गुरुवार, 13 नवंबर 2025

कहानी - छाले

कहानी - छाले


ऊपर की मंजिलों से नीचे तक, कचरे के दो-दो बड़ी टंकियों जैसे डिब्बों को उतारती हुई लछमी हांफ गई थी। बिल्डिंग के किनारे डिब्बों को धकेल कर, वही थोड़े देर के लिए सुस्ताने बैठ गई। 
"इतनी बड़ी सोसायटी ट्रक भर कचरा रोज निकलता है यहां, पर इनका दिल चींटी मक्खी से भी छोटा है। कहते हैं लिफ्ट का उपयोग मत करो, पूरे लिफ्ट में बास फैल जाती है। अब क्या करें कूड़ा भी तो इन्हीं का फैलाया हुआ है।"

कमर में खोंसी गुटके की पूड़ी निकाली, हथेली में थोड़ा झड़ाया और वापस पुड़िया कमर में खोंसी ली। हथेली के गुटके को जरा अंगूठे से घसकर, खैनी का आनंद लेती लछमी फिर से उठ खड़ी हुई तभी घंटा गाड़ी की आवाज आने लगी। 
"अरी ओ लछमी आंटी! जब गाड़ी चली जाएगी तब लाएगी क्या कचरे का डिब्बा।" मुरली ने आवाज लगाई।
"खींच के लाने में टैम लगता है ना छोकरे,  तू जवान मैं आधी बूढ़ी। एक है क्या हमारी ताकत।" लछमी ने पूरी शक्ति से खींचते हुए डिब्बों को घंटा गाड़ी तक पहुंचा दिया था।
"बीस-बाइस  मंजिल की बिल्डिंग से कचरा उतारने में बड़ी ताकत लगती है।" वंदू ने डिब्बे को घसीटकर गाड़ी के पास रखते हुए कहा। 
"अब सोसाइटी वालों को कुछ व्यवस्था करनी ही चाहिए, नहीं तो मुश्किल हो जाएगी।" लछमी अभी भी हांफ रही थी।

हाथ मुंह धो कर सब ने अपने साथ लाया नाश्ता निकाल लिया। 
"लक्ष्मी नाश्ता के बाद सीढियों को झाड़ू कर दे, फिर तेरे को सोलहवें फ्लोर वाली मैडम ने बुलाया है।"  इस सफाई दल का स्वयं नियुक्त मैनेजर भूषण ने लक्ष्मी से कहा।
"कौन, वह जो नए आए हैं फ्लैट में?  मैंने तो आज तक उनकी सूरत भी नहीं देखी। दो महीना हो गया कचरा  बैग में बांधकर रख देते हैं वो लोग।"  लक्ष्मी ने मिठाई का डिब्बा खोलकर सभी के सामने फैला दिया। 
"आज क्या तेरी दिवाली है मवशी?" नई-नई भर्ती हुई बीस साल की सुगंधा बोली।
"अपनी तो रोज दिवाली रहती है। बिल्डिंग के लोग हैं, फल मिठाई लेकर आते हैं पर खाते नहीं। एक-एक दिन खाया, बाकी उठा कर दे देते हैं मेरे को और मेरा तो नाम लछमी है तो मेरी रोज दिवाली है।" लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा।
"अपने घर नहीं ले जाती मौसी घर के लोग कहेंगे मिठाई।" काम करने वाले एक लड़के ने पूछा। 
" नहीं रे, घर में कोई छोटा बच्चा नहीं है। तुम्हारी उमर का एक बेटा है, किसके लिए ले जाऊंगी? तुमको ले जाना है तो लेकर जाओ।" कहती हुई लक्ष्मी ने बची मिठाई उसके हाथ में थमा दिया और उठ खड़ी हुई।

महानगर की इस बड़ी सुंदर सोसायटी की सबसे पुरानी सफाई कर्मचारी है लछमी। थक भी जाती है तो बड़े धैर्य से एक-एक सीढ़ी, लॉबी की खिड़कियों की सलाखें, काँच साफ करने में कमी नहीं करती शायद इसलिए  इस सफाई स्टाफ की वह स्थाई कर्मचारी है। 
झाड़ू पोछा लगाकर एक बार फिर लक्ष्मी ने हाथ मुंह धोया। अपने बैग से कंघी निकाल कर बोल ठीक किया, साड़ी व्यवस्थित की और सोलहवें मंजिल पर आए नए लोगों के फ्लैट की ओर चल पड़ी। घंटी की आवाज बहुत बढ़िया थी ऐसा लगता था जैसे कोई बांसुरी बजा रहा है। इस घर में घंटी बजाने का कभी काम भी नहीं पड़ा था उसे। समय पर अपना कचरा बाहर रख देते थे वो लोग। कचरे में कभी-कभी बाहर से आने वाला खाना, पिज़्ज़ा का डिब्बा रहता था। दरवाजा खुलता है और सामने एक उसी की उमर की औरत खड़ी दिखाई देती है।

"भूषण बोलता था कि मैडम ने मुझे बुलाया है। बोलो मैडम को की लछमी आई है।" लछमी ने उस औरत से कहा। 
"आओ, अंदर आ जाओ।"  दरवाजा पूरा खोलकर वह अंदर चली गई। 
लछमी ने कदम अंदर रखा तो आंखें खुली रह गईं । सुंदर ड्राइंग रूम, हल्के रंग के दो परत वाले परदे, सोफे पर बहुत सुंदर कुशन, दीवारों पर दो बड़ी पेंटिंग लकड़ी की कलाकारी वाला एक टेबल, बड़ा व्यवस्थित साफ सुथरा घर था। एक अच्छे साफ सुथरे घर में घुसने के बाद लछमी को अपने काम की गंदगी का एहसास हुआ। उसने झुककर अपने पैरों को अपने पल्लू से ही पोंछ लिया। 
मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है। अपनी किसी भी कमी को वह जिंदगी भर अपने दिल पर हावी रखता है फिर उसकी कल्पना में हर व्यक्ति, हर स्थान, हर वक्त वह कमी सिर उठाए घूमती है। इस व्यवस्थित बड़े फ्लैट को दो मिनट तक लछमी तौलती रही फिर सामने खड़ी उस औरत से पूछा।

" मैडम नहीं है क्या?  नीचे मेरा और काम है। आगे पीछे सब झाड़ने का है मेरे को।" लछमी इस महानगर की तरह जरा हड़बड़ी में थी। 
"मुझे भी थोड़ा काम है तुमसे। बालकनी की ग्रिल, खिड़कियों के काँच साफ करवाने हैं। चाहे तो तुम कर दो या फिर किसी और को भेज देना।" सामने खड़ी औरत ने बड़ी शालीनता से कहा।
 लछमी अचकचा गई।  मन ही मन उस औरत को इस घर के साथ बिठाने का प्रयास करने लगी। 
अड़तीस-चालीस की  होगी यह औरत।  रंग कान्हा की तरह सांवला या और बहुत सांवला। थोड़ी दबी सी नाक,  भरे-भरे गाल, थोड़ी कुछ ज्यादा ही धंसी हुई पर ठुड्ढी। खिचड़ी से बाल जिसे शायद पार्लर जाकर उसने सैट किया था।  उसके सांवले हाथों में सोने की एक-एक पतली चूड़ी चमक रही थी। गले में चैन, कान और माथा सूना था उसका।
"आजकल बड़े लोगों में टिकली बिंदी लगाने का रिवाज ही नहीं है लगता।" इस बिल्डिंग की सभी औरतों को ऐसे ही देखती थी वह इसीलिए बुदबुदाई।
"नमस्ते मैडम जी।" लछमी ने कहा। इस फ्लैट की सुंदरता को देखकर, सामने खड़ी औरत को इस फ्लैट की मालकिन स्वीकार करना, लछमी के लिए बड़ा कठिन हो रहा था।

"नमस्ते।" उसने उत्तर दिया।
"मैडम जी, दोपहर खाना खाने के बाद एक घंटा आराम करते हैं सब। अपना काम थोड़ा जल्दी निपटाकर मैं कल से आती हूँ।" लछमी ने बताया। 
"ठीक है। अभी नयी हूँ यहां, किसी को पहचानती नहीं। तुम्हारा काम देखा है मैंने इसलिए सोसायटी ऑफिस में फोन करके तुम्हें बुलवाया।"  शांत, धीमा स्वर था उसका।
" ठीक है मैडम जी, कल से दो-तीन दिन रोज दोपहर को आकर काम कर जाऊंगी।" कहती हुई लछमी पलटने लगी। 
"दो दिनों में ही करना, उसके बाद ऑफिस है मेरा।" दरवाजे तक आकर उसने कहा और दरवाजा बंद कर दिया।
उसे दिन लछमी बड़े ऊहापोह में रही। अपने गोरे हाथों को देखती, जिन पर उसके पति ने माणिक-नीलम जड़े थे, अपने कचरे से सने पैरों को देखती जो कचरे से  लिपटे रहने के बाद भी झाड़ पोंछ दो तो संगमरमर की मूरत से बन जाते थे। एक क्षण के लिए उसको अपने रंग रूप पर घमंड आ गया ज्यों ही हाथों के नीले लाल निशाने पर वापस नजर पड़ी, सारा घमंड कपूर की भांति उड़ गया और उसके अगले ही क्षण इस शरीर से भाग जाना चाहती थी वो। 

शाम को सब्जी-भाजी खरीदते हुए लछमी घर पहुंची। सुबह ही नगर पालिका के नल से, आंगन में पड़े सब ड्रम भर जाती थी वो। सब्जी का थैला खूंटी पर लटका कर, तार पर रखी अपनी साड़ी उठा ली। टिन के पतरों से बने बाथरूम में घुस गई। रोज शाम को नहाते समय अपने हाथों को साबुन से रगड़ डालती थी वह। इन हाथों से सारे जमाने की गंदगी उठाती, भरती और ढोती थी। फल-सब्जियों के छिलके, खाली डिब्बे, पुराने टूटे-फूटे बर्तन-खिलौने, जूठन खाना यहां तक तो दिल सह जाता परंतु जब इन बिल्डिंगों में रहने वाली पढ़ी लिखी औरतें अपने माहवारी के पैड्स खुले कचरे में फेंक देती तो उसे उबकाई आ जाती थी। मन ही मन सोचती,  "ये औरतें कब दूसरी औरतों का दर्द समझेंगीं?" 

कोरोना काल के बाद मास्क और हाथों के दास्ताने का चलन मानो वरदान साबित हो गया था लछमी और अन्य सफाई कर्मियों के लिए। 
नहा कर जल्दी से सब्जी-भाजी काट ली। एक तरफ भात का पानी चढ़ाया और लहसुन अदरक कुचलने लगी। सब्जी छौंक ही रही थी कि उसका पति विनोद आ गया। 
"क्या पका रही है घास फूस? ये ले मुर्गी पका, एकदम मस्त तेरे जैसी कड़क मसाला।" कहता हुआ बेहयाई से हँसता, पॉलिथीन में बंधा मांस उसकी ओर उछाल दिया।
" तेरा लच्छन, तेरा बेटा भी सीख गया है। आजकल कभी कमाता है तो दारू की दुकान पर जाता है।" बेटे की शिकायत शराबी बाप से बताते हुए, उसकी आवाज माध्यम हो गई थी। 

इस चॉल की सभी औरतों का एक-सा हाल है। औरतें, सुबह नगर-निगम के नल से पानी भरकर घर को जीवन देने की शुरुआत करती हैं। बच्चों को नहला-धुलाकर, चाय-रोटी खिलाकर, उनका बस्ता अपने कंधों पर लाद कर  स्कूल छोड़कर आती हैं। उन्हें सुकून रहता है कि जो काम उन्होंने नहीं किया या अधूरा छोड़ दिया था, उनके बच्चे उसे पूरा करेंगे। रोटी पानी तैयार करके, मर्दों का डिब्बा बांधकर, वे अपने-अपने काम के लिए निकल जाती हैं।
कोई अस्पताल में साफ-सफाई करती है, कचरा झाड़ती-बुहारती है, सुपर मार्केट में सामान तौलती है, बच्चों की देखभाल करती है, किसी को लोगों के घरों में बर्तन-पोंछा करना है, कोई भोजन केंद्र में जाकर दिनभर रोटियां बनती है तो कोई स्कूल बस से बच्चों को लाने ले जाने का काम करती है।

"आते समय भेल, चना मसाला लाई थी ना।"  हाथ पर धोकर, अपनी थैली से शराब की बोतल निकाल कर विनोद तैयार था। 
"आज उधर से आई नहीं मैं । रोड का काम चालू था इसलिए दूसरे रास्ते से आई।"  उसकी और बिना देखे ही लछमी ने उत्तर दिया।
"कितनी हरामखोर औरत है!  गड्ढा खुदा था तो गिरकर मर जाती, खाली हाथ क्यों आई साली।" कहता हुआ  पास पड़ी चप्पल लछमी की पीठ पर बरसाने लगा। 
" नहीं रहता मेरे पास रोज पैसा, तेरे चखने के लिए। महीने में एक बार तनख्वाह मिलती है। रोज मैं इतनी दूर पैदल आती-जाती हूँ बस भी नहीं लेती, तेरा दारू चखना रोज आता है घर में।"  सिसक रही थी इस घर की लक्ष्मी। 
"तेरा लाया खाना भी जहर है। मुर्गा पका और जा मेरे सामने से मर जा कहीं।" कहता हुआ वह बोतल लेकर घर के बाहर चला गया।

सोलह साल की उम्र से इस आदमी का ऐसा बर्ताव झेल रही लछमी ने, अब बयालीस पार कर लिए थे। अपने काम के दम पर बेटी को बारहवीं और बेटे को दसवीं तक पढ़ाया था उसने। खाना ढांक कर रख दी और अंदर कमरे में लेट गई। दिनभर कचरा, गंदगी को खींचते, भरते, सफाई करते और रात को इस गंदगी से दो-चार होते, जिंदगी बीत रही थी उसकी।
 खाट पर लेटते ही सारा शरीर अकड़ने लगा। मांसपेशियों को आराम मिला परंतु पीठ की ताजा मार, चादर के ताने-बाने से खुरच रही थी। हृदय की बर्फ गर्म होकर पिघलने लगी। अच्छा हुआ सोनाली को बारहवीं पढ़ाकर ब्याहा, अब खुद काम करती है और घर में उसकी इज्जत भी होती है। अपनी बेटी के सुख की छांव में, अपना दुख भूलना चाहती थी वह।

सुबह जब नींद खुली तो आंगन में दो थाली, दो गिलास, खाली बोतल दुर्गंध फैल रहे थे। आज का दिन इस गंदगी को साफ करने से शुरू हुआ। चाय बनाई और अनमने मन से रात की रोटी का टुकड़ा खा लिया। नहा धोकर आले में बैठे गणेश जी को नमस्कार किया। उनसे भी कुछ मांगना छोड़ दिया था उसने। 
आज अनमनी सी कचरा समेटकर, पूरी सोसाइटी का झाड़ू बुहारू किया और बोतल में पानी भर  बैठकर पीने लगी। 
"लछमी मावशी, आना हमारे साथ खा ले।"  एक लड़की ने बुलाया। 
"आज मैं सुबह ही खाकर आई रे ! तुम लोग खाओ।" कह कर लछमी सोलहवें माले के, फ्लैट वाली मैडम के काम के लिए चल पड़ी।
 "ऐ वंदू,  मेरे को देर हो जाएगी तो लॉबी को एक बार पोंछा मार देना आज।" कहती हुई लछमी चली गई।

"मैडम, कागज और पुराना सूती कपड़ा दे दो कांच अच्छे से साफ होगा।" कहती हुई लछमी बालकनी की ओर जाने लगी फिर अचानक रुक गई। 
"मैडम अंदर जाऊं ना।" सभ्यता से उसने पूछा।
"हाँ-हांँ,  मैं अकेली ही रहती हूंँ इस घर में।"  मुस्कुराते हुए वह बोल रही थी।
 धूल के कण, पानी के छीटों के साथ मिलकर काँच की पारदर्शिता को कम कर रहे थे। आकाश, बाहर का पेड़ सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था लगता था जैसे सारे रंग बदल गए हैं। काँच के ऊपर जमी धूल की परत हटी और दुनिया अपने यथार्थ रूप से संजी-संवरी दिखाई देने लगी।
लक्ष्मी का मन इसी बात पर अटका था कि "मैं अकेली ही रहती हूँ।" चालीस की तो वह जरूर होगी, शादी ब्याह नहीं किया क्या? अलग रहती है? क्या बच्चे हैं या नहीं?  एक काँच साफ करती तब तक दूसरा धुंधला काँच सामने आ जाता। लगातार गर्द की परत को साफ करते उसे दो घंटे हो गए।
"आओ चाय पी लो।" मैडम जी ने आवाज दी। 
"मैडम जी, नीचे जाकर पी लूंगी।" आज तक उसे घर पर बिठाकर किसी ने चाय नहीं पिलाई थी। 
"बाथरूम में जाकर हाथ मुंह धो लो, चाय पी लो। कितना काम किया आज सुबह से तुमने।"  कितना प्यारा मीठा बोलती है मैडम जी। बड़ी नौकरी में लगती है फिर भी घमंड नहीं है।

 मैडम सोफे पर बैठी, चाय बिस्किट टेबल पर था। लक्ष्मी नीचे बैठ गई।
 "कुर्सी पर बैठ जाओ आराम से लछमी!" उन्होंने कहा।
" नहीं नहीं मैडम जी। यही ठीक हूंँ।" कहते हुए लक्ष्मी चाय सुड़कने लगी। 
लछमी की सुंदरता, गोरा रंग और काम करने की ईमानदारी से सोफे पर बैठी औरत प्रभावित थी।
"हाथों और पीठ पर इतने दाग कैसे हैं लछमी?" मैडम ने पूछा।
" हमारे मोहल्ले में खूब मच्छर है मैडम जी, मेरे को काटते हैं तो दाग बड़े दिनों रहता है।" अपनी पीठ पर आंचल फैला कर दागों को ढांकती हुई, नीचे नज़रें झुकाए लछमी बोली थी।

दाग शरीर में दिखते हैं, चोट हृदय और मस्तिष्क झेलता है। कुछ दाग दिखाई देते हैं और कुछ हृदय में घर बसाकर, अंदर ही अंदर पूरे शरीर को अपना घर बना लेते हैं। लछमी में नज़र उठाने का साहस नहीं था और मैडम जी की दृष्टि उन चोटों में अपना अतीत ढूंढने निकल गई थी।
 विकास और फैशन से दूर प्रकृति के साथ सोने जागने वाले गांव की पैदाइश थी कुसुम। कक्षा आठवीं में पूरे जिले में प्रथम आने पर उसे शहर के हाई स्कूल में पढ़ाने का फैसला लिया गया। सरकार की ओर से शुल्क माफी, हॉस्टल और पुस्तकों की व्यवस्था सब मिल गई। आदिवासी पिछड़े क्षेत्र से आने वाली मेधावी बच्ची थी कुसुम। वैसे भी गांव में इन दिनों विद्रोह की आग भड़काकर, नक्सल नाम का बम सभी तरफ भड़क रहा था। पहाड़ों के पत्थरों, बारिश में झूमते बादलों और गांव की उपजाऊ मिट्टी के रंगों से मेल खाती थी कुसुम। गांव में तो सभी उसी के रंग के थे परंतु शहर के हॉस्टल में गोरी त्वचा के आकर्षण और बल का एहसास हुआ था उसे।

लिखना-पढ़ना सबसे बेहतर परंतु प्रेजेंटेशन, प्रतियोगिताओं में उसे पीछे रखा जाता था। यह सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं रहा, वहां से तो इस अंतर का झरना प्रवाहित हुआ और फिर आज तक वह इस धारा में बहती हुई अपनी जिंदगी को ठिठक कर देखती है। ग्रेजुएशन के बाद कुसुम ने प्रतियोगी परीक्षाओं को मात देने का लक्ष्य निर्धारित किया था। 
"नौकरी की क्या जरूरत है कुसुम? शादी ब्याह करके अपनी घर गृहस्थी संभालना औरत का काम है।" गांव जाने पर माँ यही बोलती थी। गांव एकदम अपनी ही चाल में चल रहा था। दुनिया की ऊंची उड़ानों से बेखबर लोग, दो जून भात-साग का ही जश्न मना लेते।  पच्चीस साल की अनब्याही वही सबसे बड़ी लड़की थी इस गांव की।

" राज्य स्तरीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा, एक ही बार में उत्तीर्ण करने वाली इस गांव की ही नहीं समाज और इस राज्य की होनहार लड़की है कुसुम।"  गांव की पंचायत में कुसुम की सफलता को हाथों हाथ उठा लिया।
इस शासकीय नौकरी की ट्रेनिंग के दौरान कुसुम की जान पहचान अपनी ही तरह के कई लोगों से हुई। इनमें से कुछ लोग उसके करीब भी आए, जिसमें एक युवक यश था। लंच और लेक्चर के दौरान दोनों मिलते और अपने विचारों को बांटने का यही समय मिलता था। पोस्टिंग हुई और दोनों अलग-अलग शहरों में चले गए। अब उनके बीच फोन में कभी-कभी बात होती थी और बातों का सिलसिला शायद जीवनभर के साथ में बदल जाता कि तभी कुसुम को यश के रवैये में हल्के से रूखेपन का एहसास होने लगा। किसी भी निर्णय के पहले वह स्वयं सब कुछ देख समझ लेना चाहती थी इसलिए एक दिन यश से मिलने उसके शहर पहुंच गई।

 सरकारी क्वार्टर का पता तो तो उसके पास था ही वहां जाकर पता चला कि वह दो दिनों से अपने घर गया है, उसकी सगाई हो रही है। उसी के सामने की बेंच पर बैठकर खूब रोई थी वह। उसके बुद्धि उसके पद पर फिर त्वचा के रंग और खूबसूरती ने विजय पा ली थी। कई बार अपने स्टाफ के फुसफुसाने से भी उसे दुख और ग्लानि होती थी। एक दक्ष, ईमानदार अधिकारी इस समाज की संकीर्ण मनोवृत्ति का शिकार थी। 
लछमी के खांसने की आवाज आई तो कुसुम हड़बड़ा गई। उसकी चोटों को घूरती हुई वापस अपने वर्तमान में आ गई। 

"चलती हूँ मैडम जी, रोज थोड़ा काम करके खत्म करूंगी।"  लछमी जाने लगी।
"रुको।"  कहती हुई कुसुम ने कुछ फल और पचास उसके हाथों में रख दिए।
 हाथ जोड़कर नमस्कार करती लछमी चली गई। इस फ्लैट और मैडम जी के बारे में जितना सोचती, उतना उलझती जाती। शक्ल-सूरत से ही तो कमतर है मैडम जी, स्वभाव, गुण और नौकरी तो बहुत अच्छी है। 
अब काम करने और कभी सब्जी भाजी ला देने के लिए, अक्सर लछमी इस घर में आने-जाने लगी। वीकेंड पर हमेशा साफ-सफाई कर, कुछ अतिरिक्त काम कर देती। इस प्रकार दो स्त्रियों के मन के द्वार खुलने लगे थे।

