कहानी - संतृप्ति
सावन-भादों की रिमझिम अब मूसलाधार वर्षा का रूप ले रही थी। इस पूरे क्षेत्र के गांँव वासी, बड़ी संख्या में मंदिर के सामने उपस्थित थे। देवी माता की पाट-जात्रा के बाद, आज रथ और पालकी की शुरुआत का मुहूर्त था। दशहरे के त्यौहार की शुरुआत करीब ढाई महीने पहले से करने की पुरातन परंपरा को, कुशलता पूर्वक निभाने वाला यह आदिवासी बहुल क्षेत्र है।
डिबडिबी, संगीत मोहरी की थाप में, अपने सुर लगाते सभी देवी जसगीत गा रहे थे। रंग-बिरंगे कपड़े, सिर पर गमछा लपेटे, गले में कौड़ियों की माला, हाथों में रंगी सजी लकड़ी और मोरपंखों से सजे गांववासियों के स्वर देवी माता से प्रार्थना कर रहे थे।
लेही अवतार दाई दुर्गा
रक्च्छा कर ही हमार दाई दुर्गा।
दाई दंतेश्वरी पैयां परहूंँ तोर
दाई दंतेश्वरी सरन पढ़हूँ तोर।।
पूजा विधि के बाद मुख्य कारीगर देवा ने तिरपाल से ढंँकी लकड़ियों को प्रणाम किया और सबने मिलकर एक बंद सुरक्षित बड़े कमरे में, लकड़ियांँ रख दीं। इन लकड़ियों का स्पर्श सजीव जान पड़ रहा था। उनकी छालों ने कई सालों के किस्सों को अनुभूत किया था। देवा और उसके चार साथियों को पालकी, रथ यात्रा की तैयारी का काम मिला था। आज लोगों की अपार भीड़ में न जाने क्यों देवा को अपने आजा, गुनवा "बबा" याद आ रहे थे। हरियाली अमावस के दिन देवी मांँ से आशीर्वाद लेकर रथ पालकी बनाने का काम शुरू होता हुआ, अलग-अलग चरणों से गुजरता, यह नवरात्रि में रथ परिक्रमा से पूर्ण होता है। आज भी इस स्थान के राज परिवार इस पूजा का नेतृत्व करते हैं, वर्षों से अपनी परंपरा निभाते चले आ रहे हैं।
लोगों की भीड़ अब कम हो गई थी। सभी लकड़ियों को सुरक्षित रखने के बाद देवा और उसके सभी साथी बैठकर आगे के बारे में विचार करने लगे।
"रथ डोली बनाए के मौका मिलिस हमर भाग खुल गे।" लकड़ियों को सुरक्षित स्थान पर रखने के बाद हांँफता हुआ बिसनू बोला।
"सही बोलत हस बिसनू। हमर हाथ लगही, हमर जिनगी भर के पुन है।" धनी ने कहा।
"तै काबर चुप्पे चाप हस रे देवा?" अपने बीच के जवान देवा से उन्होंने पूछा।
"नहीं, मैं सब की बात सुन रहा हूंँ।" फिर सहसा अपनी भाषा बदलते हुए कहा, "तू मन के गोठ सुनत हों कका।"
अब पाँचो कारीगर अपने गांँव की तरफ चलने को तैयार हो गए। अभी शाम होने में देर थी परंतु काले बादलों ने सूरज को अपने पाश में छुपा लिया था। वैसे भी प्राकृतिक संपदा से पूर्ण यह गांँव, हर ऋतु, हर मौसम में अपनी सुंदरता के लिए विख्यात है। मरकत के बिछौने जैसा यह गांँव, जिसमें हाथों से हाथ जोड़े पहाड़ियांँ, उनसे टकराकर कूद-फांँदकर आनेवाली सुगंध भरी हवाएं, इन पहाड़ियों से टकराकर बरस जाने के लिए आतुर मस्त बादलों की टोलियांँ, जगह-जगह से झरते झरनों का जादू, बांँस, महुआ, तेंदू, आम, कटहल, काजू के पेड़ों से घिरा, दुनिया के नक्शे पर जड़ा एक खूबसूरत नगीना है यह गांँव।
अभी उन्होंने पैदल चलना शुरू ही किया था कि बिजली चमकने लगी। आसपास के पेड़ों से टकराकर तेज हवाएं बहने लगीं और पेड़ों पर पंछी डरते हुए चुपचाप अपने-अपने घोसलों में घुस गए थे। सहसा, बड़ी सी बिजली कौंधी और उसकी चमक में देवा को अपने बबा का मुस्कुराता हुआ चेहरा, क्षितिज पर दिखाई देने लगा।
झुर्रियों वाला सुंदर चेहरा, सर पर गमछा, छोटी-छोटी मूंँछ, छोटी उगी दाढ़ी, बीड़ी से पीले पड़े दांँतों वाली मुस्कुराहट, कानों में बारी, गले में धागे में बंँधा लकड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा।
"बबा।" देवा के मुँह से निकला और अगले ही क्षण दूर-दूर तक आकाश में कुछ भी नहीं था। उसके बबा, उसकी जिंदगी के आधार थे, उसके गुरु और भाग्य विधाता। वे प्रकृति के इस विराट स्वरूप में अपना अस्तित्व दिखाकर, उसे आशीर्वाद और बधाई देने आए थे। आज उनकी अतृप्त इच्छा पूरी हुई थी।
क्षितिज की उस चमक में विलीन होते बबा, उसकी स्मृतियों में स्पष्ट होते गए। अपनी उम्र के दस वर्ष तक का उनका साथ, आज भी देवा के पैंतीस वर्ष की आयु का स्वर्णिम काल है। गुनवा बबा के इकलौते बेटे दुकालू का, वह इकलौता वंशज है। उसके बबा उसे प्राणों से भी ज्यादा प्यार करते थे।
अंग्रेजों की गुलामी में अपना बचपन बिताने वाले उसके बबा, यानी गुनवा स्वतंत्रता-संग्राम के जलते दीपक को देखने का साक्षी था। अंँग्रेजों के अत्याचार, उनकी रंगभेद, उनकी घृणा भोगने के बाद एक सशक्त सरकार के लिए, इस बड़े आदिवासी बहुल क्षेत्र के राजा ने अपनी स्वीकृति दी थी। जैसे-जैसे गुनवा युवा होता गया वैसे-वैसे अपनी कलाकारी के लिए प्रसिद्ध होते गया। लकड़ी लेकर बैठता तो उसे तराश कर, सजीव साकार रूप देता। सबसे पहले उसने कुलदेवी माँ मोहिनी का चेहरा तराशा था, लगा माता ने उस चेहरे में प्रवेश कर लिया हो। सजीव बोलती आँखें, कोरों पर से छलकता स्नेह का सागर, अधखुली पलकें, माथे पर एक और नेत्र जो बंद है, कानों में कुंडल-बाली, गले में हार। इतनी बारीक खुदाई से उकेरा था लकड़ी पर शक्ति की प्रतिकृति को। गांँव भर ने उस चेहरे को साक्षात देवी का अंश मानकर, मडिया बनाकर वहांँ उसकी स्थापना की। आज भी वह मडिया शक्ति और भक्ति से पूजी जाती है।
बबा, एक ऐसे कारीगर जिन्हें अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने कार्य से मुख मोड़ लेना पड़ा था। उन्होंने गांँव के हर बच्चे और जवान में अपना यह गुण रोपने का प्रयास किया। वे इस पारंपरिक कला और कारीगरी को जन-जन तक पहुंँचाना चाहते थे। वह अपने साथ देवा को जंगल ले जाया करते, कई लकड़ियों की पहचान कराना, छालों और लकड़ियों का स्पर्श करके उनके बारे में बहुत सी बातों की जानकारी दिया करते थे। कम उम्र में ही देवा ने लकड़ियों के रूपों, उनके गुण उनके टिकाऊपन को समझ लिया था।
"आज अब्बड पानी बरसत हे, कोन जाने रात भर गिरही का?" पानी भरे गड्ढे में पैर छपकाते हुए धनी बोला।
"आज देवी-देवता घलोक खुस हें, गुनवा बबा के आत्मा तृप्त होही।" देवा के पिता के हमउम्र जीतन काका ने कहा।
