1. लघुकथा "तिल का ताड़"
सप्ताह भर से टेलीविजन पर बवाल मचा था। जितना पाकिस्तान-भारत की सीमाओं पर भारतीय सैनिकों ने साहस दिखाया, उससे कहीं ज़्यादा टेलीविजन के वातानुकूलित कमरों में बैठे समाचार वाचक दिखा रहे थे।
"सचमुच युद्ध शुरू हो रहा है क्या?" अपने कमरे से बाहर आते दादाजी ने हॉल में समाचार देखते अपने बेटे से पूछा।
"शायद, हमारी सेना ने लाहौर को घेर लिया है। काफी नुकसान पहुँचाया पाकिस्तानी सेना और उनके ठिकानो को।" टेलीविजन को मंत्रमुग्ध होकर देखते बेटे ने कहा।
"पापा, कल से यह समाचार वाचक लगातार यही अपडेट दे रहा है। चैनल की टी.आर.पी. बढ़ाना ही आज मीडिया का प्रथम उद्देश्य है।" अपने लैपटॉप पर काम करते पोते ने कहा।
कुछ ही देर बाद छोटे सी सूचना के साथ लाहौर समाचारों का खंडन करते हुए, समाचार वाचक अब अपना ध्यान अमेरिका के समाचारों की अतिश्योक्ति करने में लगा रहा था।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585
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2. लघुकथा - "हरफनमौला"
दलित उत्थान सरकारी समिति का वार्षिक अधिवेशन कल ही संपन्न हुआ था। अपने भाषण में समिति अध्यक्ष ने, जातिगत भिन्नता हटाने के, समिति के प्रयासों का सविस्तार उल्लेख किया था।
आज उनके बंगले पर मीडिया और समाजसेवी संस्थाओं के लोगों का तांता बँधा था।
"हमने पिछड़े वर्ग के लोगों को अपने हृदय में, अपने घर में स्थान दिया।" एक नवयुवक को अपने बगल में बिठाकर वो गर्व से बोल रहे थे।
नवयुवक पढ़ा-लिखा था परंतु कुछ सकुचाया सा कसमसा रहा था।
"हमने इस वर्ग के कुछ बच्चों को अपने घर में जगह दी, काम दिया। अपने बच्चों जैसा प्रेम दिया।" अब उनके आसपास तीन-चार और गृह सहयोगी नवयुवक-युवती आ गए।
हाथों में ट्रे पकड़े वो सभी दलित युवान, लोगों को चाय-नाश्ता वितरित कर रहे थे। नेताजी का चाय-नाश्ता, उनका स्वजातीय बंधु उन्हें पकड़ा गया।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585
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3. लघुकथा - सरकारी फंडा
नई सरकार ने आते ही वादे के मुताबिक जनता का ध्यान रखना शुरू कर दिया।
लोगों की समस्याओं को सुनने के लिए, हर शहर, गाँव, कस्बे में केंद्रों की स्थापना हुई। समितियांँ बनीं और पदाधिकारियों को लोगों की समस्याओं को सुनने के लिए नियुक्त किया गया।
लोग जाते, घंटों लाइन में खड़े रहते, अपनी समस्या बताकर छाती ठंडी कर आते। महीनों के इस क्रम में, समस्याएं सुना-सुना कर लोग ठंडे होने लगे।
आज सभी केंद्रों को बंद कर दिया गया क्योंकि अब देश की जनता के पास सुनाने के लिए कोई समस्या ही नहीं बची थी।
शर्मिला चौहान
ठाणे (पश्चिम)
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4. लघुकथा- रंगा सियार
हर मंच से नेताओं का चुनावी शंखनाद गूंज रहा था। नकद रुपयों, साइकिल, लैपटॉप, मोबाइल का चारा चुग चुकी जनता, अब किसी बड़े स्वादिष्ट चारे की अपेक्षा लगाए बैठी थी।
"सुना है इस क्षेत्र से फिर रमन बाबू ही चुनाव जीतेंगे।" अवधेश ने अपने मित्र धीरेन से कहा।
"पिछली बार कहे थे जीतने पर हर परिवार को पंद्रह हजार का दीपावली बोनस बैंक एकाउंट में भेज देंगे, कहाँ दिए? अब कौन वोट देगा उनको?" सांसद से असंतुष्ट धीरेन बड़बड़ा रहा था।
सामने चौक पर मंच सजा था। कुछ देर बाद रमन बाबू आए, बिना किसी लाग-लपेट के अपना वादा पूरा ना कर पाने की व्यथा-गाथा सुनाए।
"अब इस पाँच साल में हमने अपनी जमीन पक्की कर ली है। आपकी कृपा रही तो आगामी पाँच सालों में, हर घर में सरकारी नौकरी और महिलाओं को मासिक भत्ता देने का पक्का वादा है।" तीर चलते रहे और कुछ देर बाद निशाने अचूक लगने लगे।
भाषण के दो घंटे बाद, पंडाल के नीचे कुर्सी टेबल लगाए सांसद जी के अनुयायी गण बैठ गए। अपने घरों की जानकारी और सरकारी नौकरी के लिए उम्मीदवारों का बायोडाटा देने के लिए, दो किलोमीटर लंबी लाइन लगी थी।
धीरेन और अवधेश को इस लाइन में खड़ा देखकर, मुख्य द्वार पर लगी सासंद जी की तस्वीर, मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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5. लघुकथा - बोल री मछली
शीनू- "बोल री मछली कितना पानी.. घुटने तक पानी।"
मम्मी - "टीचर ने नयी कविता सिखाई क्या शीनू को?"
शीनू- नहीं-नहीं, ड्राइवर अंकल ने सिखाया वो भी सिर्फ मुझे सिखाया है।"
मम्मी - "मुझे भी सिखाओ ना प्लीज..!"
शीनू- आप उत्तर देना हाँ..
बोल री मछली कितना पानी?
मम्मी - कमर तक पानी।
शीनू ने मम्मी का कुर्ता उठाया और कमर को चूमने लगी।
शीनू - बोल री मछली कितना पानी?
मम्मी -(चुप)
शीनू - बोलो मम्मा, आपको तो कुछ नहीं आता। बोलो छाती तक पानी, होंठ तक पानी.. तभी तो मैं आपको चूमुंगी जैसे ड्राइवर अंकल मुझे चूमते हैं।
मम्मी की आँखों में पानी ही पानी था।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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