सप्त अश्वों पर सवार, अनंत तक गतिवान।
सृष्टि पर दिव्य प्रकाश, ऊर्जा का करे संचरण।
हे मित्र! स्वीकारो करबद्ध नमन।।
तम विषाद को दूर करे, नवप्राण फूंक रोशनी भरे।
प्राची की रक्तिम आभा, संजीवनी का हो रमण।
हे भानु! स्वीकारो करबद्ध नमन।।
कण-कण जागृति का आव्हान, क्षण-क्षण फैले नवविहान।
दक्षिणायन से रथगति, बदली अब उत्तरायण।
हे भास्कर! स्वीकार करो करबद्ध नमन।।
तिल-गुड़ की मिठास रहे, पतंग की सी आस रहे।
खिचड़ी का मेल रहे सबमें, घृत से पुष्ट रहे जीवन।
हे सूर्य! स्वीकार करो करबद्ध नमन।।
सीमाओं में बँधकर , सृष्टि का नियमन करते।
अवगुणों का कर निवारण, सतगुणों का करो संक्रमण।
हे आदित्य! स्वीकारो करबद्ध नमन।।
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"शुभ मकर संक्रांति"
शर्मिला चौहान
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