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लफ्ज़ों के तीर खूब चलाता है आदमी
दुश्मन बहुत ज़ुबां से बनाता है आदमी।।1।।
अपनी खुशी की चाह में भटके वो दर-बदर
औरों की चाहतों को चुराता है आदमी।।2।।
घर उसने जो खड़ा किया अब वो मकान है
सामान कीमती से सजाता है आदमी।।3।।
मौका मिला कभी तो भरी जेब ही सदा
पैसों के जोर सबको नचाता है आदमी।।4।।
मतलब निकल गया तो गया भूल फिर जहां
माता पिता का प्यार भुलाता है आदमी।।5।।
हैं ऐब खुद में लाख कहे पाक खुद को पर
औरों की गल्तियों को गिनाता है आदमी।।6।।
फैला रखे जो स्याह ज़रुरत के दायरे
निज स्वार्थ के ही दीप जलाता है आदमी।।7।।
शर्मिला चौहान
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