बुधवार, 20 जनवरी 2021

आजी माँ

पूज्य आजी माँ की प्रथम पुण्यतिथि पर लिखी श्रद्धांजली 🙏   (२०/१/२०१४)



उस तूफानी रात की तेज हवाओं से,
जर्जर वटवृक्ष की जड़ें हिल गयीं।
भयानक हवाओं ने जड़ से उखाड़ कर,
बरगद को मानो परास्त कर दिया।

मैं एक अदना सा कमजोर तना,
उस मंजर से भयभीत हो गया।
सहसा मुझे अहसास हुआ
क्यों डरूँ मैं?
मेरे बूढ़े वट ने
कई मजबूत बंधन तैयार किए हैं
जो मुझे बाँधे रखेंगे।

बरगद, जिसने कितने ही तूफानों को झेला
अपनी शाखाओं को खूब बढ़ाया।
सघन छाया में रखकर भी,
वन में जीना सिखाया।

जड़ों से थामकर पोषण किया
शाखाओं पर पत्तों का जिम्मा दिया।
बरगद हमेशा अयाचक रहा
विश्वास यही तनों में भरा।

आज हस्तिनापुर में देवव्रत ने प्रतिज्ञा ली,
अयाचक, दृढ़, सत्यनिष्ठ जीवन।
"भीष्म" एक विचार है,
मजबूती से सबको बाँधने वाला।

मृत्यु को भी वश में करने वाला,
इच्छा से वरण का दुस्साहस।
सूर्य के उत्तरायण का इंतजार,
अर्जुन पर गर्व से सिंहनाद करने वाला।

आँखों के सामने भीष्म का प्रतिबिंब,
मस्तिष्क में बूढ़े बरगद का आकार।
आँख और मस्तिष्क ने रुप सजाया,
मेरे दिल में रहने वाला, चिर परिचित चेहरा दिखाया।

आकार जैसे साफ होता गया,
मन प्यार और ममता से भरता गया।
मैं एक छोटा सा तना
आज भी उनके स्पर्श से स्फूर्त हूँ,
उनके सानिध्य से अभिभूत हूँ।।

शर्मिला चौहान

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