"रहिमन पानी राखिए"
(व्यंग्य)
शिवा ने पाठ पढ़ना शुरू किया। सामने दीवान पर विराजमान दादी, चश्में के पीछे से बराबर अपनी नज़र बनाए रखीं थीं। दो बार टोकते हुए कहा भी, "दोहे पढ़ रहे हो तो ज़रा लय ताल में पढ़ो, क्या अपनी अम्माँ की बनाई तरकारी की तरह बेस्वाद, बेसुर बने हो।" चश्में को ज़रा नीचे झुकाते हुए, दादी ने थोड़ी दूर खड़ी अपनी बहू लता को कनखियों से देखा।
शिवा इस नज़र को खूब पहचानता था, बस झट दादी के पास आकर चिपट गया।
"अम्माँ सचमुच ही बड़ा फीका खाना बनातीं हैं। आपने एक दिन जो बैंगन का भरता बनाया था ना वाह! कितना टेस्टी था।" एक तीर दो निशाने,दादी ने पढ़ाई के लिए डाँटना बंद कर दिया और आँचल में बँधा पाँच का सिक्का लाड़ले को थमा दिया।
"जा जल्दी से दोहे गाकर याद कर ले फिर संतरे की नहीं तो चूरन की गोली ले आना। मुझे भी एक देना।" उसके बालों को अपनी अंगुलियों से संवारती दादी को देख लता ने अपना माथा ठोक लिया।
"पढ़ाई-लिखाई तो थैली में बाँधकर, खूँटे में लटका दो। उन्हीं की गोद में छुपे बैठो, एक को तो बिगाड़ रखीं हैं अब तुम्हारी बारी है।" लता ने सामने से आते अपने बड़े बेटे भुवन को देखकर कहा।
"देखा भुवन, कैसी कैंची की तरह कतर-कतर ज़ुबान चलती है इसकी। हाय राम! तुम अपने ही साथ क्यों ना ले गए मुझे।" बरामदे में माला चढ़ी अपने पति की लटकती तस्वीर को देखकर दादीआँसू बहाने लगी।
"नल में तो पानी नहीं आ रहा, आँखों से गंगा-जमुना बह पड़ती है।" बुदबुदाती लता के अस्पष्ट शब्दों को सुनने के लिए दादी ने एक क्षण के लिए रोना बंद कर दिया और फिर लय में रोने लगी।
पाँच रुपए से कल्पना को पंख मिल गए। चूरन की गोलियांँ दो रुपए, दो की चाकलेट, बचे एक का क्या करना चाहिए सोचता हुआ शिवा दूकान पर जा पहुँचा।
"पाँच रुपए का सिक्का घुमा रहे हो, बुढ़िया की पोटली से चुरा लाए क्या? नहीं तो आकर हमसे वसूल लेगी।" दूकानदार पोपली हँसी हँसने लगा।
"क्यों करूँ चोरी, दादी ने दिया है।" दूकानदार के कानों में फुसफुसाया, "दादी से पैसे लेना हो तो अम्माँ की बुराई कर दो, अम्माँ से दूध, घी ज़्यादा लेना हो तो दादी की कर दो।" गहरा राज खोल दिया शिवा ने।
"बड़े शातिर हो।" कहते हुए दूकानदार ने सामान दे दिया। जाते जाते शिवा ने चूरन की एक गोली बरनी से निकाल कर मुँह में डाल ली।
"खरीदी वाली खाओ ना बच्चू, हमें चूना काहे लगा रहे हो?" तब तक तो शिवा नौ दो ग्यारह हो गया था।
दरवाजे से ही शिवा ने घर की स्थिति का जायज़ा लिया।
"शरम लाज कहाँ बची है, आँखों का पानी ही मर गया है। हाय हाय! कैसी पनौती बहू दी राम जी।" दादी जोरों से प्रलाप कर रहीं थीं और पापा उनके पैर दबा रहे थे।
"जा, तू ही लायक होता तो ये दिन ना देखने पड़ते।" अपने पैर को पापा के हाथों से दादी ने झटक लिया।
पापा कमरे में गए और शिवा दबे पाँव दादी के पास आ गया। दादी ने इधर उधर का नज़री मुआयना किया और चूरन की गोली मुँह में डाल ली।
गोली जीभ पर रखी और असर शरीर पर होने लगा। खट्टा-मीठा रस जिव्हा पर से सरक कर, सर्प की चाल से लहराता गले तक जा पहुंँचा।
स्वादेन्द्रिय के जागृत होने से, उदर की चटपटी आहुति की चाह रखने वाली अग्नि प्रदीप्त हो गई। लार सुड़कते ही ज़बान का चटकारा लगा और आँखों में चमक आ गई।
शिवा के हाथ से दो गोली झपटकर दादी ने, अपने पल्ले की गाँठ में बाँध ली।
"चल जा अब, जरा मन लगाकर पढ़ना।" कहती हुई दीवान से उतरती दादी ने शिवा को बस्ते की ओर धकेल ही दिया। दादी के तेवरों के आदी शिवा ने, मुँह में चाकलेट डालकर फिर से दोहे रटने की शुरुआत कर दी।
नल के नीचे रखी बाल्टी, टोंटी की ओर बड़े प्रेम से निहार रही थी। प्रियतम की प्यारभरी फुहार के बिना वह शुष्क, बेजान पड़ी थी।
लता ने रसोई में जाकर मटके को टटोला, पानी तली में चला गया था।
"हमारे स्नान का बखत हो गया, दो बाल्टी पानी तो ला दो कोई। हमारा दीन धर्म खराब ना करो बुढ़ापे में।" आँगन की ओर देखती दादी कहने लगी।
"बाहर का चूरन, चाकलेट, पैकेट के चिप्स छुप छुप कर खाती हो, तब दीन धर्म की याद नहीं आती आपको। कौन लाएगा हैंड पंप से पानी, अब मुझे यह भी करना पड़ेगा क्या?" लता रसोईघर से चिल्लाने लगी।
"अरे जा रे भुवन, तू पानी लाकर दे। तेरी अम्माँ की ज़ुबान बड़ी तेज़ चलने लगी है। नहा धोकर पूजा पाठ करूँ तो शांति मिलेगी।" दादी की आवाज सुनकर भुवन का चेहरा उतर गया।
"इस जवानी में पानी भरने का काम, दादी भी ना हुँह.!" भुवन ने दोनों बाल्टियाँ पकड़ीं और मुस्कुराते हुए शिवा को देखा तो चिड़ गया। बाल्टियांँ छोड़ बरामदे की ओर भागा और शिवा को दो तमाचे जड़ दिए।
"कब से पढ़ने का स्वांग रचा रहा है, एक दोहा याद नहीं हुआ अब तक।" गुस्से का प्रेशर था कि चांटा जरा जोर पड़ गया और आँखों से शिवा उस दबाव को निकालने में लग गया।
सुबकती हुई आवाज़ गूँजने लगी।
"रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गए ना उबरे मोती मानुष चून।"
अब सुर-ताल, लय सब एकदम परफेक्ट था।
दोनों हाथों में बाल्टी उठाए, शिवा घर से बाहर निकल गया। पिछले साल ही मोहल्ले में सरकारी खर्चे से तीन हैंडपंप लगाए थे। बड़ा जोर-शोर हुआ था उद्घाटन। हैंडपंप को फूलों की मालाओं, रंग बिरंगे पेपर से दूल्हे की तरह सजाया गया था। बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम, खाना पीना सब हुआ था।
भुवन की आँखों के सामने, महानगर से आई दोनों डांसरों के लटके-झटके मचलने लगे।