उत्तर में देवा ने दोनों हाथ जोड़ लिए। अभी भी सूर्यास्त नहीं हुआ था परंतु सूर्य को ढांँककर बदलियों ने रात्रि का ऐलान कर दिया था।
आज भी बबा की याद देवा की राह को प्रकाशित करती है। स्वयं अनपढ़, अशिक्षित होने के बावजूद उन्होंने देवा में पढ़ने-लिखने, काम सीखने की ललक उत्पन्न की थी। याद है उसे, सरकारी पाठशाला में दाखिला के लिए बबा ही लेकर गए थे।
"ये लड़का तोर का लागथे बाबा?" गुरु जी ने पूछा था।
"का बताओं गुरजी, ए मोर पोता है, मोर आसरा मोर सब कुछ है गुरजी।" कहा था बबा ने।
"एकर माँ-बाप नहीं आइन?" गुरूजी ने प्रश्न किया।
एकटक नीचे देखते रहे बबा फिर बोले, "एकर दाई-ददा सब मिहीच हों गुरजी। बाप ला कोई बात के होस नई रहे, दाई बपरी एकर जलम के बाद मर गिस।" कम शब्दों में जिंदगी की किताब खोल दी थी बबा ने।
बबा के साथ रहकर देवा ने पाठशाला की पढ़ाई की। वह उनके साथ ही जंगल जाता, कंदमूल, फल जमा करता और उनके अनुसार लकड़ियों के टुकड़े उठाता तो कभी-कभी लकड़ियाँ काटता भी और घर के आंँगन तक उठा लाता। उसके बबा हस्त विहीन थे परंतु उनके सपने, उनकी इच्छाएं अभी भी पंँख लगाए उड़ा करती थीं ।
एक लकड़ी के टुकड़े को देवा ने रिंदा किया, उसे सूरज का आकार दिया, तेल पॉलिश करके उसे चमकदार बनाकर और बबा को दिखाया।
"कतेक सुग्घर बनीस बेटा, मोर सिखावन तै समझ ले हस। झाड़ पेड़, नदी तलाव, चंदा सूरज, भूइयां, हमर देवी-देवता हैं। झाड़ के लकड़ी काटबे, झाड़ काटे के जरूरत नो हे।" खुश होकर समझाया था उन्होंने।
उन्हीं के आशीर्वाद से देवा ने गांँव में आठवीं तक और दो साल पास के छोटे से शहर में दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की थी। उसे गांँव के बाहर के जीवन का अंदाजा आ गया था। बबा तो नहीं थे परंतु उनकी सीख दस साल की उम्र में ही उसने समझ ली थी।
"गुनवा बबा ला बहुत मान मिलत रहिस। हमर पुराना राजा, बबा ला बोलात रहिन। ओकर हाथ के बने मूर्ति, जिनिस ला अपन घर में, राज दरबार में सजात रहिन, जानत हो तुमन।" जीतन ने सभी को जानकारी दी।
जीतन, जो गुनवा बबा के बेटे दुकालू का हमउम्र था उसने बबा को अपना गुरु मानकर लकड़ी की कारीगरी उनसे सीखी थी।
देवा के जेहन में अपने घर के बरामदे में लटकी, पुरानी श्वेत श्याम तस्वीर वाली फ्रेम कौंध गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजा जी के साथ बबा की थी यह।
"जात्रा के रथ, देवी दाई के मुख, पालकी सब मिहिच बनाए रहौं। दू-तीन मितान संगी रहिन, हमार राजा खुश हो गये रहिन।" बाबा हर दिन फोटो निहारते थे।
"राजा जी के महल में फोटो वाला आए रिहीस, मोर संग फोटो खैंचे रहिन राजा जी। धोती, साल गमछा दे रहिन मोला।" उस फोटो फ्रेम के ऊपर हाथ फिराते हुए बबा, दूर-दूर तक अपने इतिहास में डूबते जाते थे।
आदिवासी बहुल क्षेत्र का इतिहास भी इन्हीं की तरह दबा-छुपा रहा है। स्वतंत्रता के पहले से राज परिवार की जो परंपरा यहाँ है वह गांँववासियों, आदिवासियों के लिए आज भी सम्मान की बात है। बबा बताते थे कि उस समय जो राजा था वह आदिवासी जनमानस का देव था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस क्षेत्र के विकास के लिए, लोगों की भलाई के लिए, इसे केंद्र की सरकार में मिला देने की स्वीकृति राजा ने दी थी परंतु जंगली जीवन जीते लोगों का शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा, पक्की सड़कें, मुख्य धारा में शामिल होने का सपना, सपना ही रह गया।
राजाजी आदिवासियों के उत्थान के लिए सरकारी नियमों में बदलाव चाहते थे। बाहर के लोग आकर इन लोगों की जमीनों पर अधिकार जमाने लगे और प्रकृति का दोहन करने लगे इसलिए राजाजी को यह सब पसंद नहीं था पूरा गांँव उनके समर्थन में खड़ा था।
आदिवासी जनमानस की बुलंद आवाज़ें केंद्र सरकार तक पहुंचने लगीं कि अब आदिवासी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने लगे थे। पैसेवालों की शक्ति इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने में जुटी थी। घोर आंतरिक विरोध का, सीधे-सादे, निश्छल लोग शिकार होने लगे।
अचानक एक रात राजमहल पर आक्रमण हुआ नकाबपोशों ने राजा के सिपाहियों को मार दिया और राजा की भी हत्या कर दी। उस समय उनका पुत्र शहर में शिक्षा प्राप्त कर रहा था।
समय के साथ सरकारी शिकंजा कसता रहा और राजाओं की दौलत सरकारी नियंत्रण में आ गई। कुछ सालों की कसाकसी में, आदिवासियों का जीवन बदतर होता गया। उनके घर द्वार, खेत-खलिहान, वन्य एवं खनिज संपदा पर बाहरी लोगों की नज़रें थीं।
"फिरंगी मन कोड़ा मारत रहिन, अपन सरकार के मनखे पेट में लात मारथें। हमर अन्न-धन, मुर्गी तीतरी, फल-फूल, लकड़ी ला ले जात रहिन।" बबा को स्वतंत्रता का यह रूप बिल्कुल पसंद नहीं था।
फिर इन क्षेत्रों के शूर भील गोंड युवाओं ने खुलकर विरोध करना शुरू किया। राज परिवार की शक्ति घट गई थी वह सिर्फ नाम मात्र को अब राज परिवार रह गए थे फिर भी गांँव वालों की मांँग पर उनकी सहमति हमेशा रही। एक खुला युद्ध अब स्वतंत्र भारत में था। पिछड़े, आदिवासी, जनजातियों के अधिकारों और उन्हें दबाने वाली सरकार के बीच का युद्ध। कई लोगों को जबरदस्ती जेल में ठूंँस दिया गया। लड़कियों और औरतों पर अपने ही लोगों ने अत्याचार किए थे। गांँव की त्रासदी नासूर बनती जा रही थी और अब गुनवा को भी अपना जीवन खोखला लगने लगा था। अपने बेटे की शराब की लत, दिनभर आवारा सा घूमना, पड़े रहना और अपना हुनर उसे ना सीखा पाने का दुख भी वह अपनी छाती में समेटे घूमता रहता था गुनवा।
चलते-चलते जब जीतन कका थक कर रूक गए, तब सारे लोग भी बरसाती, छाता ढांके उनके आसपास खड़े हो गए।
"कल से में मोटरसाइकिल ले आहूं कका, तैं थक जाथस।" देवा ने पिता तुल्य जीतन को सांत्वना दी।
"तोर सब गुन सभाव तोर बबा जैसन हवे रे देवा। जात्रा ला चालू रखे बर वो अपन जमीन बेच दे रहिस।" बबा के साथ बहुत सारा समय बिताए जीतन काका ने बताया।
इस बात का जिक्र तो देव के पिता दुकालू ने भी कई बार किया था। वह हमेशा कहते थे कि जमीन बेचकर यह पूजा पालकी, पाट जात्रा करने का शौक डोकरे को है। आदिवासी मान्यता और परंपरा की यह जात्रा, रथ परिक्रमा हमेशा चलती रहे, इसकी जिम्मेदारी बबा ने अपने कंधों पर ले ली थी। पूजा का पहला मान राजपरिवार के वंशजों को ही दिया गया था।
नवरात्र के नौ दिनों में पूरे गांँव में परिक्रमा की जाती। आदिवासी क्षेत्र से जुड़े सभी गांँववासी इसमें शामिल होते। राजा के वंशज पूजा की शुरुआत करते मुंडा बाजा, संगीत मोहड़ी, झांझ, नगाड़ा की लय जाप पर झूमते गाते, ध्वजा उठाते सभी परिक्रमा करते।
एक बरस, जब छठवें दिन की पालकी जात्रा गाजे-बाजे के साथ निकली, ना जाने कहाँ से विद्रोहियों का दल सामने आ गया। यह वही असंतुष्ट आदिवासी युवा थे जो सरकार का विरोध करते-करते ना जाने कब अपनी परंपराओं के भी विरोधी हो गए थे। सबके चेहरे कपड़ों से ढँके थे। पालकी में लगी सोने-चांँदी की मूठें, तलवार, माता की ध्वजा दंड, जो भी था वह निकालने लगे। गुनवा सामने आकर खड़ा हो गया।
रथ के सामने दोनों हाथ फैलाकर वह उस शक्ति का संरक्षण कर रहा था जिसके इशारों से यह दुनिया चलती है। उसके पीछे उसके कुछ साथी कारीगर भी आकर खड़े हो गए। विद्रोहियों ने हटने का आदेश दिया इस बीच पुलिस के चार जवान आ गए। विद्रोहियों और पुलिस के बीच आक्रमण-प्रत्याक्रमण हुए। गांँव वाले सुरक्षित जगह में जाकर छुप गए थे। विद्रोहियों ने पुलिस की बंदूके छीनकर, दो पुलिस वालों को मार गिराया और अब पालकी की ओर बढ़ते हुए वह गुनवा को सावधान करने लगे।
"अबे, सामने से हट साला। राजा के नौकर हस तेहा।" वो पालकी की ओर बढ़ रहे थे और गुनवा दृढ़ता से दोनों हाथ दाएं-बाएं फैलाए खड़ा था।
"मोर परान चले जाएं, मैं पालकी नहीं देहुं।" कहते हुए अटल खड़े गुनवा का चेहरा, विश्वास से दमक रहा था।
विद्रोह की ज्वाला धधक रही थी और आदमी को जानवर बना दिया था। दोनों ओर से दो लोग आगे बढ़ते रहे, हाथ फैलाए गुनवा बाबा के बाजू में पहुंँचकर खड़े हो गए। एक क्षण उन्होंने कुछ नारा लगाया और फरसे से दोनों तरफ की भुजाएं काट डालीं। गुनवा बाबा पीड़ा से चीखते हुए गिर पड़े, लोगों में हाहाकार मच गया। देवी माता की पालकी, इसमें से लगे सोने-चांदी के मूंठ, पादुका सब कुछ लूट कर वह ले गए। तड़पते हुए गुनवा ने माता की पालकी को लुटते हुए देखा, जो उसके जीवन का वह घाव था जो शायद मृत्यु तक नासूर बना सड़ता रहा।
इस घटना के बाद गुनवा बबा मौन हो गए। आदिवासियों को अपना भविष्य अंधकार में डूबा नजर आने लगा था। बाबा ने अपने ही आंगन में बच्चों और जवानों को लकड़ी पर काम करना, लकड़ियांँ तराशना, आकार बनाना सीखने लगे। उन्होंने अपने बेटे दुकालू का विवाह पास गांँव की सतरूपा से कर दिया। सतरूपा अच्छी लड़की थी उसने इस उजड़े झोपड़ी नुमा मकान को, घर बनाने की पूरी कोशिश की। बाबा तन्मयता से बच्चों-जवानों को, काठ प्रतिमा बनाना सिखाते थे। हाथ तो नहीं थे परंतु उनकी बोली, उनकी आंँखों का तजुर्बा और उनके अनुभव से बच्चे सीखते थे।
सतरूपा के गर्भ में देवा आया और गुनवा बाबा के सपनों को पंँख लग गए।
"नोनी होही चाहे बाबू, ओला लकड़ी के काम सीखाहूं।" उनकी बात सुनकर उनका बेटा दुकालू ठठाकर हंँसने लगा था।
"मोला नहीं सीखा पाइस डोकरा, मोर लइका ला सिखाही कहथे।" सतरूपा पति की बात से दुखी हो गई थी।
अभी परीक्षाओं का अंत नहीं हुआ था। ईश्वर की लीला ऐसी थी कि देवा ने इस दुनिया में प्रवेश किया और उसके रोने की आवाज सुनने के कुछ ही देर बाद, उसकी मांँ सतरूपा दुनिया से चली गई। एक बार फिर दुनिया, घर-आंँगन सब सूना हो गया था गुनवा बबा का। दुकालू तो वैसे ही घर से मतलब नहीं रखता था अब पूरी तरह से स्वच्छंद होकर दिनभर देसी दारू के ठीहे पर बैठा रहता। चावल और महुआ की दारू पीकर मस्त पड़े आदमी को छोटे बच्चे और बूढ़े बाप, किसी की कोई चिंता नहीं थी।
जंँगल, आदिवासियों के मांँ-बाप होते हैं। कंदमूल, फल-फूल, महुआ, आंवला, कटहल का इंतजाम करते थे बबा। उनकी खेती का टुकड़ा, आसपास के लोग जोत-बो देते, इससे दो समय का भात मिल जाता था। यह धरती मांँ कभी किसी को भूख नहीं मरने देती और धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता गया। आसपास देखता गया, सीखता गया, समझता गया और उसको अपनाता भी गया। दस साल अपने साथ रखकर इस भीड़भाड़ वाली दुनिया में, अपने आप को संभालने का तौर तरीका सिखा गए थे उसको गुनवा बबा। आज वह अपने आजा की तरह बेहतरीन कारीगर है। उसकी बनाई लकड़ी की प्रतिमाएं, दीवारों पर लगाने वाली सुंदर कलाकृतियांँ, शहरों में पसंद की जाती हैं।
कारीगरों का यह समूह, अब गांँव के मुख्य रास्ते पर आ गया था। वर्षा ने भी अपनी तेजी कम कर दी थी। पक्की साफ सुथरी सड़कें, खंँभों पर चमकते बल्बों की रोशनी, सुंदर सी पाठशाला, सभी के लिए शौचालय की व्यवस्था, कितना बदल गया था उनका यह गांँव? इसी बदलाव के इंतजार में कितने प्राणों ने अपनी आहुतियांँ दी थीं।
"चलो संगवारी कल मिलबो, इहीच जगा में।" एक-दूसरे को जोहारते वो अपने घरों की ओर बढ़ गए।
"जीतन कका, तैं मोर मोटरसाइकिल में जाबै।" देवा ने फिर से उन्हें याद दिलाया और अपने घर का रास्ता पकड़ लिया।
"आपने सबके साथ पूजा की। नए राजा जी ने आपके हाथों में नारियल दिया था पिताजी। आप इस साल पाट जात्रा की पालकी बनाने वाले हो ना?" देवा के बेटा-बेटी उससे लिपट गए और उसकी पत्नी मुस्कुरा रही थी।
"हांँ बेटा, आज देवी माता खुश है। आज हमारे बबा की आत्मा भी खुश है, तृप्त हो गए वो। जो काम सालों साल गुनवा बबा ने किया, आज वापस उनके इसी घर में वह आया है।" अपने सामने फ्रेम में लगी उस श्वेत-श्याम और कुछ पीली पड़ी तस्वीर में मुस्कुराते बबा को देखकर देवा ने हाथ जोड़ लिए और आंँखें बंद कर लीं। कोने के खाट पर पड़े दुकालू ने करवट बदली, उठ कर बैठा और आज पहली बार उसने अपने बाप की फोटो के आगे हाथ जोड़ा था।
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