शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

2122 1212 22 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा भी एक प्रयास 🙏 


फ़िलबदीह 52
दूसरा चरण 

2122  1212  22

रात से चाँद अनमना सा है।
दूर कुछ चल के वो रुका सा है।।1।।

बंद लगते हैं सारे दरवाज़े।
इक झरोखा सदा खुला सा है।।2।।

हर घड़ी रूप बदले ये मौसम
धरती का दिल ज़रा दुखा सा है।।3।।


आज जी भर के बरसा है बादल
देख धरती को खुद ठगा सा है।।4।।

है उनींदा सा सूर्य बदली में 
प्रेम का रोग भी नशा सा है।।5।।

************

शर्मिला चौहान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें