रिश्ते की डोरी" (कहानी)
वृंदा को गाँव से शहर लाना अब कम मुश्किल था। मुस्कुराते हुए जीवन के तमाम झंझावतों को झेल लेने वाली सत्तर साल की वृंदा ने, पिछले कुछ सालों से जैसे मुस्कुराहट का वह अस्त्र त्याग दिया था।
"अम्माँ, कुछ दिनों के लिए हमारे साथ चलोगी?" वृंदा से बेटी मालिनी ने पूछा।
टकटकी बांँधे वो मालिनी को देखती रही। तभी नातिन वृद्धि ने कहा, "आपको चलना ही होगा नानी।"
मासूम बच्ची के दिल के भाव से विह्वल हो वृंदा ने उसे छाती से लगा लिया।
प्रेम प्रवाह ने हृदय के बंजर में से, एक किस्से के भ्रूण को पनपने का अवसर दिया।
वृंदा सूटकेस में कपड़े रखने लगी और साथ खड़ी वृद्धि नानी की सहायता कर रही थी।
मालिनी अपनी माँ की मनोदशा समझ रही थी।
"अम्माँ, जब आप बोलोगी आपको वापस ले आएंगे।" अम्माँ की साड़ी तह करती मालिनी ने एक सांत्वना दी।
वृंदा हौले से मुस्कुरा दी।
सूती साड़ियों को हर परत, सिलवटों से भरी थी। इन्हीं सिलवटों की परतों में लिपटे जीवन को समतल करने में लगी वृंदा के लिए, अब जीवन के मायने बदल गए थे।
एक पुरानी बनारसी को आलमारी से निकालते वक्त, मानो वक्त थम गया। चढ़ाव में बनारसी न चढ़ा पाने की ग्लानि को, विवाह के पाँच साल बाद मालिनी के बाबूजी ने इस बनारसी साड़ी को उसके हाथों में धरकर दूर किया था। ऐसी साडियाँ सिर्फ तन ढंकने का कपड़ा नहीं होती बल्कि प्रेम और हृदय के भावों से महीन बुनी गई कहानियांँ होती हैं जिन्हें दोहराना, अपने आपको उन प्रेम गलियों में एक बार फिर खुला छोड़ने जैसा होता है।
"नानी, आप हमेशा कॉटन की साड़ी पहनती हो, क्यों?" किशोरी वृद्धि ने प्रश्न किया।
"सूती कपड़े शरीर के लिए बड़े अच्छे होते हैं। पेड़-पौधों से बने होने के कारण, कभी त्वचा पर बुरा प्रभाव नहीं डालते बेटा।" वृंदा की बातों की गहराई में नातिन डूब रही थी और बेटी मालिनी पिछली बातों में।
"अम्माँ, मेरी नौकरी सिंगापुर में लगी है तो मैं अब कभी-कभी ही आ पाऊंगा।" बड़े भैया ने बाबूजी की मृत्यु के एक साल बाद ही अपनी दुनिया सिंगापुर में बसा ली थी।
"अब बड़े भैया तो यहाँ आने से रहे और मेरा रहना भी निश्चित नहीं है अम्माँ, तो घर के दो हिस्से कर लेते हैं। एक में आप रहना दूसरा किराए पर चढ़ा देंगे।" बड़े भैया को किनारा करते देख, छोटा मनोज बोलने लगा।
अम्माँ ने तो बस चुप्पी साध ली थी। दोनों भाइयों ने जब घर के दो हिस्से किए तो अम्माँ ने कहा- "मालिनी का क्या सोचा तुम लोगों ने, उसे अपने पिता के इस घर से क्या मिलेगा?"
"दीदी तो अब अपना घर-संसार देखेगी ना अम्माँ।" छोटा बोल पड़ा।
अम्माँ ने अपने गले का हार और कर्णफूल मालिनी को दे दिया।
"मुझे इन गहनों की जरूरत नहीं है अम्माँ, आपके और बाबूजी के आशीर्वाद से अच्छा घर-द्वार है मेरा।" मालिनी ने भीगी आँखों से कहा था।
घर के दो हिस्से हुए और आँगन में खड़ा, बुजुर्ग की तरह अपनी छाया देता वह नीम का पेड़ जिसे दादी ने रोपा था, बँटवारे के आड़े आ रहा था।
"इतने सोच-विचार की क्या बात है अम्माँ, एक पेड़ ही तो है फिर लगा लेंगे।" दोनों बेटों की बात सुनकर वृंदा का मौन, मुखर हो गया था।
"हाँ, पेड़ ही तो है तुम्हारे लिए यह पर मेरे लिए मेरे सुख-दुख, मेरे जीवन की चढ़ती-उतरती का साथी।" अपने में गुम होती वृंदा अतीत के गलियारों में भटकने लगी थी।
"मेरे आने के बाद तुम्हारी दादी ने रोपा था इसे, मेरे इस घर का हम-उम्र, सखा है मेरा। इसकी डालियों में बँधे झूले पर तुमने नींद ली और आज यह तुम्हारे लिए एक पेड़ रह गया है।"
बीच से बाउंड्री वॉल बनी और नीम के कराहते अंगों की सिसकियों ने वृंदा को, एक दिन में कई बरसों की बूढ़ी बना दिया।
बड़ा तो दो-तीन सालों में सप्ताह भर के लिए आता। छोटा, शहर में रहकर भी बहुत कम आ पाता था। सब अपनी-अपनी ज़िंदगी की नाव खेने में लगे थे। वृंदा को लगता कि उसके जहाज से उतरी, बच्चों की इन नावों को अपना किनारा मिल जाए, बस वो हमेशा खुश रहें। आधा घर, हमेशा आधा रह गया।
"काकी, आप कब तक अकेली रहोगी, चली क्यों नहीं जाती अपने बच्चों के पास?" किरायेदार उससे अक्सर पूछा करता।
"अरे बेटा, अब इस बुढ़ापे में अपना घर कहाँ छूटेगा?" वृंदा कह देती परंतु मन ही मन सोचती की बेटों ने उसे कभी रहने के लिए बुलाया ही नहीं।
वक्त की झुर्रियों से वृंदा सबल होती गई और उसकी काया निर्बल। एक दिन आँगन से भरी बाल्टी उठाते हुए उसका पैर फिसल गया। किरायेदार ने बच्चों को सूचना दी, छोटा और बहू भागे-भागे आए। अस्पताल में पैर की हड्डी में छोटा फ्रेक्चर बताकर प्लास्टर चढ़ा दिया गया और आराम करने की सलाह दी।
चार दिनों में ही वृंदा ने बहू के व्यवहार और बोली के बदलते रुख को अनुभूत किया और अपने घर वापस आ गई। किरायेदार, अड़ोसी-पड़ोसियों के सहयोग से किसी तरह वक्त गुज़र गया।
फोन पर सबसे बात हो जाती थी, छोटा दो-चार दिनों में आकर कुछ फल-सब्जी रख जाता। कमजोरी इतनी आ गई थी कि वृंदा को अब खुद के लिए चार रोटियांँ सेंकने की हिम्मत नहीं होती थी।
मालिनी, माँ की हालत समझती थी। उनके अकेलेपन को जानती थी इसीलिए अपनी बेटी वृद्धि को लेकर, माँ को अपने साथ ले जाने आई थी।
"नानी, आप खिड़की वाली सीट पर बैठ जाओ मैं आपके बगल में।" नानी को खुश करने के लिए वृद्धि ने कहा।
"तुम बैठो, मुझे तो ये भागती रेलगाड़ी की खिड़की से देखने में डर लगता है।" वृंदा ने कहा और वृद्धि लपक कर उस सीट पर बैठ गई।
धरती को प्राणवायु देने वाले पेड़ों की कम होती संख्या, खेतों की फसलों में पानी के छिड़काव के लिए जद्दोजहद करते किसान कई दृश्य सामने से गुजरते जा रहे थे। पहले भी रेलयात्राएं की थी वृंदा ने, इस बार बहुत सालों बाद की तो धरती की कम हरीतिमा ने मन को विचलित कर दिया।
"जब मैं ही अपने घर के बुजुर्ग नीम को नहीं बचा पाई तो दुनिया को क्या कह सकती हूँ।" अपने आपसे वृंदा बड़बड़ा रही थी।
स्टेशन से घर पहुँचे तो रात हो गई थी। दामाद और नाती ने दिल खोलकर स्वागत किया।
सुबह नींद खुली तो वृंदा दरवाजा खोलकर बाहर आ गई। आँगन के दोनों ओर सुंदर गेंदे की क्यारियांँ, एक कोने में लाल रंग के बड़े जासवन का पौधा लगा था। आँगन के दूसरे कोने में जाना-पहचाना पेड़, अपनी ठंडी हवा बिखेरता लहरा रहा था।
"नीम का पेड़।" खुशी से चीख पड़ी वृंदा।
"हाँ अम्माँ, जब घर का नीम पेड़ काट दिया गया था उसी महीने यहाँ हमने नीम का पौधा लगाया था, देखो अब छत को पार कर रहा है।" वृंदा के पीछे खड़ी मालिनी ने बताया।
"आपके लिए हम सबका यह सरप्राइज़ था नानी, कैसा लगा आपको?" नाती-नातिन दोनों ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"बहुत अच्छा लगा बच्चों, ये पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं होते अपने पुरखों, बुजुर्गों के समान होते हैं। मुझे लग रहा है कि अब इस आँगन में तुमने मुझे और अपने नानाजी को जगह दी है।" भावविभोर वृंदा बोलती जा रही थी और अपनी बातें सुनकर नीम और था ज़्यादा झूमने लगा, आज इस परिवार ने उसे रिश्तों की डोर से बाँध जो लिया था।
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