मंगलवार, 12 सितंबर 2023

हिंदी भावभूमि के ई-पत्रिका संकलन में प्रकाशित

"त्रिपदा छंद"


मोह लोभ के पाश।
जितने कसते छोर
प्रेम शांति हो नाश।।

नदियाँ उगलें रोष।
हुई मलिन कृशकाय
पूछें किसका दोष।।

पर्वत तो हैं मौन।
कल कल उतरी धार
सुर लय भरता कौन।।

गगन धरा का साथ।
बरसे बरखा नेह
मिले क्षितिज में हाथ।।


सच्चे हैं मनमीत।
ग़ज़ल विविध सब छंद
कविता दोहा गीत ।।


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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

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