"मेरे बेटे का ब्याह तय कर दिया है मैडम जी। अगले महीने ब्याह करना है।"  एक दिन लछमी ने बताया। "अच्छा!  बहुत बढ़िया, क्या करता है तुम्हारा बेटा?"   कुसुम ने पूछा।
" दसवीं फेल हो गया था मैडम जी, आगे पढ़ा ही नहीं। कभी कुछ काम करता है, कभी कुछ करता है नहीं तो घूमता रहता है। कुछ पक्का नहीं है मैडम जी। बहू आएगी तब अपनी जिम्मेदारी समझ लेगा।" बातें करती लछमी ने, सारे फर्नीचर आज साफ पोंछ के चमका दिए थे।
" मैडम जी, यह आपकी फोटो है ना ? आपके साथ बच्चा कौन है?" एक छोटे फोटोफ्रेम में कुसुम की पुरानी पुरानी तस्वीर एक छोटे बच्चों के साथ देखकर लछमी ने पूछा। 
"मेरा बेटा था।" उस  फ्रेम को अपने आंचल से पोछती हुई कुसुम ने कहा। 
 "आपका बेटा था, अब नहीं है क्या मैडम जी?" लछमी उसे एकटक देख रही थी।
" बहुत प्यार था ना वह, भगवान ने वापस बुला लिया अपने पास।" कलेजे को चीरकर निकली आवाज से कांप गई थी लछमी। हाथ पकड़ लिया लछमी ने उसका। अभी कोई पद नहीं, कोई डिग्री नहीं, कोई भेद नहीं सिर्फ दो नारियां एक सतह पर खड़ीं, एक दूसरे को आधार दे रही थीं। समय ने जो घाव दिए थे वो अब छाले बन गए थे,
 उस पर मानो मलहम लगा रही थीं। छालों में पका मवाद फैलने लगा था। मवाद का बह जाना‌ अच्छा होता है वरना घाव की टीस जीते जी मार देती है।

सोफे पर बैठ गई थी मैडम जी। लछमी पानी ले आई। आज वह भूल गई थी कि वह इस घर में नौकर की हैसियत से आई है और एक अधिकारी महिला ने अपने सामने लगे 'अधिकारी' को भुला दिया। पानी का एक घूंट अंदर गया और बहुत सी बातें, बहुत सी यादें दर्द बन कर बाहर निकलने लगी। 
"विवाह हुआ था मेरा और तीन साल बाद ही हम अलग हो गए। शीनू पैदा हुआ, डेढ़ साल की उम्र में ही वह हमें छोड़कर चला गया। उसके हृदय में कुछ समस्या थी, वह ठीक नहीं हो पाया।" गहरी सांस लेकर मैडम जी फिर बोली,  "शीनू के बाद हम साथ रहे ही नहीं सकते थे। वही हमारा सेतु था वरना हम दोनों जीवन के दो किनारे थे। मैं कमाती, घर संभालती, रिश्तेदारियां निभाती और वह सिर्फ खर्च करते। मेरे रंग रूप पर दिन-रात गलियां बरसाते, मेरे पद को गाली देते। परिवार वालों ने ही शादी तय की थी पर किस्मत में शायद यही लिखा था।" आगे कुसुम चुप हो गई इस काम करने वाली स्त्री को क्या बताती कि उसका पति उसके पद और नाम का इस्तेमाल करके लोगों से पैसे भी लिया करता था।

लछमी की ओर देखकर, उसे झिंझोड़ती हुई कुसुम बोली, "शादी के पहले अपने लड़के को जिम्मेदार बनाओ! आने वाली के जीवन का सत्यानाश मत करना लछमी, कभी मत करना।" कुछ देर चुपचाप बैठी रही लछमी फिर चली गई।
 आज वापसी में लछमी बस में चढ़ गई। अपने पैरों को आराम मिलता देख, उसे कमर में खोंसे हुए पैसे निकालने में खुशी हुई। आज शाम को बाप बेटा साथ ही आए।
" मां, आज घास-फूस मत बनाना, अंडा भुर्जी बनाना। बापू लाया है।" कहते हुए उसका बेटा उसे घूरने लगा।
 "आज बाप बेटा साथ में किस बात की खुशी मना रहे हो?" कमर में पल्ला खोंसती लछमी बेटे के सामने तनकर खड़ी थी।
 "आज काम पर गया था तू? जगनू बोला, तू चार दिनों से काम पर जाता ही नहीं है। दारू पिएगा, अंडा भुर्जी खाएगा और अब शादी करेगा।" बिफरती हुई अब अपने पति के सामने  खड़ी हो गई वह।

"तू बनाती है या बापू से बोलूं तेरी पिटाई करने को?" बेटा, बाप की भाषा बोल रहा था।
"सुनी नहीं तू क्या बोल रहा है बेटा।" अपना गिलास भरते हुए लछमी का पति विनोद बोला।
"सुनी ना, पूरी जिंदगी तो सुनी। अभी तक तेरी सुनी, अब तेरे बेटे की सुनूंगी। मैं कमाने जाती हूँ, मैं पैसा लाती हूँ, तुमको बनाकर खिलाती हूँ और अब तेरे साथ यह लड़का भी मेरे को पीटने की बात करने लगा। रुक, सुनती हूँ मैं।"  हाथ में रखे अंडे के पैकेट को जमीन पर पटक दिया लछमी ने। कागज के पैकेट से दुर्गंध फैलाता, सफेद-पीला द्रव बहने लगा जैसे अंदर की ज्वाला बहुत से मलाल लिए बह चली हो।
"साली, तेरी हिम्मत कैसे हुई? रुक, तेरी हड्डी तोड़ता हूँ।" कहता हुआ विनोद चारपाई से उठने लगा।

 पास ही किनारे एक लकड़ी रखी थी। बिजली की फुर्ती से लछमी ने उसे उठा लिया और विनोद को धुनना शुरू कर दिया। 
"मेरी कमाई से घर चलता है, चूल्हा जलता है। तेरे पैसे तो तेरी दारू में उड़ जाते हैं। मुझे मारेगा, मेरी हड्डी तोड़ेगा.. चल आज देखती हूँ मैं, कैसे हड्डी तोड़ता है तू? सीधे पुलिस को बुलाती हूँ। चल, साला हरामी!  तेरी औलाद को भी आज  सुधारती हूँ, मस्ती चढ़ी है उसको भी।"  हांफती हुई लकड़ी लेकर जब मुड़ी तो बेटे को सरपट भागते हुए देखा।
"यह घर मेरे नाम पर है, इसका टैक्स मैं भरती हूँ। बिजली बिल मैं भरती हूँ, मुझे घर से निकालेगा?" 

 विनोद रोता-चिल्लाता, चारपाई पर लोटता रहा, लछमी लकड़ी बरसाती रही। सारे जीवन का हिसाब इतनी जल्दी कैसे पूरा होता? जी भर पीटने के बाद उसने लकड़ी फेंक दी। थोड़ी देर सिर पकड़ कर बैठी रही फिर हाथ पैर धोए।  पेट-पीठ, हाथ-पैरों के गहरे लाल-नीले निशानों को देखती हुई उठी। अपने बाल अच्छे किए और खुद का बनाया हुआ गरम भात थाली में परोस लिया। भात के ऊपर सब्जी डाल ली और पाटे पर बैठ गई। आज खाने में उसे बहुत आनंद आया।  पहली बार उसने अपने हाथ का बना गर्म खाना, खुद पहले खाया था। यह खाना भविष्य के लिए उसे नव ऊर्जा प्रदान कर रहा था।

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