(संशोधित ग़ज़ल)
1222 1222 1222 122
किनारों पर नहीं अपना ठिकाना चाहती हूँ।
नदी उन्मुक्त सी बन कर दिखाना चाहती हूँ।।1।।
थपेड़ों से थकी टूटी पड़ी थी नाव कब से
बनाकर फिर नई उसको चलाना चाहती हूँ।।2।।
कतर कर पँख सपनों के उन्हें बौना रखा था
गगन तक सपनों का अब कद बढ़ाना चाहती हूँ।3।।
महकते फूलों की बगिया थी चाहा जिसने तोड़ा
कुछेक काँटे चमन में अब उगाना चाहती हूँ।।4।।
बड़े दावे किया करते थे बातों से कभी वो
उन्हीं दावों को अब मैं आज़माना चाहती हूँ।।5।।
मिले जो चंद रिश्ते खून के बंधन से बँधकर
उन्हीं के कत्ल पर आँसू गिराना चाहती हूँ।।6।।
पेशानी पर पड़ी सलवट गवाही खूब देती
कि चिन्ता छोड़ अब इनको हटाना चाहती हूँ।।7।।
*****************
शर्मिला चौहान
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें