी और एक्सीलेटर में पैर दबाते हुए धीरज ने फोन उठा लिया।

"आ ही रहा हूँ घर, अब हर चौक पर रोक रहा है मुझे सिग्नल तो क्या उड़कर आऊँ?" पत्नी से झुंझलाते हुए कहा था कि दूसरी ओर से उससे भी ज़ोर की धमकी आई।
"अब बुढ़ापे में अपनी उम्र की तरह कार चलाओगे तो अटक कर ही आओगे। हजार बार बोली कि ओला-उबर की सुविधा है पर नहीं, अपनी कार निकालने का शौक जो है..।" अपनी पत्नी उमा की आगे की बड़बड़ बंद करके धीरज ने अपनी गति कम करनी शुरू कर दी। अगले चौक का सिग्नल गुस्से से लाल हो गया था।

"हे भगवान! सही कहती है उमा।" कुछ और बड़बड़ाता कि आगे उन्नीस-बीस साल की युवती, एकदम काँच से सटकर अंदर झाँक रही थी।
गोरा रंग, भूरी आंँखें, बाल भी भूरे, होंठों पर गुलाबी रंग की लिपिस्टिक पोती, गाल पर तिल और जरूरत से ज्यादा गहरे गले की टी-शर्ट। वह काँच को ठकठका रही थी।

"क्या है? क्या बेचना है? मैं नहीं खरीदता।" काँच को थोड़ा नीचे करते धीरज ने कहा और उस लड़की में किसी और को ढूँढते हुए कई साल पीछे निकल गया।

वही आँखें, वैसे ही बाल और कद-काठी परंतु वो तो ऐसी नहीं थी। दस साल की उम्र से लंबा कुर्ता, घेरदार लहंगा पहने आती और चुनरी को शरीर से लिपटाए रखती।

"दस साल की बच्ची को लबादा क्यों ढांक देती हो मुरनी।" धीरज की माँ दीपावली की साफ-सफाई करने, कपड़े-पर्दे धोकर लाने और लगाने वाली मुरनी से कहती।
"हमारी जात-बिरादरी में चोखी बात न माने दिद्दी। आज छोट्टि लगे, दो साल में बड़ी लगन लगेगी। आदत पड़ गई तो खुल्ली घूमा करेगी, सहर की छोकरियों की तरहा।" सामने से धीरज को आते देख वह झट मुँह पर घूँघट ले लेती थी।
"भैय्या आ रहो है दिद्दी, मैं चलूँ। काम हो सो भौंरी से खबर कर देओ।" और वह अपनी दस साल की बेटी पारबती को कमर से सटाए निकल जाती।
"अरे.. कॉलेज में पढ़ता है धीरज, तुम्हारे बच्चों के उम्र का है उसे भैय्या क्यों कहती हो?" माँ का बड़बड़ाना चालू रहता और वह हवा-हवाई हो जाती।

"तुम क्यों उसको अक्ल सिखाती रहती हो माँ? वो गंवार लोग हैं उनको उनके अनुसार ही जीने दो। छोटी सी बच्ची को स्कूल तो भेजते नहीं, पर्दे में रखना है तो तुम्हें क्या करना है?" माँ पर धीरज चिड़चिड़ा जाता।

समय बीतता रहा, धीरज ने कॉलेज की पढ़ाई करके, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। एक बड़े सरकारी बैंक में नौकरी मिली और माँ-बाबूजी ने उसकी शादी की बातें शुरू कर दी।

अक्सर छुट्टियों में वो घर आता, मुरनी के साथ आने वाली पारबती अब बड़ी हो गई थी। अपने बंधनों, संस्कारों और बिरादरी की बातों में अपने को कैद रखने वाली पारबती को एक दोपहर धीरज ने देखा। हॉल का पर्दा लगा रही थी। दुबली-पतली, गोरी, भूरे लंबे बालों वाली सोलह-सत्रह साल की बहुत सुंदर लड़की पारबती। ताकत से पर्दा उठा कर, उसकी चुन्नटों की लोहे में डालकर चढ़ाती उस ग्रामीण सौंदर्य पर आसक्त होकर, सुध-बुध खो दिया था धीरज ने। शहरों के बनावटीपन से बिल्कुल भिन्न, सादा सौंदर्य छलक रहा था उस कमरे में। 

धीरज धीरे-धीरे उसकी ओर खींचता चला गया और बिल्कुल पास जाकर उसे निहारने लगा। उसकी आँखें तो दिल की गहराई तक उतर रही थीं।‌
अचानक उसका संतुलन गड़बड़ा गया और वह स्टूल पर से गिरने लगी की धीरज ने उसे कमर से पकड़ लिया। भगवान ने मन की मुराद पूरी कर दी थी और उसने उसे पास सटा लिया। एक क्षण तो वह कुछ समझी ही नहीं फिर अपनी स्थिति देखकर चौंक गई।

धीरज को धकेल कर अपने से दूर किया और टुकुर-टुकुर देखने लगी।

"ऐ करमजली! भैय्या खड़ा सामने, तू का निहार रही, पर्दा तो कर। पारबती, कब सीखेगी तू ?" न जाने कहाँ से उसकी माई मुरनी आ धमकी और यह एकतरफा प्रेम-प्रसंग, कुछ मिनटों में अपने अंत तक पहुँच गया।

अब अक्सर धीरज छुट्टियों में आने लगा। आता तो कभी कमरे के पर्दे, कभी चादरें, कभी अपने ही भारी कपड़े धोने दे देता। पारबती आती, वह देखता रहता। अपना काम करके, चुपचाप निकल जाती। एक दिन जाते-जाते उसने पलटकर देखा। कमरे की खिड़की से एक जोड़ी पहचानी आँखें उसे ही देख रही थीं। 
उसने अपनी चुनरी हटा ली, खुले भूरे लंबे बाल फहराने लगे। गजब की खूबसूरत पारबती, उसकी वो सौम्यता से भरी मुस्कान कोई कैसे भूल सकता था?

पीछे की हार्न बजाती कारों ने धीरज को वर्तमान में ला पटका।
"अरे बढ़ा भाई कार, बत्ती हरी हो गई है।" बाजू से गुजरते बाइक वाले ने कहा।
वो लड़की बाजू के कारवाले से कुछ कह रही थी। उसके हाथों में कुछ मोती की मालाएं, कुछ सजावटी सामान थे। कार आगे बढ़ाते हुए वह उसी को देख रहा था, थोड़ी फैशन में रंगी प्रतिकृति थी पारबती की। उसकी मुद्राओं, उसके हाव-भाव का मिलान जाने-अनजाने  पारबती से करने लगा, कुछ भी मिलता-जुलता नहीं था सिवाय देह सौंदर्य के। कहाँ वो पूरे शरीर को ढांकने वाली, कहाँ ये गले की गहराइयों से अपने यौवन का दर्शन कराने वाली। उसकी नत आँखें, इसकी कुछ अलग ही से इशारे करती आँखें, साम्यता तो नहीं विरोधाभास में निबंध लिखा जा सकता था।

"पापा, आप कार मत ले जाया करो। मम्मा सबका दिमाग खराब कर देती हैं।" बरामदे पर ही बेटी ने सावधान करते हुए कहा।
"अब अभी से ड्रायविंग बंद कर दूँ क्या? अस्सी साल के लोग कार चलाते हैं, मुझे अभी से बूढ़ा बना रहे हो तुम लोग। तेरी शादी के बाद नहीं चलाऊंगा।" कहता हुआ धीरज अंदर चला गया।

दो महीने बाद ही बेटी की शादी थी और व्यवस्था के अनेक कामों के बीच भी धीरज, पारबती की उस प्रतिकृति को भूला नहीं था। पंडित जी की बताई सूची में से कुछेक वस्तुएं नहीं मिल पाईं थीं सो एक दोपहर ऑटो रिक्शा से मुख्य बाजार की ओर चला गया। विवाह विधि में लगने वाली छोटी-छोटी वस्तुओं की खरीदारी यानी पूरी तरह से भीड़ भाड़ में खपने का काम। 

अभी सामान के लिए पूछताछ कर ही रहा था कि सूपा-टोकरी, कलश बेचने वाली ने कहा, "भैय्या, अगली गली में दाहिने चले जाओ। कंकन, मौरी सब बढ़िया मिल जाएगी।  हाथ से बनाती है सुंदर, मोती वाली, रंग-बिरंगी मौरियाँ।" उसकी बताई दिशा में धीरज आगे बढ़ गया।

तुलसी विवाह के बाद पहले ही मुहूर्त में विवाह तय हुआ था बिटिया का इसीलिए विवाह सामग्री अभी कम ही उपलब्ध थीं वरना तो ये सारी गली रंगाए कलश, मिट्टी के चूल्हे, सिलबट्टे, सजे पीपे और लकड़ी के सुंदर खंब से पटी पड़ी रहती है। 

मोड़ के कोने पर छतरी की छाँव किए, टोकरियों में शादी-ब्याह की चीजें लेकर एक औरत बैठी थी। 

"कंकन और मौरी चाहिए।" उसने उससे कहा।
"कन्या वर दोनों के लिए चाहिए भैय्या?" चुनरी से ढंके चेहरे से दो आँखें झांकी।
"हाँ।" उन आंखों को गौर से देखते हुए धीरज ने कहा। 
भूरी आँखें, सौम्यता से उठती झुकती हुई। 
उसने टोकरियों में रखे अलग-अलग डिब्बे खोल दिए। 
"वर के लिए इसमें हैं, कन्या के लिए दूसरे डिब्बे में। आप जो पसंद आए ले लो।" उसने दो-चार नमूने सामने फैला दिए।

धीरज नमूने भी देखता और उसकी ओर भी। कुछ देर ऐसा होता रहा और उस दिन सिग्नल पर मिली वह लड़की आ गई।
टाइट पैंट, पतली झीनी शर्ट से झांकता यौवन, लिपस्टिक से रंगे होंठ लिए वह  सामने आ खड़ी हुई।
"ऐ बाबू, सामान ले रहा कि औरत ताड़ रहा। ये ऐसी नहीं है, बड़ी डरपोक है, डरती है समाज से, मैं नहीं डरती। बोल, क्या चाहिए?" धीरज के हाथों से कंकन छूट गया, पसीने से भीग कर वह चिल्लाया, "क्या बेकार बात करती है। उम्र की कोई समझ है क्या? तेरी उम्र की बेटी है मेरी, उसकी शादी का सामान ले रहा हूँ।" खड़ा हो गया था धीरज। अनजाने ही उसकी आवाज़ में बदलाव आ गया था।

"बहुत बदतमीज लड़की हो, अपनी माँ से भी ऐसी बात करती हो?" न जाने क्यों बोल गया वह।

"माफ़ कर दो भैय्या, बच्ची है। मेरे ही संस्कारों में कमी रह गई जो इसे सिखा नहीं पाई।‌" सामने हाथ जोड़े जो खड़ी हुई तो ओढ़नी खिसक गई। ज़माने की झुर्रियों ने भी, उसकी सौम्यता, सादगी को प्रभावित नहीं किया था। 

शायद वो नहीं पहचान पाई थी या अनजान बन रही थी। नहीं-नहीं,  अनजान बनने वालों  में से नहीं थी वो और कोई कारण भी तो नहीं था अनजान बनने का।

"तू घर जा मुरनी। मैं दूकान उठाकर आती हूँ। बेकार की बातें करने से क्या अपना जीवन बदल जाएगा?" उसने अपनी बेटी को "मुरनी" पुकारा था। मुरनी तो उसकी माँ का नाम भी था। शायद अपनी माँ का नाम बेटी को दिया है। अब तो पारबती के पारबती होने पर कोई अविश्वास नहीं रहा धीरज को।

"आप जो पसंद है ले लो भैय्या। अपनी बच्ची के उमर की जानकर छोरी को माफी दे दो। आपकी बिटिया को सौभाग्य मिले, जोड़ा सुखी रहे।" उसकी भूरी आँखें पानी से भरा कटोरा बनी थीं।

"लेता हूँ।" धीरज ने टोकरी में रखी मौरियों को उलटना-पलटना चालू किया।
"ऐसा व्यवहार क्यों करती है तुम्हारी बेटी?" अपनी आवाज़ थोड़ी बदलते हुए धीरज ने पूछा।

"उसका दोष नहीं भैय्या, बाप को देखी ही नहीं। इसके जन्म के पहले ही उसने छोड़-छुट्टी कर ली थी सो बस, मेरे को कोसती है कि उसे छोड़-छुट्टी दी क्यों?" अपनी ओढ़नी शरीर पर लपेटते हुए कहने लगी, "समझती नहीं, जवान खून है कि औरतों को बंधन से छुट्टी नहीं मिलती। इसकी नानी ने बचपन में संभाला फिर ऊपर चली गई।" वह चुप हो गई। सामने वाले व्यक्ति के अपमान के बदले में, अपना जीवन खोल कर रख देने पर खुद संकोच कर रही थी।

एक इतिहास गुजर जाता है उम्र खड़ी रहती है। कलाकार बदलते हैं, जीवन का रंगमंच जारी रहता है और वो अपने दिग्दर्शक के अनुसार अपने किरदार को जीता है।

अपने बचपन से आज की उम्र तक धीरज ने भी, औरतों के तीन पीढ़ियों के कलेवर को देख लिया था।

कंकन, मौरी और कलश सजाने की मोती की झालरें पैक करवा कर धीरज ने कीमत से ज़्यादा पैसे टोकरी पर रख दिए। वर्षों से इस औरत के आसपास की हवा रुकी सी है पता नहीं कि इसने खुद को ढांक लिया या हवा ने अपने पंँख सिकोड़ लिए इसके आसपास।

"ये तो ज्यादा हैं भैय्या।" उसकी आँखें उठीं और हाथ में पैसे भी।

"रख लो, आजकल में बेटी का ब्याह होगा तो मेरे परिवार काआशीर्वाद समझ लेना।" मुँह तक उसका नाम "पारबती" आते-आते रुक गया क्योंकि वह भी समाज से डरने वाला एक डरपोक आदमी है। सामान लेकर चलता हुआ वह तेजी से बाज़ार की भीड़ में गुम हो गया।‌

************

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

221 1222 221 1222

👍👍मज़ाहिया ग़ज़ल कहने की बढ़िया कोशिश, शर्मिला जी. प्रशंसनीय.👏👏
221 1222 221 1222


 जब देखो तो बांके जी, बीमार नज़र आते
पार्टी हो जहाँ कोई, दमदार नज़र आते।।1।।

दर्पण के खड़े आगे, वो देख परेशां हैं
चेहरे पे बुढ़ापे के आसार नज़र आते।।2।।

 बालों में फिराते जब, ख़ुश होके कोई कंघा,
नीचे गिरे बालों के अंबार नज़र आते।।3।।

सिर पर जो बची थोड़ी, वो फ़स्ल छिपाने को
टोपी को लगा फिर वो तैयार नज़र आते।।4।।

चेहरे पे पड़ी झुर्री जीवन की धरोहर थी
वो भाग रहे पल की रफ़्तार नज़र आते।।5।।

जो शर्ट पहननी थी वह तोंद पे जा अटकी 
कुर्ते से हया ढाँपे, बेज़ार नज़र आते।।6।।

सज धज के उन्होंने फिर, दर्पण को निहारा तो
अपने में कई उनको किरदार नज़र आते।।7।।✔️

****************

शर्मिला चौहान

रविवार, 7 दिसंबर 2025

221 1222 /221 1222


221 1222/ 221 1222


हो ज्ञान विषय का कम, तो वाद नहीं करते 
औरों का समय यूँ हम, बर्बाद नहीं करते।।1।।

हर साग अनोखा है, गुण रूप विविध सबके
भर खूब मसालों से, बेस्वाद नहीं करते।।2।।

निज देश बचाने को, जो प्राण लुटा देते
क्यों लोग उन्हें दिल से, नित याद नहीं करते।।3।

आपस में समझ कम हो, संबंध भी बिगड़ें पर
परिवार बचाने को, संवाद नहीं करते।।4।।

अच्छी हो ग़ज़ल जो भी, हिंदी में कि उर्दू में
भाषा की बहस उस पे, उस्ताद नहीं करते।।5।।

गिरह का शेर-

मुश्किल में अगर हम हों, अपने भी पराये भी
अफ़सोस तो करते हैं, इम्दाद नहीं करते।।


********

शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

कहानी - छरफुक्कन

कहानी - छरफुक्कन 


इंदू आंगन से दौड़ती हुई भीतर आई और उसका पैर दूध के बर्तन से टकरा गया। दूध गिराकर वह तेजी से अंदर के कमरे में घुस गई। 
"अब क्या गिराई-पडा़ई रे छरफुक्कन छोकरी। दिन भर दौड़ भाग करती है, छन-छन में नुकसान करती है नासपीटी।" बरामदे में माला जपती दादी गुस्से से चिल्लाई।
"हैरान करके रखा है इसने। बिना किसी नुकसान के, तोड़फोड़ के इसका दिन ही नहीं जाता।" नीचे गिरे दूध को कपड़े से पोंछती हुए इंदू की माँ बड़बड़ाई।
"आपको ही शौक था अम्माँजी कि तीसरा तो बेटा ही होगा। बेटा-वेटा तो ना हुआ यह निगोड़ी आ गई करम फोड़ने।" मांँ की आवाज से आठ साल की इंदू सोच में पड़ गई। 
"माँ, अगर मेरी जगह भाई होता तो आज यह दूध न गिरता ना?" बस, माँ ने उसकी बांँह पकड़ी और पीठ पर दो धमाके जड़ दिए। रोती-बिसूरती इंदू किनारे पड़े दीवान पर पसर गई और थोड़ी ही देर में गहरी नींद में सो गई थी।

साधारण नौकरी वाला, सामान्य परिवार तीन लड़कियों की जिम्मेदारी कैसे संभाल सकता था? तीन लड़कियों की पैदाइश ही मानो इस घर में असाधारण बात थी फिर अंतिम फूल के प्रति मन कैक्टस सा कांटेदार हो तो ऐसी घटनाएं रोजमर्रा का अंग बन जाती हैं।

घर मालिक विश्वनाथ, सरकारी दफ्तर में छोटे बाबू थे। उनकी अम्माँ उन्हें बड़ा अफसर बताया करती थीं परंतु पत्नी सुभद्रा को सच्चाई से कभी परहेज नहीं रहा।
"अम्माँजी क्लर्की के काम को अफसरी बताने पर क्या घर में तनख्वाह ज्यादा आ जाती है या बोनस भत्ता दुगुना मिल जाता है?" सुभद्रा की यह बात अम्मांँजी अनसुना कर देती थीं। विश्वनाथ जी की दोनों बड़ी कन्याएं क्रमशः सोलह  साल की निधि और बारह साल की नीमा थीं। दोनों शांत, सुशील, आज्ञाकारी दादी का हाथ पैर दबाने वाली, माँ का काम दौड़कर करने वाली और बाबूजी के आगे पीछे थैला पकड़ने वाली सुघड़ कन्याएं थीं।
इंदू , ऐसी संतान जिसके गर्भ में आने पर दादी की जपमाला दुगुनी हो गई थी।
" हे प्रभु आखिरी दांव है, बेटा दे दे। विश्वनाथ का वंश आगे चलता रहेगा।" उनकी दुगुनी जपमाला से सुभद्रा को भी अपने पेट में अभिमन्यु का एहसास होने लगा था। जिस दिन बच्ची ने जन्म लिया, उसी रात अस्पताल में आग लग गई। वैसे उस दिन अस्पताल में चार और बच्चे पैदा हुए थे पर ठीकरा तो इस बच्ची के परिवार ने इसी के सिर फोड़ा। अब बिजली विभाग ने अपना काम सही ढंग से नहीं किया और दोष नवजात इंदू पर आ गया। सवा महीने में नामकरण की शुभ बेला थी उसी दिन विश्वनाथ जी की फाइलों की अचानक जांच हुई और हिसाब किताब की सही गणना ना मिल पाने पर उन्हें छह महीनों के लिए नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। नामकरण तो हुआ "इंदू" परंतु जपमाला की उलटबांसी जानकर दादी ने उसे "छरफुक्कन" नाम दे दिया।

दफ्तर के काम की गड़बड़ी दो साल पुराने हिसाब किताब की थी परंतु अपराधी साबित हुई यह नवजात कन्या, जिसका दो साल पहले कहीं कोई अता-पता नहीं था। अमावस्या को पैदा हुई थी तो दिन दूनी रात चौगुनी चंद्रमा की तरह बढ़ने लगी। बड़ी बहनों के आगे पीछे घूमती, उनकी पुस्तक कॉपी पर पेंसिल चलाती और खुश होती बच्ची इंदू की व्यथा उस समय और बढ़ गई जब उसका पहला जन्मदिन आया।

इंदू के पहले जन्मदिन पर उसकी सबसे बड़ी दीदी निधि, जो उसे वक्त नौ साल की थी सड़क पर गिर पड़ी और उसके सामने के दो दांँत टूट गए। 
"कैसी कुलच्छन जन्मी है इस घर में, जिसके जन्म से लेकर आज पहले जन्मदिन तक अशांति ही अशांति है।" मां निधि के बहते खून को पोंछती जाती और खुद रो-रो कर छोटी बेटी पर दोष मढ़ती जाती। 
भगवान की मर्जी थी कि सबका कोपभाजन बनी बच्ची स्वस्थ, सुगठित, खुशमिजाज और हर बात में तेजतर्रार थी। विश्वनाथ को छोटी बच्ची की मासूमियत और उसके निर्दोष होने पर कभी-कभी बड़ा पछतावा होता परंतु वह मध्यम वर्ग का ऐसा पिता था जो अभी भी अपने आप को एक आदर्श बेटे के फंदे से छुड़ा पानी में असमर्थ था।

अब तो परिवार ने तीसरी लड़की के जन्म को, अपने घर के सर्वनाश का कारण साबित करने के लिए कमर कस लिया था। इस घर में जो कुछ भी लीक से हटकर होता, उसका सारा दोषारोपण भगवान की दी हुई इस अतिरिक्त बेटी के सिर मढ़ दिया जाता।
दूसरे नंबर की बेटी नीमा के जन्मदिन पर विश्वनाथ एक बछिया खरीद लाए थे।
"तीन-तीन छोरियां हैं घर पर, दूध दही की खरीदी तो कर नहीं सकते आये-गये के  चाय पानी के लिए भी मुंँह देखना पड़ता है। एक बछिया ले आता तो दो-तीन साल में बिया जाती। कम से कम दूध दही का भरोसा हो जाता।" अपनी अम्माँजी की इस बात को शिरोधार्य करके विश्वनाथ ने, इस महीने नीमा के जन्मदिन पर बछिया ला दी थी।
"माँ, यह लड़की है या लड़का?" उसके चारों ओर घूम-घूम कर उसे प्यार से स्पर्श करती इंदू ने पूछा। 
"लड़की है, बछिया है ना।" आज माँ बिना तुनके बोल रही थी। इंदू सोच में पड़ गई कि वह भी तो लड़की है उसे कितनी गालियांँ पड़ती है। बछिया को तो जानबूझकर, पैसे देकर खरीद कर लाए हैं। उसे इस घर का हिसाब-किताब समझ ना आता। प्यार मनुहार से बछिया बिल्लो बढ़ने लगी और क्षण-क्षण गाली खाकर छरफुक्कन इंदू।

इंदू जैसे-जैसे बड़ी हो रही थी वैसे-वैसे घरवालों को उससे चिड़ होती जा रही थी। वह गुल्लक में पैसे जमा करती तो कभी भी पटक कर फोड़ देती, पैसे निकालकर बर्फ, अमरूद और चने खरीद लाती।
"राम राम! कैसी छोरी है जो मिला खा-पी के खत्म कर देती है, ना आगे सोच ना पीछे देखना। झाड़ू मार के निकल जाती है। जिस घर जाएगी सारे घर में झाड़ू फिरा के सब कुछ सत्यानाश कर देगी छरफुक्कन।" दादी उसे आसपास भी देख लेती तो बड़बड़ाना शुरू कर देती थीं।
बड़ी बेटी निधि के शादी की तैयारी हो रही थी। लड़के वालों के सामने इंदू को आने ही नहीं दिया गया पता था कुछ ना कुछ गड़बड़ कर देगी। निधि के दूध के टूटे दांत तो दोबारा उग आए थे परंतु शादी में गड़बड़ हो गई तो क्या करते? 

खैर, अब बढ़ता खर्च, लड़के वालों की फरमाइशें, शादी की तैयारियों का जोर दादी का कुछ पुराना बूढ़ा दिल झेल नहीं पाया और एक महीना पहले वो स्वर्ग सिधार गईं।
"सच कहती थीं अम्माँजी, इस छरफुक्कन के पैदा होने के बाद कोई काम सही नहीं हुआ। अब सिर पर ब्याह है और अम्माँजी संसार छोड़ गईं । हे राम! कैसे होगा आगे?"  माँ रोती जाती और हमेशा की तरह ठीकरा बस एक पर फूट रहा था। 
"माँ, दीदी के ससुराल वालों को मैंने देखा भी नहीं परंतु दादी को आज सोलह साल से देख रही थी। उनका दिल चलते-चलते रुक गया, तो उसमें मैं क्या करूंँ?" जवान होती इंदू ने जवाब देना शुरू कर दिया था।
समय की मार और वाक् तीरों को झेलती इंदू ने, अपने पैरों को जमीन पर जमाते हुए आसमान की ओर देखना शुरू कर दिया था। उसने ग्रेजुएशन कर लिया था। दोनों बहनें अपने घरों में सुखी थी परंतु इंदू से ज्यादा मेलजोल रखने से कतराती थीं।
"नीमा का सातवां महीना, गोद भराई का बुलावा आया है उसकी ससुराल से। इस काम में सब मायके से ही जाता है नीमा के बाबूजी। साड़ी, मेवा, फल, मिठाई, सास-ससुर और दामाद के कपड़े।" माँ ने सामान की सूची बाबूजी को पकड़ा दिया था। बाबूजी ने लिस्ट पढ़ी, दस-बारह हजार का खर्च देखकर उनका दिल बैठ गया।
"सबके लिए कपड़े अभी थोड़ी लिए जाते हैं। निधि के समय तो सिर्फ उसी के कपड़े गए थे।" बाबूजी ने याद दिलाया।

"चार-पांच साल में दुनिया बदल जाती है। इसके घर का स्टैंडर्ड कुछ अलग है सो नीमा ने खुद कहा है।" माता-पिता की बातें सुनकर इंदू ने सोचा इस घर की दुनिया तो पिछले बीस-इक्कीस सालों में अपनी  सोच, अपनी मानसिकता में जी रही है। क्या बदल गया, कुछ भी तो नहीं। बदल तो उसकी दोनों बहनें गई हैं जो ससुराल में यह चाहिए, वह चाहिए, अमुक त्यौहार फल-मिठाई भेज देना, शगुन का नकद लिफाफा भेजना, हिदायतें  देती रहती हैं जबकि पिताजी के सेवानिवृत्ति की जानकारी उन दोनों को है।

नीमा का मन तो नहीं था पर दुनिया दिखावे के लिए मायके से सबको बुलाना जरूरी था। 
"उसे समझा देना अम्माँ, चुपचाप एक जगह बैठी रहे। यहांँ कोई नए झंडे गाड़ने की जरूरत नहीं है।" दीदी की फोन पर आवाज इंदू के मन को चुभ गई।
इंदू का मन हुआ कह दे उसे जाना भी नहीं है परंतु यह दुनिया है पूरी तरह से दिखावे की दुनिया। इसका एहसास तो उसे हर दिन, हर समय होता ही रहता है।
 परसों ही कॉलेज से अपनी अंक सूची लेकर आते हुए, उसे पड़ोस की मधु चाची मिल गई। 
"कहांँ घूम रही हो इंदू?"  चाची ने  ही आवाज दी।
"कॉलेज आई थी चाची, माँ ने कुछ सामान मंगवाया है सो सामान लेकर जा रही हूंँ।"  साइकिल पर सामान का बैग रखते हुए इंदू ने कहा।
"आप भी कुछ लेने आई हो?" सहज व्यावहारिकता भरा प्रश्न था इंदू का।
"हांँ-हांँ, प्रिया को देखने लड़के वाले आ रहे हैं तो जरा कुशन-कवर, पर्दे बदलने की सोच रही हूँ।" मधु चाची ने उत्साह से कह तो दिया परंतु अगले ही क्षण उनका चेहरा उतर गया जैसे कुछ गलत हो गया हो।

 बस कल शाम तो मांँ उस पर बरस पड़ीं, "क्या जरूरत थी तुझे पूछने की उनसे? किसी का तो भला होने दिया कर। अपने घर का तो बेड़ा पार करती ही रही है, अब पड़ोसी-पड़ोसियों के घरों का क्यों बंटाधार करती है?"  माँ की बात बिल्कुल समझ नहीं आई इंदू को।
"क्या हुआ माँ, अब क्या किया मैंने?" इंदू ने माँ के सामने आकर पूछा। 
"कल तुझे मधु मिली थी ना तो उससे बातें क्यों की तूने? उसकी बेटी को लड़के वाले देखने आने वाले थे, तेरे से बात हुई और आज उन्होंने रिश्ते की बात कैंसिल कर दी।" अम्मा ने सिर धुनते हुए कहा।
"बात उन्होंने की थी माँ फिर मैंने पूछा था। मुझे तो मालूम भी नहीं था कि प्रिया की कहीं बातचीत चल रही है, चाची ने खुद बताया। अब उनकी लड़की की कोई बात लड़के वालों को पसंद ना आए तो उसमें मैं क्या करूंँ?" कहती हुई इंदू अपने एम.ए. का फॉर्म भरकर, जमा करने निकल गई।

 "तेरे लच्छन, तेज मुँह, खोटा भाग सबको पेर देंगे।" माँ की आवाज उसके कानों से दिल को चुभती चली गई। 
दिल बड़ा संवेदनशील होता है, वह धड़कता है तो शरीर जिंदा है। कितने भी परदों, तालों में बंद रखती थी वह अपने दिल को पर पैने‌ नश्तर कहीं ना कहीं से घुस कर भेद ही डालते थे। शाम को बाबूजी-माँ कमरे में कुछ बातचीत कर रहे थे। करीब एक घंटे दोनों में बातें हुई फिर बाबूजी बरामदे में बैठ गए।
"इंदू, एक बात पूछनी है तुमसे।" बाबूजी की आवाज हमेशा की तरह थकी सी थी।
 वह चुपचाप खड़ी हो गई बाबूजी ने बैठने का इशारा किया और वह वहीं रखे मोढे पर बैठ गई। 
"आज एम.ए. का फॉर्म भरकर आई तू, तेरी माँ ने मुझे बताया।" बाबूजी पूछे।
"हाँ, मुझे अर्थशास्त्र में एम.ए. करना है इसीलिए तीन कॉलेजों के फॉर्म भरी हूँ मैं बाबूजी।"  बड़े आत्मविश्वास से बोली थी इंदू क्योंकि वह अपनी पढ़ाई अपनी छात्रवृत्ति से करती थी।
"एक अच्छे लड़के का रिश्ता है बेटा। जीवन बीमा में काम करता है। खुद का छोटा सा घर भी खरीद लिया है। अकेला है, ताऊ-ताई गांँव में हैं। माता-पिता दुर्घटना में कुछ साल पहले चल बसे थे। बाबूजी की आवाज से लगा कि उन्होंने सब पता कर लिया है।
"पर बाबूजी मुझे आगे पढ़ना है।" इंदू बोल पड़ी।
" ठीक है, अभी इतनी पढ़ाई कर ली हो आगे वही जाकर पढ़ लेना।" माँ के स्वरों की तेजी और रवैया बदला नहीं था। बाबूजी ने इशारे से उन्हें चुप करवाया और बोले, "मेरे साथी ने रिश्ता बताया है। मैंने भी बीमा ऑफिस जाकर लड़के को देखा, उसके बारे में पता किया। पढ़ा-लिखा, समझदार, अच्छा लड़का है। बात तो करते हैं।" बाबूजी अपने ढलते शरीर और जिम्मेदारियां से उकता गए थे जो उनके चेहरे और आवाज से अक्सर झलक जाता था। नेहा ने सिर झुका लिया।

नीमा की गोद भराई के बाद इस लड़के से बातचीत करने का तय हुआ। गोद भराई में दीदी की हिदायत के मुताबिक इंदू एक ही जगह पर बैठी रही मानो किसी ने मूर्ति को रख दिया हो। लेनदेन में माँ ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी, दीदी के बताने से सब कुछ बीस ही रखा था सामान और नकद। आते हुए माँ ने पहले प्रसव के लिए बिटिया को मायके लाने का प्रस्ताव रखा जिसे दामाद ने मंजूर नहीं किया। 
"अम्माँ जी, यहाँ भरा-पूरा परिवार है, देखभाल भी अच्छी होगी। आप जब मन हो आया जाया करना।" दामाद जी ने अपनी बात खत्म की। नीमा दीदी के चेहरे से उनकी खुशी दिख रही थी शायद मायके में इस बहन की उपस्थिति उनके मन में डर पैदा करती थी।

नीमा की गोद भराई के पंद्रह दिनों बाद बाबूजी के साथ भोला चाचा ने बात की। उन्होंने लड़के को साथ लेकर आने की बात बताई। माँ के चेहरे पर घबराहट थी जिस लड़की ने जन्मते ही अपना छरफुक्कन कदम दिखाया, उसे ब्याहने वाले का क्या होगा?

 इंदू बाहर से आई तो घर का माहौल बदला हुआ था। सिर पर हाथ धरे बाबूजी बैठे थे, माँ देहरी पर बैठी मानो उसी का रास्ता देख रही थी। 
"सही कह रही थी नीमा, तुझे ले जाना ही नहीं चाहिए था। आदमी लोक-लाज से डरता है वरना मैं तुझे वहाँ नहीं ले जाती। 
"क्या हुआ माँ, दीदी ठीक तो है ना?" इंदू ने पूछा।
"होना क्या था री छरफुक्कन, दामाद जी गिर पड़े मोटरसाइकिल से पैरों में चोट आई है। दो-तीन महीने प्लास्टर चढ़ा रहेगा। हे भगवान! क्या सोचेंगे वो लोग।"  माँ बिसूरने लगी।

"फालतू बातें मत करो माँ, मैंने उस दिन किसी भी काम में हिस्सा नहीं लिया था। जीजाजी से बातें भी आपने की, अब वह गिरे तो आप सारा दोष मेरे ऊपर मढ़ दे रही हो। मेरी अपनी ही सगी बहनें भी दिमाग में कैसा वहम पाले हुए हैं कि मुझे भी उनकी सूरत देखने का मन नहीं करता है।" लांछनों से घायल इंदू अपने कमरे में चली गई। क्या हाल पूछती अपनी बहन से, जब बिना कारण सबने उसे दोषी मान ही लिया है। ये उसके अपने लोग हैं दादी, माँ और अब नए ज़माने की पढ़ी-लिखी उसकी बहनें। 

दूसरे दिन तैयार होकर इंदू बाबूजी के पास गई और उनसे कुछ देर बातचीत करती रही फिर साइकिल लेकर निकल पड़ी। निश्चित दिन, निश्चित समय पर लड़का सुनील और भोला चाचा घर आए। अपनी और लड़कियों के लिए जो साज-संवार, नाश्ता-पानी का इंतजाम किया जाता था इस बार उसका आधा भी नहीं किया था माँ ने। इंदू, बाबूजी के पेंशन की बात समझती थी परंतु कहीं ना कहीं उसका भी दिल चाहता था कि आलमारी में पड़े अच्छे पर्दे, अच्छी चादरें  तो घर में बिछाई जाएं।

खैर, सुनील का सादा-सरल स्वभाव, सीधी-सच्ची बातें बाबूजी और इंदू को भा गई और बिना किसी दहेज के कोर्ट मैरिज का प्रस्ताव भी उन्हें जंच गया था। इंदू की शादी में, उसकी बड़ी दीदी निधि और उसके पति ने उपस्थिति दी। नीमा दीदी का नवां महीना था और जीजाजी के पैरों में प्लास्टर चढ़ा था तो इस विवाह में वे  नहीं आ पाए। कोर्ट में शादी के बाद सुनील ने अपने कुछ मित्रों, स्टाफ के लोगों को छोटी सी पार्टी दी थी उसी में उसके रिश्तेदार और इंदू के माता-पिता भी शामिल हुए थे। इंदू के पढ़ने की इच्छा देखकर सुनील ने उसे एम.ए. करने के लिए प्रोत्साहित किया और एक कॉलेज में एडमिशन लेकर वह अर्थशास्त्र में एम.ए. करने लगी।

नीमा की बिटिया हुई और फिर बारसे का खर्च उसने माता-पिता पर ठोंक दिया। बाबूजी अपनी सीमित पेंशन में घर का खर्च और दोनों की दवाई पानी कर लेते थे। उन्हें अस्थमा की परेशानी तो थी परंतु फिर भी वह घर का काम खुद ही करते थे। बाजार से सब्जी, दुकान से अनाज लाने से कभी पीछे नहीं हटते थे। एक सुबह सब्जी लेने गए तो पीछे से आती ऑटो ने उन्हें ठोकर मार दी। सात दिनों अस्पताल में रहे परंतु सिर पर लगी चोट ने उन्हें घर वापस आने का मौका नहीं दिया। 

इंदू और सुनील अस्पताल में लगातार उनकी सेवा देखभाल करते रहे। माँ दिन भर बैठतीं तो सुबह-शाम इंदू और रात सुनील उनके साथ रहता था। दोनों बहनों ने अपने भरे पूरे परिवार और छोटे बच्चों का बहाना ऐसा तय किया कि दोनों एक ही दिन, एक ही साथ मिलकर बाबूजी को देखने आई थीं। समय निकलता गया और उसे घर में माँ अकेली रह गई। इंदू और सुनील आते-जाते थे परंतु रोज तो यह संभव नहीं था। निधि ने फिर गर्भ धारण किया और नीमा दीदी अपनी साल भर की बिटिया में मगन रहती थीं।

अर्थशास्त्र की शिक्षिका पदों पर होने वाली नियुक्तियों का विज्ञापन आया और अंतिम वर्ष में पढ़ने वाली इंदू ने आवेदन भर दिया। इधर उसका फाइनल हुआ और उधर उच्च श्रेणी शिक्षिका की नियुक्ति हाथ में थी। पास के ही दूसरे शहर में उसका स्कूल था, यह देखकर सुनील ने अपना यह घर किराए पर दे दिया और दोनों उसे नयी जगह में रहने चले गए। सुनील रोज इसी पुराने शहर के अपने ऑफिस आता जाता था।
"माँ, अकेली रहोगी तो  मुझे भी चिंता बनी रहेगी। हमारे साथ चलोगी तो सार-संभाल भी होगी अकेलापन भी नहीं रहेगा।" डरते-डरते इंदू ने माँ से पूछा।
 चुपचाप देखती रही माँ, क्या करती? दोनों बड़ी बेटियों ने कभी पूछा तक नहीं कि माँ क्या खाती हो, कैसे रहती हो, कैसे जीती हो? अपनी करनी खुद सामने आ गई थी।  जिसे कुलच्छन, छरफुक्कन कहकर दिन-रात उलाहने देती रहती थी, वही आज बांहें फैलाए सामने तैयार खड़ी है।

दूसरे शहर में शिफ्ट होने के बाद भी सुनील ऑफिस आते, तो सप्ताह में दो बार माँ से मिल ही जाते थे। एक साल पूरा होते होते माँ ने मन बना लिया और घर को ताला लगाकर वह इंदू के पास आ गई थी। तीन साल वहां रहकर, वापस अपने इस शहर में स्थानांतरण करवा लिया था इंदू ने। अपने घर को सुधारकर सुनील, इंदू और माँ ने एक अच्छी शुरुआत की। माँ के मकान को किराये पर दे दिया था।

माँ के शहर वापसी पर दोनों बहनें अपने परिवार सहित मिलने आई थीं। दोनों की दो-दो प्यारी बेटियों पर अपना प्रेम बरसाया था इंदू ने। माँ तो बेटियों को देखकर, कुछ अनमनी हो गई थीं। 

"माँ, अब इंदू के भी बाल-बच्चा होने वाला है। तुम यहीं रहोगी या अपने पुराने घर वापस जाओगी?" दोनों बहनों का मंतव्य पुराने घर को लेकर था।

"जब मुझे जरूरत थी तो इंदू और छोटे दामाद जी ने हर कदम साथ दिया। अब आगे मेरा भी तो कुछ फर्ज है इसके लिए, आज तक तो सिर्फ दोष ही दिया है सबने इसको।" कहती हुई माँ ने आगे अपना पक्ष साफ किया, "पुराने घर का किराया बैंक में जमा होता है और तुम्हारे पिताजी की पेंशन मैं घर में देती हूँ। अभी मुझे अपने घर के बारे में कुछ निर्णय लेना जरूरी नहीं लगता।" बाद का वातावरण उतना प्रेममय नहीं रहा।
कभी-कभार वे दोनों माँ का हालचाल फोन से पूछ लिया करतीं। 

"मम्मी, ओ मम्मी! नानी से बोलो ना कि सारे गुब्बारे वह ना फुलाएं। मैं और दीपक आधे-आधे फुला सकते हैं ना।" आठ साल के रोशन ने इंदू को झिंझोडते हुए कहा।
"दीपक नहीं, भैया कहो रोशन।"  इंदू ने अपने बेटे को डाँट लगाई।
"सिर्फ चार मिनट बड़ा है वो, भैया क्यों बोलूंँ?" कहता हुआ दीपक बाहर भाग गया।
"शादी की सालगिरह मुबारक हो मैडम इंदू जी।" गुलाब का एक फूल, उसके बालों में लगाते हुए सुनील ने कहा। 
"इंदू ...या छरफुक्कन?" शरारत से हँसती हुई इंदू ने कहा।
"वह तो शादी की बात करने तुम्हारे घर आने से पहले ही, तुमने खुद मेरे ऑफिस पहुंँचकर मुझसे बातें की थीं। पहली बार सुना था यह शब्द मैंने तुम्हारे मुंँह से। यदि तुम छरफुक्कन हो, तो ऐसी छरफुक्कन पत्नी भगवान हर जन्म में मुझे दें।" कहते हुए सुनील ने उसका माथा चूम लिया।

 तभी बाहर गुब्बारे के फूटने की आवाज आई। दीपक और रोशन तालियाँ बजाते हुए कह रहे थे, "बहुत ज्यादा फुलाया था आपने नानी। बेचारा फुग्गा फूट ही गया।" 
इंदू और  सुनील देख रहे थे, माँ भी उनकी तालियों के साथ तालियाँ बजाकर हँस रही थीं।


*******************

बुधवार, 26 नवंबर 2025

1121 2122 1121 2122पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 
फ़िलबदीह - 54
दूसरा चरण 


1121 2122. 1121 2122

पड़ा राहों में था पत्थर, बना अब  वो देवता है 
ये जो दूरी तय की उसने, यही उसकी साधना है।।1।।

न समझ सके जो दिल को, न सुने जो मौन भाषा
पड़े बोलना सभी कुछ, तो ये रिश्ता खोखला है।।2।।

सुनो, बरसों बाद घर में, कहीं कुछ हुई है हलचल 
बना छज्जे पे नया जो, वो बया का घोंसला है।।3।।

कभी नभ वो छू के आता, डुबकी कभी लगाता
कभी फूल सा लजाता, ये तो मन ही बावरा है।।4।।

चलो, गाँव ढूंढ आएं, ये शहर भी छान आएं
यहां आदमी भरे हैं, जो मनुज था, लापता है।।5।।

है निराली खूब दुनिया, करे प्रेम का दिखावा 
जरा मन में झांक देखो, तो वहां ज़हर भरा है।।6।।

*********

शर्मिला चौहान

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

कहानी - हस्तांतरण

कहानी - हस्तांतरण 

"बिट्टी, जा भाग कर नाउन काकी को बुला ला। सब सुहागनें आ गई हैं, काकी आए तो आलता-महावर से शुरुआत करें।" अम्माँ का आदेश मिला और भानु साइकिल लेकर गली के दूसरे छोर पर नजर आने लगी।

 सुरती काकी, जिसे पूरा गांव उसके नाम, पेशे से ही बुलाता था। सारे गांव के शादी ब्याह, व्रत-त्यौहार, छठी-बरहों, गौरैया-सुहागिन सभी का ठेका अपने नाजुक कंधों पर लिए सुरती, आबाल-वृद्ध की काकी बनी घूमती थी। इस घर तो दादी के समय से ही काकी आती-जाती थी।  उम्र में बहुत छोटी रही होगी, अपनी बुआ के साथ आया करती थी। बुआ का हाथ पकड़ कर उन्होंने अपने इस काम की जानकारी, बोलने का ढंग, तीज-त्योहारों के सामानों की सब जानकारी ले ली थी। 

गांव में ब्याही गई और देखते ही देखते दो साल में दो बच्चों की मां बन गई थी काकी। अम्माँ बताती थीं कि उसी की कमाई से उसका घर चलता था वरना उसका घरवाला तो बस बैठे बिठाए खाता, घूमता और घर में खाट तोड़ता पड़ा रहता।

बड़ी दीदी की शादी में तो सुरती काकी ने मंडप का सारा काम संभाल लिया था। चालीस-पैंतालीस की उम्र में बीस का उत्साह लिए, काकी हर ओर नज़र आती थी।  
"जिज्जी, आम की लकड़ी उपले सब धर दिए हैं किनारे से, हल्दी का शगुन कर लो तो हल्दी कूट-छानकर तैयार कर दूंगी।"  सूपा को रंगती,  टोकरी और कलश के सजावट के लिए रंग-बिरंगे चावल-जौ सुखाती सुरती, सारे नेगाचार जानती थी। कोहबर लिखने वालियों को वह सुंदर, पुरानी नमूने भी बताती जाती थी।

"काकी मैं ज्यादा हल्दी नहीं लगवाऊंगी, मुझे पसंद नहीं है।" बड़ी दीदी ने कहा और सुरती काकी ने अपना वाक् पिटारा खोल दिया। 
"कैसी बातें करती हो बिटिया! हल्दी मल कर लगाने से तो दुल्हन का रंग निखरता है, दप-दप दमकती है दुल्हन।" एक बार शुरू हुआ कि बंद होने का नाम नहीं लेता था काकी हल्दी पुराण।
"इस छोटी बच्ची को साथ-साथ लिए घूमती हो सुरती, बच्ची है थक जाती होगी।" सुरती काकी के साथ पाँच-छह  साल की दुबली-पतली,  सांवली सी लड़की अलसाई-अलसाई सी चिपके रहती।
"अरे जिज्जी, इसके महतारी-बाप बड़े शहर में कामकाज करने गए हैं, अब हम ना देखें तो कौन देखेगा इसको?" अपनी पोती सलोनी के उलझे बाल सुलझाती बोली थी सुरती काकी।
"बेटा-बहू क्या काम करते हैं बड़े शहर में?" अम्माँ ने पूछ लिया।
"बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें, सड़क, पुलिया सब काम में मजदूरी करते हैं दोनों। कहते हैं, पैसा जमा करके लौट आएंगे। अब छोकरी को साथ कहां-कहां भटकाते फिरेंगे तो मेरे साथ है। इसे अपना काम भी तो सिखाऊंगी जिज्जी! आगे आने वाले टाइम में बड़ी पूछ रहेगी इस काम की। अभी तो इस बड़े गांव में, मैं एक ही हूँ नउनिया।" हंसते हुए वह अपने काम पर गर्व करती थी।

"सो तो है सुरती, तेरी बिटिया को सिखाया तो वह अपनी ससुराल में अपना काम निभाती है। अब बहू नहीं तो पोती तेरे साथ है।" अम्माँ भी उसके काम की प्रशंसक ही थीं। जिस घर काम हो, सुरती आरंभ से अंत तक प्रेम से अपना काम करने, उस घर से जुड़ जाती। कामकाज के लिए ऐसे लोगों की सख़्त ज़रूरत होती है जो अपनापन और जिम्मेदारी से संबल देते खड़े रहें।

हरे मंडप के लिए बांस, आम की पत्ती लाना, बताशे की पुड़िया बांधना, हर दिन बन्नी गीत के लिए बुलौवा दे आना, ढोलक को धूप दिखाना, दरी बिछाना उठाना और सुहागिनों की कौंछ भरवा कर उनके पैरों में हल्दी महावर लगाना, सुरती काकी का हर शादी ब्याह में काम रहता था।  महावर क्या लगाती काकी मानो पैरों की मालिश ही कर देती थी। पहले पैरों को पोंछकर घुटने के नीचे से तलुवों तक दबाती  फिर हथेलियां में हल्दी मलकर पैरों पर लगाती। हल्दी जब सूख जाए तब महावर भरती थी काकी। 

महावर के नमूने भी बड़े सुंदर बनाती थी वो। एड़ी से चौड़ी लकीरें पंजों तक खींचती फिर लकड़ी से उंगलियों पर पत्ती, आम के डिजाइन बनाती, बीच में गोल टीका उसमें बारीक नमूना भर देती मजाल है कि महावर फैल जाए। उससे महावर लगवा कर औरतें महावर की कटोरी को प्रणाम करतीं और सुरती को नेग दक्षिणा  देतीं। आशीर्वाद की झड़ी फूल जैसे बिखर जाती थी सुरती के पान रचे होठों से। 

बड़ी दीदी की शादी में उनको नेग रस्म के लिए मंडप में लाना ले जाना, लोहे का छल्ला आंचल से बांधे रखना, हर वक्त उनका पल्लू संभालना काकी ने खूब निभाया। छांव बनी बड़ी दीदी के आगे पीछे रहती थी सुरती काकी। इन सबके बीच वह सलोनी का भी ध्यान रखती, उसे खिला-पिला कर घर में सुला आती थी।
जाते हुए अपने घर वाले के लिए कुछ खाना बंद कर ले जाती थी सुरती। चाहे खुद खाए, ना खाए सलोनी और घर वाले के पेट की बड़ी चिंता रहती थी उसे। 

"बहुत ध्यान रखती हो घर वाले का भी सुरती, समय पर खाना दे आती हो। सुबह जाकर झटपट चाय रोटी बनाती हो। रात भर यहां नाच गाने में चाय पानी देना-लेना करती हो, कैसे कर लेती हो सब?" अम्माँ सुरती काकी के गुण और स्वभाव की जी भर प्रशंसा करती थीं।
"जिज्जी, दिन रात घर में पड़े रहते हैं, कई-कई दिनों काम पर नहीं जाते, खाते और सोते रहते हैं जिज्जी। क्या करूं, जानती हूं कि उनके रहते मैं सुहागन हूँ। नाउन का काम करती हूँ सुहागन ना रहूं तो काम नहीं मिलेगा मुझे इसीलिए अपने खाने-पीने से भी ज्यादा उनके खाने-पीने की सोचती हूंँ।" ये कैसी विडम्बना, कैसा चलन उस आदमी के लिए, जो काम न काज करे, ऊपर से मारे-पीटे भी, उसको जिंदा रखने के लिए उसकी घरवाली चिंतित रहती है क्योंकि उसका सुहागन रहना उसके धंधे,उसके काम की मांग थी।

बड़ी दीदी के ब्याह की पूरे रिश्तेदारी में खूब बड़ाई हुई और "सुरती नाउन" तो लोगों के दिलों दिमाग पर छा गई थी। 
"सुरती को हमारे बेटे की शादी में ले आना मीरा, खूब संभालती है काम।" छतरपुर से आई ताई बोल गईं।
"अगले महीने गुड्डू का मुंडन है, अब पहले पोते का मुंडन है तो तीन दिनों का कार्यक्रम रखना है। आप सब आना और हो तो सुरती को ले आना।" बड़ी बुआ जी जाते-जाते बोल गईं। 
क्या लगती थी सुरती उनकी? बस आदमी का काम बोलता है और उससे ज्यादा उसका काम प्यारा होता है दूसरों को।

बड़ी दीदी के पगफेरे, पहली वट सावित्री, करवा चौथ सब में अम्माँ सुहाग का सामान भेजती और सुरती काकी से पूछ कर सारी पिटारे भरवातीं। 
पहली जचकी के लिए दीदी मायके आई और सुरती ने सारी जिम्मेदारी ले ली। जच्चा-बच्चा की मालिश, नहलाना, धूनी सेंक, सब समय पर करती। साथ सलोनी भी मुटुर-मुटुर देखा करती थी।
"बिटिया, आलू मटर सब मत खाना। बादिक होता है मुन्ने का पेट फूल जाएगा।" छोटे शीबू को नहलाते हुए काकी ने कही। 
 "गजब हो काकी! आलता-महावर, हल्दी-तेल से लेकर सुपाच्य-गरिष्ठ भोजन में भी मास्टरी है क्या?" दीदी हँसती थी।
"मास्टरी का बिटिया, समय का खेल है यही सब सिखा देता है वरना मैं तो हूँ अंगूठा छाप।" कहते हुए काकी ने सलोनी से पानी की धार छोड़ने कहा।
"इस लड़की को भी अंगूठा छाप बनाओगी क्या काकी?  सारा दिन चिपकाए घूमती रहती हो।" दीदी ने आंखें तरेरकर पूछा था। 
"नहीं बिटिया दो में पढ़ती है ये। सुबह से बारह बजे तक पाठशाला जाती है ना, इसे दस-बारह तो पढ़ाना है। इसकी बुआ को सात तक पढ़ाया था मैंने।" अपनी बेटी की याद करके उसकी आंखों की कोरों से पानी छलक गया था।

सवा महीने में कुआं पूजन, बारसा के बाद भी काकी, दीदी और मुन्ना की मालिश करने आया करती थी। कभी-कभी अम्मा की पिंडलियों में तेल लगाकर दबा देती, तो कभी बालों में तेल लगा देती। बड़ी दीदी मुन्ने को लेकर ससुराल जाने वाली थी तो उन्होंने अपनी ओर से एक सुंदर बनारसी साड़ी काकी को दिया।
"कैसी सुंदर, सुनहरे किनारी की साड़ी है बिट्टी। कच्चे आम का रंग, नाचते मोर की बुनावट, लगता है बस देखते ही रहूँ। अब इस बुढ़ापे में इतनी बनठन कर कहाँ जाऊंगी बिट्टी? तुम कहो तो तुमसे मिलने तुम्हारे ससुराल आऊंगी, जिज्जी के साथ।" साड़ी पर हाथ फेरते प्रेम और अपनेपन के सागर में डूब गई थी सुरती काकी।

बड़ी दीदी के चले जाने के बाद अम्माँ ने सेर-सीधा, सुहाग का सामान, जच्चा-बच्चा के सेवा-जतन के धन्यवाद स्वरूप रुपए और सोने के कान के बुंदे, सुरती काकी को दिए।
"जिज्जी, इतनी बड़ी चीज कैसे ले लूं मैं? बिटिया मेरी भी तो है, बचपन से देखा है तो इतनी कीमत ले लूं तेल पानी की?" सुरती काकी ने हाथ जोड़ लिए थे।
"नहीं सुरती, यह कोई कीमत नहीं।  तुम्हारे काम के लिए बरसों से हमारा घर ऋणी है। तुम्हारी सेवा प्रेम का कोई मोल नहीं। अब यह बुंदे इस सलोनी को पहना देना।"  सुरती काकी बुंदों को देख रही थी। लाल और मोती की लटकन, गजब की कारीगरी थी बुंदों में।

समय की चाल समरूप कदम से बढ़ती ही जा रही थी। बड़ी दीदी अपने परिवार, मुन्ना में मगन हो गई थीं। नौकरी के लिए भानु को शहर जाना पड़ा और अम्माँ- पिताजी घर पर रह गए। सामान बांधकर जब भानु रेलवे स्टेशन के लिए निकली, तो सामने सुरती काकी भागी-भागी आई। 
"छोटी बिट्टी, तेल कढा कर लाई हूँ। हफ्ते-दो हफ्ते में बालों की जड़ों पर लगा लिया करना। घने मुलायम बाल रहेंगे वरना शहरों में तो बाल ऐसे रुखे हो जाते हैं जैसे हमारी बहू के हो गए हैं।" अब भानु को हँसी आ गई। बिल्डिंगों के लिए चूना-गारा ढोने वाली बहू के बाल देखकर, नौकरी करने के लिए जाने वाली भानु के बालों के लिए तेल बनाकर लाने वाली सुरती काकी, थी ना बेजोड़।
"ठीक है काकी, जब अगली बार आऊंगी तब फिर से बना कर दे देना।" तेल की शीशी लेते हुए भानु पिताजी के साथ रिक्शे पर बैठ गई।
"शादी-ब्याह करोगी तो एड़ी हमसे ही रंगवाना छोटी बिट्टी। हमारे हाथ की हल्दी-महावर चटक लगता है।" अपने बिजनेस को भूलती नहीं थी काकी। काकी के साथ खड़ी सलोनी ने भी हाथ हिलाया। अब वह भी दस  साल की हो रही थी।

शहर की व्यस्तता, नौकरी की दौड़ाभागी में भानु भी भागने लगी थी। बीच-बीच में अम्माँ-पिताजी आते, एकाध सप्ताह रहकर चले जाते। अम्माँ को तसल्ली थी कि आसपास के लोग अच्छे और परिवार वाले हैं। हाँ, काकी तेल देना कभी नहीं भूलती थी। 
नौकरी को दो साल होने आए और भानु के ही विभाग में काम करने वाले विजय से उसकी जान पहचान बढ़ी। दोनों परिवारों की सहमति और बात से, रिश्ता पक्का हो गया। इस बीच अम्माँ की चिट्ठी आई कि सुरती काकी विधवा हो गई है और अब वह अपनी पोती को लेकर बेटा-बहू के पास जा रही है। 
"ओह!" भानु उदास हो गई थी। सुरती काकी के काम में उसका सुहागन होना ही उसके काम का आधार था। सामने उसकी शादी थी और काकी का यह समाचार बहुत दुखद था।

विजय और उसके परिवार के जोर देने पर इसी शहर में भानु का विवाह हुआ। बड़ी दीदी का परिवार, सारे रिश्तेदार, गांव के कुछ लोग यहीं आ गए थे। इस शहर में नाउन का काम कोई जानता ही नहीं था। यहां तो हर काम खुद करने का चलन था, तब सब घर वाले सुरती काकी की बहुत याद कर रहे थे।
बुआ जी की बहू ने सुरती काकी का काम संभाला, सबको आलता-महावर लगाया। सभी सुरती काकी के महावर, उसके स्वभाव, उसके पैरों की मालिश के हुनर और हल्दी लगाने की बहुत प्रशंसा करते रहे।

 "मम्मी, आप तैयार नहीं हुईं अब तक!  दीदी को मंडप में पूजा के लिए ले जाना है ना।" भानु को ढूंढता उसका बेटा विनीत कमरे में आया।
 भानु ने चौंकते हुए कहा," अरे हां बेटा, मैं तो इस पुराने एल्बम में ही डूब गई थी। रस्मों को देखने के लिए एल्बम उठाया, तेरे पापा और मेरी शादी का एल्बम है। देख, कैसा फैशन था तब!" कुर्सी पर से उठती हुई भानु हंँसने लगी। सामने अपने पति विजय को तैयार होकर आते देख, वह जल्दी से तैयार होने चली गई।
"लड़के वाले जरा पुराने विचार के लगते हैं रे भानु। उनको मंडप में पूरी विधि-रीतियां करवानी है लगता। कह रहे थे उनकी तरफ नाउन, धोबन सब तैयार हैं।" गहनों और भारी साड़ी से लदी-फदी बड़ी दीदी, भानु की ओर बढ़ते हुए बोली।
" दीदी, मेरी शादी में तो कोई नाउन मिली नहीं थी उस शहर में, अब यहां डेस्टिनेशन वेडिंग में कहां से मिल गए सब इनको।" भानु को आश्चर्य हुआ।
"आजकल लोग अपनी पुरानी रीति-नेगाचार को  करने में खुश होते हैं भानु इसीलिए इन बड़े-बड़े डेस्टिनेशन होटल, रिसोर्ट के पास पंडित, पूजा का सामान, नाउन धोबन सबकी व्यवस्था रहती है। यदि जरूरत हो तो ये उन्हें बुला देते हैं।" बड़ी दीदी ने अपना अनुभव बताया।

सब मंडप में जमा हुए तो सिर पर पल्ला लिए, लाल चुनरी, सिंदूर, महावर, कलाई भर चूड़ियां पहने एक प्रौढ़ महिला और एक युवती आकर नीचे बैठ गईं। प्रौढ़ा ने मंडप का कलश ठीक किया, आम की ताजी पत्तियां लगाई, छोटा सिलबट्टा लाकर रख दिया। 
 दीपक में तेल भरा और कहने लगी," जिज्जी, किसी सुहागन से दीपक जलवा दो और आप सब महावर लगवा लो। कौंछ में देने के लिए चावल, हल्दी-सुपारी साथ लाए हो क्या जिज्जी?" 
भानु और उसकी बड़ी दीदी मंत्र-मुग्ध से सुनते रहे। उसने झट महिलाओं के पैरों में हल्दी मली, घुटने से नीचे तलवे तक दबाकर मालिश करती फिर अपने साथ आई युवती से कहने लगी," चंदा, सबको हल्दी लगा बिटिया। जब सूख जाए तब महावर चटक पकड़ेगा। सुहागिनों की एड़ी चटक रंगना बेटा, कन्याओं को लगाओ तो एडी़ छोड़ देना।" उसका हाथ सधा हुआ चल रहा था। एक पतली लकड़ी से पैरों के किनारों पर छोटे नमूने भी बना रही थी, मजाल कि महावर इधर से उधर फैल जाए।

भानु और उसकी बड़ी दीदी की आंखों के सामने, वर्षों पहले की शादी का दृश्य घूम गया। सहसा, उस युवती चंदा के सिर पर से पल्ला खिसक गया और कानों में लाल मोती की लटकन वाले बुंदे झलकने लगे। भानु ने अपनी बड़ी दीदी की ओर देखा, दोनों की नज़रें मिलीं। स्मृतियों में अम्माँ-पिताजी, अपना गांव, रस्में और सुरती काकी की छबि घूम गई। 
"तुम्हारे कानों के बुंदे बड़े सुंदर हैं, ब्याह के हैं क्या?" युवती की मांग में सिंदूर देखकर भानु ने पूछा।
"जिज्जी, ब्याह में ना लिए थे ये, हमारी दादी की निशानी है जो हमारे पास थी, अब इसे पहना दिया है। जब किसी अच्छे बड़े ब्याह में काम मिलता है तो यही बुंदा पहनती है वरना हम तो नकली के गहने पहन कर जिंदगी चलाने वाले लोग हैं।" प्रौढ़ स्त्री ने अपना काम रोक कर ,भानु की ओर देखकर कहा, "पहले के लोगों में अपनापन था जिज्जी, इसी अपनेपन की निशानी है ये बुंदे।" 

"सुरती काकी भी तो प्राण लुटाती थी सब पर सलोनी। उनकी याद हमेशा आती है। मेरे ब्याह में तो काकी विधवा हो गई थी, बड़ी दीदी के ब्याह में तुम आती थी सुरती काकी के साथ हमारे घर।" भानु कहती गई और सलोनी के साथ चंदा आश्चर्यचकित सुनते गए।
"राम जी की दुनिया है जिज्जी, सुरती दादी आप सबको खूब याद करती थी। अंत तक दुखी थी कि आपकी एड़ी में महावर ना लगा सकी। देखो जिज्जी, आज एक की जगह दो-दो सुरती आपकी बिटिया को महावर लगावेंगे। बिटिया का भाग सुहाग बना रहे, अखंड सुहाग वाली रहे हमारी बिटिया।" सलोनी भावविभोर हो गई।
"हमने भी अपने ब्याह के बाद गांव छोड़ दिया था। इसका बापू  मिट्टी-गारे के काम करते शहर-शहर घूमता।हम दोनों बड़े-बड़े घर बिल्डिंग, मकान और होटलों में भी काम करते। कभी-कभी इन बड़े होटलों में ब्याह की झलक देखने मिल जाती थी। बाहर के गांव से आए लोगों को ब्याह का सामान, पूजा का सामान, रीति-रिवाज का सामान और हम जैसे लोगों की जरूरत होती थी। हमने उन सब बड़े होटल और रिसॉर्ट वालों से को बताया कि हम ऐसा काम गांव में करते थे। देखो, मिट्टी गारे से सने हाथों ने फिर महावर हल्दी को थाम लिया है।" अपनी जिंदगी खोल कर रख दी थी सलोनी ने।

सामने सीढ़ियों से उतरती, पीले रंग के कपड़ों में सजी भानु की बिटिया सिद्धि मंडप में आ रही थी। सलोनी ने नजर भर के बच्ची को देखा, पास ही पड़ा ढोलक उठा लिया और ढोलक की थाप पर गाने लगी।
"सुहाग मांगन जाए, बन्नी पार्वती के पास।
 मैया ऐसो वर दीजो,  गौरी ऐसो वर दीजो,
  जिसके लछमन जैसे भाई, जिसकी कौसल्या सी माई,
 सुहाग मांगन जाए...।।

 सलोनी विभोर होकर ढोलक बजा रही थी। मंडप में उपस्थित सभी महिलाएं उसके संग गीत दोहरा रही थीं, तालियां बजा रही थीं।  सलोनी की बिटिया चंदा, बड़ी कुशलता से सुहागिनों के पैरों में हल्दी महावर रचा रही थी। उसके कानों में झूलते बुंदे, कौशल और संस्कारों के सहज हस्तांतरण के साक्षी थे।

****************

रविवार, 23 नवंबर 2025

कहानी - संतृप्ति

कहानी - संतृप्ति 


सावन-भादों की रिमझिम अब मूसलाधार वर्षा का रूप ले रही थी। इस पूरे क्षेत्र के गांँव वासी, बड़ी संख्या में मंदिर के सामने उपस्थित थे। देवी माता की पाट-जात्रा के बाद, आज रथ और पालकी की शुरुआत का मुहूर्त था। दशहरे के त्यौहार की शुरुआत करीब ढाई महीने पहले से करने की पुरातन परंपरा को, कुशलता पूर्वक निभाने वाला यह आदिवासी बहुल क्षेत्र है। 

डिबडिबी, संगीत मोहरी की थाप में, अपने सुर लगाते सभी देवी जसगीत गा रहे थे। रंग-बिरंगे कपड़े, सिर पर गमछा लपेटे, गले में कौड़ियों की माला, हाथों में रंगी सजी लकड़ी और मोरपंखों से सजे गांववासियों के स्वर देवी माता से प्रार्थना कर रहे थे।

लेही अवतार दाई दुर्गा 
रक्च्छा कर ही हमार दाई दुर्गा।
दाई दंतेश्वरी पैयां परहूंँ तोर 
दाई दंतेश्वरी सरन पढ़हूँ तोर।।

पूजा विधि के बाद मुख्य कारीगर देवा ने तिरपाल से ढंँकी लकड़ियों को प्रणाम किया और सबने मिलकर एक बंद सुरक्षित बड़े कमरे में, लकड़ियांँ रख दीं। इन लकड़ियों का स्पर्श सजीव जान पड़ रहा था। उनकी छालों ने कई सालों के किस्सों को अनुभूत किया था। देवा और उसके चार साथियों को पालकी, रथ यात्रा की तैयारी का काम मिला था। आज लोगों की अपार भीड़ में न जाने क्यों देवा को अपने आजा, गुनवा "बबा" याद आ रहे थे। हरियाली अमावस के दिन देवी मांँ से आशीर्वाद लेकर रथ पालकी बनाने का काम शुरू होता हुआ, अलग-अलग चरणों से गुजरता, यह नवरात्रि में रथ परिक्रमा से पूर्ण होता है। आज भी इस स्थान के राज परिवार इस पूजा का नेतृत्व करते हैं, वर्षों से अपनी परंपरा निभाते चले आ रहे हैं।
लोगों की भीड़ अब कम हो गई थी। सभी लकड़ियों को सुरक्षित रखने के बाद देवा और उसके सभी साथी बैठकर आगे के बारे में विचार करने लगे। 

"रथ डोली बनाए के मौका मिलिस हमर भाग खुल गे।" लकड़ियों को सुरक्षित स्थान पर रखने के बाद हांँफता हुआ बिसनू बोला।
"सही बोलत हस बिसनू। हमर हाथ लगही, हमर जिनगी भर के पुन है।" धनी ने कहा। 
"तै काबर चुप्पे चाप हस रे देवा?" अपने बीच के जवान देवा से उन्होंने पूछा।
"नहीं, मैं सब की बात सुन रहा हूंँ।" फिर सहसा अपनी भाषा बदलते हुए कहा, "तू मन के गोठ सुनत हों कका।"
अब पाँचो कारीगर अपने गांँव की तरफ चलने को तैयार हो गए। अभी शाम होने में देर थी परंतु काले बादलों ने सूरज को अपने पाश में छुपा लिया था। वैसे भी प्राकृतिक संपदा से पूर्ण यह गांँव, हर ऋतु, हर मौसम में अपनी सुंदरता के लिए विख्यात है। मरकत के बिछौने जैसा यह गांँव, जिसमें हाथों से हाथ जोड़े पहाड़ियांँ, उनसे टकराकर कूद-फांँदकर आनेवाली सुगंध भरी हवाएं, इन पहाड़ियों से टकराकर बरस जाने के लिए आतुर मस्त बादलों की टोलियांँ, जगह-जगह से झरते झरनों का जादू, बांँस, महुआ, तेंदू, आम, कटहल, काजू के पेड़ों से घिरा, दुनिया के नक्शे पर जड़ा एक खूबसूरत नगीना है यह गांँव।

अभी उन्होंने पैदल चलना शुरू ही किया था कि बिजली चमकने लगी। आसपास के पेड़ों से टकराकर तेज हवाएं बहने लगीं और पेड़ों पर पंछी डरते हुए चुपचाप अपने-अपने घोसलों में घुस गए थे। सहसा, बड़ी सी बिजली कौंधी और उसकी चमक में देवा को अपने बबा का मुस्कुराता हुआ चेहरा, क्षितिज पर दिखाई देने लगा।

झुर्रियों वाला सुंदर चेहरा, सर पर गमछा, छोटी-छोटी मूंँछ, छोटी उगी दाढ़ी, बीड़ी से पीले पड़े दांँतों वाली मुस्कुराहट, कानों में बारी, गले में धागे में बंँधा लकड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा।
 "बबा।" देवा के मुँह से निकला और अगले ही क्षण दूर-दूर तक आकाश में कुछ भी नहीं था। उसके बबा, उसकी जिंदगी के आधार थे, उसके गुरु और भाग्य विधाता। वे प्रकृति के इस विराट स्वरूप में अपना अस्तित्व दिखाकर, उसे आशीर्वाद और बधाई देने आए थे। आज उनकी अतृप्त इच्छा पूरी हुई थी।
क्षितिज की उस चमक में विलीन होते बबा, उसकी स्मृतियों में स्पष्ट होते गए। अपनी उम्र के दस वर्ष तक का उनका साथ, आज भी देवा के पैंतीस वर्ष की आयु का स्वर्णिम काल है। गुनवा बबा के इकलौते बेटे दुकालू का, वह इकलौता वंशज है। उसके बबा उसे प्राणों से भी ज्यादा प्यार करते थे।

 अंग्रेजों की गुलामी में अपना बचपन बिताने वाले उसके बबा, यानी गुनवा स्वतंत्रता-संग्राम के जलते दीपक को देखने का साक्षी था। अंँग्रेजों के अत्याचार, उनकी रंगभेद, उनकी घृणा भोगने के बाद एक सशक्त सरकार के लिए, इस बड़े आदिवासी बहुल क्षेत्र के राजा ने अपनी स्वीकृति दी थी। जैसे-जैसे गुनवा युवा होता गया वैसे-वैसे अपनी कलाकारी के लिए प्रसिद्ध होते गया। लकड़ी लेकर बैठता तो उसे तराश कर, सजीव साकार रूप देता।  सबसे पहले उसने कुलदेवी माँ मोहिनी का चेहरा तराशा था, लगा माता ने उस चेहरे में प्रवेश कर लिया हो। सजीव बोलती आँखें, कोरों पर से छलकता स्नेह का सागर, अधखुली पलकें, माथे पर एक और नेत्र जो बंद है, कानों में कुंडल-बाली, गले में हार। इतनी बारीक खुदाई से उकेरा था लकड़ी पर शक्ति की प्रतिकृति को। गांँव भर ने उस चेहरे को साक्षात देवी का अंश मानकर, मडिया बनाकर वहांँ उसकी स्थापना की। आज भी वह मडिया शक्ति और भक्ति से पूजी जाती है।

बबा, एक ऐसे कारीगर जिन्हें अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने कार्य से मुख मोड़ लेना पड़ा था। उन्होंने गांँव के हर बच्चे और जवान में अपना यह गुण रोपने का प्रयास किया। वे इस पारंपरिक कला और कारीगरी को जन-जन तक पहुंँचाना चाहते थे। वह अपने साथ देवा को जंगल ले जाया करते, कई लकड़ियों की पहचान कराना, छालों और लकड़ियों का स्पर्श करके उनके बारे में बहुत सी बातों की जानकारी दिया करते थे। कम उम्र में ही देवा ने लकड़ियों के रूपों, उनके गुण उनके टिकाऊपन को समझ लिया था।
"आज अब्बड पानी बरसत हे, कोन जाने रात भर गिरही का?" पानी भरे गड्ढे में पैर छपकाते हुए धनी बोला।
"आज देवी-देवता घलोक खुस हें, गुनवा बबा के आत्मा तृप्त होही।" देवा के पिता के हमउम्र जीतन काका ने कहा।
उत्तर में देवा ने दोनों हाथ जोड़ लिए। अभी भी सूर्यास्त नहीं हुआ था परंतु सूर्य को ढांँककर बदलियों ने रात्रि का ऐलान कर दिया था। 

आज भी बबा की याद देवा की राह को प्रकाशित करती है। स्वयं अनपढ़, अशिक्षित होने के बावजूद उन्होंने देवा में पढ़ने-लिखने, काम सीखने की ललक उत्पन्न की थी। याद है उसे, सरकारी पाठशाला में दाखिला के लिए बबा ही लेकर गए थे। 
"ये लड़का तोर का लागथे बाबा?" गुरु जी ने पूछा था।
"का बताओं गुरजी, ए मोर पोता है, मोर आसरा  मोर सब कुछ है गुरजी।" कहा था बबा ने। 
"एकर माँ-बाप नहीं आइन?" गुरूजी ने प्रश्न किया।
एकटक नीचे देखते रहे बबा फिर बोले, "एकर दाई-ददा सब मिहीच हों गुरजी। बाप ला कोई बात के होस नई रहे, दाई बपरी एकर जलम के बाद मर गिस।"  कम शब्दों में जिंदगी की किताब खोल दी थी बबा ने।
बबा के साथ रहकर देवा ने पाठशाला की पढ़ाई की। वह उनके साथ ही जंगल जाता, कंदमूल, फल जमा करता और उनके अनुसार लकड़ियों के टुकड़े उठाता तो कभी-कभी लकड़ियाँ काटता भी और घर के आंँगन तक उठा लाता। उसके बबा हस्त विहीन थे परंतु उनके सपने, उनकी इच्छाएं अभी भी पंँख लगाए उड़ा करती थीं ।
एक लकड़ी के टुकड़े को देवा ने रिंदा किया, उसे सूरज का आकार दिया, तेल पॉलिश करके उसे चमकदार बनाकर और बबा को दिखाया। 

"कतेक सुग्घर बनीस बेटा, मोर सिखावन तै समझ ले हस। झाड़ पेड़, नदी तलाव, चंदा सूरज, भूइयां, हमर देवी-देवता हैं। झाड़ के लकड़ी काटबे, झाड़ काटे के जरूरत नो हे।" खुश होकर समझाया था उन्होंने।
उन्हीं के आशीर्वाद से देवा ने गांँव में आठवीं तक और दो साल पास के छोटे से शहर में दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की थी। उसे गांँव के बाहर के जीवन का अंदाजा आ गया था। बबा तो नहीं थे परंतु उनकी सीख दस साल की उम्र में ही उसने समझ ली थी।

"गुनवा बबा ला बहुत मान मिलत रहिस। हमर पुराना राजा, बबा ला बोलात रहिन। ओकर हाथ के बने मूर्ति,  जिनिस ला अपन घर में, राज दरबार में सजात रहिन, जानत हो तुमन।" जीतन ने सभी को जानकारी दी।
जीतन, जो गुनवा बबा के बेटे दुकालू का हमउम्र था उसने बबा को अपना गुरु मानकर लकड़ी की कारीगरी उनसे सीखी थी।
देवा के जेहन में अपने घर के बरामदे में लटकी, पुरानी श्वेत श्याम तस्वीर वाली फ्रेम कौंध गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजा जी के साथ बबा की थी यह। 
 "जात्रा के रथ, देवी दाई के मुख, पालकी सब मिहिच बनाए रहौं। दू-तीन मितान संगी रहिन, हमार राजा खुश हो गये रहिन।"  बाबा हर दिन फोटो निहारते थे।
"राजा जी के महल में फोटो वाला आए रिहीस, मोर संग फोटो खैंचे रहिन राजा जी। धोती, साल गमछा दे रहिन मोला।" उस फोटो फ्रेम के ऊपर हाथ फिराते हुए बबा, दूर-दूर तक अपने इतिहास में डूबते जाते थे।
आदिवासी बहुल क्षेत्र का इतिहास भी इन्हीं की तरह दबा-छुपा रहा है। स्वतंत्रता के पहले से राज परिवार की जो परंपरा यहाँ है वह गांँववासियों, आदिवासियों के लिए आज भी सम्मान की बात है। बबा बताते थे कि उस समय जो राजा था वह आदिवासी जनमानस का देव था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस क्षेत्र के विकास के लिए, लोगों की भलाई के लिए, इसे केंद्र की सरकार में मिला देने की स्वीकृति राजा ने दी थी परंतु जंगली जीवन जीते लोगों का शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा, पक्की सड़कें, मुख्य धारा में शामिल होने का सपना, सपना ही रह गया।
राजाजी आदिवासियों के उत्थान के लिए सरकारी नियमों में बदलाव चाहते थे। बाहर के लोग आकर इन लोगों की जमीनों पर अधिकार जमाने लगे और प्रकृति का दोहन करने लगे इसलिए राजाजी को यह सब पसंद नहीं था पूरा गांँव उनके समर्थन में खड़ा था।

 आदिवासी जनमानस की बुलंद आवाज़ें केंद्र सरकार तक पहुंचने लगीं कि अब आदिवासी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने लगे थे। पैसेवालों की शक्ति इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने में जुटी थी। घोर आंतरिक विरोध का, सीधे-सादे, निश्छल लोग शिकार होने लगे।
 अचानक एक रात राजमहल पर आक्रमण हुआ नकाबपोशों ने राजा के सिपाहियों को मार दिया और राजा की भी हत्या कर दी। उस समय उनका पुत्र शहर में शिक्षा प्राप्त कर रहा था। 

समय के साथ सरकारी शिकंजा कसता रहा और राजाओं की दौलत सरकारी नियंत्रण में आ गई। कुछ सालों की कसाकसी में, आदिवासियों का जीवन बदतर होता गया। उनके घर द्वार, खेत-खलिहान, वन्य एवं खनिज संपदा पर  बाहरी लोगों की नज़रें थीं। 
"फिरंगी मन कोड़ा मारत रहिन, अपन सरकार के मनखे पेट में लात मारथें। हमर अन्न-धन, मुर्गी तीतरी, फल-फूल, लकड़ी ला ले जात रहिन।" बबा को स्वतंत्रता का यह रूप बिल्कुल पसंद नहीं था।

फिर इन क्षेत्रों के शूर भील गोंड युवाओं ने खुलकर विरोध करना शुरू किया। राज परिवार की शक्ति घट गई थी वह सिर्फ नाम मात्र को अब राज परिवार रह गए थे फिर भी गांँव वालों की मांँग पर उनकी सहमति हमेशा रही। एक खुला युद्ध अब स्वतंत्र भारत में था। पिछड़े, आदिवासी, जनजातियों के अधिकारों और उन्हें दबाने वाली सरकार के बीच का युद्ध। कई लोगों को जबरदस्ती जेल में ठूंँस दिया गया। लड़कियों और औरतों पर अपने ही लोगों ने अत्याचार किए थे। गांँव की त्रासदी नासूर बनती जा रही थी और अब गुनवा को भी अपना जीवन खोखला लगने लगा था। अपने बेटे की शराब की लत, दिनभर आवारा सा घूमना, पड़े रहना और अपना हुनर उसे ना सीखा पाने का दुख भी वह अपनी छाती में समेटे घूमता रहता था गुनवा।

