"अपना आसमान"
बदनाम गली में आने वाले लोगों के बड़े नाम हैं। शालू पलंग पर लेटी कुछ सोच रही थी।
"क्या सोच रही है माँ?" पंद्रह साल की बेटी चाँदनी ने पूछा।
"इस बीमारी की वजह से धंधा बैठ गया है। ना जाने कब जाएगा इसका कहर।" कोरोना काल में देह व्यापार का भविष्य शालू को बेचैन कर रहा था।
"तू चिंता मत कर, मैं पढ़ लिख जाऊंगी तो कोई ना कोई काम मिल जाएगा।" पंद्रह वर्ष की आशाभरी सोच थी।
"चिंता तेरी ही है, पंद्रह की हो गई, इस साल तेरी बात करती। अच्छी रकम मिलती। अब कौन आएगा और धंधा चलेगा।" माँ की आवाज, गर्म सीसे की तरह चाँदनी के कान से होकर दिल में टपकने लगी।
"मुझे इसलिए पाल रही थी, कैसी माँ है?" मन ही मन विचार करती चाँदनी को वो औरतें याद आईं जो हमेशा आकर, उनकी गली की औरतों को दवाईयां, सेनेटरी नैपकिन और जरूरत का सामान देती हैं।
"मुझे अपनी राह खुद बनानी होगी, इन गलियों में घुट घुटकर दम नहीं तोड़ना है।" दृढ़ संकल्प से आँखें चमकने लगीं।
एक थैला लेकर, पता लिखा कार्ड हथेली में दबाए वह शालू के सामने खड़ी थी।
"कहां चली?" शालू ने प्रश्न किया।
"तेरी दवाई ले आती हूँ और कुछ सब्जी भी।" माँ को जी भर देखती बेटी बोली।
"चेहरा ढाँक कर जाना, बीमारी बड़ी फैल रही है।" शालू ने सलाह दी।
चुन्नी लपेट कर, मास्क पहने चाँदनी, इस गली में फैले वाइरस को मात देने निकल पड़ी।
शर्मिला चौहान
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें