बुधवार, 26 नवंबर 2025

1121 2122 1121 2122पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 
फ़िलबदीह - 54
दूसरा चरण 


1121 2122. 1121 2122

पड़ा राहों में था पत्थर, बना अब  वो देवता है 
ये जो दूरी तय की उसने, यही उसकी साधना है।।1।।

न समझ सके जो दिल को, न सुने जो मौन भाषा
पड़े बोलना सभी कुछ, तो ये रिश्ता खोखला है।।2।।

सुनो, बरसों बाद घर में, कहीं कुछ हुई है हलचल 
बना छज्जे पे नया जो, वो बया का घोंसला है।।3।।

कभी नभ वो छू के आता, डुबकी कभी लगाता
कभी फूल सा लजाता, ये तो मन ही बावरा है।।4।।

चलो, गाँव ढूंढ आएं, ये शहर भी छान आएं
यहां आदमी भरे हैं, जो मनुज था, लापता है।।5।।

है निराली खूब दुनिया, करे प्रेम का दिखावा 
जरा मन में झांक देखो, तो वहां ज़हर भरा है।।6।।

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शर्मिला चौहान

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