बुधवार, 17 मई 2023

1121 2122 1121 2122

( आदरणीय सर के सुझावों पर संशोधित ग़ज़ल) ( मिली खाक में मोहब्बत..)

1121 2122  1121 2122


डरा सा दिखे हमेशा, रहे मौन ये बश़र है
सहे घात सारे जीवन, बड़ा ही विकट समर है ।।1।।

रखे बाँधकर थे रिश्ते, लगे दूर बिखरे बिखरे
लगा खोजने मेरा मन, रही कौन सी कसर है।।2।।

जो बिना कहे समझ ले, पढ़े दिल की बात दिल से
बड़ी पारखी सी रहती, वो जो माँ की इक नज़र है।।3।।

 थे जो बाग ताल पोखर, नहीं  दिखते अब यहांँ सब
बिना उनके सूना सूना, पड़ा ये बड़ा शहर है।।4।।

कली दिल की खिल गई जब, मधुमास सा लगे सब
खुली आँखें बुनती सपने, तेरी प्रीत का असर है।।5।।

करे दूर तम के साए, खुले द्वार ताके रवि को
भरे आस सबके मन में, ये तो भोर का पहर है।।6।।

बने कागज़ों से कश्ती, चली थोड़ी डूबी फिर वो 
जहांँ खेलता था बचपन, नहीं अब वहाँ नहर है।।7।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

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