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गमों को हमेशा छुपाती है औरत
भरी आँख खुशियाँ लुटाती है औरत।।1।।
बनी नींव सहती रहे बोझ सबका
मकां को मगर घर बनाती है औरत।।2।।
खड़ी धूप में खुद थपेड़ों को झेले
कि आँचल से छैयाँ कराती है औरत।।3।।
दिए ज़ख्म लाखों ज़माने ने उसको
मगर हँस के मरहम लगाती है औरत।।4।।
नदी बन के सींचे वो रिश्तों की धरती
किनारों को पुल बन मिलाती है औरत।।5।।
घना खूब छाए तिमिर जब जगत में
तो आँगन में दीपक जलाती है औरत।।6।।
पड़ी चंद बूँदें भरी नेह से जब
महक मोगरे सी वो जाती है औरत।।7।।
निभाती रहे झुक के बंधन खुशी से
ग़लत बात पे सिर उठाती है औरत।।8।।
कहाँ से चली थी कहाँ आज पहुँची
सरल राह खुद ही बनाती है औरत।।9।।
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शर्मिला चौहान
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