गुरुवार, 14 जनवरी 2021

कविता "नारी व्यथा"

"नारी व्यथा"

मानवता शर्मसार है, इंसानियत रो रही है।
मेरे देश में नारी, अपनी अस्मिता खो रही है।।

आये दिन अखबारों में, स्त्री शोषण के समाचार होते हैं।
जीवन की इस भयावह घड़ी में,
चार दिन सब साथ होते हैं।।
ना जाने शूलों से भरी राह पर, वो कैसे चल रही है?

आज मेरे देश में स्त्री, अपनी अस्मिता खो रही है।।

कुसूर है उसका, जो उसने औरत जन्म पाया है।
हर एक पुरुष को उसने ही, इस दुनिया में लाया है।
अपनी सुरक्षा के लिए वह, समाज के सामने रो रही है।

आज मेरे देश में स्त्री, अपनी अस्मिता खो रही है।।

सीता, अनुसूइया जैसी सतियों की हमारी संस्कृति है।
लक्ष्मीबाई, पद्मिनी ने दिखाई राष्ट्र भक्ति है।
आज की विकट स्थिति में, वैदिक संस्कृति रो रही है।

आज मेरे देश में स्त्री अपनी अस्मिता खो रही है।।

जीजाबाई के बिना क्या छत्रपति शिवाजी हो सकते थे?
अंजना की सीख से ही हनुमान भक्त बने थे।
क्यों आज माँ अपने कोख को कोस रहीं हैं।

आज मेरे देश में स्त्री अपनी अस्मिता खो रही है।।

अगर ये ना रुका तो, प्रलय आ जाएगा।
स्त्रियों की सिसकियों से जलजला छा जाएगा।
नारी की इस दशा पर, नारीत्व शर्मसार हो रही है।

आज मेरे देश में स्त्री अपनी अस्मिता खो रही है।।

अपने ही घरों से हमें शुरुआत करनी होगी।
अपनी संतानों के मन में, नारी छबि साफ करनी होगी।
यदि हम अपने ही घर में, ये कदम उठा पाते हैं,
अपनी बहन बेटियों को सुरक्षित बनाते हैं।।
हम तो जाग जाएं, क्या हुआ जो दुनिया सो रही है।

आज मेरे देश में स्त्री अपनी अस्मिता खो रही है।।
आज मेरे देश में स्त्री अपनी अस्मिता खो रही है।।

शर्मिला चौहान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें