"ट्रैंड"
प्रदर्शनी में वैसे तो कई प्रकार की वस्तुएँ थीं परंतु काँच के दुकान के सामने सबसे ज्यादा भीड़ थी।
"इनकी चमक के सामने तो आदमी की आँखें चौंधिया जाती है। बगल में ही सजे हैं पर इक्का-दुक्का लोग ही आते हैं।" लकड़ी के स्टाल पर रखे गुलदान ने मुँह बनाया।
"मुझे तो छूकर टटोलते हैं फिर छोड़ देते हैं। कौन साफ करेगा, कीमत भी ज्यादा है।" लंबी सांस छोड़ते हुए पीतल के नक्काशीदार कलश ने दुखड़ा सुनाया।
"अपनी माटी, अपना देश का डंका बजाने वाले बहुत हैं पर मिट्टी की चीजें उपयोग करने वाले गिनती के। कितने दिनों से राह देख रही हूँ, कोई घर ले जाए और जीवन सार्थक हो।" मिट्टी की कड़ाही ने गीले स्वर में कहा।
"हम सब कितने पुराने साथी हैं आदमी के, ना जाने इस काँच में क्या जादू है।" स्टील के डिब्बे भी शामिल हो गए।
लोगों की बढ़ती भीड़ और छू- छू कर देखने की प्रवृत्ति से, काँच का एक शो-पीस गिर गया।
छन्न - छनाक की आवाज आई और भीड़ अचानक हटने लगी।
अब वही लोग लकड़ी, स्टील और पीतल की ओर झाँक रहे थे।
"अच्छा हुआ हम लकड़ी के हैं वरना साथ निभाना कठिन हो जाता।" लकड़ी से बने सारस जोड़े, एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले मुस्कुरा रहे थे।
"आखिर जड़ों की ओर मुड़ ही गया आदमी।" प्रदर्शनी की सारी वस्तुएं हँस रहीं थीं।
शर्मिला चौहान
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