आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा भी एक प्रयास 🙏
फ़िलबदीह 52
दूसरा चरण
2122 1212 22
रात से चाँद अनमना सा है।
दूर कुछ चल के वो रुका सा है।।1।।
बंद लगते हैं सारे दरवाज़े।
इक झरोखा सदा खुला सा है।।2।।
हर घड़ी रूप बदले ये मौसम
धरती का दिल ज़रा दुखा सा है।।3।।
आज जी भर के बरसा है बादल
देख धरती को खुद ठगा सा है।।4।।
है उनींदा सा सूर्य बदली में
प्रेम का रोग भी नशा सा है।।5।।
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शर्मिला चौहान
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