चलते-चलते जब जीतन कका थक कर रूक गए, तब सारे लोग भी बरसाती, छाता ढांके उनके आसपास खड़े हो गए।
"कल से में मोटरसाइकिल ले आहूं कका, तैं थक जाथस।"  देवा ने पिता तुल्य जीतन को सांत्वना दी।
"तोर सब गुन सभाव तोर बबा जैसन हवे रे देवा। जात्रा ला चालू रखे बर वो अपन जमीन बेच दे रहिस।" बबा के साथ बहुत सारा समय बिताए जीतन काका ने बताया।
इस बात का जिक्र तो देव के पिता दुकालू ने भी कई बार किया था। वह हमेशा कहते थे कि जमीन बेचकर यह पूजा पालकी, पाट जात्रा करने का शौक डोकरे को है। आदिवासी मान्यता और परंपरा की यह  जात्रा, रथ परिक्रमा हमेशा चलती रहे, इसकी जिम्मेदारी बबा ने अपने कंधों पर ले ली थी। पूजा का पहला मान राजपरिवार के वंशजों को ही दिया गया था।

 नवरात्र के नौ दिनों में पूरे गांँव में परिक्रमा की जाती। आदिवासी क्षेत्र से जुड़े सभी गांँववासी इसमें शामिल होते। राजा के वंशज पूजा की शुरुआत करते मुंडा बाजा, संगीत मोहड़ी, झांझ, नगाड़ा की लय जाप पर झूमते गाते, ध्वजा उठाते सभी परिक्रमा करते।
एक बरस, जब छठवें दिन की पालकी जात्रा गाजे-बाजे के साथ निकली, ना जाने कहाँ से  विद्रोहियों का दल सामने आ गया। यह वही असंतुष्ट आदिवासी युवा थे जो सरकार का विरोध करते-करते ना जाने कब अपनी परंपराओं के भी विरोधी हो गए थे। सबके चेहरे कपड़ों से ढँके थे। पालकी में लगी सोने-चांँदी की मूठें, तलवार, माता की ध्वजा दंड, जो भी था वह निकालने लगे। गुनवा सामने आकर खड़ा हो गया।
रथ के सामने दोनों हाथ फैलाकर वह उस शक्ति का संरक्षण कर रहा था जिसके इशारों से यह दुनिया चलती है। उसके पीछे उसके कुछ साथी कारीगर भी आकर खड़े हो गए। विद्रोहियों ने हटने का आदेश दिया इस बीच पुलिस के चार जवान आ गए। विद्रोहियों और पुलिस के बीच आक्रमण-प्रत्याक्रमण हुए। गांँव वाले सुरक्षित जगह में जाकर छुप गए थे। विद्रोहियों ने पुलिस की बंदूके छीनकर, दो पुलिस वालों को मार गिराया और अब पालकी की ओर बढ़ते हुए वह गुनवा को सावधान करने लगे।
"अबे, सामने से हट साला। राजा के नौकर हस तेहा।" वो पालकी की ओर बढ़ रहे थे और गुनवा दृढ़ता से दोनों हाथ दाएं-बाएं फैलाए खड़ा था।
"मोर परान चले जाएं, मैं पालकी नहीं देहुं।" कहते हुए अटल खड़े गुनवा का चेहरा, विश्वास से दमक रहा था।
विद्रोह की ज्वाला धधक रही थी और आदमी को जानवर बना दिया था। दोनों ओर से दो लोग आगे बढ़ते रहे, हाथ फैलाए गुनवा बाबा के बाजू में पहुंँचकर खड़े हो गए। एक क्षण उन्होंने कुछ नारा लगाया और फरसे से दोनों तरफ की भुजाएं काट डालीं। गुनवा बाबा पीड़ा से चीखते हुए गिर पड़े, लोगों में हाहाकार मच गया। देवी माता की पालकी, इसमें से लगे सोने-चांदी के मूंठ, पादुका सब कुछ लूट कर वह ले गए। तड़पते हुए गुनवा ने माता की पालकी को लुटते हुए देखा, जो उसके जीवन का वह घाव था जो शायद मृत्यु तक नासूर बना सड़ता रहा।
इस घटना के बाद गुनवा बबा मौन हो गए। आदिवासियों को अपना भविष्य अंधकार में डूबा नजर आने लगा था। बाबा ने अपने ही आंगन में बच्चों और जवानों को लकड़ी पर काम करना, लकड़ियांँ तराशना, आकार बनाना सीखने लगे। उन्होंने अपने बेटे दुकालू का विवाह पास गांँव की सतरूपा से कर दिया। सतरूपा अच्छी लड़की थी उसने इस उजड़े झोपड़ी नुमा मकान को, घर बनाने की पूरी कोशिश की। बाबा तन्मयता से बच्चों-जवानों को, काठ प्रतिमा बनाना सिखाते थे। हाथ तो नहीं थे परंतु उनकी बोली, उनकी आंँखों का तजुर्बा और उनके अनुभव से बच्चे सीखते थे।

सतरूपा के गर्भ में देवा आया और गुनवा बाबा के सपनों को पंँख लग गए। 
"नोनी होही चाहे बाबू, ओला लकड़ी के काम सीखाहूं।" उनकी बात सुनकर उनका बेटा दुकालू ठठाकर हंँसने लगा था।
"मोला नहीं सीखा पाइस डोकरा, मोर लइका ला सिखाही कहथे।" सतरूपा पति की बात से दुखी हो गई थी।
अभी परीक्षाओं का अंत नहीं हुआ था। ईश्वर की लीला ऐसी थी कि देवा ने इस दुनिया में प्रवेश किया और उसके रोने की आवाज सुनने के कुछ ही देर बाद, उसकी मांँ सतरूपा दुनिया से चली गई। एक बार फिर दुनिया, घर-आंँगन सब सूना हो गया था गुनवा बबा का। दुकालू तो वैसे ही घर से मतलब नहीं रखता था अब पूरी तरह से स्वच्छंद होकर दिनभर देसी दारू के ठीहे पर बैठा रहता। चावल और महुआ की दारू पीकर मस्त पड़े आदमी को छोटे बच्चे और बूढ़े बाप, किसी की कोई चिंता नहीं थी।

जंँगल, आदिवासियों के मांँ-बाप होते हैं। कंदमूल, फल-फूल, महुआ, आंवला, कटहल का इंतजाम करते थे बबा। उनकी खेती का टुकड़ा, आसपास के लोग जोत-बो देते, इससे दो समय का भात मिल जाता था। यह धरती मांँ कभी किसी को भूख नहीं मरने देती और धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता गया। आसपास देखता गया, सीखता गया, समझता गया और उसको अपनाता भी गया। दस साल अपने साथ रखकर इस भीड़भाड़ वाली दुनिया में, अपने आप को संभालने का तौर तरीका सिखा गए थे उसको गुनवा बबा। आज वह अपने आजा की तरह बेहतरीन कारीगर है। उसकी बनाई लकड़ी की प्रतिमाएं, दीवारों पर लगाने वाली सुंदर कलाकृतियांँ, शहरों में पसंद की जाती हैं।

कारीगरों का यह समूह, अब गांँव के मुख्य रास्ते पर आ गया था। वर्षा ने भी अपनी तेजी कम कर दी थी। पक्की साफ सुथरी सड़कें, खंँभों पर चमकते बल्बों की रोशनी, सुंदर सी पाठशाला, सभी के लिए शौचालय की व्यवस्था, कितना बदल गया था उनका यह गांँव?  इसी बदलाव के इंतजार में कितने प्राणों ने अपनी आहुतियांँ दी थीं।
"चलो संगवारी कल मिलबो, इहीच जगा में।" एक-दूसरे को जोहारते वो अपने घरों की ओर बढ़ गए।
"जीतन कका, तैं मोर मोटरसाइकिल में जाबै।" देवा ने फिर से उन्हें याद दिलाया और अपने घर का रास्ता पकड़ लिया।
"आपने सबके साथ पूजा की। नए राजा जी ने आपके हाथों में नारियल दिया था पिताजी। आप इस साल पाट जात्रा की पालकी बनाने वाले हो ना?" देवा के बेटा-बेटी उससे लिपट गए और उसकी पत्नी मुस्कुरा रही थी। 
"हांँ बेटा, आज देवी माता खुश है। आज हमारे बबा की आत्मा भी खुश है, तृप्त हो गए वो। जो काम सालों साल गुनवा बबा ने किया, आज वापस उनके इसी घर में वह आया है।" अपने सामने फ्रेम में लगी उस श्वेत-श्याम और कुछ पीली पड़ी तस्वीर में मुस्कुराते बबा को देखकर देवा ने हाथ जोड़ लिए और आंँखें बंद कर लीं। कोने के खाट पर पड़े दुकालू ने करवट बदली, उठ कर बैठा और आज पहली बार उसने अपने बाप की फोटो के आगे हाथ जोड़ा था।

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

कहानी - छाले

कहानी - छाले


ऊपर की मंजिलों से नीचे तक, कचरे के दो-दो बड़ी टंकियों जैसे डिब्बों को उतारती हुई लछमी हांफ गई थी। बिल्डिंग के किनारे डिब्बों को धकेल कर, वही थोड़े देर के लिए सुस्ताने बैठ गई। 
"इतनी बड़ी सोसायटी ट्रक भर कचरा रोज निकलता है यहां, पर इनका दिल चींटी मक्खी से भी छोटा है। कहते हैं लिफ्ट का उपयोग मत करो, पूरे लिफ्ट में बास फैल जाती है। अब क्या करें कूड़ा भी तो इन्हीं का फैलाया हुआ है।"

कमर में खोंसी गुटके की पूड़ी निकाली, हथेली में थोड़ा झड़ाया और वापस पुड़िया कमर में खोंसी ली। हथेली के गुटके को जरा अंगूठे से घसकर, खैनी का आनंद लेती लछमी फिर से उठ खड़ी हुई तभी घंटा गाड़ी की आवाज आने लगी। 
"अरी ओ लछमी आंटी! जब गाड़ी चली जाएगी तब लाएगी क्या कचरे का डिब्बा।" मुरली ने आवाज लगाई।
"खींच के लाने में टैम लगता है ना छोकरे,  तू जवान मैं आधी बूढ़ी। एक है क्या हमारी ताकत।" लछमी ने पूरी शक्ति से खींचते हुए डिब्बों को घंटा गाड़ी तक पहुंचा दिया था।
"बीस-बाइस  मंजिल की बिल्डिंग से कचरा उतारने में बड़ी ताकत लगती है।" वंदू ने डिब्बे को घसीटकर गाड़ी के पास रखते हुए कहा। 
"अब सोसाइटी वालों को कुछ व्यवस्था करनी ही चाहिए, नहीं तो मुश्किल हो जाएगी।" लछमी अभी भी हांफ रही थी।

हाथ मुंह धो कर सब ने अपने साथ लाया नाश्ता निकाल लिया। 
"लक्ष्मी नाश्ता के बाद सीढियों को झाड़ू कर दे, फिर तेरे को सोलहवें फ्लोर वाली मैडम ने बुलाया है।"  इस सफाई दल का स्वयं नियुक्त मैनेजर भूषण ने लक्ष्मी से कहा।
"कौन, वह जो नए आए हैं फ्लैट में?  मैंने तो आज तक उनकी सूरत भी नहीं देखी। दो महीना हो गया कचरा  बैग में बांधकर रख देते हैं वो लोग।"  लक्ष्मी ने मिठाई का डिब्बा खोलकर सभी के सामने फैला दिया। 
"आज क्या तेरी दिवाली है मवशी?" नई-नई भर्ती हुई बीस साल की सुगंधा बोली।
"अपनी तो रोज दिवाली रहती है। बिल्डिंग के लोग हैं, फल मिठाई लेकर आते हैं पर खाते नहीं। एक-एक दिन खाया, बाकी उठा कर दे देते हैं मेरे को और मेरा तो नाम लछमी है तो मेरी रोज दिवाली है।" लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा।
"अपने घर नहीं ले जाती मौसी घर के लोग कहेंगे मिठाई।" काम करने वाले एक लड़के ने पूछा। 
" नहीं रे, घर में कोई छोटा बच्चा नहीं है। तुम्हारी उमर का एक बेटा है, किसके लिए ले जाऊंगी? तुमको ले जाना है तो लेकर जाओ।" कहती हुई लक्ष्मी ने बची मिठाई उसके हाथ में थमा दिया और उठ खड़ी हुई।

महानगर की इस बड़ी सुंदर सोसायटी की सबसे पुरानी सफाई कर्मचारी है लछमी। थक भी जाती है तो बड़े धैर्य से एक-एक सीढ़ी, लॉबी की खिड़कियों की सलाखें, काँच साफ करने में कमी नहीं करती शायद इसलिए  इस सफाई स्टाफ की वह स्थाई कर्मचारी है। 
झाड़ू पोछा लगाकर एक बार फिर लक्ष्मी ने हाथ मुंह धोया। अपने बैग से कंघी निकाल कर बोल ठीक किया, साड़ी व्यवस्थित की और सोलहवें मंजिल पर आए नए लोगों के फ्लैट की ओर चल पड़ी। घंटी की आवाज बहुत बढ़िया थी ऐसा लगता था जैसे कोई बांसुरी बजा रहा है। इस घर में घंटी बजाने का कभी काम भी नहीं पड़ा था उसे। समय पर अपना कचरा बाहर रख देते थे वो लोग। कचरे में कभी-कभी बाहर से आने वाला खाना, पिज़्ज़ा का डिब्बा रहता था। दरवाजा खुलता है और सामने एक उसी की उमर की औरत खड़ी दिखाई देती है।

"भूषण बोलता था कि मैडम ने मुझे बुलाया है। बोलो मैडम को की लछमी आई है।" लछमी ने उस औरत से कहा। 
"आओ, अंदर आ जाओ।"  दरवाजा पूरा खोलकर वह अंदर चली गई। 
लछमी ने कदम अंदर रखा तो आंखें खुली रह गईं । सुंदर ड्राइंग रूम, हल्के रंग के दो परत वाले परदे, सोफे पर बहुत सुंदर कुशन, दीवारों पर दो बड़ी पेंटिंग लकड़ी की कलाकारी वाला एक टेबल, बड़ा व्यवस्थित साफ सुथरा घर था। एक अच्छे साफ सुथरे घर में घुसने के बाद लछमी को अपने काम की गंदगी का एहसास हुआ। उसने झुककर अपने पैरों को अपने पल्लू से ही पोंछ लिया। 
मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है। अपनी किसी भी कमी को वह जिंदगी भर अपने दिल पर हावी रखता है फिर उसकी कल्पना में हर व्यक्ति, हर स्थान, हर वक्त वह कमी सिर उठाए घूमती है। इस व्यवस्थित बड़े फ्लैट को दो मिनट तक लछमी तौलती रही फिर सामने खड़ी उस औरत से पूछा।

" मैडम नहीं है क्या?  नीचे मेरा और काम है। आगे पीछे सब झाड़ने का है मेरे को।" लछमी इस महानगर की तरह जरा हड़बड़ी में थी। 
"मुझे भी थोड़ा काम है तुमसे। बालकनी की ग्रिल, खिड़कियों के काँच साफ करवाने हैं। चाहे तो तुम कर दो या फिर किसी और को भेज देना।" सामने खड़ी औरत ने बड़ी शालीनता से कहा।
 लछमी अचकचा गई।  मन ही मन उस औरत को इस घर के साथ बिठाने का प्रयास करने लगी। 
अड़तीस-चालीस की  होगी यह औरत।  रंग कान्हा की तरह सांवला या और बहुत सांवला। थोड़ी दबी सी नाक,  भरे-भरे गाल, थोड़ी कुछ ज्यादा ही धंसी हुई पर ठुड्ढी। खिचड़ी से बाल जिसे शायद पार्लर जाकर उसने सैट किया था।  उसके सांवले हाथों में सोने की एक-एक पतली चूड़ी चमक रही थी। गले में चैन, कान और माथा सूना था उसका।
"आजकल बड़े लोगों में टिकली बिंदी लगाने का रिवाज ही नहीं है लगता।" इस बिल्डिंग की सभी औरतों को ऐसे ही देखती थी वह इसीलिए बुदबुदाई।
"नमस्ते मैडम जी।" लछमी ने कहा। इस फ्लैट की सुंदरता को देखकर, सामने खड़ी औरत को इस फ्लैट की मालकिन स्वीकार करना, लछमी के लिए बड़ा कठिन हो रहा था।

"नमस्ते।" उसने उत्तर दिया।
"मैडम जी, दोपहर खाना खाने के बाद एक घंटा आराम करते हैं सब। अपना काम थोड़ा जल्दी निपटाकर मैं कल से आती हूँ।" लछमी ने बताया। 
"ठीक है। अभी नयी हूँ यहां, किसी को पहचानती नहीं। तुम्हारा काम देखा है मैंने इसलिए सोसायटी ऑफिस में फोन करके तुम्हें बुलवाया।"  शांत, धीमा स्वर था उसका।
" ठीक है मैडम जी, कल से दो-तीन दिन रोज दोपहर को आकर काम कर जाऊंगी।" कहती हुई लछमी पलटने लगी। 
"दो दिनों में ही करना, उसके बाद ऑफिस है मेरा।" दरवाजे तक आकर उसने कहा और दरवाजा बंद कर दिया।
उसे दिन लछमी बड़े ऊहापोह में रही। अपने गोरे हाथों को देखती, जिन पर उसके पति ने माणिक-नीलम जड़े थे, अपने कचरे से सने पैरों को देखती जो कचरे से  लिपटे रहने के बाद भी झाड़ पोंछ दो तो संगमरमर की मूरत से बन जाते थे। एक क्षण के लिए उसको अपने रंग रूप पर घमंड आ गया ज्यों ही हाथों के नीले लाल निशाने पर वापस नजर पड़ी, सारा घमंड कपूर की भांति उड़ गया और उसके अगले ही क्षण इस शरीर से भाग जाना चाहती थी वो। 

शाम को सब्जी-भाजी खरीदते हुए लछमी घर पहुंची। सुबह ही नगर पालिका के नल से, आंगन में पड़े सब ड्रम भर जाती थी वो। सब्जी का थैला खूंटी पर लटका कर, तार पर रखी अपनी साड़ी उठा ली। टिन के पतरों से बने बाथरूम में घुस गई। रोज शाम को नहाते समय अपने हाथों को साबुन से रगड़ डालती थी वह। इन हाथों से सारे जमाने की गंदगी उठाती, भरती और ढोती थी। फल-सब्जियों के छिलके, खाली डिब्बे, पुराने टूटे-फूटे बर्तन-खिलौने, जूठन खाना यहां तक तो दिल सह जाता परंतु जब इन बिल्डिंगों में रहने वाली पढ़ी लिखी औरतें अपने माहवारी के पैड्स खुले कचरे में फेंक देती तो उसे उबकाई आ जाती थी। मन ही मन सोचती,  "ये औरतें कब दूसरी औरतों का दर्द समझेंगीं?" 

कोरोना काल के बाद मास्क और हाथों के दास्ताने का चलन मानो वरदान साबित हो गया था लछमी और अन्य सफाई कर्मियों के लिए। 
नहा कर जल्दी से सब्जी-भाजी काट ली। एक तरफ भात का पानी चढ़ाया और लहसुन अदरक कुचलने लगी। सब्जी छौंक ही रही थी कि उसका पति विनोद आ गया। 
"क्या पका रही है घास फूस? ये ले मुर्गी पका, एकदम मस्त तेरे जैसी कड़क मसाला।" कहता हुआ बेहयाई से हँसता, पॉलिथीन में बंधा मांस उसकी ओर उछाल दिया।
" तेरा लच्छन, तेरा बेटा भी सीख गया है। आजकल कभी कमाता है तो दारू की दुकान पर जाता है।" बेटे की शिकायत शराबी बाप से बताते हुए, उसकी आवाज माध्यम हो गई थी। 

इस चॉल की सभी औरतों का एक-सा हाल है। औरतें, सुबह नगर-निगम के नल से पानी भरकर घर को जीवन देने की शुरुआत करती हैं। बच्चों को नहला-धुलाकर, चाय-रोटी खिलाकर, उनका बस्ता अपने कंधों पर लाद कर  स्कूल छोड़कर आती हैं। उन्हें सुकून रहता है कि जो काम उन्होंने नहीं किया या अधूरा छोड़ दिया था, उनके बच्चे उसे पूरा करेंगे। रोटी पानी तैयार करके, मर्दों का डिब्बा बांधकर, वे अपने-अपने काम के लिए निकल जाती हैं।
कोई अस्पताल में साफ-सफाई करती है, कचरा झाड़ती-बुहारती है, सुपर मार्केट में सामान तौलती है, बच्चों की देखभाल करती है, किसी को लोगों के घरों में बर्तन-पोंछा करना है, कोई भोजन केंद्र में जाकर दिनभर रोटियां बनती है तो कोई स्कूल बस से बच्चों को लाने ले जाने का काम करती है।

"आते समय भेल, चना मसाला लाई थी ना।"  हाथ पर धोकर, अपनी थैली से शराब की बोतल निकाल कर विनोद तैयार था। 
"आज उधर से आई नहीं मैं । रोड का काम चालू था इसलिए दूसरे रास्ते से आई।"  उसकी और बिना देखे ही लछमी ने उत्तर दिया।
"कितनी हरामखोर औरत है!  गड्ढा खुदा था तो गिरकर मर जाती, खाली हाथ क्यों आई साली।" कहता हुआ  पास पड़ी चप्पल लछमी की पीठ पर बरसाने लगा। 
" नहीं रहता मेरे पास रोज पैसा, तेरे चखने के लिए। महीने में एक बार तनख्वाह मिलती है। रोज मैं इतनी दूर पैदल आती-जाती हूँ बस भी नहीं लेती, तेरा दारू चखना रोज आता है घर में।"  सिसक रही थी इस घर की लक्ष्मी। 
"तेरा लाया खाना भी जहर है। मुर्गा पका और जा मेरे सामने से मर जा कहीं।" कहता हुआ वह बोतल लेकर घर के बाहर चला गया।

सोलह साल की उम्र से इस आदमी का ऐसा बर्ताव झेल रही लछमी ने, अब बयालीस पार कर लिए थे। अपने काम के दम पर बेटी को बारहवीं और बेटे को दसवीं तक पढ़ाया था उसने। खाना ढांक कर रख दी और अंदर कमरे में लेट गई। दिनभर कचरा, गंदगी को खींचते, भरते, सफाई करते और रात को इस गंदगी से दो-चार होते, जिंदगी बीत रही थी उसकी।
 खाट पर लेटते ही सारा शरीर अकड़ने लगा। मांसपेशियों को आराम मिला परंतु पीठ की ताजा मार, चादर के ताने-बाने से खुरच रही थी। हृदय की बर्फ गर्म होकर पिघलने लगी। अच्छा हुआ सोनाली को बारहवीं पढ़ाकर ब्याहा, अब खुद काम करती है और घर में उसकी इज्जत भी होती है। अपनी बेटी के सुख की छांव में, अपना दुख भूलना चाहती थी वह।

सुबह जब नींद खुली तो आंगन में दो थाली, दो गिलास, खाली बोतल दुर्गंध फैल रहे थे। आज का दिन इस गंदगी को साफ करने से शुरू हुआ। चाय बनाई और अनमने मन से रात की रोटी का टुकड़ा खा लिया। नहा धोकर आले में बैठे गणेश जी को नमस्कार किया। उनसे भी कुछ मांगना छोड़ दिया था उसने। 
आज अनमनी सी कचरा समेटकर, पूरी सोसाइटी का झाड़ू बुहारू किया और बोतल में पानी भर  बैठकर पीने लगी। 
"लछमी मावशी, आना हमारे साथ खा ले।"  एक लड़की ने बुलाया। 
"आज मैं सुबह ही खाकर आई रे ! तुम लोग खाओ।" कह कर लछमी सोलहवें माले के, फ्लैट वाली मैडम के काम के लिए चल पड़ी।
 "ऐ वंदू,  मेरे को देर हो जाएगी तो लॉबी को एक बार पोंछा मार देना आज।" कहती हुई लछमी चली गई।

"मैडम, कागज और पुराना सूती कपड़ा दे दो कांच अच्छे से साफ होगा।" कहती हुई लछमी बालकनी की ओर जाने लगी फिर अचानक रुक गई। 
"मैडम अंदर जाऊं ना।" सभ्यता से उसने पूछा।
"हाँ-हांँ,  मैं अकेली ही रहती हूंँ इस घर में।"  मुस्कुराते हुए वह बोल रही थी।
 धूल के कण, पानी के छीटों के साथ मिलकर काँच की पारदर्शिता को कम कर रहे थे। आकाश, बाहर का पेड़ सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था लगता था जैसे सारे रंग बदल गए हैं। काँच के ऊपर जमी धूल की परत हटी और दुनिया अपने यथार्थ रूप से संजी-संवरी दिखाई देने लगी।
लक्ष्मी का मन इसी बात पर अटका था कि "मैं अकेली ही रहती हूँ।" चालीस की तो वह जरूर होगी, शादी ब्याह नहीं किया क्या? अलग रहती है? क्या बच्चे हैं या नहीं?  एक काँच साफ करती तब तक दूसरा धुंधला काँच सामने आ जाता। लगातार गर्द की परत को साफ करते उसे दो घंटे हो गए।
"आओ चाय पी लो।" मैडम जी ने आवाज दी। 
"मैडम जी, नीचे जाकर पी लूंगी।" आज तक उसे घर पर बिठाकर किसी ने चाय नहीं पिलाई थी। 
"बाथरूम में जाकर हाथ मुंह धो लो, चाय पी लो। कितना काम किया आज सुबह से तुमने।"  कितना प्यारा मीठा बोलती है मैडम जी। बड़ी नौकरी में लगती है फिर भी घमंड नहीं है।

 मैडम सोफे पर बैठी, चाय बिस्किट टेबल पर था। लक्ष्मी नीचे बैठ गई।
 "कुर्सी पर बैठ जाओ आराम से लछमी!" उन्होंने कहा।
" नहीं नहीं मैडम जी। यही ठीक हूंँ।" कहते हुए लक्ष्मी चाय सुड़कने लगी। 
लछमी की सुंदरता, गोरा रंग और काम करने की ईमानदारी से सोफे पर बैठी औरत प्रभावित थी।
"हाथों और पीठ पर इतने दाग कैसे हैं लछमी?" मैडम ने पूछा।
" हमारे मोहल्ले में खूब मच्छर है मैडम जी, मेरे को काटते हैं तो दाग बड़े दिनों रहता है।" अपनी पीठ पर आंचल फैला कर दागों को ढांकती हुई, नीचे नज़रें झुकाए लछमी बोली थी।

दाग शरीर में दिखते हैं, चोट हृदय और मस्तिष्क झेलता है। कुछ दाग दिखाई देते हैं और कुछ हृदय में घर बसाकर, अंदर ही अंदर पूरे शरीर को अपना घर बना लेते हैं। लछमी में नज़र उठाने का साहस नहीं था और मैडम जी की दृष्टि उन चोटों में अपना अतीत ढूंढने निकल गई थी।
 विकास और फैशन से दूर प्रकृति के साथ सोने जागने वाले गांव की पैदाइश थी कुसुम। कक्षा आठवीं में पूरे जिले में प्रथम आने पर उसे शहर के हाई स्कूल में पढ़ाने का फैसला लिया गया। सरकार की ओर से शुल्क माफी, हॉस्टल और पुस्तकों की व्यवस्था सब मिल गई। आदिवासी पिछड़े क्षेत्र से आने वाली मेधावी बच्ची थी कुसुम। वैसे भी गांव में इन दिनों विद्रोह की आग भड़काकर, नक्सल नाम का बम सभी तरफ भड़क रहा था। पहाड़ों के पत्थरों, बारिश में झूमते बादलों और गांव की उपजाऊ मिट्टी के रंगों से मेल खाती थी कुसुम। गांव में तो सभी उसी के रंग के थे परंतु शहर के हॉस्टल में गोरी त्वचा के आकर्षण और बल का एहसास हुआ था उसे।

लिखना-पढ़ना सबसे बेहतर परंतु प्रेजेंटेशन, प्रतियोगिताओं में उसे पीछे रखा जाता था। यह सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं रहा, वहां से तो इस अंतर का झरना प्रवाहित हुआ और फिर आज तक वह इस धारा में बहती हुई अपनी जिंदगी को ठिठक कर देखती है। ग्रेजुएशन के बाद कुसुम ने प्रतियोगी परीक्षाओं को मात देने का लक्ष्य निर्धारित किया था। 
"नौकरी की क्या जरूरत है कुसुम? शादी ब्याह करके अपनी घर गृहस्थी संभालना औरत का काम है।" गांव जाने पर माँ यही बोलती थी। गांव एकदम अपनी ही चाल में चल रहा था। दुनिया की ऊंची उड़ानों से बेखबर लोग, दो जून भात-साग का ही जश्न मना लेते।  पच्चीस साल की अनब्याही वही सबसे बड़ी लड़की थी इस गांव की।

" राज्य स्तरीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा, एक ही बार में उत्तीर्ण करने वाली इस गांव की ही नहीं समाज और इस राज्य की होनहार लड़की है कुसुम।"  गांव की पंचायत में कुसुम की सफलता को हाथों हाथ उठा लिया।
इस शासकीय नौकरी की ट्रेनिंग के दौरान कुसुम की जान पहचान अपनी ही तरह के कई लोगों से हुई। इनमें से कुछ लोग उसके करीब भी आए, जिसमें एक युवक यश था। लंच और लेक्चर के दौरान दोनों मिलते और अपने विचारों को बांटने का यही समय मिलता था। पोस्टिंग हुई और दोनों अलग-अलग शहरों में चले गए। अब उनके बीच फोन में कभी-कभी बात होती थी और बातों का सिलसिला शायद जीवनभर के साथ में बदल जाता कि तभी कुसुम को यश के रवैये में हल्के से रूखेपन का एहसास होने लगा। किसी भी निर्णय के पहले वह स्वयं सब कुछ देख समझ लेना चाहती थी इसलिए एक दिन यश से मिलने उसके शहर पहुंच गई।

 सरकारी क्वार्टर का पता तो तो उसके पास था ही वहां जाकर पता चला कि वह दो दिनों से अपने घर गया है, उसकी सगाई हो रही है। उसी के सामने की बेंच पर बैठकर खूब रोई थी वह। उसके बुद्धि उसके पद पर फिर त्वचा के रंग और खूबसूरती ने विजय पा ली थी। कई बार अपने स्टाफ के फुसफुसाने से भी उसे दुख और ग्लानि होती थी। एक दक्ष, ईमानदार अधिकारी इस समाज की संकीर्ण मनोवृत्ति का शिकार थी। 
लछमी के खांसने की आवाज आई तो कुसुम हड़बड़ा गई। उसकी चोटों को घूरती हुई वापस अपने वर्तमान में आ गई। 

"चलती हूँ मैडम जी, रोज थोड़ा काम करके खत्म करूंगी।"  लछमी जाने लगी।
"रुको।"  कहती हुई कुसुम ने कुछ फल और पचास उसके हाथों में रख दिए।
 हाथ जोड़कर नमस्कार करती लछमी चली गई। इस फ्लैट और मैडम जी के बारे में जितना सोचती, उतना उलझती जाती। शक्ल-सूरत से ही तो कमतर है मैडम जी, स्वभाव, गुण और नौकरी तो बहुत अच्छी है। 
अब काम करने और कभी सब्जी भाजी ला देने के लिए, अक्सर लछमी इस घर में आने-जाने लगी। वीकेंड पर हमेशा साफ-सफाई कर, कुछ अतिरिक्त काम कर देती। इस प्रकार दो स्त्रियों के मन के द्वार खुलने लगे थे।

"मेरे बेटे का ब्याह तय कर दिया है मैडम जी। अगले महीने ब्याह करना है।"  एक दिन लछमी ने बताया। "अच्छा!  बहुत बढ़िया, क्या करता है तुम्हारा बेटा?"   कुसुम ने पूछा।
" दसवीं फेल हो गया था मैडम जी, आगे पढ़ा ही नहीं। कभी कुछ काम करता है, कभी कुछ करता है नहीं तो घूमता रहता है। कुछ पक्का नहीं है मैडम जी। बहू आएगी तब अपनी जिम्मेदारी समझ लेगा।" बातें करती लछमी ने, सारे फर्नीचर आज साफ पोंछ के चमका दिए थे।
" मैडम जी, यह आपकी फोटो है ना ? आपके साथ बच्चा कौन है?" एक छोटे फोटोफ्रेम में कुसुम की पुरानी पुरानी तस्वीर एक छोटे बच्चों के साथ देखकर लछमी ने पूछा। 
"मेरा बेटा था।" उस  फ्रेम को अपने आंचल से पोछती हुई कुसुम ने कहा। 
 "आपका बेटा था, अब नहीं है क्या मैडम जी?" लछमी उसे एकटक देख रही थी।
" बहुत प्यार था ना वह, भगवान ने वापस बुला लिया अपने पास।" कलेजे को चीरकर निकली आवाज से कांप गई थी लछमी। हाथ पकड़ लिया लछमी ने उसका। अभी कोई पद नहीं, कोई डिग्री नहीं, कोई भेद नहीं सिर्फ दो नारियां एक सतह पर खड़ीं, एक दूसरे को आधार दे रही थीं। समय ने जो घाव दिए थे वो अब छाले बन गए थे,
 उस पर मानो मलहम लगा रही थीं। छालों में पका मवाद फैलने लगा था। मवाद का बह जाना‌ अच्छा होता है वरना घाव की टीस जीते जी मार देती है।

सोफे पर बैठ गई थी मैडम जी। लछमी पानी ले आई। आज वह भूल गई थी कि वह इस घर में नौकर की हैसियत से आई है और एक अधिकारी महिला ने अपने सामने लगे 'अधिकारी' को भुला दिया। पानी का एक घूंट अंदर गया और बहुत सी बातें, बहुत सी यादें दर्द बन कर बाहर निकलने लगी। 
"विवाह हुआ था मेरा और तीन साल बाद ही हम अलग हो गए। शीनू पैदा हुआ, डेढ़ साल की उम्र में ही वह हमें छोड़कर चला गया। उसके हृदय में कुछ समस्या थी, वह ठीक नहीं हो पाया।" गहरी सांस लेकर मैडम जी फिर बोली,  "शीनू के बाद हम साथ रहे ही नहीं सकते थे। वही हमारा सेतु था वरना हम दोनों जीवन के दो किनारे थे। मैं कमाती, घर संभालती, रिश्तेदारियां निभाती और वह सिर्फ खर्च करते। मेरे रंग रूप पर दिन-रात गलियां बरसाते, मेरे पद को गाली देते। परिवार वालों ने ही शादी तय की थी पर किस्मत में शायद यही लिखा था।" आगे कुसुम चुप हो गई इस काम करने वाली स्त्री को क्या बताती कि उसका पति उसके पद और नाम का इस्तेमाल करके लोगों से पैसे भी लिया करता था।

लछमी की ओर देखकर, उसे झिंझोड़ती हुई कुसुम बोली, "शादी के पहले अपने लड़के को जिम्मेदार बनाओ! आने वाली के जीवन का सत्यानाश मत करना लछमी, कभी मत करना।" कुछ देर चुपचाप बैठी रही लछमी फिर चली गई।
 आज वापसी में लछमी बस में चढ़ गई। अपने पैरों को आराम मिलता देख, उसे कमर में खोंसे हुए पैसे निकालने में खुशी हुई। आज शाम को बाप बेटा साथ ही आए।
" मां, आज घास-फूस मत बनाना, अंडा भुर्जी बनाना। बापू लाया है।" कहते हुए उसका बेटा उसे घूरने लगा।
 "आज बाप बेटा साथ में किस बात की खुशी मना रहे हो?" कमर में पल्ला खोंसती लछमी बेटे के सामने तनकर खड़ी थी।
 "आज काम पर गया था तू? जगनू बोला, तू चार दिनों से काम पर जाता ही नहीं है। दारू पिएगा, अंडा भुर्जी खाएगा और अब शादी करेगा।" बिफरती हुई अब अपने पति के सामने  खड़ी हो गई वह।

"तू बनाती है या बापू से बोलूं तेरी पिटाई करने को?" बेटा, बाप की भाषा बोल रहा था।
"सुनी नहीं तू क्या बोल रहा है बेटा।" अपना गिलास भरते हुए लछमी का पति विनोद बोला।
"सुनी ना, पूरी जिंदगी तो सुनी। अभी तक तेरी सुनी, अब तेरे बेटे की सुनूंगी। मैं कमाने जाती हूँ, मैं पैसा लाती हूँ, तुमको बनाकर खिलाती हूँ और अब तेरे साथ यह लड़का भी मेरे को पीटने की बात करने लगा। रुक, सुनती हूँ मैं।"  हाथ में रखे अंडे के पैकेट को जमीन पर पटक दिया लछमी ने। कागज के पैकेट से दुर्गंध फैलाता, सफेद-पीला द्रव बहने लगा जैसे अंदर की ज्वाला बहुत से मलाल लिए बह चली हो।
"साली, तेरी हिम्मत कैसे हुई? रुक, तेरी हड्डी तोड़ता हूँ।" कहता हुआ विनोद चारपाई से उठने लगा।

 पास ही किनारे एक लकड़ी रखी थी। बिजली की फुर्ती से लछमी ने उसे उठा लिया और विनोद को धुनना शुरू कर दिया। 
"मेरी कमाई से घर चलता है, चूल्हा जलता है। तेरे पैसे तो तेरी दारू में उड़ जाते हैं। मुझे मारेगा, मेरी हड्डी तोड़ेगा.. चल आज देखती हूँ मैं, कैसे हड्डी तोड़ता है तू? सीधे पुलिस को बुलाती हूँ। चल, साला हरामी!  तेरी औलाद को भी आज  सुधारती हूँ, मस्ती चढ़ी है उसको भी।"  हांफती हुई लकड़ी लेकर जब मुड़ी तो बेटे को सरपट भागते हुए देखा।
"यह घर मेरे नाम पर है, इसका टैक्स मैं भरती हूँ। बिजली बिल मैं भरती हूँ, मुझे घर से निकालेगा?" 

 विनोद रोता-चिल्लाता, चारपाई पर लोटता रहा, लछमी लकड़ी बरसाती रही। सारे जीवन का हिसाब इतनी जल्दी कैसे पूरा होता? जी भर पीटने के बाद उसने लकड़ी फेंक दी। थोड़ी देर सिर पकड़ कर बैठी रही फिर हाथ पैर धोए।  पेट-पीठ, हाथ-पैरों के गहरे लाल-नीले निशानों को देखती हुई उठी। अपने बाल अच्छे किए और खुद का बनाया हुआ गरम भात थाली में परोस लिया। भात के ऊपर सब्जी डाल ली और पाटे पर बैठ गई। आज खाने में उसे बहुत आनंद आया।  पहली बार उसने अपने हाथ का बना गर्म खाना, खुद पहले खाया था। यह खाना भविष्य के लिए उसे नव ऊर्जा प्रदान कर रहा था।

*****************

सोमवार, 10 नवंबर 2025

2122 2122 212 पर ग़ज़ल

खूबसूरत ग़ज़लों से सजे इस पटल पर आ.अनिल सर एवं सभी साथियों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास।🙏(संशोधित)


फ़िलबदीह  53
दूसरा चरण 
2122  2122  212

ये मनुज जीवन बड़ा उपहार है 
फिर भी मानवता से क्यूँ इंकार है।।1।।

कौन कब बदलेगा नीयत क्या पता
किस समय पर किसको क्या दरकार है।।2।।


घूमता पहने मुखौटा आदमी
हर मुखौटे का अलग किरदार है।।3।।


युद्ध चलते रात दिन उठता धुआँ
विश्व में हर ओर हाहाकार है।।4।।


धीर वसुधा का भी अब तो छूटता
मौन कब तक वो करे मनुहार है।।5।।


खुद मिटा आपस की फैली दूरियां 
प्रेम ही सबसे बड़ा हथियार है।।6।।


भूल मत जन्मा है तू जिस देश में 
कृष्ण राधा का यहां अवतार है।।7।।


***********

शर्मिला चौहान

शनिवार, 8 नवंबर 2025

कहानी - रिश्ते की डोरी

रिश्ते की डोरी" (कहानी) 


वृंदा को गाँव से शहर लाना अब कम मुश्किल था।‌ मुस्कुराते हुए जीवन के तमाम झंझावतों को झेल लेने वाली सत्तर साल की वृंदा ने, पिछले कुछ सालों से जैसे मुस्कुराहट का वह अस्त्र त्याग दिया था।

"अम्माँ, कुछ दिनों के लिए हमारे साथ चलोगी?" वृंदा से बेटी मालिनी ने पूछा।
टकटकी बांँधे वो मालिनी को देखती रही। तभी नातिन वृद्धि ने कहा, "आपको चलना ही होगा नानी।"
मासूम बच्ची के दिल के भाव से विह्वल हो वृंदा ने उसे छाती से लगा लिया।
प्रेम प्रवाह ने हृदय के बंजर में से, एक किस्से के भ्रूण को पनपने का अवसर दिया।

वृंदा सूटकेस में कपड़े रखने लगी और साथ खड़ी वृद्धि नानी की सहायता कर रही थी।
मालिनी अपनी माँ की मनोदशा समझ रही थी।
"अम्माँ, जब आप बोलोगी आपको वापस ले आएंगे।" अम्माँ की साड़ी तह करती मालिनी ने एक सांत्वना दी।
वृंदा हौले से मुस्कुरा दी।

सूती साड़ियों को हर परत, सिलवटों से भरी थी। इन्हीं सिलवटों की परतों में लिपटे जीवन को समतल करने में लगी वृंदा के लिए, अब जीवन के मायने बदल गए थे।

एक पुरानी बनारसी को आलमारी से निकालते वक्त, मानो वक्त थम गया। चढ़ाव में बनारसी न चढ़ा पाने की ग्लानि को, विवाह के पाँच साल बाद मालिनी के बाबूजी ने इस बनारसी साड़ी को उसके हाथों में धरकर दूर किया था। ऐसी साडियाँ सिर्फ तन ढंकने का कपड़ा नहीं होती बल्कि प्रेम और हृदय के भावों से महीन बुनी गई कहानियांँ होती हैं जिन्हें दोहराना, अपने आपको उन प्रेम गलियों में एक बार फिर खुला छोड़ने जैसा होता है।

"नानी, आप हमेशा कॉटन की साड़ी पहनती हो, क्यों?" किशोरी वृद्धि ने प्रश्न किया।
"सूती कपड़े शरीर के लिए बड़े अच्छे होते हैं।‌ पेड़-पौधों से बने होने के कारण, कभी त्वचा पर बुरा प्रभाव नहीं डालते बेटा।" वृंदा की बातों की गहराई में नातिन डूब रही थी और बेटी मालिनी पिछली बातों में।

"अम्माँ, मेरी नौकरी सिंगापुर में लगी है तो मैं अब कभी-कभी ही आ पाऊंगा।" बड़े भैया ने बाबूजी की मृत्यु के एक साल बाद ही अपनी दुनिया सिंगापुर में बसा ली थी।
"अब बड़े भैया तो यहाँ आने से रहे और मेरा रहना भी निश्चित नहीं है अम्माँ, तो घर के दो हिस्से कर लेते हैं। एक में आप रहना दूसरा किराए पर चढ़ा देंगे।" बड़े भैया को किनारा करते देख, छोटा मनोज बोलने लगा।

अम्माँ  ने तो बस चुप्पी साध ली थी। दोनों भाइयों ने जब घर के दो हिस्से किए तो अम्माँ ने कहा- "मालिनी का क्या सोचा तुम लोगों ने, उसे अपने पिता के इस घर से क्या मिलेगा?" 
"दीदी तो अब अपना घर-संसार देखेगी ना अम्माँ।" छोटा बोल पड़ा।
अम्माँ ने अपने गले का हार और कर्णफूल मालिनी को दे दिया।
"मुझे इन गहनों की जरूरत नहीं है अम्माँ, आपके और बाबूजी के आशीर्वाद से अच्छा घर-द्वार है मेरा।" मालिनी ने भीगी आँखों से कहा था।

घर के दो हिस्से हुए और आँगन में खड़ा, बुजुर्ग की तरह अपनी छाया देता वह नीम का पेड़ जिसे दादी ने रोपा था, बँटवारे के आड़े आ रहा था।
"इतने सोच-विचार की क्या बात है अम्माँ, एक पेड़ ही तो है फिर लगा लेंगे।" दोनों बेटों की बात सुनकर वृंदा का मौन, मुखर हो गया था।
"हाँ, पेड़ ही तो है तुम्हारे लिए यह पर मेरे लिए मेरे सुख-दुख, मेरे जीवन की चढ़ती-उतरती का साथी।" अपने में गुम होती वृंदा अतीत के गलियारों में भटकने लगी थी।
"मेरे आने के बाद तुम्हारी दादी ने रोपा था इसे, मेरे इस घर का हम-उम्र, सखा है मेरा। इसकी डालियों में बँधे झूले पर तुमने नींद ली और आज यह तुम्हारे लिए एक पेड़ रह गया है।" 
बीच से बाउंड्री वॉल बनी और नीम के कराहते अंगों की सिसकियों ने वृंदा को, एक दिन में कई बरसों की बूढ़ी बना दिया। 

बड़ा तो दो-तीन सालों में सप्ताह भर के लिए आता। छोटा, शहर में रहकर भी बहुत कम आ पाता था। सब अपनी-अपनी ज़िंदगी की नाव खेने में लगे थे। वृंदा को लगता कि उसके जहाज से उतरी, बच्चों की इन नावों को अपना किनारा मिल जाए, बस वो हमेशा खुश रहें। आधा घर, हमेशा आधा रह गया।

"काकी, आप कब तक अकेली रहोगी, चली क्यों नहीं जाती अपने बच्चों के पास?" किरायेदार उससे अक्सर पूछा करता।
"अरे बेटा, अब इस बुढ़ापे में अपना घर कहाँ छूटेगा?" वृंदा कह देती परंतु मन ही मन सोचती की बेटों ने उसे कभी रहने के लिए बुलाया ही नहीं। 

 वक्त की झुर्रियों से वृंदा सबल होती गई और उसकी काया निर्बल। एक दिन आँगन से भरी बाल्टी उठाते हुए उसका पैर फिसल गया। किरायेदार ने बच्चों को सूचना दी, छोटा और बहू भागे-भागे आए। अस्पताल में पैर की हड्डी में छोटा फ्रेक्चर बताकर प्लास्टर चढ़ा दिया गया और आराम करने की सलाह दी। 

चार दिनों में ही वृंदा ने बहू के व्यवहार और बोली के बदलते रुख को अनुभूत किया और अपने घर वापस आ गई। किरायेदार, अड़ोसी-पड़ोसियों के सहयोग से किसी तरह वक्त गुज़र गया।

फोन पर सबसे बात हो जाती थी, छोटा दो-चार दिनों में आकर कुछ फल-सब्जी रख जाता। कमजोरी इतनी आ गई थी कि वृंदा को अब खुद के लिए चार रोटियांँ सेंकने की हिम्मत नहीं होती थी।
मालिनी, माँ की हालत समझती थी। उनके अकेलेपन को जानती थी इसीलिए अपनी बेटी वृद्धि को लेकर, माँ को अपने साथ ले जाने आई थी।

"नानी, आप खिड़की वाली सीट पर बैठ जाओ मैं आपके बगल में।" नानी को खुश करने के लिए वृद्धि ने कहा।
"तुम बैठो, मुझे तो ये भागती रेलगाड़ी की खिड़की से देखने में डर लगता है।" वृंदा ने कहा और वृद्धि लपक कर उस सीट पर बैठ गई।

धरती को प्राणवायु देने वाले पेड़ों की कम होती संख्या, खेतों की फसलों में पानी के छिड़काव के लिए जद्दोजहद करते किसान कई दृश्य सामने से गुजरते जा रहे थे। पहले भी रेलयात्राएं की थी वृंदा ने, इस बार बहुत सालों बाद की तो धरती की कम हरीतिमा ने मन को विचलित कर दिया।

"जब मैं ही अपने घर के बुजुर्ग नीम को नहीं बचा पाई तो दुनिया को क्या कह सकती हूँ।" अपने आपसे वृंदा बड़बड़ा रही थी।
स्टेशन से घर पहुँचे तो रात हो गई थी। दामाद और नाती ने दिल खोलकर स्वागत किया। 

सुबह नींद खुली तो वृंदा दरवाजा खोलकर बाहर आ गई। आँगन के दोनों ओर सुंदर गेंदे की क्यारियांँ, एक कोने में लाल रंग के बड़े जासवन का पौधा लगा था। आँगन के दूसरे कोने में जाना-पहचाना पेड़, अपनी ठंडी हवा बिखेरता लहरा रहा था।

"नीम का पेड़।" खुशी से चीख पड़ी वृंदा।
"हाँ अम्माँ, जब घर का नीम पेड़ काट दिया गया था उसी महीने यहाँ हमने नीम का पौधा लगाया था, देखो अब छत को पार कर रहा है।" वृंदा के पीछे खड़ी मालिनी ने बताया।
"आपके लिए हम सबका यह सरप्राइज़ था नानी, कैसा लगा आपको?" नाती-नातिन दोनों ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"बहुत अच्छा लगा बच्चों, ये पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं होते अपने पुरखों, बुजुर्गों के समान होते हैं। मुझे लग रहा है कि अब इस आँगन में तुमने मुझे और अपने नानाजी को जगह दी है।" भावविभोर वृंदा बोलती जा रही थी और अपनी बातें सुनकर नीम और था ज़्यादा झूमने लगा, आज इस परिवार ने उसे रिश्तों की डोर से बाँध जो लिया था।

*********

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

कहानी - सुंदरी

कहानी - सुंदरी


दस-बारह फुट का साधारण पुताई वाला असाधारण कमरा था वो। जहांँ रंगों की विविधता, उसकी दीवारों की छिली छातियों पर पर्दा डालने के लिए प्रयासरत थी। पीले रंग का मद्धम बल्ब कुछ चीजों को रोशन कर रहा था जिनमें से एक थी सुंदरी। पीली रोशनी में उसका प्रौढ़ होता, कुछ भरा-भरा सा शरीर सोने की आभा बिखेर रहा था। चालीस-पैंतालीस में भी नैसर्गिक सौंदर्य से दमकती थी सुंदरी। 

     "ऐ भुल्लन कहांँ मर गया था रे तू!  तेरा नाम ही तेरी मैया ने ऐसा रखा कि जो बुलाए वह खुद सब भूल जाए।" पान से सने अपने लाल होठों से अंगार उगलती सुंदरी ने कहा।
"मरा कहांँ था, तेरे दर पर तो पड़ा था।" ढीला कुर्ता, घेर वाला पजामा पहने, अटपटी सी कहीं-कहीं उगी दाढ़ी पर हाथ फेरते, चालीस साल का दुबला पतला, कंधे तक के पतले-पतले बालों को फैलाए भुल्लन आ गया। उसके लिंग निर्धारण का फैसला जब ईश्वर ही नहीं कर सका तो इस दुनिया की क्या बिसात थी।
    "अरे चौक के बर्तन की दुकान से दो पीतल की दीये लाना है भुल्लन। तेल-बाती सब ले आना वरना एक काम को तीन बार में पूरा करेगा,  वह भी पजामा संभाल-संभाल के।" जोरों से हँसते हुए सुंदरी ने कहा। 
"आज क्या जोगन बन रही है इस कोठे की सुंदरी जो दीपक-बाती की जरूरत पड़ी?" ठुड्डी पर तर्जनी लगाए भुल्लन ने पिचके गालों को सिकोड़ कर, आँखें फैला लीं।
"अब ढलते सूरज को तो दीपक का सहारा लेना ही पड़ता है रे। बताया था ना कि आज का कस्टमर बड़ा अजीब है, उसकी सनक का नतीजा यह कमरा है।" सुंदरी ने पान की पिक, पिकदान में पिच्च से थूक दी। 
"आज तू भी तो सालों बाद बैठी है दीवान पर, क्या ज़माना था तेरा भी बड़े चाहने वाले थे तेरे।" अतीत का सुनहरा पन्ना भुल्लन ने अपनी जुबान से साक्षात दिखा दिया।
सिर हिलाता हुआ भुल्लन, एक थैला लटकाए चौक की ओर दौड़ गया।

बीस-बाइस साल की तीन-चार लड़कियों ने कमरे को सजाना शुरू किया। सुंदरी के कहने के अनुसार कमरा सज गया। कोठे के इस कमरे को सद्गृहस्थ के घर का चोला पहनाया गया। दीवारों पर तिथि का कैलेंडर, दरवाजे पर स्वास्तिक और शुभ चिन्हों को उकेरती लड़कियों को, अपने घरों की धूमिल आकृतियाँ कुछ सजीव सी जान पड़ने लगीं।

"सुनी, तेरा घर कितना याद है तेरे को?" मन्नू ने सुनंदा से पूछा। 
"जितना एक महीने पहले का ग्राहक है। पता नहीं साला क्या पाप किया था कि बचपन में ही बेच दिया! कौन मांँ-बाप बेचते हैं?"  सुनंदा के हृदय की कड़वाहट, जुबान से पूरे कमरे में फैल गई। सद्गृहस्थ कमरा, गालियों की बौछार से कसमसा गया।

"मुझे तो याद है एक तालाब था, जिसके पार पर आम-बेर के पेड़ थे। मंदिर था, जहां मैं और मेरी छोटी बहन खेलते थे। माँ जब भी कपड़े धोने जाती थी हम दोनों उसके साथ जाते थे।" मन्नू की आँखों में डूबने लगी थी सुनंदा आँखों के कोर से तालाब का पानी छलकने लगा था। 
"ये क्या याद हुई? हर गाँव में तालाब, मंदिर और किनारे पेड़ लगे रहते हैं।" सुनंदा ने वातावरण को हल्का किया। 

"यह लाया सब दीया-बाती, तेल और दरवाजे पर चिपकाने का फोटू।" गर्दन और हाथ मटका कर भुल्लन बोला। 
"तुझे तो एक चीज ज्यादा लाने की आदत ही है! पता नहीं भगवान ने तुझे कम क्यों दिया?" ऊपर से नीचे उसे घूरती हुई सुंदरी ने बोला। 
"अरे! अब घर कमरा सजा ली हो तो इस सुंदरी पर भी किरपा कर दो। पैंतालीस की उम्र में तीस का ग्राहक, अंधेर है जमाना भी!  छोकरे को अठारह से पच्चीस तक की इतनी छोकरियों में कोई पसंद नहीं आई।" माथे पर रेखाएं बढ़ाती हुई, वह बड़बड़ा रही थी।

"ऐ मवशी, तू वाईन है वाईन, वो भी ओल्ड! जबरदस्त डिमांड है छोकरे की।" एक आँख दबाती कुमारी बोली।
"बड़ी फटाक-फटाक बोलती है रे ये।  हजार कस्टमर के बाद भी तभी कुमारी है।" सुंदरी के बोलने पर सब हँसने लगे।

बोल तो गई सुंदरी फिर उसने झुकी तिरछी नजरों से कुमारी को देखा। आठ साल पहले अधमरी सी मिली थी रेलवे पुल के नीचे। महीने भर तक तो कमजोरी और बुखार से मूर्छा टूटती फिर अचेत हो जाती।
 डॉक्टर साहब ने उसके गर्भवती होने की पुष्टि की और साथ ही दुनिया भर की विटामिन और खून बढ़ाने की दवाई, गोलियां सब दे गए। सेवा जतन से कुमारी बच तो गई पर भ्रूण पूरे अंकुरण से पहले ही बिखर गया। एक मानसिक रोगी बनकर रह गई थी वह। सभी लड़कियों ने बड़े प्रेम से उसकी सेवा की और फिर वह इस कोठे की एक और सदस्य बन गई। 
"सुंदरी मावशी! यह कोठा तूने बनाया, बसाया ना?" मन्नू ने सुंदरी के जूड़े में मोगरे की लड़ियाँ लगाते हुए पूछा। 
"कोठे तो सजते हैं मन्नू, यह घर परिवार थोड़े ना है कि जिसे बनाया और बसाया जाए।" डूबती सी थकी आवाज में सुंदरी बोली। 


मोगरे की खुशबू नथुनों से घुसने लगी और सुंदरी उसकी महक में गुम होने लगी।  दस साल की उम्र में ना कपड़े पहनने का शऊर ना बाल-कंघी का, दिन भर मोहल्ले के बच्चों में खेलना ही जीवन था उसका। मजदूरों की बस्ती, जो काम जहाँ मिले वहीं ठिकाना बना लेती, बस्ती बसा लेती। 
बाप था, वह जो थी उसके साथ एक औरत थी, माँ तो नहीं थी उसकी। उस औरत का भी अपना एक बच्चा था जो लड़का था, जिसे वह सीने से लगाए रखती। बाप उसके कहे उठता उसके कहे बैठता। 
एक दिन उस औरत ने एक सुंदर छींटदार लहंगा-ब्लाउज लाकर दिया। उसके बालों में तेल चुपड़ा, रिबन बांधकर सुंदर फूल का आकार दिया। पैरों में आलता लगाने लगी। 

"क्या मेरा ब्याह हो रहा है?" अपना साज श्रृंगार देखकर दस साल की बच्ची पूछने लगी। 
"हांँ,  ब्याह ही समझ।" उस औरत ने अपनी टिकली की डिबिया से एक पारदर्शी गुलाबी टिकली, मेन सहित उसके माथे पर चिपका दी। आज उसने अपने गोदी के बच्चे को एक बार भी सीने से नहीं लगाया था। 
उस एक घंटे में  दस साल की बच्ची ने मानो पूरा बचपन जी लिया। उसने आंँचल में बंधे गुड़ की एक डली बच्ची के मुंँह में ठूँस दिया। बच्ची के  मुंँह का गुड़ घुलकर, मुंँह से हृदय तक जीवन की  मिठास फैला रहा था। तैयार करके लड़की का हाथ पकड़े वह बाहर निकलने लगी कि लड़की दौड़कर बरामदे में लगे शीशे के सामने खड़ी हो गई। 

"अब और क्या बाकी रह गया तेरा सोलह सिंगार करके मुँह मीठा करके ही भेज रही हूंँ।" कहती हुई लड़की का हाथ खींचते तेजी से वह गली के बाहर निकल गई। 
उसके गोद का बच्चे को, आज उसके पति यानि उस दस साल की बच्ची के पिता ने संभाल रखा था। मोहल्ले से बाहर गांँव-शहरों की गंदगी ढोता नाला और नाले की दूसरी ओर कुछ खंडहर होते घर, पुराने सामानों से भरा गोदाम जो कबाड़ियों की मिल्कियत थे, ऊंघ रहे थे।

 एक खंडहर के पास वह रुकी, इधर-उधर देखा। साइकिल पर दो आदमी दूर खड़े रुमाल हिला रहे थे। उसने लड़की के कानों में फुसफुसा कर कुछ कहा और उसे वहीं खड़ा करके उन साइकिल वालों के पास चली गई। दस मिनट बाद अपने ब्लाउज में कुछ ठूंसते हुए वह उधर से ही निकल गई और वह दोनों साइकिल सवार लड़की के पास आ गए। 
लड़की ने घबरा कर कदम पीछे किया तो पानी के छोटे गड्ढे में पैर छपक गया। लड़की ने देखा पैरों का महावर पानी की सतह को गुलाबी कर रहा था। उसके पैर का महावर घुल कर पानी को रंगीन बना रहा था और पैरों को रंगहीन। वह कुछ और सोचती तब तक एक आदमी ने अपनी मजबूत हथेली से, उसका चेहरा दबा दिया। कुछ क्षणों तक उसे आसपास की सुध थी फिर एक अनजान जगह में ही वह चेतन हुई।

एक कमरा मानो बित्ते से नाप-नाप कर बनाया हो। मैली-कुचली चादर वाली खाट, छोटा सा गत्तों के टुकड़ों वाला डिब्बा जिस पर एक बोतल, दो गिलास, कुछ चना-चबैना रखा था। इस प्रकार की बोतल से हर मजदूर का बच्चा वाकिफ था। उसके घर के आले, बरामदे के कोनों पर यह उसे सहज मिल जाती थी। कई बार इस बोतल की दवा को अपने गले से गटकने के लिए मजदूर, अपनी बीवी को एक रात के लिए गिरवी भी रखने को राजी रहता था। इतनी ताकतवर दवा है इस बोतल में जो इंसान को शैतान बना दे, राजा को भिखारी और भिखारी को सेठ।

उसने आँखें खोल कर देखा तो मोगरे की माला कलाई में बांधे वह दोनों, बोतल की लाल दवा गिलास में भर रहे थे। मोगरे की सुगंध, उस गंदे अंधेरे से सीलन वाले बदबूदार कमरे में, सांस भर रही थी। कुछ मिनट बाद उस सुगंध को अपने शरीर के पास पाकर वह हड़बड़ा कर उठने लगी। उस सशक्त हथेली ने उन्हीं सुगंध वाले मोगरों से उसकी सांसें रोक दी। वह ना चीख सकती थी ना अपने को छुड़ा सकती थी। मोगरे की सुगंध उसके मस्तिष्क के चेतन, अर्थ चेतन में घुसती चली गई और पैरों का बचा महावर अब उसे गंदी, झिरझिरी चादर को रंगने में लगा था। 

"इतना क्या सोच रही मवशी कोई नवी थोड़े ना है तो धंधे में।" लड़कियों में से सबसे तेज पटाखा जैसे बोलने वाली यह कुमारी थी। 
सफेद साड़ी में लाल ‌चौड़ी किनारी, माथे में सिंदूर का लाल टीका, पाँव में महावर और होठों पर हमेशा की तरह पान की लाली। शीशे में अपने को अपलक देखती रही सुंदरी। 

गृहस्थ कमरे में दीया-बाती का पावित्र्य, अपनी गुण राशि बिखेर रहा था। आज अगरबत्ती की महक में कोई सांसारिक उन्माद नहीं, आत्मा तक रिसने वाला माधुर्य था। मलयागिरी के चंदन में भी तो विषधर लिपटे होते हैं पर वह ईश्वर के माथे पर चढ़ाया जाता है।  विषधर को कंठ के चारों ओर लपेटे विष का पान करने वाले शुभकारी शिव इस नश्वर संसार के आदि, मध्य और अंत हैं। इन स्त्रियों से घृणा करके प्रकृति से मुंँह नहीं मोड़ा जा सकता क्योंकि ये स्वयं प्रकृति हैं।
 
"सुंदरी, आज तू परम सुंदरी लगती है रे! ऐसा रूप ऐसी सुंदरता जिसमें सिर्फ सच्चा श्रृंगार झलकता है सुहागन का सादा श्रृंगार। कोठे पर रहने वाली औरतों का श्रृंगार इस श्रृंगार से बहुत अलग होता है क्योंकि वे इस सादे श्रृंगार को भूल जाती हैं। यहां आने वालों को घरेलू नहीं कुछ अलग बाजारू सौंदर्य लुभाता है।" सोचती हुई सुंदरी अपनी सोच पर झल्ला उठी। 

"एक दिन के ग्राहक के लिए क्या वह इस बाजार के नियम बदल देगी? इतनी सादगी प्रिय थी तो इन लड़कियों को इस दुनिया का तामझाम क्यों सिखाया? बेशर्मी की चादर क्यों ओढ़ाई?" कहते हुए उसने भुल्लन को पुकारा। 
"वह टेलर मास्टर क्या लड़कियों के कपड़े त्यौहार के बाद देगा? यह सब अपनी जात दिखाते हैं, कपड़े मुफ्त में नहीं सीलता वो। उसके पसंद की लड़की मिलती है उसको हर दो-तीन महीने में।" भुल्लन को जाते-जाते जोर से कहा सुंदरी ने।
"तेरे को याद नहीं क्या चार महीने से वह पान वाला अपना बिल ठोकता है, तू पान खाती है पर हिसाब इन लड़कियों को चुकाना पड़ता है।" मुंह बिचकाकर भुल्लन बाहर जाने लगा। 
"तो क्या तू चुकाएगा बिल! काम का ना काज का ढाई मन अनाज का। उस हमीदा के बच्चे की तबीयत खराब है उसकी दवा भी लाना जा।" सुंदरी ने एक और हुकुम दाग दिया।

कैसा संसार है यह? इस गली में आज भी वस्तु विनिमय की प्रथा चालू है। पान, कपड़ों यहां तक की अनाज, फल, सब्जी-भाजी के लिए पैसों की नहीं स्त्री नामक वस्तु का आदान-प्रदान होता है यहां। बड़े अधिकारियों, पुलिस विभाग के लोगों, राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें करने वालों के लिए यहां विशेष सुविधाएं उपलब्ध हैं जिससे इस गली के दरवाजे-खिड़कियां हमेशा खुली रह सकें। 
सामने दरवाजे पर तोरण लगाते भुल्लन को देखकर सुंदरी मुस्कुराई। अपने पैरों में लगी महावर देखने लगी तो मन्नू के धक्के से टेबल पर रखा गिलास लुढ़क गया और  एक बार फिर उसके महावर का रंग पानी में मिलकर बहने लगा। 
"महावर लगाने की किस्मत नहीं लिखी ऊपर वाले ने मेरी। नौटंकी भी करने नहीं देता मेरे को यह।" अपने पैरों को ऊपर सिकोड़ते हुए बड़बड़ा रही थी सुंदरी। 

नीचे गिरा पानी एक बार फिर लाल हो गया था और सुंदरी को उन वादियों में बहा ले चला जिन वादियों में वह गिरती चली गई थी।  संभलने और खड़े होने का कभी समय ही नहीं दिया था वक्त ने उसे। आज भी उसकी देह झुरझुरा जाती है। उस दस साल की बच्ची पर हुए अत्याचारों से, क्या करती बच्ची? एक मांस का लोथड़ा बन पड़ी रहने के सिवाय। उन दोनों ने सप्ताह भर उसे वहीं रखा। खाने के लिए मुर्गी का भुना मांस, पाव रोटी, कभी समोसा देते थे। भूखी, नासमझ, दुखी और कमजोर बच्ची दिन भर में उसे कुतर डालती।
 महावर के रंग का बहाव रुका नहीं। लाल पानी सरकता हुआ पास पड़े पायदान को छूने लगा उसने अब अपनी दो-तीन धाराएं बना ली थीं।
उसके जीवन का बहाव भी कुछ ऐसी ही धाराओं में बंटते-टूटते, अपने साथ लोगों की गंदगी समेटे, महानगर के इस कोठे पर आ गया। अब दस साल की बच्ची ग्यारह की हो चुकी थी। साल भर की दरिंदगी उसके रोम रोम से फूटती थी। रोबदार औरत सामने थी और दो आदमियों के बीच में थी वह बच्ची। 

"क्या नाम है छोकरी तेरा?" भारी आवाज में उसने पूछा। आदमियों के साथ खड़ी बच्ची मौन थी। 
"अरे बहरी गूंगी है क्या? सुनाई नहीं दिया?" वह गुर्राई थी। 
बहते पानी ने पत्थरों से टकराना सीख लिया था और टकराने का परिणाम शरीर के अंग-प्रत्यंग में धब्बे बनकर जड़ा था। 
"नाम याद नहीं। बाप ने कभी किसी नाम से बुलाया नहीं।  माँ पता नहीं कौन थी, जो औरत घर में थी वह साली, हरामखोर, दुश्मन पुकारती थी। मजदूरों के बच्चे कोई 'अरे ओ' बोलते थे कोई जिपरी, कोई सेमडी और कोई कुछ भी। शाला तो गई नहीं की नाम लिखवाती। उसके पहले आपके दरबार में आ गई।" न जाने क्यों, कैसे और कितना बोल गई थी उस दिन वो ग्यारह साल की बच्ची। शायद सरस्वती ने अपना आसन जमा लिया था जुबान पर। 
"बाप रे बाप!  इतनी दबंगई ऐसा तेवर। दिखने में भी सुंदर है। चल, आज से इस कोठे में तुझे तेरा नाम मिलेगा।" उसे दबंग औरत ने खुशी से कहा और बच्ची को अंदर वालों के सुपुर्द कर दिया।

शाम को उसकी रूप राशि बदल गई थी। बालों को थोड़ा कट किया आकार दिया और कपड़ों को भी सुधारा, नाम रखा सुंदरी। एक नए पड़ाव की ओर अब बहाव मुड़ गया था। उस दबंग औरत का नाम "मंगला" था, अच्छी थी। उसने सुंदरी को इस धंधे का गुर  सिखाया। खानपान, दवा-पानी कपड़ों का ध्यान रखती थी वह, तो वही भागने वालियों के लिए चंडालिनी बन जाती थी। 

सुंदरी अपने पहले ही साक्षात्कार से उसके करीब थी और समय के साथ उसकी हर योजना इस कोठे की व्यवस्था, साफ-सफाई, समाज सेवी संस्थाओं की आवाजाही, टीकाकरण सभी में सुंदरी की सलाह महत्वपूर्ण होती गई।
सुंदरी और दूसरी लड़कियों के अतीत से मंगला को कोई मतलब नहीं था बल्कि वह उसे भूलकर आगे जीवन में बढ़ने के लिए कहती। अतीत भला कभी किसी का पीछा छोड़ता है?  वह तो वर्तमान के पीछे गांठ बांधकर चला आता है और भविष्य की ड्योढ़ी पर खड़ा हो जाता है। इस कोठे तक आने की अपनी यात्रा कोई लड़की कैसे भूल सकती थी भला। सभी की अपनी कहानी जिसमें कभी अपनों ने कभी दूसरों ने बेईमानी की थी। हांँ,  इन सभी में एक बात समान थी। जिंदगी में विश्वास नाम का कुछ उनकी डायरी में नोट नहीं था।

फैशन की तरह समय बदलता गया और मंगला की उम्र के साथ सुंदरी का अधिकार बढ़ने लगा। लड़कियों के स्वास्थ्य और पोषण पर अब ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा। सत्ता प्राप्ति के लिए कई बार ऐसी जगह को निशाना बनाया जाता परंतु अब इस कोठे पर सुंदरी ने अठारह साल से कम की लड़कियों के आगमन पर प्रतिबंध लगा दिया था। कई बड़े लोगों के दबाव को भी उसने झेल लिया था। अखबार वालों, फोटोग्राफरों के प्रिय विषय रह चुके इस कोठे पर अब सोच समझकर काम किया जाने लगा था। 

कुछ लड़कियाँ, माँ भी थीं तो छोटे-छोटे बच्चों के खान-पान,  शिक्षा पर ध्यान दिया जाता था। मास्टर जी थे जिन्हें बुलाकर बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था की थी सुंदरी में। कोठी की लड़कियों की चहेती थी यह मालकिन।
बदलते समय के साथ अपने को, अपने आसपास को बदलने में माहिर थी सुंदरी। वह चाहती थी की काम चलता रहे और किसी भी प्रकार का कोई पुलिस केस, कोई अखबार बाजी कभी ना हो। लड़कियां स्वस्थ रहें तभी यह धंधा अच्छे से फल-फूल सकता था पनप सकता था। 
"मवशी, शाम हो रही है वह आएगा।  अभी तू बोल और क्या करना है?" कुमारी ने सुंदरी को झिंझोड़ा।

"सब ठीक है अब तुम लोग आराम करो भुल्लन और मन्नू सामने बैठे रहो, उसके आने की खबर देना।" अपना श्रृंगार और पल्लू ठीक करती सुंदरी ने आदमकद दर्पण में खुद को निहारा।
 सुंदरी का दिल तेजी से धड़क रहा था। इस धंधे में तीस-पैंतीस के बाद तो औरतें सिर्फ झाड़न-पोंछन के काम की रहती हैं, पता नहीं यह कैसा पुरुष है?  पिछले दो सालों से उसने इस कोठे से अपना संपर्क रखा है। पैसों, अनाज-राशन और लड़कियों के व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए लगातार मदद करता रहा है। उसी ने सुंदरी के इस घर में फोन लगवाया था और महीने में एक दो बार बातें किया करता।
जब पहली बार उससे फोन पर बात हुई तो उसने 'प्रणाम' से शुरुआत की थी। इससे पहले उसके भेजे आदमी आकर सामान, पैसे दे जाते थे। 

'प्रणाम' संबोधन तो सपने में भी कोठेवालियां सोच नहीं सकतीं तो वह तुरंत उसका कोई उत्तर नहीं दे पाई थी। कितने विचार कितने प्रश्न ज़हन में थे।  यह लड़का कौन है, क्या कोई बड़ा झांसा देने वाला है, मानसिक रोगी है या बाद में वसूली करने का कोई लंबा प्लान है उसका।
दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है। यहां तो सब छाछ से झुलसे लोग थे, तो सुंदरी ने बहुत प्रकार से पता लगवाया था उसके बारे में। पुलिस के कांस्टेबलों से, नियमित आने वालों के मार्फत, डॉक्टर और नर्स से, मास्टर जी से परंतु उसके पता और कोई भी जानकारी के अभाव में कोई क्या ही बताता।
"मावशी,  एक बड़ी लंबी गाड़ी नुक्कड़ पर रुकी है और एक आदमी उतरा है।" मन्नू भागती हुई आई।
"वह पैदल ही आ रहा है सुंदरी तेरे दर्शन को।"  इठलाता हुआ भुल्लन बोला। 
दोनों वापस बाहर चले गए और सुंदरी की सांसें  धौंकनी की तरह चलने लगी। मोगरे की लड़ियों ने अपनी महक कमरे में बिखेर दी थी, वही मोगरे की महक जो उसे दस साल की लड़की के नथुनों से रिसकर हृदय में नासूर बना चुकी थी। सुंदरी को फिर घबराहट होने लगी। उसने बालों से खींचकर गजरा निकाल दिया और कमरे के एक कोने में उछाल दिया।

सांसों को काबू में करती तब तक वह सामने आ गया था। ऊंची कद-काठी, मध्यम शरीर, घुंघराले से बाल, चौड़ा माथा, सफेद कमीज और नीली जींस पैंट, हाथ में घड़ी, गले और हाथ में प्लेटिनम का चैन, कड़ा। पैरों में बड़े महंगे जूते जो अपनी सादगी से अपनी रईसी दिखाते थे। कंधे तने और आँखें झुकी थीं। एक क्षण वह रुका फिर दीवान पर बैठी सुंदरी के, नीचे लटके दोनों पैरों के पास बैठ गया। महावर से अधरंगे पैरों पर उसकी दृष्टि टिकी थी। फिर उसने दोनों पैरों के अंगूठे को अपनी उंगलियों से स्पर्श किया और माथे तथा आंँखों पर लगा लिया। सुंदरी का शरीर झुरझुरा गया। स्थिति वही थी जो  दो साल पहले फोन पर उसका 'प्रणाम' सुनकर हुई थी।
जाने अनजाने उसका दाहिना हाथ लड़के के सिर पर चला गया। लड़का दो मिनट यूंँ ही बैठा रहा फिर उठकर सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया। उसने अपनी दृष्टि सुंदरी के पैरों पर ही टिकाए रखी थी। कमरे के बाहरी दरवाजे पर खड़े भुल्लन और मन्नू,  ठुड्ढी पर हाथ धरे इस दृश्य को देख रहे थे। कमरे के भीतरी भाग में परदे के पीछे से झांकती हुई कई जोड़ी आंखें, टकटकी लगाए दम साधे थीं। 
"आपको सब क्या पुकारते हैं?" उस युवक का ढेर गंभीर स्वर था। 
आज एक बार फिर अनायास दस साल की वह बच्ची सुंदरी में जाग गई। 
"बचपन में बेनाम थी, कोठी ने सुंदरी नाम दिया। लड़कियां 'मौसी' पुकारती हैं। नेता, अधिकारी पुलिस, पत्रकारों ने अपनी जुबान और सोच से कई गालियों, बाजारू विशेषणों से सजाया मुझे। तुम किस नाम के बारे में पूछ रहे हो?"  सुंदरी ने प्रश्न वापस कर दिया।
"मौसी तो माँ की बहन होती है तो आपको "माँ" किसी ने नहीं पुकारा। आप कहें तो मैं आपको माँ स्वीकार करता हूंँ। आपका परिवार तो पूरा है, मेरा बचपन और जवानी मांँ विहीन है। मेरी पूर्णता आपको माँ से संवारने में ही है।" वह शून्य में घूरता हुआ, कहे जा रहा था। 
"बचपन की, बहुत छुटपन की यादों में माँ के आलता लगे पैर, सफेद साड़ी लाल किनारी वाली, मेरे मस्तिष्क में अंकित है। दो-तीन साल की वह स्मृति, देवी माँ के स्वरूप से एक होकर परिपक्व होती रही है। मैं अपना परिवार बनाने आया हूंँ।  कई बेबस, मजबूर लड़कियों को इस धंधे से निकालकर सामान्य जीवन और जीविका के दूसरे हुनरों की शिक्षा दिलवाई है अब तक।"
अब पहली बार उसने सुंदरी के चेहरे की ओर देखा और नज़रों से नज़रें मिलाकर कहने लगा।
"मेरी माँ को कुछ लोग उठा कर ले गए थे। पिताजी धनी थे, जमींदार थे परंतु माँ को वापस लाने की कोशिश भी नहीं की। उनके अनुसार औरत की इज्जत उसकी देह में है।  वह अपवित्र हो गई तो उसका सभ्य  समाज में कोई स्थान नहीं रहता।" गहरी सांस भरकर वह बोला मैंने इतने सालों औरत की देह उसके इस देह व्यापार पर अध्ययन किया, काम किया और हमेशा इस समाज, परिस्थितियों को उसका गुनहगार पाया है।आपको मेरा यह ऑफर पसंद आए तो मुझे इस नंबर पर फोन करना। बहुत बड़ी कॉलोनी बना रहा हूँ जहां इन लड़कियों, उनके बच्चों को मनुष्य जैसा जीवन देने की कोशिश होगी। सबको किसी न किसी काम की ट्रेनिंग देकर, काम करके पैसा कमाने की सीख भी जाएंगी।"
उसने एक मिनट की चुप्पी साध ली। 

"यह मेरा कार्ड, पता और फोन नंबर, मेरे कारोबार की जानकारियां हैं। यह चेक साइन किया हुआ है आप खुद भर  लेना। मेरे ऑफर पर सोचना। भविष्य की राह पर नया कदम उठाने की कोशिश करना ही मानवता है। माँ, जीवन का बहाव अब समतल की ओर मोड़ दो।" 

सुंदरी के हाथों में कार्ड्स और चेक पकड़ा कर, उसके पैरों में झुक कर प्रणाम करने लगा। बाहर धुंधलका  बढ़ गया था और सड़कों पर लगे बल्ब जगमगाने लगे थे। वह सधे कदमों से नुक्कड़ पर खड़ी अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गया। सुंदरी ने मुट्ठी खोलकर उसके दिए कार्डों को पढ़ने की कोशिश की। कुछ समझ नहीं आया हस्ताक्षर किया चेक भी साथ था।

 वह गहरी सोच में डूब गई जीवन के इस पड़ाव में इस कोठे को छोड़कर एक नौजवान की बातों में आकर अपने घर से दूर चले जाना, इस धंधे को छोड़कर अपने बुढ़ापे में आगे और तकलीफ भोगना उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। 
सुंदरी ने सुनंदा को आवाज दी। इन सबमें वही कुछ पढ़ी लिखी थी और जब मास्टर जी बच्चों को पढ़ाने आते थे तो वह भी उनके साथ बैठ जाती थी।
"मावशी,  इसका तो बहुत सारा बिज़नेस है।  गौरव होम डेकोरेशन, इंटीरियर, गौरव रियल्टी और पता नहीं क्या-क्या। बहुत पैसे वाला है मावशी, अपना नाम पता अब बताया है, दो साल हमारी चुपचाप मदद करता रहा।"  कार्ड्स और चेक को सुंदरी के हाथों में देते हुए वह फिर बोली, "मावशी और क्या बिगड़ जाएगा हमारा! पहले ही सब कुछ बिगड़ चुका है अब शायद हमारे लिए कोई मददगार भगवान ने भेजा है। हमारी मजबूरी, हमारे दुख, हमारे तकलीफों से लगता है ऊपर वाले का आसान डोल गया है। कहते हैं ना की घूरे के भी दिन पलटते हैं।" कहती हुई वह परदे के पीछे चली गई।

दूर अंधेरा गहरा रहा था। सामने, बल्बों की रोशनी से छिपते-छिपाते इस गली में आते-जाते लोग दिखाई दे रहे थे। दूर तक सिर्फ आते-जाते आदमी दिखते थे। सुंदरी ने कमरे में दृष्टि घुमाई। पीतल के दीपक की बाती, अपनी रोशनी बिखेर रही थी। सुंदरी ने उस शांत, सौम्य रोशनी की चमक, कमरे में मूर्तिवत खडी सभी लड़कियों के आंँखों में देखी। अपने जीवन में इस सौम्य रोशनी को लाने की उत्कंठा मानो उस पल, उस कमरे में हिलोरें मार रही थी। एक निश्चल, भोली मुस्कान सुंदरी के अधरों पर फैल गई और अपनी हथेली में दबे हुए उन कार्ड्स को उसने माथे से लगा लिया।


********************