"जैसे को तैसा"
अपनी भुजाओं को शान से देखता छंगू , शेर की मस्त चाल से गली पार कर रहा था। आसपास के लोग उसे सलामी देकर अपना फर्ज़ निभा रहे थे।
"अबे रतन, एक गिलास लस्सी तो पिला, मलाई मारके।" सड़क किनारे के हाॅटल में घुसते हुए छंगू ने आदेश दिया।
उसके आते ही सुई पटक सन्नाटा छा गया। मालिक ने नौकरों को घूरकर देखा। इस छंगू को रोज़ मुफ्त की लस्सी पिलाना सबको भारी पड़ता था।
"अबे! सब के सब मुँह क्या ताक रहे हो? लस्सी पिलाओ।" छंगू की दबंग आवाज़ गूंँज रही थी।
"पहलवान साहब, आप को एक क्या दो-दो गिलास लस्सी पीनी चाहिए। आज हम चंदा जमा करने में लगे हैं। जो सबसे ज्यादा चंदा देगा, उसको कल हार पहनाकर सम्मानित किया जाएगा। " सांँस लेकर रतन ने फिर कहा, "आपको मालूम अभी जग्गू दादा भी आने वाले हैं। हम उन्हीं का इंतजार कर रहे हैं। आखिर उनसे ज्यादा दरियादिल कौन है इस कस्बे में।" लस्सी पर मलाई भरकर रतन ने छंगू को दिया।
"क्या सचमुच जग्गू आने वाला है?" छंगू ने रतन को टटोला।
"आने भी वाले हैं और सुना है कि हॉटल के इस काम में दिल खोलकर गुप्त दान भी देने वाले हैं। असली दान तो गुप्त ही होता है पहलवान जी।" रतन ने तीर छोड़ा।
"ऐसा भी क्या रतन, मैं तो हमेशा ही आता हूँ यहाँ। अब मेरे पास अभी तो दांव में जीते दो हजार रुपए हैं। ये मैं दान करता हूँ परंतु तुझे तो मालूम हैं ना कि मैंने रुपए दिए हैं, तो अब कल हार मुझे पहनाना।" आज रतन ने पासा पलट दिया था। आज छंगू ने दो हजार की एक गिलास लस्सी पी ली थी।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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