कहानी - हस्तांतरण
"बिट्टी, जा भाग कर नाउन काकी को बुला ला। सब सुहागनें आ गई हैं, काकी आए तो आलता-महावर से शुरुआत करें।" अम्माँ का आदेश मिला और भानु साइकिल लेकर गली के दूसरे छोर पर नजर आने लगी।
सुरती काकी, जिसे पूरा गांव उसके नाम, पेशे से ही बुलाता था। सारे गांव के शादी ब्याह, व्रत-त्यौहार, छठी-बरहों, गौरैया-सुहागिन सभी का ठेका अपने नाजुक कंधों पर लिए सुरती, आबाल-वृद्ध की काकी बनी घूमती थी। इस घर तो दादी के समय से ही काकी आती-जाती थी। उम्र में बहुत छोटी रही होगी, अपनी बुआ के साथ आया करती थी। बुआ का हाथ पकड़ कर उन्होंने अपने इस काम की जानकारी, बोलने का ढंग, तीज-त्योहारों के सामानों की सब जानकारी ले ली थी।
गांव में ब्याही गई और देखते ही देखते दो साल में दो बच्चों की मां बन गई थी काकी। अम्माँ बताती थीं कि उसी की कमाई से उसका घर चलता था वरना उसका घरवाला तो बस बैठे बिठाए खाता, घूमता और घर में खाट तोड़ता पड़ा रहता।
बड़ी दीदी की शादी में तो सुरती काकी ने मंडप का सारा काम संभाल लिया था। चालीस-पैंतालीस की उम्र में बीस का उत्साह लिए, काकी हर ओर नज़र आती थी।
"जिज्जी, आम की लकड़ी उपले सब धर दिए हैं किनारे से, हल्दी का शगुन कर लो तो हल्दी कूट-छानकर तैयार कर दूंगी।" सूपा को रंगती, टोकरी और कलश के सजावट के लिए रंग-बिरंगे चावल-जौ सुखाती सुरती, सारे नेगाचार जानती थी। कोहबर लिखने वालियों को वह सुंदर, पुरानी नमूने भी बताती जाती थी।
"काकी मैं ज्यादा हल्दी नहीं लगवाऊंगी, मुझे पसंद नहीं है।" बड़ी दीदी ने कहा और सुरती काकी ने अपना वाक् पिटारा खोल दिया।
"कैसी बातें करती हो बिटिया! हल्दी मल कर लगाने से तो दुल्हन का रंग निखरता है, दप-दप दमकती है दुल्हन।" एक बार शुरू हुआ कि बंद होने का नाम नहीं लेता था काकी हल्दी पुराण।
"इस छोटी बच्ची को साथ-साथ लिए घूमती हो सुरती, बच्ची है थक जाती होगी।" सुरती काकी के साथ पाँच-छह साल की दुबली-पतली, सांवली सी लड़की अलसाई-अलसाई सी चिपके रहती।
"अरे जिज्जी, इसके महतारी-बाप बड़े शहर में कामकाज करने गए हैं, अब हम ना देखें तो कौन देखेगा इसको?" अपनी पोती सलोनी के उलझे बाल सुलझाती बोली थी सुरती काकी।
"बेटा-बहू क्या काम करते हैं बड़े शहर में?" अम्माँ ने पूछ लिया।
"बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें, सड़क, पुलिया सब काम में मजदूरी करते हैं दोनों। कहते हैं, पैसा जमा करके लौट आएंगे। अब छोकरी को साथ कहां-कहां भटकाते फिरेंगे तो मेरे साथ है। इसे अपना काम भी तो सिखाऊंगी जिज्जी! आगे आने वाले टाइम में बड़ी पूछ रहेगी इस काम की। अभी तो इस बड़े गांव में, मैं एक ही हूँ नउनिया।" हंसते हुए वह अपने काम पर गर्व करती थी।
"सो तो है सुरती, तेरी बिटिया को सिखाया तो वह अपनी ससुराल में अपना काम निभाती है। अब बहू नहीं तो पोती तेरे साथ है।" अम्माँ भी उसके काम की प्रशंसक ही थीं। जिस घर काम हो, सुरती आरंभ से अंत तक प्रेम से अपना काम करने, उस घर से जुड़ जाती। कामकाज के लिए ऐसे लोगों की सख़्त ज़रूरत होती है जो अपनापन और जिम्मेदारी से संबल देते खड़े रहें।
हरे मंडप के लिए बांस, आम की पत्ती लाना, बताशे की पुड़िया बांधना, हर दिन बन्नी गीत के लिए बुलौवा दे आना, ढोलक को धूप दिखाना, दरी बिछाना उठाना और सुहागिनों की कौंछ भरवा कर उनके पैरों में हल्दी महावर लगाना, सुरती काकी का हर शादी ब्याह में काम रहता था। महावर क्या लगाती काकी मानो पैरों की मालिश ही कर देती थी। पहले पैरों को पोंछकर घुटने के नीचे से तलुवों तक दबाती फिर हथेलियां में हल्दी मलकर पैरों पर लगाती। हल्दी जब सूख जाए तब महावर भरती थी काकी।
महावर के नमूने भी बड़े सुंदर बनाती थी वो। एड़ी से चौड़ी लकीरें पंजों तक खींचती फिर लकड़ी से उंगलियों पर पत्ती, आम के डिजाइन बनाती, बीच में गोल टीका उसमें बारीक नमूना भर देती मजाल है कि महावर फैल जाए। उससे महावर लगवा कर औरतें महावर की कटोरी को प्रणाम करतीं और सुरती को नेग दक्षिणा देतीं। आशीर्वाद की झड़ी फूल जैसे बिखर जाती थी सुरती के पान रचे होठों से।
बड़ी दीदी की शादी में उनको नेग रस्म के लिए मंडप में लाना ले जाना, लोहे का छल्ला आंचल से बांधे रखना, हर वक्त उनका पल्लू संभालना काकी ने खूब निभाया। छांव बनी बड़ी दीदी के आगे पीछे रहती थी सुरती काकी। इन सबके बीच वह सलोनी का भी ध्यान रखती, उसे खिला-पिला कर घर में सुला आती थी।
जाते हुए अपने घर वाले के लिए कुछ खाना बंद कर ले जाती थी सुरती। चाहे खुद खाए, ना खाए सलोनी और घर वाले के पेट की बड़ी चिंता रहती थी उसे।
"बहुत ध्यान रखती हो घर वाले का भी सुरती, समय पर खाना दे आती हो। सुबह जाकर झटपट चाय रोटी बनाती हो। रात भर यहां नाच गाने में चाय पानी देना-लेना करती हो, कैसे कर लेती हो सब?" अम्माँ सुरती काकी के गुण और स्वभाव की जी भर प्रशंसा करती थीं।
"जिज्जी, दिन रात घर में पड़े रहते हैं, कई-कई दिनों काम पर नहीं जाते, खाते और सोते रहते हैं जिज्जी। क्या करूं, जानती हूं कि उनके रहते मैं सुहागन हूँ। नाउन का काम करती हूँ सुहागन ना रहूं तो काम नहीं मिलेगा मुझे इसीलिए अपने खाने-पीने से भी ज्यादा उनके खाने-पीने की सोचती हूंँ।" ये कैसी विडम्बना, कैसा चलन उस आदमी के लिए, जो काम न काज करे, ऊपर से मारे-पीटे भी, उसको जिंदा रखने के लिए उसकी घरवाली चिंतित रहती है क्योंकि उसका सुहागन रहना उसके धंधे,उसके काम की मांग थी।
बड़ी दीदी के ब्याह की पूरे रिश्तेदारी में खूब बड़ाई हुई और "सुरती नाउन" तो लोगों के दिलों दिमाग पर छा गई थी।
"सुरती को हमारे बेटे की शादी में ले आना मीरा, खूब संभालती है काम।" छतरपुर से आई ताई बोल गईं।
"अगले महीने गुड्डू का मुंडन है, अब पहले पोते का मुंडन है तो तीन दिनों का कार्यक्रम रखना है। आप सब आना और हो तो सुरती को ले आना।" बड़ी बुआ जी जाते-जाते बोल गईं।
क्या लगती थी सुरती उनकी? बस आदमी का काम बोलता है और उससे ज्यादा उसका काम प्यारा होता है दूसरों को।
बड़ी दीदी के पगफेरे, पहली वट सावित्री, करवा चौथ सब में अम्माँ सुहाग का सामान भेजती और सुरती काकी से पूछ कर सारी पिटारे भरवातीं।
पहली जचकी के लिए दीदी मायके आई और सुरती ने सारी जिम्मेदारी ले ली। जच्चा-बच्चा की मालिश, नहलाना, धूनी सेंक, सब समय पर करती। साथ सलोनी भी मुटुर-मुटुर देखा करती थी।
"बिटिया, आलू मटर सब मत खाना। बादिक होता है मुन्ने का पेट फूल जाएगा।" छोटे शीबू को नहलाते हुए काकी ने कही।
"गजब हो काकी! आलता-महावर, हल्दी-तेल से लेकर सुपाच्य-गरिष्ठ भोजन में भी मास्टरी है क्या?" दीदी हँसती थी।
"मास्टरी का बिटिया, समय का खेल है यही सब सिखा देता है वरना मैं तो हूँ अंगूठा छाप।" कहते हुए काकी ने सलोनी से पानी की धार छोड़ने कहा।
"इस लड़की को भी अंगूठा छाप बनाओगी क्या काकी? सारा दिन चिपकाए घूमती रहती हो।" दीदी ने आंखें तरेरकर पूछा था।
"नहीं बिटिया दो में पढ़ती है ये। सुबह से बारह बजे तक पाठशाला जाती है ना, इसे दस-बारह तो पढ़ाना है। इसकी बुआ को सात तक पढ़ाया था मैंने।" अपनी बेटी की याद करके उसकी आंखों की कोरों से पानी छलक गया था।
सवा महीने में कुआं पूजन, बारसा के बाद भी काकी, दीदी और मुन्ना की मालिश करने आया करती थी। कभी-कभी अम्मा की पिंडलियों में तेल लगाकर दबा देती, तो कभी बालों में तेल लगा देती। बड़ी दीदी मुन्ने को लेकर ससुराल जाने वाली थी तो उन्होंने अपनी ओर से एक सुंदर बनारसी साड़ी काकी को दिया।
"कैसी सुंदर, सुनहरे किनारी की साड़ी है बिट्टी। कच्चे आम का रंग, नाचते मोर की बुनावट, लगता है बस देखते ही रहूँ। अब इस बुढ़ापे में इतनी बनठन कर कहाँ जाऊंगी बिट्टी? तुम कहो तो तुमसे मिलने तुम्हारे ससुराल आऊंगी, जिज्जी के साथ।" साड़ी पर हाथ फेरते प्रेम और अपनेपन के सागर में डूब गई थी सुरती काकी।
बड़ी दीदी के चले जाने के बाद अम्माँ ने सेर-सीधा, सुहाग का सामान, जच्चा-बच्चा के सेवा-जतन के धन्यवाद स्वरूप रुपए और सोने के कान के बुंदे, सुरती काकी को दिए।
"जिज्जी, इतनी बड़ी चीज कैसे ले लूं मैं? बिटिया मेरी भी तो है, बचपन से देखा है तो इतनी कीमत ले लूं तेल पानी की?" सुरती काकी ने हाथ जोड़ लिए थे।
"नहीं सुरती, यह कोई कीमत नहीं। तुम्हारे काम के लिए बरसों से हमारा घर ऋणी है। तुम्हारी सेवा प्रेम का कोई मोल नहीं। अब यह बुंदे इस सलोनी को पहना देना।" सुरती काकी बुंदों को देख रही थी। लाल और मोती की लटकन, गजब की कारीगरी थी बुंदों में।
समय की चाल समरूप कदम से बढ़ती ही जा रही थी। बड़ी दीदी अपने परिवार, मुन्ना में मगन हो गई थीं। नौकरी के लिए भानु को शहर जाना पड़ा और अम्माँ- पिताजी घर पर रह गए। सामान बांधकर जब भानु रेलवे स्टेशन के लिए निकली, तो सामने सुरती काकी भागी-भागी आई।
"छोटी बिट्टी, तेल कढा कर लाई हूँ। हफ्ते-दो हफ्ते में बालों की जड़ों पर लगा लिया करना। घने मुलायम बाल रहेंगे वरना शहरों में तो बाल ऐसे रुखे हो जाते हैं जैसे हमारी बहू के हो गए हैं।" अब भानु को हँसी आ गई। बिल्डिंगों के लिए चूना-गारा ढोने वाली बहू के बाल देखकर, नौकरी करने के लिए जाने वाली भानु के बालों के लिए तेल बनाकर लाने वाली सुरती काकी, थी ना बेजोड़।
"ठीक है काकी, जब अगली बार आऊंगी तब फिर से बना कर दे देना।" तेल की शीशी लेते हुए भानु पिताजी के साथ रिक्शे पर बैठ गई।
"शादी-ब्याह करोगी तो एड़ी हमसे ही रंगवाना छोटी बिट्टी। हमारे हाथ की हल्दी-महावर चटक लगता है।" अपने बिजनेस को भूलती नहीं थी काकी। काकी के साथ खड़ी सलोनी ने भी हाथ हिलाया। अब वह भी दस साल की हो रही थी।
शहर की व्यस्तता, नौकरी की दौड़ाभागी में भानु भी भागने लगी थी। बीच-बीच में अम्माँ-पिताजी आते, एकाध सप्ताह रहकर चले जाते। अम्माँ को तसल्ली थी कि आसपास के लोग अच्छे और परिवार वाले हैं। हाँ, काकी तेल देना कभी नहीं भूलती थी।
नौकरी को दो साल होने आए और भानु के ही विभाग में काम करने वाले विजय से उसकी जान पहचान बढ़ी। दोनों परिवारों की सहमति और बात से, रिश्ता पक्का हो गया। इस बीच अम्माँ की चिट्ठी आई कि सुरती काकी विधवा हो गई है और अब वह अपनी पोती को लेकर बेटा-बहू के पास जा रही है।
"ओह!" भानु उदास हो गई थी। सुरती काकी के काम में उसका सुहागन होना ही उसके काम का आधार था। सामने उसकी शादी थी और काकी का यह समाचार बहुत दुखद था।
विजय और उसके परिवार के जोर देने पर इसी शहर में भानु का विवाह हुआ। बड़ी दीदी का परिवार, सारे रिश्तेदार, गांव के कुछ लोग यहीं आ गए थे। इस शहर में नाउन का काम कोई जानता ही नहीं था। यहां तो हर काम खुद करने का चलन था, तब सब घर वाले सुरती काकी की बहुत याद कर रहे थे।
बुआ जी की बहू ने सुरती काकी का काम संभाला, सबको आलता-महावर लगाया। सभी सुरती काकी के महावर, उसके स्वभाव, उसके पैरों की मालिश के हुनर और हल्दी लगाने की बहुत प्रशंसा करते रहे।
"मम्मी, आप तैयार नहीं हुईं अब तक! दीदी को मंडप में पूजा के लिए ले जाना है ना।" भानु को ढूंढता उसका बेटा विनीत कमरे में आया।
भानु ने चौंकते हुए कहा," अरे हां बेटा, मैं तो इस पुराने एल्बम में ही डूब गई थी। रस्मों को देखने के लिए एल्बम उठाया, तेरे पापा और मेरी शादी का एल्बम है। देख, कैसा फैशन था तब!" कुर्सी पर से उठती हुई भानु हंँसने लगी। सामने अपने पति विजय को तैयार होकर आते देख, वह जल्दी से तैयार होने चली गई।
"लड़के वाले जरा पुराने विचार के लगते हैं रे भानु। उनको मंडप में पूरी विधि-रीतियां करवानी है लगता। कह रहे थे उनकी तरफ नाउन, धोबन सब तैयार हैं।" गहनों और भारी साड़ी से लदी-फदी बड़ी दीदी, भानु की ओर बढ़ते हुए बोली।
" दीदी, मेरी शादी में तो कोई नाउन मिली नहीं थी उस शहर में, अब यहां डेस्टिनेशन वेडिंग में कहां से मिल गए सब इनको।" भानु को आश्चर्य हुआ।
"आजकल लोग अपनी पुरानी रीति-नेगाचार को करने में खुश होते हैं भानु इसीलिए इन बड़े-बड़े डेस्टिनेशन होटल, रिसोर्ट के पास पंडित, पूजा का सामान, नाउन धोबन सबकी व्यवस्था रहती है। यदि जरूरत हो तो ये उन्हें बुला देते हैं।" बड़ी दीदी ने अपना अनुभव बताया।
सब मंडप में जमा हुए तो सिर पर पल्ला लिए, लाल चुनरी, सिंदूर, महावर, कलाई भर चूड़ियां पहने एक प्रौढ़ महिला और एक युवती आकर नीचे बैठ गईं। प्रौढ़ा ने मंडप का कलश ठीक किया, आम की ताजी पत्तियां लगाई, छोटा सिलबट्टा लाकर रख दिया।
दीपक में तेल भरा और कहने लगी," जिज्जी, किसी सुहागन से दीपक जलवा दो और आप सब महावर लगवा लो। कौंछ में देने के लिए चावल, हल्दी-सुपारी साथ लाए हो क्या जिज्जी?"
भानु और उसकी बड़ी दीदी मंत्र-मुग्ध से सुनते रहे। उसने झट महिलाओं के पैरों में हल्दी मली, घुटने से नीचे तलवे तक दबाकर मालिश करती फिर अपने साथ आई युवती से कहने लगी," चंदा, सबको हल्दी लगा बिटिया। जब सूख जाए तब महावर चटक पकड़ेगा। सुहागिनों की एड़ी चटक रंगना बेटा, कन्याओं को लगाओ तो एडी़ छोड़ देना।" उसका हाथ सधा हुआ चल रहा था। एक पतली लकड़ी से पैरों के किनारों पर छोटे नमूने भी बना रही थी, मजाल कि महावर इधर से उधर फैल जाए।
भानु और उसकी बड़ी दीदी की आंखों के सामने, वर्षों पहले की शादी का दृश्य घूम गया। सहसा, उस युवती चंदा के सिर पर से पल्ला खिसक गया और कानों में लाल मोती की लटकन वाले बुंदे झलकने लगे। भानु ने अपनी बड़ी दीदी की ओर देखा, दोनों की नज़रें मिलीं। स्मृतियों में अम्माँ-पिताजी, अपना गांव, रस्में और सुरती काकी की छबि घूम गई।
"तुम्हारे कानों के बुंदे बड़े सुंदर हैं, ब्याह के हैं क्या?" युवती की मांग में सिंदूर देखकर भानु ने पूछा।
"जिज्जी, ब्याह में ना लिए थे ये, हमारी दादी की निशानी है जो हमारे पास थी, अब इसे पहना दिया है। जब किसी अच्छे बड़े ब्याह में काम मिलता है तो यही बुंदा पहनती है वरना हम तो नकली के गहने पहन कर जिंदगी चलाने वाले लोग हैं।" प्रौढ़ स्त्री ने अपना काम रोक कर ,भानु की ओर देखकर कहा, "पहले के लोगों में अपनापन था जिज्जी, इसी अपनेपन की निशानी है ये बुंदे।"
"सुरती काकी भी तो प्राण लुटाती थी सब पर सलोनी। उनकी याद हमेशा आती है। मेरे ब्याह में तो काकी विधवा हो गई थी, बड़ी दीदी के ब्याह में तुम आती थी सुरती काकी के साथ हमारे घर।" भानु कहती गई और सलोनी के साथ चंदा आश्चर्यचकित सुनते गए।
"राम जी की दुनिया है जिज्जी, सुरती दादी आप सबको खूब याद करती थी। अंत तक दुखी थी कि आपकी एड़ी में महावर ना लगा सकी। देखो जिज्जी, आज एक की जगह दो-दो सुरती आपकी बिटिया को महावर लगावेंगे। बिटिया का भाग सुहाग बना रहे, अखंड सुहाग वाली रहे हमारी बिटिया।" सलोनी भावविभोर हो गई।
"हमने भी अपने ब्याह के बाद गांव छोड़ दिया था। इसका बापू मिट्टी-गारे के काम करते शहर-शहर घूमता।हम दोनों बड़े-बड़े घर बिल्डिंग, मकान और होटलों में भी काम करते। कभी-कभी इन बड़े होटलों में ब्याह की झलक देखने मिल जाती थी। बाहर के गांव से आए लोगों को ब्याह का सामान, पूजा का सामान, रीति-रिवाज का सामान और हम जैसे लोगों की जरूरत होती थी। हमने उन सब बड़े होटल और रिसॉर्ट वालों से को बताया कि हम ऐसा काम गांव में करते थे। देखो, मिट्टी गारे से सने हाथों ने फिर महावर हल्दी को थाम लिया है।" अपनी जिंदगी खोल कर रख दी थी सलोनी ने।
सामने सीढ़ियों से उतरती, पीले रंग के कपड़ों में सजी भानु की बिटिया सिद्धि मंडप में आ रही थी। सलोनी ने नजर भर के बच्ची को देखा, पास ही पड़ा ढोलक उठा लिया और ढोलक की थाप पर गाने लगी।
"सुहाग मांगन जाए, बन्नी पार्वती के पास।
मैया ऐसो वर दीजो, गौरी ऐसो वर दीजो,
जिसके लछमन जैसे भाई, जिसकी कौसल्या सी माई,
सुहाग मांगन जाए...।।
सलोनी विभोर होकर ढोलक बजा रही थी। मंडप में उपस्थित सभी महिलाएं उसके संग गीत दोहरा रही थीं, तालियां बजा रही थीं। सलोनी की बिटिया चंदा, बड़ी कुशलता से सुहागिनों के पैरों में हल्दी महावर रचा रही थी। उसके कानों में झूलते बुंदे, कौशल और संस्कारों के सहज हस्तांतरण के साक्षी थे।
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