शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2023

221 2121 1221 212

221 2121 1221 212

लफ्ज़ों के तीर खूब चलाता है आदमी
दुश्मन बहुत ज़ुबां से बनाता है आदमी।।1।।

अपनी खुशी की चाह में भटके वो दर-बदर
औरों की चाहतों को चुराता है आदमी।।2।।

घर उसने जो खड़ा किया अब वो मकान है
सामान कीमती से सजाता है आदमी।।3।।

मौका मिला कभी तो भरी जेब ही सदा
पैसों के जोर सबको नचाता है आदमी।।4।।

मतलब निकल गया तो गया भूल फिर जहां
माता पिता का प्यार भुलाता है आदमी।।5।।

हैं ऐब खुद में लाख कहे पाक खुद को पर
औरों की गल्तियों को गिनाता है आदमी।।6।।

फैला रखे जो स्याह ज़रुरत के दायरे
निज स्वार्थ के ही दीप जलाता है आदमी।।7।।


शर्मिला चौहान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें