रविवार, 31 दिसंबर 2023

चिकीर्षा पोटली

गणपति छप्पन भोग २०२३

"गणपति छप्पन भोग वंदना २०२३"

आना आना गणपति, भोग लगाने आना।।
लाना लाना गणपति, रिद्धि सिद्धि लाना।।


 सिर पर मुकुट चमाचम चमके
 मस्तक सिंदूर दमदम दमके।
हाथों में कंगन, पाँवों में पायल
बुद्धि का सारा जग कायल।।

आना आना गणपति, मूषक लेकर  आना।
लाना लाना गणपति रिद्धि सिद्धि  लाना।।१।।

पाँच दिवस का पूजन करते
भक्ति भाव से तन मन भरते।
धूप दीप नैवेद्य आरती
जग में फैली तुम्हारी कीर्ति।।
प्रेम भाव से पूजें तुमको
चरणों में अपने, जगह दो हमको।।


आना आना गणपति भोजन करने आना।
लाना लाना गणपति रिद्धि सिद्धि लाना।।२।।


विविध विविध पकवान बनाएंँ
थाल आरती भोग सजाएंँ।
लड्डू पूरन पोली, भात
अप्पम शीरे की क्या बात।

इडली ढोकला और मुंगोडी
पराठा, रोटी, बेसन पूड़ी।
रंग बिरंगी खट्टी मीठी
बहुत प्रकार बनी है चटनी।

आना आना गणपति, मुँह मीठा करके जाना।
लाना लाना गणपति रिद्धि सिद्धि लाना।।३।।

भात पुलाव, संग फुल्का रोटी
केक , संदेश और बर्फी मोटी।
नाना प्रकार सजी है थाल
गणपति आकर करो निहाल।।

दाल बड़ा, भजिया कटलेट
बप्पा तुम ना करना लेट।
मेदु वडा, सांभर और मेवा
फल, मोदक से प्रसन्न हैं देवा।

आना आना गणपति रुचि रुचि भोग लगाना।
लाना लाना गणपति रिद्धि सिद्धि लाना।।४।।

नींबू पानी, दाल पकवान 
 मुख में रचता मीठा पान।
छप्पन भोग मान सम्मान 
गौरीसुत तेरा गुणगान।।

सुंदर शुभ उत्सव संयोग
आज लगाते छप्पन भोग।
हाथ जोड़ स्तुति सब करते
चरणों पर हम शीश हैं धरते।

आना आना गणपति आशीष देने आना।
लाना लाना गणपति रिद्धि सिद्धि लाना।।
लाना लाना गणपति रिद्धि सिद्धि लाना।।

"गणपति बप्पा मोरया।।
मंगलमूर्ति मोरया।।

।।सभी भक्तगण निहारिका।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मंगलवार, 26 सितंबर 2023

२१२२ १२१२ २२

आप सभी के समीक्षार्थ, मेरा दूसरे चरण का प्रयास सादर है।


फ़िलबदीह क्रमांक 2
दूसरा चरण 

2122  1212  22

क़ाफिया - आओं
रदीफ़ - में


हाथ उठने लगे दुआओं में
तब हुआ कुछ असर दवाओं में।।1।।

बाँसुरी बज रही कन्हैया की
राधिका नाचती लताओं में।।2।।

सांँस भारी पता नहीं क्यूँ है
कौन सा विष घुला हवाओं में।।3।।


मोम बन कर पिघल गया पत्थर
है असर तेज़ कुछ सदाओं में।।4।।


तोड़ लातीं फलक से तारे भी
ये हुनर है तो सिर्फ़ मांँओं में।।5।।


शर्मिला चौहान

बुधवार, 20 सितंबर 2023

गणपति छप्पन भोग 2022

"छप्पन भोग स्तुति"

नेह प्रेम से परसा भोजन, हम मिल तुम्हें खिलाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति, छप्पन भोग लगाते हैं।।


सेवा भाव से पूजें निश दिन,
अर्पण जीवन के हैं पल छिन।
प्रथम पूज्य देवा हैं गणपति,
दे दो सबको सुंदर सी मति।।

सारे जग के बुद्धि विधाता, आप ही कहलाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति, छप्पन भोग लगाते हैं।।१।।

प्राण प्रतिष्ठा करके गणपति,
धूप दीप नैवेद्य आरती।
भावभक्ति से ध्यावै तुमको,
दे दो अभय हस्त हम सबको।

मंगलमूर्ति हर वर्ष आपको, प्रेम भाव से लाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।।२।‌।

शुभ मंगल कारज में देवा,
ध्यान प्रथम करते नित सेवा।
दूर्वा, जसवन, पान , सुपारी
लड्डू, मोदक की छवि न्यारी।

आपके दर्शन से बप्पा, काम सफल हो जाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।।३।।

बालरुप है सबसे न्यारा 
मात पिता संग गणपति प्यारा।
सिद्धिविनायक उमापुत्र तुम
सुमुख गजानन हो चतुर्भुज।।

दुष्टों का संहार करे जो, महागणपति कहाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।।४।।

दाल भात चटनी अचार घी,
विविध लड्डू पकवान मिठाई।
खीर पूरी और सब्जियांँ,
बड़े पकौड़े विविध रोटियाँ।।

चूरमा शीरा अप्पम छोले,
खिचड़ी, ढोकला और दही भल्ले।
हैं पुलाव, चावल के व्यंजन,
खाना गणपति बैठ के आसन।।

पापड सलाद रंग बिरंगे
गुलाब जामुन चाशनी भीगे।
दूध दही नींबू और नारियल,
मुख में रखना मीठा तांबूल।।

निहारिका के सारे निवासी, श्रद्धा से शीश झुकाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।।५।।


नेह प्रेम से परसा भोजन हम सब मिल खिलाते हैं।
रुचि रुचि भोजन करना गणपति छप्पन भोग लगाते हैं।
छप्पन भोग लगाते हैं।।


🙏गणेश भगवान की जय हो 🙏


 समस्त निहारिका निवासी

मंगलवार, 12 सितंबर 2023

हिंदी भावभूमि के ई-पत्रिका संकलन में प्रकाशित

"त्रिपदा छंद"


मोह लोभ के पाश।
जितने कसते छोर
प्रेम शांति हो नाश।।

नदियाँ उगलें रोष।
हुई मलिन कृशकाय
पूछें किसका दोष।।

पर्वत तो हैं मौन।
कल कल उतरी धार
सुर लय भरता कौन।।

गगन धरा का साथ।
बरसे बरखा नेह
मिले क्षितिज में हाथ।।


सच्चे हैं मनमीत।
ग़ज़ल विविध सब छंद
कविता दोहा गीत ।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

कविता _मुलाकात होनी चाहिए

कविता

कदमों से पगडंडियों की बात होनी चाहिए
हर कदम की घर से  फिर मुलाकात होनी चाहिए।।

झूमती शाखों की वो शोख अदाएं
झील की तलहटी में हलचल मचाएं।
और किनारों पर खड़े ये मौन पत्थर
ताकते रहते मछलियां खूबसूरत।

प्रेम की हर तरफ बरसात होनी चाहिए।
हर कदम की घर से फिर मुलाकात होनी चाहिए।।


झील के आँचल में बतखों का किलकना
हवा के पर पसारे पंछियों का चहकना।
भोर में चमकती सूरज की ख्वाहिशें,
घास पर मचलती ओस की नर्म फरमाइशें।

चाँद तारे सूरज से मिलें वो रात होनी चाहिए।
हर कदम की घर से फिर मुलाकात होनी चाहिए।।

श्वेत साफे बाँध तटों पर खड़े हैं,
शरद के स्वागत में कांस डटे पड़े हैं।
चाँद उतरा झील में कुछ झांँकता है,
कुमुदिनी को भोर तक वह ताकता है।।

शुभ बेला तारों की बारात होनी चाहिए।
हर कदम की घर से फिर मुलाकात होनी चाहिए।।

जवान फसलें खेतों में जब गुनगुनातीं,
गेहूँ संग सरसों हल्दी तब लगाती।
 गुलाबी साफा बाँध चना इठलाने लगा,
नीली अलसी का तन मन रिझाने लगा।

प्रेम पगी रस्मों की शुरुआत होनी चाहिए,
हर कदम की घर से फिर मुलाकात होनी चाहिए।।


शर्मिला चौहान

बुधवार, 17 मई 2023

1121 2122 1121 2122

( आदरणीय सर के सुझावों पर संशोधित ग़ज़ल) ( मिली खाक में मोहब्बत..)

1121 2122  1121 2122


डरा सा दिखे हमेशा, रहे मौन ये बश़र है
सहे घात सारे जीवन, बड़ा ही विकट समर है ।।1।।

रखे बाँधकर थे रिश्ते, लगे दूर बिखरे बिखरे
लगा खोजने मेरा मन, रही कौन सी कसर है।।2।।

जो बिना कहे समझ ले, पढ़े दिल की बात दिल से
बड़ी पारखी सी रहती, वो जो माँ की इक नज़र है।।3।।

 थे जो बाग ताल पोखर, नहीं  दिखते अब यहांँ सब
बिना उनके सूना सूना, पड़ा ये बड़ा शहर है।।4।।

कली दिल की खिल गई जब, मधुमास सा लगे सब
खुली आँखें बुनती सपने, तेरी प्रीत का असर है।।5।।

करे दूर तम के साए, खुले द्वार ताके रवि को
भरे आस सबके मन में, ये तो भोर का पहर है।।6।।

बने कागज़ों से कश्ती, चली थोड़ी डूबी फिर वो 
जहांँ खेलता था बचपन, नहीं अब वहाँ नहर है।।7।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

सोमवार, 15 मई 2023

काके लागूं पाय (व्यंग्य)

"काके लागूं पाय" (व्यंग्य)


अपनी इकलौती सफ़ेद कमीज़ पहने, कंघी से बालों को लच्छेदार बनाते हुए अच्छे लाल ने पत्नी से कहा,"आज का दिन शुभ है, हमारे सितारों का भाग्यांक प्रतिशत बहुत बढ़िया है। लाओ नाश्ता कर के चलूंँ, देखें कुछ काम आज बन भी जाय।" उनका बोलना खत्म होने के पहले ही पत्नी उमा ने, दो रोटी गुड़ की डली के साथ प्लेट में धर, सामने पटक दिया।
"काम से तो तुम्हारा नाता नहीं है नाता तो बस हमारे से जोड़ लिया। माथा खराब था हमारे बाप का जो तुम्हारे टूटे फ़ूटे बड़े घर को देख ब्याह गए।" छिली फटी दीवारें, बोझ से दबी कराहती दिखतीं ईंटों की ओर अँगुली दिखाती उमा बिफर पड़ी।
"अरे, अब जा ही तो रहें हैं। तुम भी बस भरी पड़ी रहती हो, शत्रु दिखा की तोप बरसाने को तैयार।" सूखी रोटी, गुड़ देख अच्छे लाल ने बिना खाए जाने में ही भलाई समझी।
"पाय लागूं अम्माँ।" आँगन में बैठी, धूप का आनंद लेती अम्माँ के चरणों को छूने लगा अच्छे।
"हमाए पाय काहे लग रहे बेटवा, जाओ उसके लगो जिसे ब्याह कर हमाए सिर मढ़ गए तुम्हाए बापू।" अम्माँ ने बुरा सा मुँह बनाया और अपने पैर सिकोड़ लिए।
अच्छे ने बरामदे में लटकी बड़ी दीवार घड़ी को देखा, चम्मच सा काँटा दोनों कोनों के बीच नाच रहा था। कमरे की चौखट से उमा घूर रही थी और आँगन में अम्माँ। 

बात ऐसी है कि घरवालों को कद्र नहीं थी अच्छे के अच्छाइयों की, उनकी साख तो बाहर वालों में जबर्दस्त थी। उनके बिना तो पूरा मोहल्ला निष्प्राण रहता। 
चाय की टपरी पर अच्छे लाल की बिरादरी का मजमा लगा हुआ था।
"आओ आओ अच्छे भैया। अरे, बड़ी देर से निकले आज। हम सब आप ही का रास्ता देख रहे हैं।" किशोर बोलने लगा।
"दे भाई सबको कटिंग चाय पिला और अच्छे भैया का हुकुम हो तो गरम समोसे भी चलेंगे।" गोविन्दा ने टपरी वाले मुन्ना से कहा।
"अच्छे भैया आ जाते हैं तो हमारी टपरी में बहार आ जाती है।" खींसे निपोरता  मुन्ना, सुबह से सैकड़ों बार खौली चाय को फिर से खौलने के लिए चढ़ा दिया।
"समोसा भी दे मुन्ना और भजिया भी, आज हम नाश्ता नहीं किए हैं।" अच्छे लाल ने खाली की हुई कुर्सी पर बैठते हुए कहा।
कुर्सी के लिए पागल दुनिया में अच्छे की अच्छाई का प्रताप था कि आज भी उनके ये दोस्त कुर्सी खाली कर देते हैं।
"लखनवा नहीं दिख रहा, कहाँ है रे।" अच्छे ने चारों ओर नज़र घुमाई। अपनी बिरादरी का ध्यान रखना हर लीडर का दायित्व है।
"भैया आपको नहीं मालूम, लखन की नौकरी लग गई है। मुंबई जाएगा आज रात, कोई कंपनी में काम मिला है।" आँखें चमकाते हुए गोविन्दा कह पड़ा।
"हमको नहीं बताया लखनवा, चलो भली करें रामजी।" अच्छे ने चाय सुड़कते हुए कहा।
कल ही तीनों किराएदारों से किराया ले लिया था सो आज जेब भी भरी है। अरे भाई, जब भाग्य का प्रतिशत बढ़िया हो तो फिर क्या पूछना।

"आज वकील से मिल आते हैं।‌ बरसों से थोड़ा किराया देने वालों से निजा़त पाना ही होगा। नए किरायेदार रहेंगे तो दोगुना किराया तय कर देंगे।" अपने मित्रमंडली से कहते हुए, अच्छे लाल की आँखें में भविष्य के सुनहरे सपने तरंगित हो रहे थे।
"जब रेंट ज़्यादा तो ख़र्च भी तो बढ़ ही जाएगा ना। तब एक दर्जन सफेद कमीज़, दो-चार जोड़ी नए जूते, एक घड़ी, और अम्माँ के लिए रेशमी साड़ी भी लें लेंगे। उमा को सोने की चूड़ियांँ पहनने का बड़ा मन है, बस बढ़े किराए से एक एक चीजें खरीद लेंगे।" अंतहीन लिस्ट के बीच में दोस्तों ने झिंझोड़ कर कहा, "चलो भैया हम तो चले, जरा कुछ काम है।" सब निकल गए और टेबल पर रखा बिल फड़फड़ा रहा था।
अच्छे लाल ने, अच्छे मन से, अच्छे लोगों के खाने का, अच्छा सा बिल पटा दिया। 
टपरी वाले मुन्ना ने एक बड़ी सी सलामी ठोक दी।
"इसके आने से धंधे में बरकत है भाई। बाप दादा के बनाए घर के किराए पर ऐश करता और कराता है।" पलटकर उसने अच्छे को हाथ दिखाया, "भैया फिर आइएगा।" 
सामने सड़क के उस पार मंगल काका अपनी दुपहिया को आड़ा कर चालू करने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे।
लपक कर अच्छे लाल सामने पहुँच गए। 
"पाय लागूं काका।"
मंगल काका एक क्षण घूरते रहे फिर अपने पैर पीछे हटा लिया। 
"हमारे पैर ना छुओ अच्छे! जरा अपनी महतारी, मेहरारू का सोचो ‌ दिन रात बेकार के दोस्तों को भिनकाए रखते हो।" काका ने स्टार्ट किया और एक बार में ही स्कूटर भुर्रर चल पड़ी। 
"आज तो हम जिनके पांँव पकड़ रहें हैं वही दिल तोड़ कर निकल जाता है।" आशीर्वाद की इच्छा को रुमाल में बाँध अपनी जेब में रख लिया। सामने मंदिर की घंटी बजी और अच्छे ने सामने देखा, पुजारी जी को देखकर उधर ही लपक लिए।

"जय राम जी की पुजारी जी।" अच्छे लाल तपाक से पुजारी जी के चरणों में झुक गए।

पुजारी जी, ऐसे छिटक कर दूर हट गए मानो बिजली का नंगा तार छू लिया हो।
"दूर हटो! अभी अभी स्नान करके चले आ रहें हैं। भोग लगाना है भगवान को। हमारे पैर ना छुओ, जाओ भगवान का मंदिर है उन्हीं के पाँव पकड़ो।" 
हाथ को जस का तस धरे अच्छे ने सिर ऊपर उठाया, तब तक तो पुजारी जी गर्भ गृह में प्रवेश कर चुके थे।

उठकर अच्छे ने इधर उधर देखा, किसी ने कुछ देखा नहीं था। अपनी कमीज़ की सिलवटों को, हथेली से झटक कर ठीक किया और मंदिर के अंदर चले गए।
नटवर, नंदलाल पीले रेशमी वस्त्रों में, मुकुट बैजयंती माला का शृंगार किए हुए चैन की बंसी बजा रहे थे। पुजारी जी ने माखन मिसरी, फल, मिठाई उनके सामने सजा दिया।
"हे भगवान! आप तो अंतर्यामी हैं। हमें कुछ ऐसा आइडिया दे दें कि हम आराम से जीवन बिता सकें। आपकी तरह फल, मेवा खाते रहें और चैन का जीवन जिएँ।" अच्छे ने इधर उधर देखा और बुदबुदाए, "अम्माँ और उमा को सद्बुद्धि दें प्रभु, उन्हें लगता है कि हम काम ही नहीं करते।" हाथ जोड़े आँख बंद किए अच्छे लाल ने, गोपाल के सामने दिल खोल कर रख दिया।
"भगवन, मित्र मंडली तो आपकी भी थी। मित्रो के लिए क्या क्या करना पड़ता है आपसे बेहतर कौन जानेगा प्रभु।" खंखार कर गला साफ किया ताकि स्पष्ट आवाज़ प्रभु तक पहुँचे।
"आपने दही माखन चुराया, खेल खेल में जमुना में कूद पड़े, रास रचाया, सब दोस्तों के साथ ना। हमने किराए का आधा पैसा मित्रों पर खर्च किया, तो कौन सा जुल्म हो गया।" ईश्वर से आशीर्वाद लेने के लिए अच्छे लाल जैसे ही फर्श पर टिकते, घंटी बजने लगी। सामने देखा तो पुजारी जी ने परदा खींचकर, कन्हैया को छुपा दिया था।
"हे भगवान! हम साष्टांग दंडवत करते कि पहले ही आप अंतर्धान हो गए। और ये क्या, आपको भी लोगों से छिपकर खाना पड़ रहा है।"  कदम पीछे पीछे लेते अच्छे मंदिर से बाहर आ गए।
देखा तो सामने वकील साहब थे। 
"नमस्कार वकील साहब, आप ही की तरफ़ आ रहे थे।" वकील साहब का गर्मजोशी से अभिवादन करते हुए अच्छे लाल ने कहा।

"क्या खाक आ रहे थे, फालतू केस ले आते हो। दो केस हार गए तुम्हारे चक्कर में, फटीचरों की टोली लिए घूमते हो और फीस के नाम पर उस टपरी में चाय पिलाते हो।" आग बबूला हो रहे थे वकील साहब।
"तुम्हारे पिताजी की साख थी जो तुम्हारे केस ले लिया करते थे। अब नहीं होगा हमसे। हमारा भी घर परिवार है, तुम्हारे जैसे निठल्ले घूमने के दिन आ जाएंगे।" कहते हुए वे झटके से मंदिर में घुस गए।
अब तो अच्छे लाल के सपनों का महल चूर-चूर हो गया। 
ना ये वकील केस लेगा, ना किराएदार घर खाली करेंगे, ना नया रेट मिलेगा..।‌ लटकती दर्जन भर कमीज़ें, वो जूतों की जोड़ियांँ सब आँखों के सामने नाचने लगीं।

आज तो हमारा भाग्यांक प्रतिशत बढ़िया था, सुबह से किसी का आशीर्वाद तक ना मिला। दुःखी अच्छे लाल ने, हारे थके कदम आगे बढ़ाए थे कि कोने में बैठे एक वृद्ध व्यक्ति के गीत ने रोक लिया।
तंबूरा पकड़े वह गा रहा था, "गुरू गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय..।"
अच्छे लाल लपक कर उसके सामने चले गए।  आव देखा ना ताव, चरण धर कर प्रणाम करने लगे।
वृद्ध भिखारी ने पैर सिकोड़ते हुए कहा, "कुछ दान दक्षिणा हो तो डालो। पाँव छू लोगे तो मेरा पेट नहीं भरेगा।" 
अच्छे लाल को दिन में तारे नज़र आने लगे। क्रम में जमे वो सभी, मुस्कुरा कर अच्छे लाल के भाग्यांक का प्रतिशत बना रहे थे।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585

शनिवार, 29 अप्रैल 2023

व्यंग्य -" रहिमन पानी राखिए "

"रहिमन पानी राखिए"
 ‌(व्यंग्य)

शिवा ने पाठ पढ़ना शुरू किया। सामने दीवान पर विराजमान दादी, चश्में के पीछे से बराबर अपनी नज़र बनाए रखीं थीं। दो बार टोकते हुए कहा भी, "दोहे पढ़ रहे हो तो ज़रा लय ताल में पढ़ो, क्या अपनी अम्माँ की बनाई तरकारी की तरह बेस्वाद, बेसुर बने हो।" चश्में को ज़रा नीचे झुकाते हुए, दादी ने थोड़ी दूर खड़ी अपनी बहू लता को कनखियों से देखा।
शिवा इस नज़र को खूब पहचानता था, बस झट दादी के पास आकर चिपट गया।
"अम्माँ सचमुच ही बड़ा फीका खाना बनातीं हैं। आपने एक दिन जो बैंगन का भरता बनाया था ना वाह! कितना टेस्टी था।" एक तीर दो निशाने,दादी ने पढ़ाई के लिए डाँटना बंद कर दिया और आँचल में बँधा पाँच का सिक्का लाड़ले को थमा दिया।
"जा जल्दी से दोहे गाकर याद कर ले फिर संतरे की नहीं तो चूरन की गोली ले आना। मुझे भी एक देना।" उसके बालों को अपनी अंगुलियों से  संवारती दादी को देख लता ने अपना माथा ठोक लिया।

"पढ़ाई-लिखाई तो थैली में बाँधकर, खूँटे में लटका दो। उन्हीं की गोद में छुपे बैठो, एक को तो बिगाड़ रखीं हैं अब तुम्हारी बारी है।" लता ने सामने से आते अपने बड़े बेटे भुवन को देखकर कहा।
"देखा भुवन, कैसी कैंची की तरह कतर-कतर ज़ुबान चलती है इसकी। हाय राम! तुम अपने ही साथ क्यों ना ले गए मुझे।" बरामदे में माला चढ़ी अपने पति की लटकती तस्वीर को देखकर दादीआँसू बहाने लगी।
"नल में तो पानी नहीं आ रहा, आँखों से गंगा-जमुना बह पड़ती है।" बुदबुदाती लता के अस्पष्ट शब्दों को सुनने के लिए दादी ने एक क्षण के लिए रोना बंद कर दिया और फिर लय में रोने लगी।
पाँच रुपए से कल्पना को पंख मिल गए‌। चूरन की गोलियांँ दो रुपए, दो की चाकलेट, बचे एक का क्या करना चाहिए सोचता हुआ शिवा दूकान पर जा पहुँचा।
"पाँच रुपए का सिक्का घुमा रहे हो, बुढ़िया की पोटली से चुरा लाए क्या? नहीं तो आकर हमसे वसूल लेगी।" दूकानदार पोपली हँसी हँसने लगा।
"क्यों करूँ चोरी, दादी ने दिया है।" दूकानदार के कानों में फुसफुसाया, "दादी से पैसे लेना हो तो अम्माँ की बुराई कर दो, अम्माँ से दूध, घी ज़्यादा लेना हो तो दादी की कर दो।" गहरा राज खोल दिया शिवा ने।
"बड़े शातिर हो।" कहते हुए दूकानदार ने सामान दे दिया। जाते जाते शिवा ने चूरन की एक गोली बरनी से निकाल कर मुँह में डाल ली।
"खरीदी वाली खाओ ना बच्चू, हमें चूना काहे लगा रहे‌ हो?" तब तक तो शिवा नौ दो ग्यारह हो गया था।

दरवाजे से ही शिवा ने घर की स्थिति का जायज़ा लिया। 
"शरम लाज कहाँ बची है, आँखों का पानी ही मर गया है। हाय हाय! कैसी पनौती बहू दी राम जी।" दादी जोरों से प्रलाप कर रहीं थीं और पापा उनके पैर दबा रहे थे।
"जा, तू ही लायक होता तो ये दिन ‌ना देखने पड़ते।" अपने पैर को पापा के हाथों से दादी ने झटक लिया।
पापा कमरे में गए और शिवा दबे पाँव दादी के पास आ गया। दादी ने इधर उधर का नज़री मुआयना किया और चूरन की गोली मुँह में डाल‌ ली।

गोली जीभ पर रखी और असर शरीर पर होने लगा। खट्टा-मीठा रस जिव्हा पर से सरक कर, सर्प की चाल से लहराता गले तक जा पहुंँचा।
स्वादेन्द्रिय के जागृत होने से, उदर की चटपटी आहुति की चाह रखने वाली अग्नि प्रदीप्त हो गई। लार सुड़कते ही ज़बान का चटकारा लगा और आँखों में चमक आ गई।
शिवा के हाथ से दो गोली झपटकर दादी ने, अपने पल्ले की गाँठ में बाँध ली।
"चल जा अब, जरा मन लगाकर पढ़ना।" कहती हुई दीवान से उतरती दादी ने शिवा को बस्ते की ओर धकेल ही दिया। दादी के तेवरों के आदी शिवा ने, मुँह में चाकलेट डालकर फिर से दोहे रटने की शुरुआत कर दी।

नल के नीचे रखी बाल्टी, टोंटी की ओर बड़े प्रेम से निहार रही थी। प्रियतम की प्यारभरी फुहार के बिना वह शुष्क, बेजान पड़ी थी।
लता ने रसोई में जाकर मटके को टटोला, पानी तली में चला गया था। 
"हमारे स्नान का बखत हो गया, दो बाल्टी पानी तो ला दो कोई।‌ हमारा दीन धर्म खराब ना करो बुढ़ापे में।" आँगन की ओर देखती दादी कहने लगी।
"बाहर का चूरन, चाकलेट, पैकेट के चिप्स छुप छुप कर खाती हो, तब दीन धर्म की याद नहीं आती आपको। कौन लाएगा हैंड पंप से पानी, अब मुझे यह भी करना पड़ेगा क्या?" लता रसोईघर से चिल्लाने लगी।
"अरे जा रे भुवन, तू पानी लाकर दे।  तेरी अम्माँ की ज़ुबान बड़ी तेज़ चलने लगी है। नहा धोकर पूजा पाठ करूँ तो शांति मिलेगी।" दादी की आवाज सुनकर भुवन का चेहरा उतर गया।

"इस जवानी में पानी भरने का काम, दादी भी ना हुँह.!" भुवन ने दोनों बाल्टियाँ पकड़ीं और मुस्कुराते हुए शिवा को देखा तो चिड़ गया। बाल्टियांँ छोड़ बरामदे की ओर भागा और शिवा को दो तमाचे जड़ दिए।
"कब से पढ़ने का स्वांग रचा रहा है, एक दोहा याद नहीं हुआ अब तक।" गुस्से का प्रेशर था कि चांटा जरा जोर पड़ गया और आँखों से शिवा उस दबाव को निकालने में लग गया।
सुबकती हुई  आवाज़ गूँजने लगी।
"रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गए ना उबरे मोती मानुष चून।"

अब सुर-ताल, लय सब एकदम परफेक्ट था।

दोनों हाथों में बाल्टी उठाए, शिवा घर से बाहर निकल गया। पिछले साल ही मोहल्ले में सरकारी खर्चे से तीन हैंडपंप लगाए थे। बड़ा जोर-शोर हुआ था उद्घाटन। हैंडपंप को फूलों की मालाओं, रंग बिरंगे पेपर से दूल्हे की तरह सजाया गया था। बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम, खाना पीना सब हुआ था।
भुवन की आँखों के सामने, महानगर से आई दोनों डांसरों के लटके-झटके  मचलने लगे।
पतुरियों का नाच गाना तो बहुत देखा था बचपन से, शादी-ब्याह में, मुंडन-छेदन में, तिलक- सगाई में और चुनाव के आगे पीछे, लेकिन शहर से आई  डांसरों की बात ही निराली थी। अंग अंग का थिरकना, उनका कसा छोटा पहनावा और अदाएँ, सोचकर ही शरीर में बिजली कौंध गई।
एक सुखद अहसास, मस्तिष्क के केंद्र से आदेश मिला और रोम रोम आनंद की अनुभूति से हिलोरें लेने लगा। उत्तेजना की चरम सीमा पर भुवन चलते चलते थिरकने लगा।

"फटाक.!" यह क्या, हैंडपंप के सामने किसी का भरा हुआ बरतन ठोकर से गिर गया।‌पानी का छोटा सा पोखर, बरतन के चारों ओर बना और प्यासी धरती ने क्षण में ही उसे गटक लिया।
"अंधे हो गए क्या? पानी से भरा बर्तन नहीं दिखा। जवानी का जोश कुछ ज़्यादा चढ़ गया है जो पूरा पानी गिरा दिया।" सामने अधेड़ आंटी ने जी भर गरिया दिया और अपना खाली बर्तन उठा कर जाने लगी।
"आ़टी, भर लीजिए दुबारा, मैं चला देता हूंँ हैंडपंप।" भुवन ने अपनी सभ्यता की कतरनों को जोड़कर, सम्मान की चादर सामने भेंट कर दी।
भुवन का ऊँचा पूरा शरीर, भरी भुजाओं को घूरती उस औरत ने कहा, "अपनी ही बाल्टी भर लो तुम तो इस हैंडपंप से अब।" और वह बंदूक़ की गोली सी दनदनाती निकल गई।
"अजीब लोग हैं।" कहते हुए भुवन ने हैंडपंप की टोंटी के नीचे बालटी रखी और पंप पर जोर आजमाईश करने लगा। अपनी बलिष्ठ भुजाओं को बड़े प्यार और गर्व से देखते हुए, जोश से धड़ाधड़ हैंडल चलाने लगा।

"खराब पड़े हैंडपंप को क्या जड़ से उखाड़ फेंकोगे?" बाजू की टपरी से चाय पीते गुप्ता जी ने आवाज़ लगाई।
"अरे, यह खराब था तो आंटी के बर्तन में पानी कहाँ से आया था?" भुवन ने पूछा।
"दो घंटे पहले भरकर गई थी कहीं, उसके बाद पंप खराब हुआ।" अब टपरी वाले ने खिखियाते हुए कहा।
"अब पानी कहाँ से मिलेगा?" जवान खून निराश हो गया।
"दो हैंडपंप खराब हैं, तीसरे पर जाओ जो मंदिर के मोड़ पर है।" पानी से भरी अपने प्लास्टिक के पीपों को देखकर, दाँत निपोरता टपरी वाला बोला।
उसे आग्नेय दृष्टि से घूरते हुए भुवन ने, अपने दाएं-बाएं की सुंदरियों के कान पकड़, हथेली में भींच आगे कदम बढ़ा लिए। सफेद पतरे की चमचमाती दाएँ में और सांवली सलोनी बाएं में सुशोभित थी। दोनों अपने प्रियतम की तलाश में मानो गुनगुना रहीं थीं।
"आजा रे, आजा रे मेरे प्रिय जल आजा, आके मुझमें समा जा रे।।"
हट्टे कट्टे मुस्टंडे जवान को बाल्टियाँ लेकर घूमते देख, सड़क के किनारे खड़ा लड़कियों का झुंड ठहाके लगाने लगा। अपना आगा-पीछा पूरी तरह चैक करने के बाद, भुवन उनको घूरता हुआ आगे बढ़ गया।
आगे भीड़ खड़ी थी।
"किस बात की भीड़ लगी है भाई?" एक व्यक्ति से भुवन ने पूछा।
"हाथों में बाल्टियाँ पकड़े, क्या सिनेमा देखने चले हो। लाइन है पानी के लिए, हमारे पीछे खड़े हो जाओ।" बुरा सा मुँह बनाते वह आदमी थोड़ा आगे सरक गया।
"यहाँ से हैंडपंप तो दूर है, इतनी लंबी लाइन।" भुवन का मुँह खुला रह गया।
अपनी बाल्टी को लाइन में लगाकर भुवन आगे की स्थिति का जायज़ा लेने चल पड़ा। घोड़ी चढ़ने को तैयार दूल्हे की तरह, हैंडपंप को लोगों ने चारों ओर से घेर रखा था। आक्टोपस के झूठे पैरों सी, गोलाकार भीड़ में सात-आठ लाइन निकली थी। 

"सामने क्यों जा रहे हो, देखते नहीं हम घंटे भर से नंबर लगाए खड़े हैं।"  गुर्राते हुए एक नौजवान ने भुवन को टोका।
"खाली हाथ हूँ कैसे पानी भर लूँगा, सिर्फ देख रहा हूंँ भाई।" भुवन भी तैश में आ गया।
"होशियारी मत करो, जाओ पीछे। अपने आपको सनी देओल समझ रहा है।" भुवन की खुली बांँह को देखकर सब हँसने लगे।
"ज्यादा चपड़ चपड़ की तो धर दूँगा दो चार।" भुवन ने चिढ़कर कहा।
"मारेगा, झगड़ा फसाद करेगा।  हीरोगिरी चढ़ी है तेरे को।" कहते हुए एक दो लोगों ने उससे धक्का मुक्की की।
धक्का मुक्की, शोर-शराबा अपने पूरे शबाब पर था, कुछ आग में घी डाल रहे थे, कुछ वीर और रौद्र रस का आस्वाद ‌ले रहे थे। इधर हड़कंप मची और उधर हैंडपंप ने अपने हैंड खड़े कर दिए।

"खट खट खट.!" एक चुप्पी। सारा कुछ थम गया।
लड़ते झगड़ते लोग रूक गए, सबके चेहरों का पानी सूख गया।
अब बारी थी दोषारोपण करने की, चुनाव में पराजित पार्टी के कार्यकर्ताओं की तरह, हैंडपंप के टूटने का दोषारोपण एक-दूसरे पर करने लगे।
भुवन लपककर बाहर निकल आया, आखिर अपना पानी बचाना भी तो जरूरी था।
लाइन तो कब की तितर-बितर हो गई थी। 
देखा तो, उसकी दाएँ अंग वाली गोरी चिट्टी, नवब्याहता सी दमकती बाल्टी का अस्तित्व नदारद था। वामांगिनी सांवली सलोनी, भुवन की हथेली में लिपट जाने को आतुर जान पड़ती थी।
अपना पसीना पोंछता, रोनी सूरत लिए भुवन ने उसे उठा लिया।‌अब वह दाएँ हाथ पर इठला रही थी। 

इकलौती खाली बाल्टी लिए भुवन ने घर के दरवाजे पर पैर रखा ही था कि अम्माँ की चहकती आवाज़ सुनाई दी।
"नगरपालिका को दया आ गई, चौबीस घंटे के बाद नल की टोंटी से निर्झर सा जल झर रहा है। अरे, भुवन! कहाँ भटक रहे थे।" हाथ में एक ही बाल्टी वो भी खाली देख लता ने अपना माथा ठोक लिया।

भुवन की दशा देखकर, पिछले दो घंटे से पढ़ाई का स्वांग रचाने वाला शिवा हँसकर ज़ोर ज़ोर से, पूरे सुर ताल में दोहा गाने लगा।

"नल प्रभु पानी दीजिए, बिन पानी सब सून।
पानी बिना सब भुगतते, मोती, भुवन और चून।।

अपनी जोड़ तोड़ से दोहा बना लेने की कला पर मुग्ध हो, उसने आज के लिए बस्ता बंद कर दिया।


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शर्मिला चौहान

रविवार, 16 अप्रैल 2023

122 122 122 122

संशोधित ग़ज़ल (१५/४/२०२३)


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122  122  122  122

चुने काफ़िए जो निभाती ग़ज़ल है
वही क़द्रद्राँ भी बनाती ग़ज़ल है।।1।।

खुशी ग़म उदासी हो जैसा भी मौसम
उसी रंग में डूब जाती ग़ज़ल है।।2।।

चले जाते जो छोड़कर दूर इसको
कशिश से उन्हें भी बुलाती ग़ज़ल है।।3।।

नशा है या जादू मज़ा कुछ अनोखा
अलग सी करीबी बढ़ाती ग़ज़ल है।।4।।

कही दिल से जाती सुनी दिल से जाती
कि दिल से ही दिल में समाती ग़ज़ल है।।5।।

लगी थी कठिन पर अभी मैंने जाना
सरलता से अपनी लुभाती ग़ज़ल है।।6।।

छलकती खुशी "शर्मिला" की जो दिल से
तो हौले से वो गुनगुनाती ग़ज़ल है।।7।।

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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

122 122 122 122

(संशोधित ग़ज़ल)

1222 1222 1222 122

किनारों पर नहीं अपना ठिकाना चाहती हूँ।
नदी उन्मुक्त सी बन कर दिखाना चाहती हूँ।।1।।

थपेड़ों से थकी टूटी पड़ी थी नाव कब से
बनाकर फिर नई उसको चलाना चाहती हूँ।।2।।

कतर कर पँख सपनों के उन्हें बौना रखा था
गगन तक सपनों का अब कद बढ़ाना चाहती हूँ।3।।

महकते फूलों की बगिया थी चाहा जिसने तोड़ा
कुछेक काँटे चमन में अब उगाना चाहती हूँ।।4।।

बड़े दावे किया करते थे बातों से कभी वो
उन्हीं दावों को अब मैं आज़माना चाहती हूँ।।5।।

मिले जो चंद रिश्ते खून के बंधन से बँधकर
उन्हीं के कत्ल पर आँसू गिराना चाहती हूँ।।6।।

पेशानी पर पड़ी सलवट गवाही खूब देती
कि चिन्ता छोड़ अब इनको हटाना चाहती हूँ।।7।।


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शर्मिला चौहान

सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

122 122 122 122

122 122 122 122

गमों को हमेशा छुपाती है औरत
भरी आँख खुशियाँ लुटाती है औरत।।1‌‌।।

बनी नींव सहती रहे बोझ सबका
मकां को मगर घर बनाती है औरत।।2।।

खड़ी धूप में खुद थपेड़ों को झेले
कि आँचल से छैयाँ कराती है औरत।।3।।

दिए ज़ख्म लाखों ज़माने ने उसको
मगर हँस के मरहम लगाती है औरत।।4।।

नदी बन के सींचे वो रिश्तों की धरती
किनारों को पुल बन मिलाती है औरत।।5।।

घना खूब छाए तिमिर जब जगत में
तो आँगन में दीपक जलाती है औरत।।6।।

पड़ी चंद बूँदें भरी नेह से जब
महक मोगरे सी वो जाती है औरत।।7।।

निभाती रहे झुक के बंधन खुशी से
ग़लत बात पे सिर उठाती है औरत।।8।।

कहाँ से चली थी कहाँ आज पहुँची
सरल राह खुद ही बनाती है औरत।।9।।

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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2023

प्रयोगात्मक लघुकथाएं

[01/12/2022, 16:09] Sharmila Chouhan: लघुकथा_ "असैनिक सैनिक"  ( छंदबद्ध काव्य शैली दोहा एवं मनहरण घनाक्षरी छंद)



लेकर के सेना बड़ी, हमलावर के वेश।
बड़ा देश हमला करे, झेले छोटा देश।।(दोहा)


जनता हौसले वाली, देशहित मतवाली
बूढ़े बच्चे घर रख, निकले वो आज हैं।
अस्त्र शस्त्र सीख रहे, शत्रु पर चीख रहे
युवानों ने प्रण लिया, यही सच्चा काज है।
शत्रु की ताकत बड़ी, नभ थल सेना खड़ी
दाँव पेंच खेल रहा, शक्ति का आगाज़ है।
सीमा पर शत्रु खड़ा, जिद पे अपनी अड़ा
लोगों का साहस देख, आती खुद पे लाज है।।(मनहरण)


नागरिकों का हौसला, बढ़ता देख अपार।
क्रोधित हो दुश्मन प्रबल, करता तीव्र प्रहार।।
नवयुवान झंडा लिए, आगे चलता वीर।
भागो ये मेरा वतन, सीना रख दूँ चीर।।


जोर की आवाज हुई, छतें कई उड़ गईं
गोली से घायल गिरा, युवा वो महान है।
धरती पे गिरा लाल, ध्वज रखा है संभाल
गौरव निज देश का, करे गुणगान है।
हौसला जो मन भाया, दुश्मन निकट आया
जाओ घर लौट जाओ,हमने ली ठान है।
खून लोगों का बहाते, सैनिक क्यों हो कहाते
जंग हम जीत लेंगे, मुझे अभिमान है।। (मनहरण घनाक्षरी)

सांँसें धीमी सी हुई, झंड़े पर थे नैन।
लहराता रहे हरदम, दिल पाएगा चैन।।
सैनिक को अफ़सोस था, आकर बैठा पास।
घर तू वापस लौट जा, करता जीवन नास।।

जन्मदिन माँ का आज, करता मैं देश काज
लौट नहीं पाऊंँगा जो, कोई ना मलाल है।
साबित मैं कर पाऊँ, धरा का  ऋण चुकाऊँ
मेरी माता करे गर्व, ये तो मेरा लाल है।
सैनिक का मन भीगा, प्यारा वो युवक लगा
बोला मेरी माता का भी, बस यही हाल है।
दोनों वीर मिल रहे, नैना नीर बह रहे
माता की यादों के संग, दोनों देखें काल हैं।।( मनहरण)


धीरे धीरे टूटती, सांँसों की थी डोर।
बैरी कायल हो गया, नम आंँखों की कोर।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585

sharmilachouhan.27@gmail.com
[02/12/2022, 18:59] Sharmila Chouhan: "असैनिक सैनिक"( काव्यात्मक शैली)


लाव लश्कर से सजी बड़े देश की सेना चली‌। हवाई हमलों की मार सहता छोटा देश मगर ना डरता।

देश खातिर जान देंगे दुश्मनों से ना डरेंगे। जन्मभूमि है हमारी हाथ से जाने ना देंगे। छोटे देश की आम जनता अभ्यास शस्त्रों का करने लगी। बूढ़े, बच्चों को घर पे छोड़, नवजवानों की टोली बढ़ने लगी।

देख ज़ज्बा आम जन का, शत्रु मुस्काने लगे। आम जन में देश के सैनिक नज़र आने लगे।
लाख हिदायतों के बाद, वो आगे बढ़ते जा रहे थे। देश की रक्षा का प्रण बस, वे सभी दोहरा रहे थे।

दनदनाती शत्रु गोली, चीरकर दिल को गई। गिर पड़ा धरा पर नवयुवान, रक्तधार सतत् बह चली। देख हौसला उस युवक का शत्रु पास आने लगा। बैर भूला बैठ नीचे हाथ सहलाने लगा।

जीत दुनिया देखती कैसे भी फिर हालात हों। जीतता तो बस वही जिसमें भरे ज़ज्बात हों।
साँसें धीमी पड़ रहीं थीं आँखों में था देश परचम। मैं रहूँ या ना रहूँ, लहराता रहे तू हरदम।

मन ही मन आक्रमणकारी उसे सलाम कर रहा था। बिना किसी दबाव के वो युवक अपने देश पर मर रहा था।
हथियार चलाकर बलपूर्वक अधिकार जमाते हो. देशभक्ति के नाम पर लोगों का खून बहाते हो।
तिलमिलाकर शत्रु सैनिक ने कहा यह सच नहीं। देश का आदेश है और इसपे मेरा बस नहीं।
धीमी होती आवाज़ में नवयुवक फुसफुसाया, अपने सीने में दफ़न इक राज फिर बताया। 
सैनिक बनने की लालसा थी बड़ी, वह दिल की दिल में रही दबी। आज अब मौका आया है देश ने उसे बुलाया है।

बस एक ग़म हमेशा रह जाएगा, आज माँ का जन्मदिन है ये बेटा मिल ना पाएगा। शत्रु सैनिक काँप गया, उसके अंदर का बेटा जाग गया।
अपने देश की सेना से मैं बात करुँगा, तुम माँ से मिल सको ये फरियाद करुँगा। ना होगा माँ को स्वीकार कि मैं दुश्मन से झुक जाऊँ, चाहे धरती की खातिर सौ बार भी मैं मर जाऊँ। 

माँ तेरी मेरी होती नहीं, बस माँ तो माँ होती है। अपने लाल को जब ठोकर लगे, माँ सौ सौ आँसू रोती है।
आँखों में दोनों की इक नमी झलकने लगी, माता का चेहरा याद कर फिर चार आँखें चमकने लगीं। साँसें नवयुवक की और धीमी हो जाती है, बंद होती पलकों में धुँध सी छा जाती है।
धीरे से डूब जाती है वो दमदार आवाज़, शत्रु नतमस्तक हो जिसका वंदन करता आज।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585

sharmilachouhan.27@gmail.com
[03/12/2022, 15:42] Sharmila Chouhan: "जीत का फंडा" (साक्षात्कार शैली)

प्रश्नकर्ता - अपनी नई पुस्तक के लिए विश्वस्तर पुरस्कार विजेता लेखक श्री रमेश देव जी का हमारे चैनल पर हार्दिक स्वागत है। 
नमस्कार एवं अभिनंदन आपका सर।

लेखक- (हाथ जोड़कर) आपके चैनल एवं सभी दर्शकों को नमस्कार, धन्यवाद।

प्रश्नकर्ता - सर, पुरस्कार प्राप्त करने के बाद आज देश में  आपका प्रथम साक्षात्कार हमारे चैनल पर है। हमारे दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मुझे कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि हमारी टी.आर.पी. रिकार्ड तोड़ देगी।

लेखक - आपने मुझे अपने चैनल पर आमंत्रित किया, मेरा सौभाग्य है।

प्रश्नकर्ता - सर,आपने कितनी पुस्तकें लिखीं और अपने शुरुआती दौर के बारे में हमारे दर्शकों को थोड़ा बताइए।

लेखक- मैंने अपने कॉलेज के दिनों से लिखना शुरू किया था। नुक्कड़ नाटकों और गीत लिखने का शौक था। (मुस्कुराते हुए) कई नाटकों का दोस्तों के साथ मंचन भी किया। कहानियों और फिर उपन्यास विधा पर कलम चलाई।
मेरे करीब बीस एकल संग्रह आए हैं।

प्रश्नकर्ता - सर,आपकी पूर्व में लिखित पुस्तकों को पाठकों ने दिल से सराहा परंतु राष्ट्रीय स्तर पर आपको कोई पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ।
इस नई पुस्तक को देश में उतनी ख्याति नहीं मिली परंतु विश्व स्तर पर विजेता रही। इसका क्या कारण है सर?

लेखक- (मौन)

प्रश्नकर्ता - सर, आज  हजारों की संख्या में जुड़े हमारे दर्शकों को यह जानने की बहुत इच्छा है। आप का उत्तर ही उनका समाधान करेगा।

लेखक- देखिए, शुरूआती दौर में मैं अपने सुख, अपने आनंद के लिए लिखता था। धीरे धीरे मैंने लोगों की पसंद नापसंद जानकर लिखना शुरू किया। लोगों से सराहना तो मिली पर कोई पुरस्कार नहीं मिला।
यह पुस्तक मैंने विश्वस्तर के निर्णायकों के दिलोदिमाग का, सूक्ष्म अध्ययन करके लिखी और पुरस्कार जीतने में सफल रहा।

(अचानक दर्शकों का ग्राफ तेजी से नीचे आने लगा)

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शर्मिला चौहान
ठाणे (पश्चिम)
मो.नं.9967674585
[06/12/2022, 15:11] Sharmila Chouhan: लघुकथा- "मनबावरा" 
(एकालाप शैली)



मुझे माफ़ कर दीजिए मैनेजर साब! मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई।
मैं सात सालों से यहाँ काम कर रहा हूँ, ना जाने ऐसा क्यूँ हो गया?  मैंने हज़ारों रुपयों का व्यवहार किया परंतु दो बार से मन बेकाबू हो गया। 
पहली बार दो महीने पहले पाँच हज़ार निकाले थे। तभी आपको अंदाजा हो गया होगा.. मुझे इस बार माफ़ कर दीजिए। मेरे बीबी-बच्चों का बुरा हाल हो जाएगा। 
आज मैंने पाँच हज़ार.. नहीं शायद छ: हज़ार निकाले। मैं हिसाब में बराबर करने वाला था पर आपने मेरी नीयत पहचान ली। होटल के गेट पर पुलिस आई है।
मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ, पाँव पकड़कर माफ़ी माँगता हूँ। दया कीजिए, मुझे पुलिस के हवाले मत कीजिए। मैं ये रूपए अभी वापस रख दूँगा। भीख मांगता हूँ।

उद्विग्नता वश वह अपने पास ही के  टेबल पर, दो दिनों से मृत पड़े फोन पर मैनेजर से इकरार कर रहा था। खिड़की से होटल के गेट के सामने खड़ी पुलिस की जीप देखकर, पसीने से भीगा थर-थर काँप रहा था। अपने कमीज़ में रखे नोटों से मुक्ति चाह रहा था।
अगले मिनट पुलिस की गाड़ी रास्ता पूछते हुए आगे निकल गई और  नोटों के बंडल पर उसकी अँगुलियाँ फिर कसने लगीं।


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शर्मिला चौहान
ठाणे महाराष्ट्र
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com

शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

अनंत आकांक्षा वैवाहिक कार्यक्रम 🌹

॥ ॐ श्री गणेशाय नम: ॥
     ॥ जय माँ आशापूरा ॥

कुलदैवत दुल्हादेव की असीम कृपा से 

चि. अनंतपाल
 एवं
 चि. आकांक्षा

के शुभविवाह समारोह का आयोजन होटल अमर महल पैलेस ओरछा, बेतवा नदी के किनारे 4/12/2023 करने का निश्चय किए हैं।

दिनांक 1/12/2023 को वैवाहिक  कार्यक्रम का श्रीगणेश माताजी की पूजा, बड़े देव की पूजा से होगी। 

2/12 को बस से नागपुर से ओरछा के लिए हम सब प्रस्थान करेंगे जो 10-12 घंटे का होगा।

3/12 को वैवाहिक कार्यक्रम और  4 /12 को विवाह विधि सायंकाल तक संपन्न करने का विचार है।

दि.5/12 को सुबह ओरछा से नागपुर के लिए निकलना है।

दि. 6/12 को दूल्हा देव के बधाई की  पूजा होगी। 
उसी दिन शाम को नागपुर में reception समारोह सेंटर पॉईंट होटल में आयोजित करेंगे।

दि. 7/12 को सुबह श्री सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन करेंगे।
शाम तक नागपुर से ठाणे आयेंगे। 

दि. 8/12 के शाम को ठाणे में  reception रखेंगे।

परिवार के प्रत्येक सदस्य का यथायोग्य सहयोग अपेक्षित है। विवाह की तैयारियों हेतु समूह पर चर्चा होती रहेगी।

चौहान परिवार

लघुकथाएंँ

‌"जैसे को तैसा"



अपनी भुजाओं को शान से देखता छंगू , शेर की मस्त चाल से गली पार कर रहा था। आसपास के लोग उसे सलामी देकर  अपना फर्ज़ निभा रहे थे।

"अबे रतन, एक गिलास लस्सी तो पिला, मलाई मारके।" सड़क किनारे के हाॅटल में घुसते हुए छंगू ने आदेश दिया।

उसके आते ही सुई पटक सन्नाटा छा गया। मालिक ने नौकरों को घूरकर देखा। इस छंगू को रोज़ मुफ्त की लस्सी पिलाना सबको भारी पड़ता था।

"अबे! सब के सब मुँह क्या ताक रहे हो? लस्सी पिलाओ।" छंगू की दबंग आवाज़ गूंँज रही थी।

"पहलवान साहब, आप को एक क्या दो-दो गिलास लस्सी पीनी चाहिए। आज हम चंदा जमा करने में लगे हैं। जो सबसे ज्यादा चंदा देगा, उसको कल हार पहनाकर सम्मानित किया जाएगा। " सांँस लेकर रतन ने फिर कहा, "आपको मालूम अभी जग्गू दादा भी आने वाले हैं। हम उन्हीं का इंतजार कर रहे हैं।‌ आखिर उनसे ज्यादा दरियादिल कौन है इस कस्बे में।" लस्सी पर मलाई भरकर रतन ने छंगू को दिया।

"क्या सचमुच जग्गू आने वाला है?" छंगू ने रतन को टटोला।

"आने भी वाले हैं और सुना है कि हॉटल के इस काम में दिल खोलकर गुप्त दान भी देने वाले हैं। असली दान तो गुप्त ही होता है पहलवान जी।" रतन ने तीर छोड़ा।

"ऐसा भी क्या रतन, मैं तो हमेशा ही आता हूँ यहाँ। अब मेरे पास अभी तो दांव में जीते दो हजार रुपए हैं। ये मैं दान करता हूँ परंतु तुझे तो मालूम हैं ना कि मैंने रुपए दिए‌ हैं, तो अब कल हार मुझे पहनाना‌।" आज रतन ने पासा पलट दिया था। आज छंगू ने दो हजार की एक गिलास लस्सी पी ली थी।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

221 2121 1221 212

221 2121 1221 212

लफ्ज़ों के तीर खूब चलाता है आदमी
दुश्मन बहुत ज़ुबां से बनाता है आदमी।।1।।

अपनी खुशी की चाह में भटके वो दर-बदर
औरों की चाहतों को चुराता है आदमी।।2।।

घर उसने जो खड़ा किया अब वो मकान है
सामान कीमती से सजाता है आदमी।।3।।

मौका मिला कभी तो भरी जेब ही सदा
पैसों के जोर सबको नचाता है आदमी।।4।।

मतलब निकल गया तो गया भूल फिर जहां
माता पिता का प्यार भुलाता है आदमी।।5।।

हैं ऐब खुद में लाख कहे पाक खुद को पर
औरों की गल्तियों को गिनाता है आदमी।।6।।

फैला रखे जो स्याह ज़रुरत के दायरे
निज स्वार्थ के ही दीप जलाता है आदमी।।7।।


शर्मिला चौहान