ट्रक में फलों की पेटियाँ लदवाते विपिन ने देखा कि आठ-दस साल का बच्चा उसकी ओर देख रहा है।
"आजा, क्या देख रहा है?" बच्चे को पास बुलाते हुए विपिन ने पेटियों की गिनती की।
"इनमें क्या है?" पेटियों की ओर अंगुली दिखाते हुए बच्चे ने पूछा।
"सोने के सिक्के!" हँसकर विपिन ने उत्तर दिया और एक पेटी से चार-पाँच संतरे बच्चे को दे दिए।
"मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसकी कीमत कितनी है?" संतरों को हाथों में संभालते हुए बच्चा बोला।
उस बच्चे में विपिन को अपना बचपन झलकने लगा। बीस साल पहले, जब एक बाग के पेड़ पर पत्थर मारकर नौ साल का विपिन आम गिरा रहा था।
"अरे! पत्थर से मत गिरा! आकर तोड़ ले।" एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति ने उससे कहा।
बाग से उस व्यक्ति ने विपिन को पाँच आम तोड़कर दिए।
"मेरे पास इसके लिए पैसे नहीं हैं।" आमों को कसकर पकड़ते हुए विपिन ने कहा था।
"तू आम खाना और बीज माटी में बो देना। जब भी फल खाएगा, बीज बो देना। जब कोई पौधा उग आए तो देखभाल करना।" उस व्यक्ति ने नौ वर्ष के विपिन के मन में, पेड़-पौधों, फलों के बगीचे का बीज बो दिया।
उसके बाद प्रायः हर मौसमी फलों के समय विपिन बाग में जाता और फलों के साथ उसे लगाने और देखभाल की सीख संग ले आता।
"पिताजी-माँ, आंगन में आम का पौधा निकला है।" पहली दो पत्तियां, नाज़ुक सा तना आज भी विपिन को याद है।
इस प्रेम ने उसे कृषि स्नातक करके, अपनी जमीन से जोड़ दिया।
"इसकी कीमत बताइए ना।" बच्चे ने विपिन को झकझोर कर पूछा।
आज उस बच्चे को फलों की कीमत बताकर, एक बार फिर विपिन अपनी मिट्टी की गहराई में बीज बोने जा रहा था।
मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना ।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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