"नवगीत"
धुंध गहरी हो जितनी
सूरज से छंट जाती है।
हर पतझड़ के बाद ही
ऋतु वसंत की आती है।।
मन में अदम्य विश्वास रहे
मंजिल की सच्ची आस रहे।
मग के काँटों की चुभन
फूलों की चाह जगाती है।
हर पतझड़ के बाद ही
ऋतु वसंत की आती है।।
वक्त बुरा जब आता है
घाव बड़े कर जाता है।
सही सोच ही जीवन में
तब मरहम लगाती है।
हर पतझड़ के बाद ही
ऋतु वसंत की आती है।।
अपनी राह बनाना है
सूरज से आँख मिलाना है।
हिम्मत बाँधे बढ़ती चींटी
पहाड़ पर चढ़ जाती है।
हर पतझड़ के बाद ही
ऋतु वसंत की आती है।।
साल नया अंदाज नया है
जीवन का यह राग नया है।
प्रकृति से जुड़ने की बातें
मानव को सिखलाती है।
हर पतझड़ के बाद ही
ऋतु वसंत की आती है।।
शर्मिला चौहान
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