पतुरियों का नाच गाना तो बहुत देखा था बचपन से, शादी-ब्याह में, मुंडन-छेदन में, तिलक- सगाई में और चुनाव के आगे पीछे, लेकिन शहर से आई डांसरों की बात ही निराली थी। अंग अंग का थिरकना, उनका कसा छोटा पहनावा और अदाएँ, सोचकर ही शरीर में बिजली कौंध गई।
एक सुखद अहसास, मस्तिष्क के केंद्र से आदेश मिला और रोम रोम आनंद की अनुभूति से हिलोरें लेने लगा। उत्तेजना की चरम सीमा पर भुवन चलते चलते थिरकने लगा।
"फटाक.!" यह क्या, हैंडपंप के सामने किसी का भरा हुआ बरतन ठोकर से गिर गया।पानी का छोटा सा पोखर, बरतन के चारों ओर बना और प्यासी धरती ने क्षण में ही उसे गटक लिया।
"अंधे हो गए क्या? पानी से भरा बर्तन नहीं दिखा। जवानी का जोश कुछ ज़्यादा चढ़ गया है जो पूरा पानी गिरा दिया।" सामने अधेड़ आंटी ने जी भर गरिया दिया और अपना खाली बर्तन उठा कर जाने लगी।
"आ़टी, भर लीजिए दुबारा, मैं चला देता हूंँ हैंडपंप।" भुवन ने अपनी सभ्यता की कतरनों को जोड़कर, सम्मान की चादर सामने भेंट कर दी।
भुवन का ऊँचा पूरा शरीर, भरी भुजाओं को घूरती उस औरत ने कहा, "अपनी ही बाल्टी भर लो तुम तो इस हैंडपंप से अब।" और वह बंदूक़ की गोली सी दनदनाती निकल गई।
"अजीब लोग हैं।" कहते हुए भुवन ने हैंडपंप की टोंटी के नीचे बालटी रखी और पंप पर जोर आजमाईश करने लगा। अपनी बलिष्ठ भुजाओं को बड़े प्यार और गर्व से देखते हुए, जोश से धड़ाधड़ हैंडल चलाने लगा।
"खराब पड़े हैंडपंप को क्या जड़ से उखाड़ फेंकोगे?" बाजू की टपरी से चाय पीते गुप्ता जी ने आवाज़ लगाई।
"अरे, यह खराब था तो आंटी के बर्तन में पानी कहाँ से आया था?" भुवन ने पूछा।
"दो घंटे पहले भरकर गई थी कहीं, उसके बाद पंप खराब हुआ।" अब टपरी वाले ने खिखियाते हुए कहा।
"अब पानी कहाँ से मिलेगा?" जवान खून निराश हो गया।
"दो हैंडपंप खराब हैं, तीसरे पर जाओ जो मंदिर के मोड़ पर है।" पानी से भरी अपने प्लास्टिक के पीपों को देखकर, दाँत निपोरता टपरी वाला बोला।
उसे आग्नेय दृष्टि से घूरते हुए भुवन ने, अपने दाएं-बाएं की सुंदरियों के कान पकड़, हथेली में भींच आगे कदम बढ़ा लिए। सफेद पतरे की चमचमाती दाएँ में और सांवली सलोनी बाएं में सुशोभित थी। दोनों अपने प्रियतम की तलाश में मानो गुनगुना रहीं थीं।
"आजा रे, आजा रे मेरे प्रिय जल आजा, आके मुझमें समा जा रे।।"
हट्टे कट्टे मुस्टंडे जवान को बाल्टियाँ लेकर घूमते देख, सड़क के किनारे खड़ा लड़कियों का झुंड ठहाके लगाने लगा। अपना आगा-पीछा पूरी तरह चैक करने के बाद, भुवन उनको घूरता हुआ आगे बढ़ गया।
आगे भीड़ खड़ी थी।
"किस बात की भीड़ लगी है भाई?" एक व्यक्ति से भुवन ने पूछा।
"हाथों में बाल्टियाँ पकड़े, क्या सिनेमा देखने चले हो। लाइन है पानी के लिए, हमारे पीछे खड़े हो जाओ।" बुरा सा मुँह बनाते वह आदमी थोड़ा आगे सरक गया।
"यहाँ से हैंडपंप तो दूर है, इतनी लंबी लाइन।" भुवन का मुँह खुला रह गया।
अपनी बाल्टी को लाइन में लगाकर भुवन आगे की स्थिति का जायज़ा लेने चल पड़ा। घोड़ी चढ़ने को तैयार दूल्हे की तरह, हैंडपंप को लोगों ने चारों ओर से घेर रखा था। आक्टोपस के झूठे पैरों सी, गोलाकार भीड़ में सात-आठ लाइन निकली थी।
"सामने क्यों जा रहे हो, देखते नहीं हम घंटे भर से नंबर लगाए खड़े हैं।" गुर्राते हुए एक नौजवान ने भुवन को टोका।
"खाली हाथ हूँ कैसे पानी भर लूँगा, सिर्फ देख रहा हूंँ भाई।" भुवन भी तैश में आ गया।
"होशियारी मत करो, जाओ पीछे। अपने आपको सनी देओल समझ रहा है।" भुवन की खुली बांँह को देखकर सब हँसने लगे।
"ज्यादा चपड़ चपड़ की तो धर दूँगा दो चार।" भुवन ने चिढ़कर कहा।
"मारेगा, झगड़ा फसाद करेगा। हीरोगिरी चढ़ी है तेरे को।" कहते हुए एक दो लोगों ने उससे धक्का मुक्की की।
धक्का मुक्की, शोर-शराबा अपने पूरे शबाब पर था, कुछ आग में घी डाल रहे थे, कुछ वीर और रौद्र रस का आस्वाद ले रहे थे। इधर हड़कंप मची और उधर हैंडपंप ने अपने हैंड खड़े कर दिए।
"खट खट खट.!" एक चुप्पी। सारा कुछ थम गया।
लड़ते झगड़ते लोग रूक गए, सबके चेहरों का पानी सूख गया।
अब बारी थी दोषारोपण करने की, चुनाव में पराजित पार्टी के कार्यकर्ताओं की तरह, हैंडपंप के टूटने का दोषारोपण एक-दूसरे पर करने लगे।
भुवन लपककर बाहर निकल आया, आखिर अपना पानी बचाना भी तो जरूरी था।
लाइन तो कब की तितर-बितर हो गई थी।
देखा तो, उसकी दाएँ अंग वाली गोरी चिट्टी, नवब्याहता सी दमकती बाल्टी का अस्तित्व नदारद था। वामांगिनी सांवली सलोनी, भुवन की हथेली में लिपट जाने को आतुर जान पड़ती थी।
अपना पसीना पोंछता, रोनी सूरत लिए भुवन ने उसे उठा लिया।अब वह दाएँ हाथ पर इठला रही थी।
इकलौती खाली बाल्टी लिए भुवन ने घर के दरवाजे पर पैर रखा ही था कि अम्माँ की चहकती आवाज़ सुनाई दी।
"नगरपालिका को दया आ गई, चौबीस घंटे के बाद नल की टोंटी से निर्झर सा जल झर रहा है। अरे, भुवन! कहाँ भटक रहे थे।" हाथ में एक ही बाल्टी वो भी खाली देख लता ने अपना माथा ठोक लिया।
भुवन की दशा देखकर, पिछले दो घंटे से पढ़ाई का स्वांग रचाने वाला शिवा हँसकर ज़ोर ज़ोर से, पूरे सुर ताल में दोहा गाने लगा।
"नल प्रभु पानी दीजिए, बिन पानी सब सून।
पानी बिना सब भुगतते, मोती, भुवन और चून।।
अपनी जोड़ तोड़ से दोहा बना लेने की कला पर मुग्ध हो, उसने आज के लिए बस्ता बंद कर दिया।
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शर्मिला चौहान
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