शनिवार, 9 जनवरी 2021

गुल्लक के किस्से ५

"प्रतिबिंब"

ना जाने कितने बरसों की मित्रता निभाते हुए आज तक आसपास हैं। पिछले कुछ वर्षों से दोनों अपनी अपनी उलझनों में फंसें थे। ताल अपने में मगन और पहाड़ अपने में। 
आज बहुत दिनों बाद, पक्षियों का झुंड पहाड़ पर चहकने लगा। उनका चहकना, इधर-उधर फुदकना, पहाड़ के मन भा गया।

"अब मैं भी अकेला नहीं हूँ , मेरे साथ कई दोस्त हैं।" ताल को सुनाते हुए पहाड़ बोला।
"अकेला तो मैं भी नहीं हूँ, कुछ जलजीव हैं अभी भी।" अपने अंदर रहने वाले जलचरों की घटती संख्या से दुखी ताल ने उत्तर दिया।
"पहले मैं जब तुम्हें देखता था, कितनी खूबसूरत तस्वीर दिखाई देती थी मेरी। अब तुम्हारे पानी में इतनी गंदगी और कचरा है कि मेरा प्रतिबिंब धुँधला नज़र आता है।" मुँह बिचकाते पहाड़ ने सुना दिया।
"अरे वाह रे वाह! पहले खुद को देखो, टकले हो गए हो। तुम्हारे सुंदर वृक्ष, हरियाली खत्म हो गई है इसलिए अब पंछी भी नहीं आते।" ताल ने भी खरी-खरी सुना दिया।
"तुम सही कहते हो। छह माह पहले, स्कूली बच्चे आए थे। उनके द्वारा लगाए पौधों से ही आज पक्षियों का समूह आकर बैठा है।" अपनी नष्ट होती हरियाली से दुखी पहाड़ ने दिल खोला।
"वो देखो, कुछ लोग सफाई का सामान, मशीन और कचरा ढो़ने की गाड़ी लिए आ रहें हैं।" ताल को भी अपना भविष्य उज्जवल नजर आने लगा।
"लगता है अब हमारे दिन बदलने वाले हैं। कुछ दिनों बाद मेरा प्रतिबिंब साफ दिखाई देगा।" पहाड़ ने खुश‌ होकर कहा।
"साफ और बेहद हराभरा भी।" ताल के अंतिम शब्द से दोस्ती की गांठ पक्की हो गई।

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें