कहानी - सुंदरी
दस-बारह फुट का साधारण पुताई वाला असाधारण कमरा था वो। जहांँ रंगों की विविधता, उसकी दीवारों की छिली छातियों पर पर्दा डालने के लिए प्रयासरत थी। पीले रंग का मद्धम बल्ब कुछ चीजों को रोशन कर रहा था जिनमें से एक थी सुंदरी। पीली रोशनी में उसका प्रौढ़ होता, कुछ भरा-भरा सा शरीर सोने की आभा बिखेर रहा था। चालीस-पैंतालीस में भी नैसर्गिक सौंदर्य से दमकती थी सुंदरी।
"ऐ भुल्लन कहांँ मर गया था रे तू! तेरा नाम ही तेरी मैया ने ऐसा रखा कि जो बुलाए वह खुद सब भूल जाए।" पान से सने अपने लाल होठों से अंगार उगलती सुंदरी ने कहा।
"मरा कहांँ था, तेरे दर पर तो पड़ा था।" ढीला कुर्ता, घेर वाला पजामा पहने, अटपटी सी कहीं-कहीं उगी दाढ़ी पर हाथ फेरते, चालीस साल का दुबला पतला, कंधे तक के पतले-पतले बालों को फैलाए भुल्लन आ गया। उसके लिंग निर्धारण का फैसला जब ईश्वर ही नहीं कर सका तो इस दुनिया की क्या बिसात थी।
"अरे चौक के बर्तन की दुकान से दो पीतल की दीये लाना है भुल्लन। तेल-बाती सब ले आना वरना एक काम को तीन बार में पूरा करेगा, वह भी पजामा संभाल-संभाल के।" जोरों से हँसते हुए सुंदरी ने कहा।
"आज क्या जोगन बन रही है इस कोठे की सुंदरी जो दीपक-बाती की जरूरत पड़ी?" ठुड्डी पर तर्जनी लगाए भुल्लन ने पिचके गालों को सिकोड़ कर, आँखें फैला लीं।
"अब ढलते सूरज को तो दीपक का सहारा लेना ही पड़ता है रे। बताया था ना कि आज का कस्टमर बड़ा अजीब है, उसकी सनक का नतीजा यह कमरा है।" सुंदरी ने पान की पिक, पिकदान में पिच्च से थूक दी।
"आज तू भी तो सालों बाद बैठी है दीवान पर, क्या ज़माना था तेरा भी बड़े चाहने वाले थे तेरे।" अतीत का सुनहरा पन्ना भुल्लन ने अपनी जुबान से साक्षात दिखा दिया।
सिर हिलाता हुआ भुल्लन, एक थैला लटकाए चौक की ओर दौड़ गया।
बीस-बाइस साल की तीन-चार लड़कियों ने कमरे को सजाना शुरू किया। सुंदरी के कहने के अनुसार कमरा सज गया। कोठे के इस कमरे को सद्गृहस्थ के घर का चोला पहनाया गया। दीवारों पर तिथि का कैलेंडर, दरवाजे पर स्वास्तिक और शुभ चिन्हों को उकेरती लड़कियों को, अपने घरों की धूमिल आकृतियाँ कुछ सजीव सी जान पड़ने लगीं।
"सुनी, तेरा घर कितना याद है तेरे को?" मन्नू ने सुनंदा से पूछा।
"जितना एक महीने पहले का ग्राहक है। पता नहीं साला क्या पाप किया था कि बचपन में ही बेच दिया! कौन मांँ-बाप बेचते हैं?" सुनंदा के हृदय की कड़वाहट, जुबान से पूरे कमरे में फैल गई। सद्गृहस्थ कमरा, गालियों की बौछार से कसमसा गया।
"मुझे तो याद है एक तालाब था, जिसके पार पर आम-बेर के पेड़ थे। मंदिर था, जहां मैं और मेरी छोटी बहन खेलते थे। माँ जब भी कपड़े धोने जाती थी हम दोनों उसके साथ जाते थे।" मन्नू की आँखों में डूबने लगी थी सुनंदा आँखों के कोर से तालाब का पानी छलकने लगा था।
"ये क्या याद हुई? हर गाँव में तालाब, मंदिर और किनारे पेड़ लगे रहते हैं।" सुनंदा ने वातावरण को हल्का किया।
"यह लाया सब दीया-बाती, तेल और दरवाजे पर चिपकाने का फोटू।" गर्दन और हाथ मटका कर भुल्लन बोला।
"तुझे तो एक चीज ज्यादा लाने की आदत ही है! पता नहीं भगवान ने तुझे कम क्यों दिया?" ऊपर से नीचे उसे घूरती हुई सुंदरी ने बोला।
"अरे! अब घर कमरा सजा ली हो तो इस सुंदरी पर भी किरपा कर दो। पैंतालीस की उम्र में तीस का ग्राहक, अंधेर है जमाना भी! छोकरे को अठारह से पच्चीस तक की इतनी छोकरियों में कोई पसंद नहीं आई।" माथे पर रेखाएं बढ़ाती हुई, वह बड़बड़ा रही थी।
"ऐ मवशी, तू वाईन है वाईन, वो भी ओल्ड! जबरदस्त डिमांड है छोकरे की।" एक आँख दबाती कुमारी बोली।
"बड़ी फटाक-फटाक बोलती है रे ये। हजार कस्टमर के बाद भी तभी कुमारी है।" सुंदरी के बोलने पर सब हँसने लगे।
बोल तो गई सुंदरी फिर उसने झुकी तिरछी नजरों से कुमारी को देखा। आठ साल पहले अधमरी सी मिली थी रेलवे पुल के नीचे। महीने भर तक तो कमजोरी और बुखार से मूर्छा टूटती फिर अचेत हो जाती।
डॉक्टर साहब ने उसके गर्भवती होने की पुष्टि की और साथ ही दुनिया भर की विटामिन और खून बढ़ाने की दवाई, गोलियां सब दे गए। सेवा जतन से कुमारी बच तो गई पर भ्रूण पूरे अंकुरण से पहले ही बिखर गया। एक मानसिक रोगी बनकर रह गई थी वह। सभी लड़कियों ने बड़े प्रेम से उसकी सेवा की और फिर वह इस कोठे की एक और सदस्य बन गई।
"सुंदरी मावशी! यह कोठा तूने बनाया, बसाया ना?" मन्नू ने सुंदरी के जूड़े में मोगरे की लड़ियाँ लगाते हुए पूछा।
"कोठे तो सजते हैं मन्नू, यह घर परिवार थोड़े ना है कि जिसे बनाया और बसाया जाए।" डूबती सी थकी आवाज में सुंदरी बोली।
मोगरे की खुशबू नथुनों से घुसने लगी और सुंदरी उसकी महक में गुम होने लगी। दस साल की उम्र में ना कपड़े पहनने का शऊर ना बाल-कंघी का, दिन भर मोहल्ले के बच्चों में खेलना ही जीवन था उसका। मजदूरों की बस्ती, जो काम जहाँ मिले वहीं ठिकाना बना लेती, बस्ती बसा लेती।
बाप था, वह जो थी उसके साथ एक औरत थी, माँ तो नहीं थी उसकी। उस औरत का भी अपना एक बच्चा था जो लड़का था, जिसे वह सीने से लगाए रखती। बाप उसके कहे उठता उसके कहे बैठता।
एक दिन उस औरत ने एक सुंदर छींटदार लहंगा-ब्लाउज लाकर दिया। उसके बालों में तेल चुपड़ा, रिबन बांधकर सुंदर फूल का आकार दिया। पैरों में आलता लगाने लगी।
"क्या मेरा ब्याह हो रहा है?" अपना साज श्रृंगार देखकर दस साल की बच्ची पूछने लगी।
"हांँ, ब्याह ही समझ।" उस औरत ने अपनी टिकली की डिबिया से एक पारदर्शी गुलाबी टिकली, मेन सहित उसके माथे पर चिपका दी। आज उसने अपने गोदी के बच्चे को एक बार भी सीने से नहीं लगाया था।
उस एक घंटे में दस साल की बच्ची ने मानो पूरा बचपन जी लिया। उसने आंँचल में बंधे गुड़ की एक डली बच्ची के मुंँह में ठूँस दिया। बच्ची के मुंँह का गुड़ घुलकर, मुंँह से हृदय तक जीवन की मिठास फैला रहा था। तैयार करके लड़की का हाथ पकड़े वह बाहर निकलने लगी कि लड़की दौड़कर बरामदे में लगे शीशे के सामने खड़ी हो गई।
"अब और क्या बाकी रह गया तेरा सोलह सिंगार करके मुँह मीठा करके ही भेज रही हूंँ।" कहती हुई लड़की का हाथ खींचते तेजी से वह गली के बाहर निकल गई।
उसके गोद का बच्चे को, आज उसके पति यानि उस दस साल की बच्ची के पिता ने संभाल रखा था। मोहल्ले से बाहर गांँव-शहरों की गंदगी ढोता नाला और नाले की दूसरी ओर कुछ खंडहर होते घर, पुराने सामानों से भरा गोदाम जो कबाड़ियों की मिल्कियत थे, ऊंघ रहे थे।
एक खंडहर के पास वह रुकी, इधर-उधर देखा। साइकिल पर दो आदमी दूर खड़े रुमाल हिला रहे थे। उसने लड़की के कानों में फुसफुसा कर कुछ कहा और उसे वहीं खड़ा करके उन साइकिल वालों के पास चली गई। दस मिनट बाद अपने ब्लाउज में कुछ ठूंसते हुए वह उधर से ही निकल गई और वह दोनों साइकिल सवार लड़की के पास आ गए।
लड़की ने घबरा कर कदम पीछे किया तो पानी के छोटे गड्ढे में पैर छपक गया। लड़की ने देखा पैरों का महावर पानी की सतह को गुलाबी कर रहा था। उसके पैर का महावर घुल कर पानी को रंगीन बना रहा था और पैरों को रंगहीन। वह कुछ और सोचती तब तक एक आदमी ने अपनी मजबूत हथेली से, उसका चेहरा दबा दिया। कुछ क्षणों तक उसे आसपास की सुध थी फिर एक अनजान जगह में ही वह चेतन हुई।
एक कमरा मानो बित्ते से नाप-नाप कर बनाया हो। मैली-कुचली चादर वाली खाट, छोटा सा गत्तों के टुकड़ों वाला डिब्बा जिस पर एक बोतल, दो गिलास, कुछ चना-चबैना रखा था। इस प्रकार की बोतल से हर मजदूर का बच्चा वाकिफ था। उसके घर के आले, बरामदे के कोनों पर यह उसे सहज मिल जाती थी। कई बार इस बोतल की दवा को अपने गले से गटकने के लिए मजदूर, अपनी बीवी को एक रात के लिए गिरवी भी रखने को राजी रहता था। इतनी ताकतवर दवा है इस बोतल में जो इंसान को शैतान बना दे, राजा को भिखारी और भिखारी को सेठ।
उसने आँखें खोल कर देखा तो मोगरे की माला कलाई में बांधे वह दोनों, बोतल की लाल दवा गिलास में भर रहे थे। मोगरे की सुगंध, उस गंदे अंधेरे से सीलन वाले बदबूदार कमरे में, सांस भर रही थी। कुछ मिनट बाद उस सुगंध को अपने शरीर के पास पाकर वह हड़बड़ा कर उठने लगी। उस सशक्त हथेली ने उन्हीं सुगंध वाले मोगरों से उसकी सांसें रोक दी। वह ना चीख सकती थी ना अपने को छुड़ा सकती थी। मोगरे की सुगंध उसके मस्तिष्क के चेतन, अर्थ चेतन में घुसती चली गई और पैरों का बचा महावर अब उसे गंदी, झिरझिरी चादर को रंगने में लगा था।
"इतना क्या सोच रही मवशी कोई नवी थोड़े ना है तो धंधे में।" लड़कियों में से सबसे तेज पटाखा जैसे बोलने वाली यह कुमारी थी।
सफेद साड़ी में लाल चौड़ी किनारी, माथे में सिंदूर का लाल टीका, पाँव में महावर और होठों पर हमेशा की तरह पान की लाली। शीशे में अपने को अपलक देखती रही सुंदरी।
गृहस्थ कमरे में दीया-बाती का पावित्र्य, अपनी गुण राशि बिखेर रहा था। आज अगरबत्ती की महक में कोई सांसारिक उन्माद नहीं, आत्मा तक रिसने वाला माधुर्य था। मलयागिरी के चंदन में भी तो विषधर लिपटे होते हैं पर वह ईश्वर के माथे पर चढ़ाया जाता है। विषधर को कंठ के चारों ओर लपेटे विष का पान करने वाले शुभकारी शिव इस नश्वर संसार के आदि, मध्य और अंत हैं। इन स्त्रियों से घृणा करके प्रकृति से मुंँह नहीं मोड़ा जा सकता क्योंकि ये स्वयं प्रकृति हैं।
"सुंदरी, आज तू परम सुंदरी लगती है रे! ऐसा रूप ऐसी सुंदरता जिसमें सिर्फ सच्चा श्रृंगार झलकता है सुहागन का सादा श्रृंगार। कोठे पर रहने वाली औरतों का श्रृंगार इस श्रृंगार से बहुत अलग होता है क्योंकि वे इस सादे श्रृंगार को भूल जाती हैं। यहां आने वालों को घरेलू नहीं कुछ अलग बाजारू सौंदर्य लुभाता है।" सोचती हुई सुंदरी अपनी सोच पर झल्ला उठी।
"एक दिन के ग्राहक के लिए क्या वह इस बाजार के नियम बदल देगी? इतनी सादगी प्रिय थी तो इन लड़कियों को इस दुनिया का तामझाम क्यों सिखाया? बेशर्मी की चादर क्यों ओढ़ाई?" कहते हुए उसने भुल्लन को पुकारा।
"वह टेलर मास्टर क्या लड़कियों के कपड़े त्यौहार के बाद देगा? यह सब अपनी जात दिखाते हैं, कपड़े मुफ्त में नहीं सीलता वो। उसके पसंद की लड़की मिलती है उसको हर दो-तीन महीने में।" भुल्लन को जाते-जाते जोर से कहा सुंदरी ने।
"तेरे को याद नहीं क्या चार महीने से वह पान वाला अपना बिल ठोकता है, तू पान खाती है पर हिसाब इन लड़कियों को चुकाना पड़ता है।" मुंह बिचकाकर भुल्लन बाहर जाने लगा।
"तो क्या तू चुकाएगा बिल! काम का ना काज का ढाई मन अनाज का। उस हमीदा के बच्चे की तबीयत खराब है उसकी दवा भी लाना जा।" सुंदरी ने एक और हुकुम दाग दिया।
कैसा संसार है यह? इस गली में आज भी वस्तु विनिमय की प्रथा चालू है। पान, कपड़ों यहां तक की अनाज, फल, सब्जी-भाजी के लिए पैसों की नहीं स्त्री नामक वस्तु का आदान-प्रदान होता है यहां। बड़े अधिकारियों, पुलिस विभाग के लोगों, राजनीति की बड़ी-बड़ी बातें करने वालों के लिए यहां विशेष सुविधाएं उपलब्ध हैं जिससे इस गली के दरवाजे-खिड़कियां हमेशा खुली रह सकें।
सामने दरवाजे पर तोरण लगाते भुल्लन को देखकर सुंदरी मुस्कुराई। अपने पैरों में लगी महावर देखने लगी तो मन्नू के धक्के से टेबल पर रखा गिलास लुढ़क गया और एक बार फिर उसके महावर का रंग पानी में मिलकर बहने लगा।
"महावर लगाने की किस्मत नहीं लिखी ऊपर वाले ने मेरी। नौटंकी भी करने नहीं देता मेरे को यह।" अपने पैरों को ऊपर सिकोड़ते हुए बड़बड़ा रही थी सुंदरी।
नीचे गिरा पानी एक बार फिर लाल हो गया था और सुंदरी को उन वादियों में बहा ले चला जिन वादियों में वह गिरती चली गई थी। संभलने और खड़े होने का कभी समय ही नहीं दिया था वक्त ने उसे। आज भी उसकी देह झुरझुरा जाती है। उस दस साल की बच्ची पर हुए अत्याचारों से, क्या करती बच्ची? एक मांस का लोथड़ा बन पड़ी रहने के सिवाय। उन दोनों ने सप्ताह भर उसे वहीं रखा। खाने के लिए मुर्गी का भुना मांस, पाव रोटी, कभी समोसा देते थे। भूखी, नासमझ, दुखी और कमजोर बच्ची दिन भर में उसे कुतर डालती।
महावर के रंग का बहाव रुका नहीं। लाल पानी सरकता हुआ पास पड़े पायदान को छूने लगा उसने अब अपनी दो-तीन धाराएं बना ली थीं।
उसके जीवन का बहाव भी कुछ ऐसी ही धाराओं में बंटते-टूटते, अपने साथ लोगों की गंदगी समेटे, महानगर के इस कोठे पर आ गया। अब दस साल की बच्ची ग्यारह की हो चुकी थी। साल भर की दरिंदगी उसके रोम रोम से फूटती थी। रोबदार औरत सामने थी और दो आदमियों के बीच में थी वह बच्ची।
"क्या नाम है छोकरी तेरा?" भारी आवाज में उसने पूछा। आदमियों के साथ खड़ी बच्ची मौन थी।
"अरे बहरी गूंगी है क्या? सुनाई नहीं दिया?" वह गुर्राई थी।
बहते पानी ने पत्थरों से टकराना सीख लिया था और टकराने का परिणाम शरीर के अंग-प्रत्यंग में धब्बे बनकर जड़ा था।
"नाम याद नहीं। बाप ने कभी किसी नाम से बुलाया नहीं। माँ पता नहीं कौन थी, जो औरत घर में थी वह साली, हरामखोर, दुश्मन पुकारती थी। मजदूरों के बच्चे कोई 'अरे ओ' बोलते थे कोई जिपरी, कोई सेमडी और कोई कुछ भी। शाला तो गई नहीं की नाम लिखवाती। उसके पहले आपके दरबार में आ गई।" न जाने क्यों, कैसे और कितना बोल गई थी उस दिन वो ग्यारह साल की बच्ची। शायद सरस्वती ने अपना आसन जमा लिया था जुबान पर।
"बाप रे बाप! इतनी दबंगई ऐसा तेवर। दिखने में भी सुंदर है। चल, आज से इस कोठे में तुझे तेरा नाम मिलेगा।" उसे दबंग औरत ने खुशी से कहा और बच्ची को अंदर वालों के सुपुर्द कर दिया।
शाम को उसकी रूप राशि बदल गई थी। बालों को थोड़ा कट किया आकार दिया और कपड़ों को भी सुधारा, नाम रखा सुंदरी। एक नए पड़ाव की ओर अब बहाव मुड़ गया था। उस दबंग औरत का नाम "मंगला" था, अच्छी थी। उसने सुंदरी को इस धंधे का गुर सिखाया। खानपान, दवा-पानी कपड़ों का ध्यान रखती थी वह, तो वही भागने वालियों के लिए चंडालिनी बन जाती थी।
सुंदरी अपने पहले ही साक्षात्कार से उसके करीब थी और समय के साथ उसकी हर योजना इस कोठे की व्यवस्था, साफ-सफाई, समाज सेवी संस्थाओं की आवाजाही, टीकाकरण सभी में सुंदरी की सलाह महत्वपूर्ण होती गई।
सुंदरी और दूसरी लड़कियों के अतीत से मंगला को कोई मतलब नहीं था बल्कि वह उसे भूलकर आगे जीवन में बढ़ने के लिए कहती। अतीत भला कभी किसी का पीछा छोड़ता है? वह तो वर्तमान के पीछे गांठ बांधकर चला आता है और भविष्य की ड्योढ़ी पर खड़ा हो जाता है। इस कोठे तक आने की अपनी यात्रा कोई लड़की कैसे भूल सकती थी भला। सभी की अपनी कहानी जिसमें कभी अपनों ने कभी दूसरों ने बेईमानी की थी। हांँ, इन सभी में एक बात समान थी। जिंदगी में विश्वास नाम का कुछ उनकी डायरी में नोट नहीं था।
फैशन की तरह समय बदलता गया और मंगला की उम्र के साथ सुंदरी का अधिकार बढ़ने लगा। लड़कियों के स्वास्थ्य और पोषण पर अब ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा। सत्ता प्राप्ति के लिए कई बार ऐसी जगह को निशाना बनाया जाता परंतु अब इस कोठे पर सुंदरी ने अठारह साल से कम की लड़कियों के आगमन पर प्रतिबंध लगा दिया था। कई बड़े लोगों के दबाव को भी उसने झेल लिया था। अखबार वालों, फोटोग्राफरों के प्रिय विषय रह चुके इस कोठे पर अब सोच समझकर काम किया जाने लगा था।
कुछ लड़कियाँ, माँ भी थीं तो छोटे-छोटे बच्चों के खान-पान, शिक्षा पर ध्यान दिया जाता था। मास्टर जी थे जिन्हें बुलाकर बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था की थी सुंदरी में। कोठी की लड़कियों की चहेती थी यह मालकिन।
बदलते समय के साथ अपने को, अपने आसपास को बदलने में माहिर थी सुंदरी। वह चाहती थी की काम चलता रहे और किसी भी प्रकार का कोई पुलिस केस, कोई अखबार बाजी कभी ना हो। लड़कियां स्वस्थ रहें तभी यह धंधा अच्छे से फल-फूल सकता था पनप सकता था।
"मवशी, शाम हो रही है वह आएगा। अभी तू बोल और क्या करना है?" कुमारी ने सुंदरी को झिंझोड़ा।
"सब ठीक है अब तुम लोग आराम करो भुल्लन और मन्नू सामने बैठे रहो, उसके आने की खबर देना।" अपना श्रृंगार और पल्लू ठीक करती सुंदरी ने आदमकद दर्पण में खुद को निहारा।
सुंदरी का दिल तेजी से धड़क रहा था। इस धंधे में तीस-पैंतीस के बाद तो औरतें सिर्फ झाड़न-पोंछन के काम की रहती हैं, पता नहीं यह कैसा पुरुष है? पिछले दो सालों से उसने इस कोठे से अपना संपर्क रखा है। पैसों, अनाज-राशन और लड़कियों के व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए लगातार मदद करता रहा है। उसी ने सुंदरी के इस घर में फोन लगवाया था और महीने में एक दो बार बातें किया करता।
जब पहली बार उससे फोन पर बात हुई तो उसने 'प्रणाम' से शुरुआत की थी। इससे पहले उसके भेजे आदमी आकर सामान, पैसे दे जाते थे।
'प्रणाम' संबोधन तो सपने में भी कोठेवालियां सोच नहीं सकतीं तो वह तुरंत उसका कोई उत्तर नहीं दे पाई थी। कितने विचार कितने प्रश्न ज़हन में थे। यह लड़का कौन है, क्या कोई बड़ा झांसा देने वाला है, मानसिक रोगी है या बाद में वसूली करने का कोई लंबा प्लान है उसका।
दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है। यहां तो सब छाछ से झुलसे लोग थे, तो सुंदरी ने बहुत प्रकार से पता लगवाया था उसके बारे में। पुलिस के कांस्टेबलों से, नियमित आने वालों के मार्फत, डॉक्टर और नर्स से, मास्टर जी से परंतु उसके पता और कोई भी जानकारी के अभाव में कोई क्या ही बताता।
"मावशी, एक बड़ी लंबी गाड़ी नुक्कड़ पर रुकी है और एक आदमी उतरा है।" मन्नू भागती हुई आई।
"वह पैदल ही आ रहा है सुंदरी तेरे दर्शन को।" इठलाता हुआ भुल्लन बोला।
दोनों वापस बाहर चले गए और सुंदरी की सांसें धौंकनी की तरह चलने लगी। मोगरे की लड़ियों ने अपनी महक कमरे में बिखेर दी थी, वही मोगरे की महक जो उसे दस साल की लड़की के नथुनों से रिसकर हृदय में नासूर बना चुकी थी। सुंदरी को फिर घबराहट होने लगी। उसने बालों से खींचकर गजरा निकाल दिया और कमरे के एक कोने में उछाल दिया।
सांसों को काबू में करती तब तक वह सामने आ गया था। ऊंची कद-काठी, मध्यम शरीर, घुंघराले से बाल, चौड़ा माथा, सफेद कमीज और नीली जींस पैंट, हाथ में घड़ी, गले और हाथ में प्लेटिनम का चैन, कड़ा। पैरों में बड़े महंगे जूते जो अपनी सादगी से अपनी रईसी दिखाते थे। कंधे तने और आँखें झुकी थीं। एक क्षण वह रुका फिर दीवान पर बैठी सुंदरी के, नीचे लटके दोनों पैरों के पास बैठ गया। महावर से अधरंगे पैरों पर उसकी दृष्टि टिकी थी। फिर उसने दोनों पैरों के अंगूठे को अपनी उंगलियों से स्पर्श किया और माथे तथा आंँखों पर लगा लिया। सुंदरी का शरीर झुरझुरा गया। स्थिति वही थी जो दो साल पहले फोन पर उसका 'प्रणाम' सुनकर हुई थी।
जाने अनजाने उसका दाहिना हाथ लड़के के सिर पर चला गया। लड़का दो मिनट यूंँ ही बैठा रहा फिर उठकर सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया। उसने अपनी दृष्टि सुंदरी के पैरों पर ही टिकाए रखी थी। कमरे के बाहरी दरवाजे पर खड़े भुल्लन और मन्नू, ठुड्ढी पर हाथ धरे इस दृश्य को देख रहे थे। कमरे के भीतरी भाग में परदे के पीछे से झांकती हुई कई जोड़ी आंखें, टकटकी लगाए दम साधे थीं।
"आपको सब क्या पुकारते हैं?" उस युवक का ढेर गंभीर स्वर था।
आज एक बार फिर अनायास दस साल की वह बच्ची सुंदरी में जाग गई।
"बचपन में बेनाम थी, कोठी ने सुंदरी नाम दिया। लड़कियां 'मौसी' पुकारती हैं। नेता, अधिकारी पुलिस, पत्रकारों ने अपनी जुबान और सोच से कई गालियों, बाजारू विशेषणों से सजाया मुझे। तुम किस नाम के बारे में पूछ रहे हो?" सुंदरी ने प्रश्न वापस कर दिया।
"मौसी तो माँ की बहन होती है तो आपको "माँ" किसी ने नहीं पुकारा। आप कहें तो मैं आपको माँ स्वीकार करता हूंँ। आपका परिवार तो पूरा है, मेरा बचपन और जवानी मांँ विहीन है। मेरी पूर्णता आपको माँ से संवारने में ही है।" वह शून्य में घूरता हुआ, कहे जा रहा था।
"बचपन की, बहुत छुटपन की यादों में माँ के आलता लगे पैर, सफेद साड़ी लाल किनारी वाली, मेरे मस्तिष्क में अंकित है। दो-तीन साल की वह स्मृति, देवी माँ के स्वरूप से एक होकर परिपक्व होती रही है। मैं अपना परिवार बनाने आया हूंँ। कई बेबस, मजबूर लड़कियों को इस धंधे से निकालकर सामान्य जीवन और जीविका के दूसरे हुनरों की शिक्षा दिलवाई है अब तक।"
अब पहली बार उसने सुंदरी के चेहरे की ओर देखा और नज़रों से नज़रें मिलाकर कहने लगा।
"मेरी माँ को कुछ लोग उठा कर ले गए थे। पिताजी धनी थे, जमींदार थे परंतु माँ को वापस लाने की कोशिश भी नहीं की। उनके अनुसार औरत की इज्जत उसकी देह में है। वह अपवित्र हो गई तो उसका सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं रहता।" गहरी सांस भरकर वह बोला मैंने इतने सालों औरत की देह उसके इस देह व्यापार पर अध्ययन किया, काम किया और हमेशा इस समाज, परिस्थितियों को उसका गुनहगार पाया है।आपको मेरा यह ऑफर पसंद आए तो मुझे इस नंबर पर फोन करना। बहुत बड़ी कॉलोनी बना रहा हूँ जहां इन लड़कियों, उनके बच्चों को मनुष्य जैसा जीवन देने की कोशिश होगी। सबको किसी न किसी काम की ट्रेनिंग देकर, काम करके पैसा कमाने की सीख भी जाएंगी।"
उसने एक मिनट की चुप्पी साध ली।
"यह मेरा कार्ड, पता और फोन नंबर, मेरे कारोबार की जानकारियां हैं। यह चेक साइन किया हुआ है आप खुद भर लेना। मेरे ऑफर पर सोचना। भविष्य की राह पर नया कदम उठाने की कोशिश करना ही मानवता है। माँ, जीवन का बहाव अब समतल की ओर मोड़ दो।"
सुंदरी के हाथों में कार्ड्स और चेक पकड़ा कर, उसके पैरों में झुक कर प्रणाम करने लगा। बाहर धुंधलका बढ़ गया था और सड़कों पर लगे बल्ब जगमगाने लगे थे। वह सधे कदमों से नुक्कड़ पर खड़ी अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गया। सुंदरी ने मुट्ठी खोलकर उसके दिए कार्डों को पढ़ने की कोशिश की। कुछ समझ नहीं आया हस्ताक्षर किया चेक भी साथ था।
वह गहरी सोच में डूब गई जीवन के इस पड़ाव में इस कोठे को छोड़कर एक नौजवान की बातों में आकर अपने घर से दूर चले जाना, इस धंधे को छोड़कर अपने बुढ़ापे में आगे और तकलीफ भोगना उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
सुंदरी ने सुनंदा को आवाज दी। इन सबमें वही कुछ पढ़ी लिखी थी और जब मास्टर जी बच्चों को पढ़ाने आते थे तो वह भी उनके साथ बैठ जाती थी।
"मावशी, इसका तो बहुत सारा बिज़नेस है। गौरव होम डेकोरेशन, इंटीरियर, गौरव रियल्टी और पता नहीं क्या-क्या। बहुत पैसे वाला है मावशी, अपना नाम पता अब बताया है, दो साल हमारी चुपचाप मदद करता रहा।" कार्ड्स और चेक को सुंदरी के हाथों में देते हुए वह फिर बोली, "मावशी और क्या बिगड़ जाएगा हमारा! पहले ही सब कुछ बिगड़ चुका है अब शायद हमारे लिए कोई मददगार भगवान ने भेजा है। हमारी मजबूरी, हमारे दुख, हमारे तकलीफों से लगता है ऊपर वाले का आसान डोल गया है। कहते हैं ना की घूरे के भी दिन पलटते हैं।" कहती हुई वह परदे के पीछे चली गई।
दूर अंधेरा गहरा रहा था। सामने, बल्बों की रोशनी से छिपते-छिपाते इस गली में आते-जाते लोग दिखाई दे रहे थे। दूर तक सिर्फ आते-जाते आदमी दिखते थे। सुंदरी ने कमरे में दृष्टि घुमाई। पीतल के दीपक की बाती, अपनी रोशनी बिखेर रही थी। सुंदरी ने उस शांत, सौम्य रोशनी की चमक, कमरे में मूर्तिवत खडी सभी लड़कियों के आंँखों में देखी। अपने जीवन में इस सौम्य रोशनी को लाने की उत्कंठा मानो उस पल, उस कमरे में हिलोरें मार रही थी। एक निश्चल, भोली मुस्कान सुंदरी के अधरों पर फैल गई और अपनी हथेली में दबे हुए उन कार्ड्स को उसने माथे से लगा लिया।
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